Ganesh Wednesday Vrat Katha - गणेश बुधवार व्रत कथा
व्रत कथा

Ganesh Wednesday Vrat Katha – गणेश बुधवार व्रत कथा

Ganesh Wednesday Vrat Katha – गणेश बुधवार व्रत कथा

गणेश बुधवार व्रत कथा – बहन की गणेश भक्ति से मृत भाई के जीवित होने की कथा

हिन्दु धर्म में भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिये बुधवार के दिन भगवान गणेश का व्रत एवं पूजन करती हैं। मान्यताओं के अनुसार श्री गणेश जी की आराधना करने से पति को दीर्घायु एवं ससुराल में सदैव सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा समस्त प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। निम्नलिखित कथा गणेश बुधवार व्रत की अत्यन्त प्रचलित लोक कथा है जिसका पाठ व्रत का सम्पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु किया जाता है।

प्राचीनकाल की बात है किसी ग्राम में एक भाई-बहन निवास करते थे। बहन का नित्य-प्रतिदिन का यह नियम था कि वह अपने भाई का मुख देखने के उपरान्त ही भोजन ग्रहण करती थी। वह प्रतिदिन प्रातः उठती तथा शीघ्रता से अपने सभी कार्यों को पूर्ण करके अपने भाई का मुख दर्शन करने हेतु उसके घर जाती थी।

एक दिन वह अपने भाई के घर जा रही थी तभी उसे मार्ग में पीपल के वृक्ष के नीचे गणेश जी की मूर्ति विराजमान दिखायी दी। उसने भगवान गणेश के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुये कहा कि – “हे गणेश जी! मुझे अमर सुहाग और अमर पीहर देना।” यह कहकर वह आगे बढ़ गयी। उस दिन से प्रतिदिन भाई के घर जाते हुये वह गणेश जी से यही प्रार्थना करती थी। मार्ग में जाते हुये वन की कटीली झाड़ियों के काँटे उसके पैरों में चुभ जाया करते थे।

एक दिन वह अपने भाई के घर गयी तथा उसके मुख का दर्शन कर बैठ गयी। उसी समय उसकी भाभी ने पूछा – “आपके पैरों में क्या हो गया है?” उसने भाभी से कहा कि – “मार्ग में वन की कटीली झाड़ियों से गिरे हुये काँटे पाँव में चुभ गये थे, उन्हीं के कारण मेरे पैरों की यह दुर्गति हुयी है।” बहन के अपने घर वापस लौटने के पश्चात् उसकी भाभी ने अपने पति से कहा कि – “हमारे घर आते समय मार्ग में आपकी बहन के पाँव में अनेक काँटे चुभ जाते हैं, इसीलिये आप मार्ग स्वच्छ करवा दीजिये।” यह सुनकर भाई स्वयं कुल्हाड़ी लेकर गया तथा समस्त काँटेदार झाड़ियों को काटकर मार्ग स्वच्छ कर दिया। उन झाड़ियों को काटते समय भाई से गणेश जी का स्थान भी वहाँ से हट गया जिसके कारण भगवान गणेश क्रोधित हो गये तथा उसके भाई के प्राण हर लिये।

जिस समय सभी उस भाई का अन्तिम संस्कार करने जा रहे थे, उस समय उसकी भाभी ने विलाप करते हुये लोगों से निवेदन किया कि – “थोड़ी देर प्रतीक्षा करो, उसकी बहन आने ही वाली है। उसका यह नियम है कि वह अपने भाई का मुख दर्शन किये बिना भोजन तक ग्रहण नहीं करती है।” उसकी बात सुनकर लोगों ने कहा – “आज तो उसका मुख देख भी लेगी किन्तु कल से क्या करेगी?, कल से भला कैसे उसका दर्शन करेगी?”

प्रतिदिन की ही भाँति वह बहन अपने भाई से भेंट करने हेतु वन मार्ग से जा रही थी। उसी समय उसने ध्यान दिया कि वन का सम्पूर्ण मार्ग पूर्णतः स्वच्छ है। थोड़ा और आगे चलने पर उसने देखा कि भगवान गणेश भी उस वृक्ष के नीचे नहीं हैं। इधर-उधर देखने पर समीप ही उसे गणेश जी की प्रतिमा झाड़ियों में दिखायी दी। बहन ने सर्वप्रथम एक स्वच्छ एवं उत्तम स्थान पर गणेश जी को विराजमान किया तथा उनसे करबद्ध निवेदन करते हुये बोली – “हे भगवन्! मेरे जैसा अटल सुहाग और मेरे जैसा अमर पीहर सभी को देना।” तदुपरान्त गणेश जी को नमन करके वह भाई के घर की ओर जाने लगी।

उस समय भगवान गणेश ने विचार किया कि – “यदि इसकी नहीं सुनी तो हमें कौन मानेगा? हमें कौन पूजेगा?” यह विचार कर गणेश जी ने उस बहन को पुकार कर कहा – “पुत्रि! इस खेजड़ी (शमी) के वृक्ष की सात पत्तियाँ लेकर जा और कच्चे दूध में घोलकर भाई को छींटा मार देना वह उठकर बैठ जायेगा।” यह सुनकर बहन ने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ पर कोई नहीं था। उसे कुछ समझ नहीं आया कि यह किसने और क्यों बोला? किन्तु वह विचार करने लगी कि – “ठीक है जैसा सुना वैसा कर लेती हूँ।”

तत्पश्चात् बहन खेजड़ी की 7 पत्तियाँ लेकर अपने भाई के घर पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि अनेक लोग घर के बाहर बैठे हुये हैं। भाभी विलाप कर रही हैं तथा समीप ही भाई का शव पड़ा हुआ है। यह भीषण दृश्य देखकर उसका हृदय विचलित हो उठा किन्तु उसी समय उसे गणेश जी की बात स्मरण हुयी। उसने उन पत्तियों को गणेश जी के निर्देशानुसार कच्चे दूध में घोलकर भाई पर उस दूध को छिड़का।

ज्यों ही बहन ने उस दूध के छींटे भाई पर मारे, तत्क्षण ही वह भाई उठ कर बैठ गया और बोला – “मुझे अत्यन्त ही गहन निद्रा आ गयी थी।” यह सुनकर बहन बोली – “यह निद्रा तो किसी शत्रु को भी न आये।” इतना कहते हुये उसने सम्पूर्ण वृत्तान्त अपने भाई को बताया तथा कहने लगी – “भैया तुमने मार्ग क्यों स्वच्छ किया, भगवान को उस स्थान से क्यों हटाया? अब मैं पुनः उन्हें ऊँचे स्थान पर विराजमान करके आयी हूँ। तब भगवान ने मेरी श्रद्धा भक्ति से प्रसन्न होकर अटल सुहाग और अमर पीहर का आशीर्वाद प्रदान किया है। हे भगवान गणपति! जैसे मेरी लाज रखी वैसे सभी की लाज रखना एवं अमर सुहाग व अमर पीहरवासा प्रदान करना|” ऐसा कहकर बहन ने गणेश जी का धन्यवाद किया तथा वे भाई-बहन प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।

॥इति श्री गणेश बुधवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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