Durva Ashtami Vrat Katha – दूर्वा अष्टमी व्रत कथा
दूर्वा अष्टमी व्रत कथा – भगवान श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित दूर्वा की उत्पत्ति की कथा
भगवान श्रीकृष्ण बोले – “हे धर्मराज! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अत्यन्त पवित्र दूर्वाष्टमी व्रत किया जाता है। जो पुरुष इस पुण्य दूर्वाष्टमी का श्रद्धापूर्वक व्रत करता है, उसके वंश का क्षय नहीं होता। दूर्वा के अङ्कुरों की भाँति उसके कुल की वृद्धि होती रहती है।”
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा – “हे भगवन्! यह दूर्वा कहाँ से उत्पन्न हुयी? कैसे चिरायु हुयी, यह क्यों पवित्र मानी गयी तथा समस्त लोकों में वन्द्य एवं पूज्य कैसे हुयी? इसका भी वर्णन करने की कृपा करें।”
भगवान श्रीकृष्ण बोले – “पूर्वकाल में जिस समय देवताओं ने अमृत की प्राप्ति करने हेतु क्षीरसागर का मन्थन किया था, उस समय भगवान विष्णु ने अपनी जङ्घा पर हाथ से पकड़कर मन्दराचल पर्वत को धारण किया था। तीव्र वेग से मन्दराचल का घर्षण होने के कारण भगवान विष्णु के कुछ रोम उखड़कर समुद्र में गिर गये थे। समुद्र की लहरों द्वारा उछलते हुये पुनः वही रोम भूमि पर आकर हरित वर्ण की सुन्दर एवं शुभ दूर्वा के रूप में उत्पन्न हो गये। तदुपरान्त समुद्रमन्थन से प्राप्त अमृत कलश को देवताओं ने उसी दूर्वा पर स्थापित किया। उसी समय अमृत के कुछ बिन्दु वहाँ गिरे जिनके स्पर्श से वह दूर्वा अजर-अमर हो गयी। इस प्रकार देवताओं के लिये भी दूर्वा वन्दनीय एवं पवित्र हो गयी।
देवताओं ने भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा खर्जुर, नारिकेल, द्राक्षा, कपित्थ, नारंग, आम्र, बीजपूर, दाड़िम आदि फलों सहित दही, अक्षत, माला आदि से दूर्वा का पूजन किया। देवताओं ने निम्नोक्त मन्त्र से दूर्वा की आराधना की –
त्वं दुर्वेऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुरासुरैः।
सौभाग्यं संततिं कृत्वा सर्वकार्यकरी भव॥
यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृतासि महीतले।
तथा ममापि संतानं देहि त्वमजरामरे॥
देवताओं के सङ्ग उनकी धर्मपत्नियों एवं अप्सराओं ने भी दूर्वा की पूजा-अर्चना की। मर्त्यलोक में वेदवती, सीता, दमयन्ती आदि स्त्रियों ने भी सौभाग्य प्रदान करने वाली इस दूर्वा की पूजा एवं वन्दना की जिसके फलस्वरूप उन सभी के मनोरथ सिद्ध हुये। जो भी स्त्री स्नानादि कर्मों से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर दूर्वा का पूजन करके तिलपिष्ट, गोधूम (गेहूँ) एवं सप्तधान्य आदि का दान कर ब्राह्मण को भोजन कराती है तथा श्रद्धापूर्वक इस पुण्यकारी व सन्तान प्रदान करने वाली दूर्वाष्टमी व्रत का पालन करती है, वह पुत्र-पौत्रादि, सौभाग्य, सम्पत्ति आदि सभी सुखों से युक्त होकर दीर्घकाल तक सांसारिक सुखों का आनन्द लेती है। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से स्त्री अन्त समय में अपने पति सहित प्रलय पर्यन्त स्वर्गलोक में वास करती है जहाँ देवतागण नाना प्रकार से सुख एवं आनन्द प्रदान करते हैं।”
॥इति श्री दूर्वाष्टमी व्रत कथा सम्पूर्णः॥




