Vishnu Thursday Vrat Katha - विष्णु बृहस्पतिवार व्रत कथा
व्रत कथा

Vishnu Thursday Vrat Katha – विष्णु बृहस्पतिवार व्रत कथा

Vishnu Thursday Vrat Katha – विष्णु बृहस्पतिवार व्रत कथा

विष्णु बृहस्पतिवार व्रत कथा – दानी राजा की कन्जूस पत्नी का बृहस्पतिदेव द्वारा मार्गदर्शन एवं उद्धार की कथा

प्राचीन समय का दृष्टान्त है, भारतवर्ष में एक अत्यन्त धर्मात्मा, प्रतापी एवं दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य नियमपूर्वक निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान आदि कर उनकी सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही निर्धनों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी तथा राजा को भी दान देने से रोकने का प्रयास करती थी।

एक दिन राजा आखेट के लिये वन की ओर गये हुये थे। रानी महल में अकेली थी। उसी समय भगवान विष्णु के अंशावतार बृहस्पति देव एक साधु का वेष धर कर राजमहल में भिक्षाटन हेतु पधारे तथा द्वार पर भिक्षा की याचना करने लगे। रानी ने साधु महाराज को भिक्षा देने से मना करते हुये कहा – “हे साधु महाराज! मैं तो इस दान-पुण्य से अत्यन्त व्यथित हो गयी हूँ। मेरे पति भी समस्त धन-सम्पदा दान-दक्षिणा में लुटाते रहते हैं। मेरी मनोकामना है कि हमारा समस्त धन-वैभव नष्ट हो जाये ताकि मुझे यह दान-पुण्य न करना पड़े, न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।”

साधु रूपी भगवान ने कहा – “देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। इस संसार में सभी मनुष्य धन-सम्पदा तथा सन्तान आदि की कामना करते हैं। पुत्र एवं लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिये। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिये प्याऊ, यात्रियों के लिये धर्मशालाओं का निर्माण करवाओ। जो निर्धन अपनी कुँवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे अनेक धार्मिक पुण्य कार्य हैं जिनको करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में प्रकाशित होगा।” परन्तु रानी पर साधु जी के उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह बोली – “महाराज आप मुझे कुछ न समझायें। मुझे ऐसे धन की कोई कामना नहीं जो मैं यत्र-तत्र बाँटती डोलूँ तथा उसकी देखभाल करूँ।”

साधु ने उत्तर दिया – “यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो तथास्तु! तुम मेरे द्वारा वर्णित कृत्यों को करना जिसके फलस्वरूप तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्‌टी से अपने केश धोकर स्नान करना, धोबी से भट्‌टी चढ़ाकर वस्त्र धुलवाना, राजा को क्षौरकर्म करवाने को कहना तथा तामसिक भोजन करना। ऐसा करने से आपका समस्त धन नष्ट हो जायेगा।” इतना कहकर वह साधु महाराज के रूप में आये भगवान वहाँ से अन्तर्धान हो गये। साधु जी के वचनानुसार कार्य करते हुये रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही व्यतीत हुये थे, कि उसकी समस्त धन-सम्पत्ति नष्ट हो गयी। यहाँ तक कि राज-परिवार में एक समय के भोजन का भी अभाव हो गया।

एक दिन राजा ने रानी से कहा कि – “हे रानी! तुम यहीं प्रतीक्षा करो, मैं अन्य देश में आजीविका का प्रबन्ध करने जा रहा हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी मुझसे परिचित हैं। अतः मैं कोई लघु अथवा निम्न कार्य नहीं कर सकता।” यह कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह वन से लकड़ी काटकर उन्हें नगर में विक्रय करने लगा। इस प्रकार एक लकड़हारे के रूप में वह अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। उधर राजा के परदेश गमन करने के उपरान्त रानी एवं उसकी दासी और अधिक दुःखी रहने लगीं।

एक समय तो इतनी दुर्गम स्थिति हो गयी कि रानी एवं दासी को सात दिवस तक भोजन प्राप्त नहीं हुआ। इससे व्याकुल होकर रानी ने अपनी दासी से कहा – “हे दासी! समीप ही के नगर में मेरी ज्येष्ठ बहन निवास करती है। वह अत्यन्त धनवान है। तू उसके समीप जा एवं कुछ सहायता ले आ जिससे हमारा कुछ जीवन-यापन हो जाये।” दासी रानी की बहन के समीप गयी। उस दिन गुरुवार था एवं रानी की बहन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा श्रवण कर रही थी। दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का सन्देश दिया, किन्तु रानी की बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह अत्यन्त दुःखी हुयी तथा उसे अत्यधिक क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को समस्त प्रकरण से अवगत कराया। दासी के मुख से अपनी बहन के व्यवहार के विषय में सुनकर रानी अपने भाग्य को कोसने लगी।

उधर रानी की बहन ने विचार किया कि – “मेरी बहन की दासी आयी थी, किन्तु मैं उससे वार्तालाप नहीं कर पायी, इससे वह अत्यन्त दुःखी हुयी होगी।” कथा श्रवण एवं पूजन समाप्त करके वह अपनी बहन के घर आयी तथा उससे बोली – “हे बहन! जिस समय तुम्हारी दासी मेरे घर आयी थी उस समय मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। परन्तु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं एवं न ही कुछ बोलते हैं, इसीलिये मैं नहीं बोली। कहो बहन! तुम्हारी दासी क्यों आयी थी?” रानी बोली – “बहन! तुमसे क्या छुपाऊँ, हमारे घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है।” ऐसा कहते-कहते रानी के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। उसने दासी समेत पिछले सात दिवस से भूखे रहने तक का सम्पूर्ण वृत्तान्त अपनी बहन को विस्तार पूर्वक सुना दिया। रानी की बहन ने कहा – “देखो बहन! भगवान बृहस्पति सभी की मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। एक बार भली प्रकार अवलोकन करो, सम्भवतः तुम्हारे घर में अन्न हो।”

पहले तो रानी को विश्वास ही नहीं हुआ किन्तु बहन के बारम्बार आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को भण्डार गृह में भेजा तो उसे वास्तविकता में अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। दासी रानी से बोली – “हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसीलिये क्यों न इनसे व्रत एवं कथा की विधि ज्ञात कर लें, ताकि हम भी व्रत कर सकें।” यह सुनकर रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के विषय में पूछा।

रानी की बहन व्रत का वर्णन करते हुये बोली – “बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल एवं मुनक्का से भगवान विष्णु का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीप प्रज्वलित करें, तदुपरान्त व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें तथा पीला भोजन ही ग्रहण करें। बृहस्पतिवार व्रत कथा के उपरान्त श्रद्धापूर्वक आरती करनी चाहिये। तत्पश्चात् प्रसाद वितरित कर उसे ग्रहण करना चाहिये। इससे बृहस्पति देव प्रसन्न होते हैं। बृहस्पति देव स्वयं भगवान विष्णु के ही अंश हैं, अतः उनका पूजन विष्णु पूजन के समान फलदायक होता है। जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है उसे धन, पुत्र, स्वास्थ्य एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। भक्तिपूर्वक यह व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है तथा विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।” व्रत एवं पूजन विधि वर्णित करने के उपरान्त रानी की बहन अपने घर लौट गयी।

सात दिवस पश्चात् जब बृहस्पतिवार आया तो रानी एवं दासी ने व्रत रखा। अश्वशाला से चना एवं गुड़ लेकर आयीं। तदुपरान्त गुड़-चने से केले की जड़ तथा भगवान विष्णु का पूजन किया। किन्तु दोनों अत्यन्त दुःखी थे क्योंकि भगवान को अर्पित करने हेतु पीला भोजन नहीं था। उन दोनों ने श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन किया था, इसीलिये भगवान बृहस्पति उनसे अत्यन्त प्रसन्न थे। इसीलिये वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को प्रदान कर गये। भोजन पाकर दासी अत्यन्त प्रसन्न हुयी तथा प्रभु को भोग लगाकर उसने रानी सहित भोजन ग्रहण किया।

तदुपरान्त वे दोनों गुरुवार को व्रत एवं पूजन करने लगीं। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके जीवन में पुनः धन-सम्पदा का आगमन होने लगा। किन्तु धन-सम्पत्ति आते ही रानी पुनः पूर्ववत् आलस्य करने लगी। रानी को पूर्व की भाँति होता देख दासी ने कहा – “हे महारानी! आप पहले भी इसी प्रकार आलस्य करती थीं, आपको धन रखने में कष्ट होता था, जिसके कारण आपका सभी धन-धान्य नष्ट हो गया तथा अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन प्राप्त हुआ है तो आप पुनः आलस्य कर रही हैं।” रानी को समझाते हुये दासी कहती है कि – “अनेक कष्टों के उपरान्त प्रभु की कृपा से हमें यह धन प्राप्त हुआ है, इसीलिये हमें दान-पुण्य करना चाहिये, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिये तथा धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिये, जिससे तुम्हारे कुल के यश में वृद्धि होगी, स्वर्ग की प्राप्ति होगी तथा पितृ प्रसन्न होंगे।” दासी के वचनों ने रानी का हृदय परिवर्तन कर दिया तथा रानी अपना धन शुभ कार्यों में व्यय करने लगी, जिससे सम्पूर्ण नगर में उनका यश होने लगा।

उधर एक दिन राजा, लकड़हारे के समान जीवन-यापन करने के कारण दुःखी होकर वन में एक वृक्ष के नीचे बैठा अपनी दुर्दशा का विचार करके व्याकुल हो रहा था। बृहस्पतिवार का दिन था, एकाएक उस निर्जन वन में एक साधु महाराज प्रकट हुये। साधु वेष में वह स्वयं बृहस्पति देव थे। वे लकड़हारे के समीप आकर बोले – “हे लकड़हारे! इस निर्जन वन में तू चिन्ता मग्न क्यों बैठा है?” लकड़हारे ने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये उत्तर दिया – “हे मुनिवर! आप तो सर्वज्ञाता हैं, मैं भला आपसे अपनी पीड़ा क्या कहूँ।” इतना कहकर राजा रोदन करने लगा तथा रोते हुये उसने समस्त आत्म व्यथा साधु महाराज को सुनायी।

साधु रूपी भगवान ने कहा – “तुम्हारी धर्मपत्नी ने बृहस्पतिवार के दिन भगवान बृहस्पति का निरादर किया है जिसके फलस्वरूप उन्होंने तुम्हारी यह दुर्दशा कर दी है। अब तुम निश्चिन्त होकर मेरे निर्देशों का पालन करो, तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे तथा प्रभु पूर्व से भी अधिक सम्पत्ति तुम्हें प्रदान करेंगे। तुम बृहस्पतिवार के दिन कथा किया करो। दो पैसे के चने-मुनक्का लाकर उसका प्रसाद बनाओ तथा लोटे में शुद्ध जल में शक्कर मिलाकर चरणामृत तैयार करो। कथा सम्पन्न होने के पश्चात् अपने समस्त कुटुम्बीजनों एवं प्रियजनों के मध्य चरणामृत एवं प्रसाद वितरित कर स्वयं भी ग्रहण करो। ऐसा करने से भगवान तुम्हारी समस्त मनोकामनायें पूर्ण करेंगे।”

साधु महाराज के मुख से इन वचनों को सुनकर लकड़हारा बोला – “हे भगवन्! मुझे लकड़ी बेचकर इतना धन नहीं प्राप्त होता, जिससे भोजन के उपरान्त कुछ शेष रहे। मैंने रात्रि में स्वप्न में अपनी पत्नी को व्याकुल देखा है। ऐसा कोई साधन नहीं जिसके द्वारा मुझे उसकी तथा उसे मेरी कोई सूचना प्राप्त हो।” साधु ने कहा – “हे लकड़हारे! तुम किसी विषय में चिन्ता मत करो। बृहस्पति के दिन तुम प्रतिदिन की भाँति लकड़ियाँ लेकर नगर को जाओ। तुमको अन्य दिनों से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिसकी सहायता से तुम भली प्रकार भोजन कर लोगे तथा बृहस्पति देव के पूजन की सामग्री भी आ जायेगी। तुम श्रद्धापूर्वक बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुनो –

प्राचीन काल में एक अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी कोई सन्तान नहीं थी। उसकी पत्नी अत्यन्त मलिन थी। वह न ही स्नान करती तथा न ही किसी देवता का पूजन करती थी जिसके कारण ब्राह्मण देव अत्यन्त दुःखी थे। वे नाना प्रकार से पत्नी को समझाने का प्रयत्न करते थे किन्तु उसका कुछ प्रभाव नहीं होता।

कालान्तर में भगवान की कृपा से ब्राह्मणी ने एक रूपवती कन्या को जन्म दिया। वह कन्या बड़ी होने पर प्रतिदिन प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन एवं बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी। पूजन सम्पन्न होने पर विद्यालय जाते समय कन्या मुट्ठी में जौ के दाने लेकर जाती तथा मार्ग में बिखेरती जाती थी। भगवान की माया से जौ के दाने स्वर्ण के हो जाते थे और कन्या लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी। इन स्वर्ण के जौ के कारण ब्राह्मण अत्यन्त धनवान हो गया।

एक दिन वह बालिका सूप में सोने के जौ को फटक रही थी कि तभी उसके पिता ने कहा – ‘हे पुत्री! स्वर्ण के जौ के लिये सूप भी स्वर्ण का ही होना चाहिये।’ अगले दिन बृहस्पतिवार था कन्या ने व्रत का पालन किया तथा भगवान बृहस्पति से प्रार्थना करते हुये कहा – ‘यदि मैंने पूर्ण श्रद्धा एवं सत्यनिष्ठा से आपका पूजन एवं व्रत किया हो तो मुझे स्वर्ण का सूप प्रदान करें।’ बृहस्पति देव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। प्रतिदिन की भाँति वह कन्या विद्यालय से आते हुये मार्ग में स्वर्ण के जौ बीन रही थी उसी समय बृहस्पति देव की कृपा से उसे स्वर्ण का सूप प्राप्त हुआ। वह उस स्वर्ण के सूप को घर ले आयी तथा उसमें जौ फटकारने लगी। परन्तु उसकी माँ का वही आचरण था।

एक दिन की बात है कि वह कन्या सोने के सूप में जौ फटकार रही थी। उस समय उस नगर का राजकुमार वहाँ से निकला। इस कन्या के रूप एवं उसे स्वर्ण के सूप में स्वर्ण के जौ फटकारते देखकर राजकुमार उस पर मोहित हो गया तथा अपने महल आकर अन्न-जल त्यागकर उदास होकर लेट गया। राजा को यह सूचना प्राप्त हुयी तो वह अपने महामन्त्री सहित उसके समीप गये और कहा कि – ‘हे पुत्र! तुम्हें किस बात का कष्ट है? किसी ने तुम्हारा अपमान किया है अथवा किसी अन्य कारण से तुम्हारी यह स्थिति है? जो भी हो स्पष्ट कहो, मैं वही कार्य करूँगा जिसमें तुम्हारी प्रसन्नता होगी।’

अपने पिता के वचन सुनकर राजकुमार ने कहा – ‘पिता श्री! आपकी कृपा से मुझे कोई कष्ट नहीं है, किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है, परन्तु मैं उस कन्या से विवाह करना चाहता हूँ जो स्वर्ण के सूप में जौ फटकार रही थी।’ यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित होकर बोला – ‘हे पुत्र! इस प्रकार की कन्या तुम्हीं खोजकर लाओ। मैं उससे तुम्हारा विवाह अवश्य ही करवा दूँगा।’ राजकुमार ने उस कन्या के विषय में राजा को बताया। तदुपरान्त महामन्त्री उस कन्या के घर गये तथा ब्राह्मण देवता को समस्त प्रकरण से अवगत कराया। ब्राह्मण देव ने राजकुमार से अपनी कन्या के विवाह हेतु स्वीकृति दे दी। तत्पश्चात् पूर्ण विधि-विधान से ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ हो गया।

कन्या के घर से विदा होते ही पूर्व की भाँति उस ब्राह्मण देवता के घर में निर्धनता का वास हो गया। भोजन हेतु अन्न भी दुर्लभ हो गया था। एक दिन दुःखी होकर ब्राह्मण देवता अपनी पुत्री से भेंट करने गये। पुत्री ने पिता की दुःखी अवस्था को देखा तथा अपनी माँ की कुशल-क्षेम ज्ञात की। कन्या के पूछने पर ब्राह्मण ने यथास्थिति का वर्णन किया। कन्या ने नाना प्रकार का धन-धान्य प्रदान कर अपने पिता को विदा कर दिया। उस धन की सहायता से कुछ समय तो सुखपूर्वक व्यतीत हो गया किन्तु कुछ दिवस पश्चात् पुनः वही स्थिति हो गयी।

ब्राह्मण ने पुनः अपनी कन्या से जाकर सब कहा। पिता की व्यथा सुनकर कन्या बोली – ‘हे पिताजी! आप माताजी को यहाँ लेकर आयें। मैं उन्हें एक ऐसी विधि बता दूँगी जिससे आपकी निर्धनता सदैव के लिये नष्ट हो जायेगी।’ ब्राह्मण देव अपनी पत्नी को लेकर पहुँचे। कन्या ने माँ से कहा – ‘हे माता! तुम प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान विष्णु का पूजन करो एवं प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत करो। ऐसा करने से आपकी दरिद्रता दूर हो जायेगी।’ परन्तु उसकी माँ ने एक भी बात का अनुसरण नहीं किया तथा प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री के बच्चों की जूठन का सेवन कर लिया।

इससे उसकी पुत्री को भी अत्यन्त क्रोध आया तथा उसने रात्रि को कोठरी से सभी सामान निकाल कर अपनी माँ को उसमें बन्द कर दिया। प्रातःकाल उसे निकाला तथा स्नानादि कराकर पाठ करवाया जिसके प्रभाव से उसकी माँ की बुद्धि शुद्ध हो गयी तथा वह प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत का पालन करने लगी। इस व्रत के पुण्यफल से उस कन्या के माँ-बाप अत्यन्त ही धनवान एवं पुत्रवान हो गये। भगवान विष्णु एवं बृहस्पति देव की कृपा से इस लोक में नाना प्रकार के सुख भोगकर अन्त में वे स्वर्गलोक को प्राप्त हुये। इस प्रकार बृहस्पतिवार व्रत की कथा सम्पूर्ण होती है।”

इतना कहकर साधु जी वहाँ से अन्तर्धान हो गये। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर पुनः वही बृहस्पतिवार का दिन आया। लकड़हारा वन से लकड़ी काटकर नगर में बेचने गया, उसे उस दिन अन्य दिनों से अधिक धन प्राप्त हुआ। उस धन से राजा ने चना-गुड़ आदि लाकर श्रद्धा एवं भक्ति से गुरुवार का व्रत किया। व्रत के फलस्वरूप उसके सभी कष्टों का अन्त हो गया। परन्तु आगामी बृहस्पतिवार को वह व्रत करना भूल गया जिसके कारण भगवान बृहस्पति क्रुद्ध हो गये। उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा सम्पूर्ण नगर में यह घोषणा करा दी कि – “कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन नहीं पकायेगा, न अग्नि प्रज्वलित करेगा। समस्त प्रजा मेरे यहाँ भोजन करने आयेगी। जो कोई भी इस आज्ञा का उल्लङ्घन करेगा उसे मृत्यु दण्ड दे दिया जायेगा।”

राजा की आज्ञानुसार नगर के सभी लोग भोजन करने गये किन्तु लकड़हारे को पहुँचने में विलम्ब हो गया। इसीलिये राजा उसको भोजन कराने हेतु अपने महल ले गये। महल में लकड़हारा एवं राजा भोजन ग्रहण कर ही रहे थे कि रानी की दृष्टि उस खूँटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था। रानी को वहाँ हार नहीं दिखा। रानी ने विचार किया कि – “मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है।” उसी समय सैनिकों को आदेश देकर उसे कारागार में डलवा दिया गया। कारागार में लकड़हारा अत्यन्त व्यथित होकर विचार करने लगा कि – “पूर्व जन्म में मैंने कौन से कर्म किये होंगे जिसके कारण मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है।”

लकड़हारा विचलित मन से वन में मिले साधु महाराज का स्मरण करने लगा। उसी समय तत्काल बृहस्पति देव साधु के रूप में प्रकट हुये एवं उसकी दशा को देखकर कहने लगे – “अरे मूर्ख! तूने बृहस्पति देव की कथा नहीं की जिसके कारण तुझे यह कष्ट प्राप्त हुआ है। अब निश्चिन्त हो जा, बृहस्पतिवार के दिन कारागार के द्वार पर चार पैसे पड़े मिलेंगे। उनसे तू बृहस्पति देव का पूजन करना, तेरे सभी संकट हल हो जायेंगे।” बृहस्पतिवार को उसे चार पैसे पड़े मिले। लकड़हारे ने कथा का पाठ किया जिसके फलस्वरूप उसी रात्रि को बृहस्पति देव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा – “हे राजन्! तुमने जिस व्यक्ति को कारागार में बन्दी बना लिया है, वह निर्दोष है। वह एक प्रतापी राजा है। अतः उसे मुक्त कर देना। रानी का हार उसी खूँटी पर लटका है। यदि तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूँगा।”

प्रातःकाल राजा ने उठकर देखा कि हार तो खूँटी पर ही है। यह देख राजा ने लकड़हारे को बुलाकर क्षमा याचना की तथा लकड़हारे को यथायोग्य सुन्दर वस्त्राभूषण प्रदान कर विदा किया। बृहस्पति देव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर की ओर चल दिया। जब वह अपने नगर के समीप पहुँचा तो उसे अत्यधिक आश्चर्य हुआ। नगर में पूर्व से भी अधिक उद्यान, सरोवर, जलकूप, धर्मशालायें तथा मन्दिर आदि का निर्माण हो चुका था। राजा ने पूछा – “यह किसका उद्यान एवं धर्मशाला हैं?” नगर के सभी लोग कहने लगे कि – “यह सब कुछ रानी एवं उनकी दासी का है।” यह सुनकर राजा को आश्चर्य भी हुआ एवं क्रोध भी आया।

जिस समय रानी को यह सूचना प्राप्त हुयी कि राजा आ रहे हैं, तो उन्होंने दासी से कहा कि – “हे दासी! देख राजा हमको कितनी दुर्दशा में छोड़ गये थे। हमारी यह स्थिति देखकर वह लौट न जायें, इसीलिये तू द्वार पर खड़ी हो जा। आज्ञानुसार दासी द्वार पर खड़ी हो गयी तथा राजा के आगमन पर उन्हें अपने साथ भीतर ले आयी।” उस समय राजा ने क्रोधवश अपनी रानी से पूछा कि – “यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है?” तब उन्होंने कहा – “हमें यह सब धन बृहस्पति देव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है।” राजा ने निश्चय किया कि सात दिवस उपरान्त तो सभी बृहस्पति देव का पूजन करते हैं परन्तु मैं दिन में तीन बार कथा एवं प्रतिदिन व्रत का पालन करूँगा। अब प्रति क्षण राजा के दुपट्‌टे में चने की दाल बँधी रहती तथा वह दिन में तीन बार कथा का पाठ करता था।

एक दिन राजा के मन में अपनी बहन से भेंट करने का विचार आया। इस प्रकार बहन से भेंट का निश्चय कर राजा अश्व पर आरूढ़ होकर अपनी बहन के घर की ओर निकल पड़ा। मार्ग में उसे कुछ लोग एक शव की अन्तिम यात्रा ले जाते हुये दिखे, उन्हें रोककर राजा कहने लगा – “अरे भाइयों! मेरी बृहस्पतिवार व्रत कथा सुन लो।” वे सभी क्रोधित स्वर में बोले – “एक तो हमारे प्रियजन की मृत्यु हो गयी है और इसको अपनी कथा सुनाने की पड़ी है।” परन्तु कुछ व्यक्तियों ने कहा – “अच्छा कहो हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे।” राजा ने दाल निकाली तथा जैसे ही कथा आधी हुयी थी कि शव हिलने लग गया एवं कथा सम्पूर्ण होने तक तो राम-राम करके मनुष्य उठकर खड़ा हो गया। राजा वहाँ से आगे चला।

आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला। राजा ने उससे कहा – “हे भ्राता! तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो।” किसान बोला – “जितने समय में मैं तेरी कथा सुनूँगा उतने समय में चार बार खेत जोत लूँगा, जा अपनी कथा किसी और को सुनाना।” इस प्रकार राजा आगे चलने लगा। राजा के वहाँ से प्रस्थान करते ही किसान के बैल पछाड़ खाकर मूर्छित हो गये तथा किसान के उदर में तीव्र पीड़ा होने लगी। उस समय उस किसान की माँ भोजन लेकर आयी, उसने जब यह देखा तो अपने पुत्र से समस्त विवरण ज्ञात किया। पुत्र ने सम्पूर्ण प्रकरण सुना दिया तो वृद्धा दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गयी और उससे बोली कि – “मैं तेरी कथा सुनूँगी तू अपनी कथा मेरे खेत पर चलकर ही कहना।” राजा ने वृद्धा के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़े हुये तथा किसान की उदर-पीड़ा भी शान्त हो गयी।

राजा अपनी बहन के घर पहुँचा। बहन ने भाई का प्रेमपूर्वक स्वागत-सत्कार किया। अगले दिन प्रातःकाल राजा उठा तो उसने देखा कि सभी लोग भोजन कर रहे हैं। राजा ने अपनी बहन से कहा – “ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो तथा वह मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले।” बहन बोली – “हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहाँ लोग भोजन करते हैं, तत्पश्चात् कोई अन्य कार्य करते हैं। यदि पड़ोस में कोई ऐसा व्यक्ति हो तो मैं ज्ञात कर आती हूँ।” वह इतना कहकर खोजने चली गयी परन्तु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने भोजन न किया हो। अन्ततः वह एक कुम्हार के घर गयी जिसका पुत्र रोगग्रस्त था। उसे ज्ञात हुआ कि उनके यहाँ तीन दिवस से किसी ने भोजन नहीं किया है। रानी ने कुम्हार से अपने भाई की कथा सुनने का निवेदन किया जिस पर कुम्हार मान गया। राजा ने उस कुम्हार को जाकर बृहस्पतिवार की कथा सुनायी जिसको सुनकर उसका पुत्र ठीक हो गया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी।

एक दिन राजा ने अपनी बहन से कहा कि – “हे बहन! हम अपने घर जायेंगे। तुम भी तैयार हो जाओ।” राजा की बहन ने अपनी सास से पूछा। सास ने कहा – “हाँ चली जा, परन्तु अपने पुत्रों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई सन्तान नहीं है।” बहन ने अपने भाई से कहा – “हे भ्राता! मैं तो चलूँगी किन्तु कोई बालक नहीं जायेगा।” राजा बोला – “जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम ही क्या करोगी?”

दुःखी हृदय से राजा अपने नगर को लौट आया। राजा ने अपनी रानी से कहा – “हम निःसन्तान हैं। हमारा मुख देखने का भी धर्म नहीं है।” राजा ने व्याकुलतावश भोजन भी ग्रहण नहीं किया। रानी ने कहा – “हे प्रभो! बृहस्पति देव ने हमें सभी सुख-सौभाग्य प्रदान किये हैं तो वह हमें सन्तान का सुख भी अवश्य प्रदान करेंगे।” उसी रात्रि में बृहस्पति देव ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा – “हे राजन्। तू निश्चिन्त हो जा, तेरी रानी गर्भवती है।” भगवान के श्री मुख से यह वचन सुन राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ। समय आने पर रानी ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।

पुत्र प्राप्ति पर राजा ने कहा – “हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, किन्तु बिना कहे नहीं रह सकती। अतः जब मेरी बहन यहाँ आये तो तुम उससे कुछ मत कहना।” रानी ने सुनकर हाँ कर दिया। जब राजा की बहन को यह शुभ समाचार प्राप्त हुआ तो वह अत्यन्त प्रसन्न हुयी तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ गयी। रानी ने राजा की बहन को देखकर कहा – “जब भाई अपने साथ ला रहे थे तब टाल दिया और आज बिना बुलाये भागी-भागी आयी है, घोड़ा चढ़कर तो नहीं आयी, गधा चढ़ी आयी है।” राजा की बहन बोली – “भाभी मैं उस प्रकार न कहती तो तुम्हें सन्तान कैसे प्राप्त होती?” तदुपरान्त वे सभी मतभेद त्यागकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।

बृहस्पति देव की महिमा यही है, वे अपने भक्तों के सभी मनोरथ सिद्ध करते हैं। जिस प्रकार श्रद्धापूर्वक रानी एवं राजा ने उनकी कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी कामनायें बृहस्पति देव की कृपा से पूर्ण हो गयीं, उसी प्रकार जो श्रद्धा-भक्ति से बृहस्पतिवार का व्रत करता है और कथा का पाठ अथवा श्रवण करता है, बृहस्पति देव उसकी सभी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं।

॥इति श्री विष्णु बृहस्पतिवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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