Santoshi Mata Friday Vrat Katha - सन्तोषी माता शुक्रवार व्रत कथा
व्रत कथा

Santoshi Mata Friday Vrat Katha – सन्तोषी माता शुक्रवार व्रत कथा

Santoshi Mata Friday Vrat Katha – सन्तोषी माता शुक्रवार व्रत कथा

सन्तोषी माता शुक्रवार व्रत कथा – सन्तोषी माता एवं वृद्धा के सात पुत्रों की कथा

प्राचीनकाल का वृत्तान्त है, किसी ग्राम में एक वृद्धा निवास करती थी। उस वृद्धा के सात पुत्र थे। उसके सात पुत्रों में से छः तो उत्तम रूप से जीविकोपार्जन करते थे किन्तु सातवाँ पुत्र किसी प्रकार का कोई भी कार्य नहीं करता था। अतः वह वृद्धा अपने छः पुत्रों के लिये ही भोजन बनाती थी तथा उन छः पुत्रों के भोजनोपरान्त जो कुछ भी शेष रह जाता था वो अपने सातवें पुत्र को प्रदान करती थी। किन्तु वह पुत्र अत्यन्त भोला था, वह कभी भी अपनी माँ के इस पक्षपात पर ध्यान नहीं देता था।

एक दिन भोले पुत्र ने अपनी पत्नी से कहा – “मेरी माता मुझसे कितना प्रेम करती है।” पत्नी ने कहा – “अवश्य! इसीलिये तो सभी की शेष जूठन तुम्हें भोजन के रूप में ग्रहण करने हेतु प्रदान करती है।” पुत्र ने कहा – “क्यों व्यर्थ ही शंका करती हो, भला ऐसा भी कहीं सम्भव है। मैं जब तक स्वयं अपने नेत्रों से प्रत्यक्ष न देख लूँ, तब तक इस पर विश्वास नहीं कर सकता।” उसकी पत्नी ने कहा – “कोई बात नहीं, जब तुम स्वयं ही देख लोगे तब तो इसपर विश्वास करोगे।”

कुछ दिवस उपरान्त एक महत्वपूर्ण त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के चूरमा एवं लड्डू तैयार किये गये। अपनी पत्नी द्वारा कहे गये कथन की सत्यता ज्ञात करने हेतु वह पुत्र एक पतला सा वस्त्र ओढ़कर पाकशाला में सो गया और वस्त्र के अन्दर से चुपचाप सबकुछ देखने लगा। कुछ समय पश्चात् उसके सभी छः भ्राता भोजन करने हेतु उपस्थित हुये। माँ ने सभी के लिये सुन्दर-सुन्दर आसन बिछाये तथा उन्हें सात प्रकार के व्यञ्जन परोसे। माँ उन सभी पुत्रों को प्रेम एवं आग्रहपूर्वक भोजन करवा रही थी तथा सातवाँ पुत्र शयन करने का नाटक करते हुये देख रहा था। सभी पुत्रों के भोजन कर लेने के पश्चात् माँ ने उन सभी की थालियों में पड़े जूठे लड्डुओं के टुकड़ों से एक लड्डू बनाया तथा शेष जूठन स्वच्छ करके उसने सातवें पुत्र को पुकारा – “उठो पुत्र! तुम्हारे सभी भ्राताओं ने भोजन ग्रहण कर लिया है, अब तुम ही शेष हो, उठो शीघ्र भोजन करो।”

अपनी वृद्धा माँ के इस कृत्य से आहत होकर पुत्र ने कहा – मुझे भोजन नहीं करना। मैं परदेश जा रहा हूँ। वृद्धा ने क्रोधवश कहा – “यदि कल जाता हो तो आज ही चला जा।” पुत्र बोला – “हाँ हाँ अवश्य! मैं तत्क्षण प्रस्थान कर रहा हूँ।” इतना कहकर वह पुत्र क्रोधवश घर से निकल गया। प्रस्थान करते समय उसे अपनी पत्नी का स्मरण हुआ। वह गोशाला में उपले थाप रही थी। वह उसके समीप पहुँचकर कहने लगा –

“हम जावें परदेश को आवेंगे कुछ काल।
तुम रहियो सन्तोष से धरम आपनो पाल॥”

यह सुनकर उसकी पत्नी ने कहा –

“जाओ पिया आनन्द से हमरूँ सोच हटाय।
राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय॥
देख निशानी आपकी देख धरूँ मैं धीर।
सुधि हमरी मती विसारियो रखियो मन गम्भीर॥”

पत्नी के वचन सुन पति ने कहा – “मेरे समीप इस अँगूठी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, इसे मेरा स्मृतिचिह्न समझ लो तथा मुझे भी अपना कोई प्रतीक प्रदान करो।” पत्नी ने कहा – “मेरे पास भी कुछ नहीं है, मैं उपले थाप रही हूँ, सो अभी यह गोबर ही है।” इतना कहकर पत्नी ने अपने गोबर के हाथ की थाप पति की पीठ पर मार दी।

पत्नी से विदा लेकर उसने अपनी यात्रा आरम्भ कर दी। चलते-चलते वह एक दूर देश में आ पहुँचा। वहाँ एक साहूकार था। उसने जाकर साहूकार से नौकरी पर रखने का आग्रह किया। साहूकार को अपनी दुकान के लिये एक सेवक की आवश्यकता थी, सो उसने उसे नौकरी पर रख लिया। युवक ने साहूकार से वेतन के विषय में पूछा तो उसने कहा – “कार्य के अनुरूप ही वेतन प्रदान किया जायेगा।” युवक प्रातःकाल से रात्रि पर्यन्त साहूकार की सेवा करने लगा।

कुछ ही दिनों में वह युवक साहूकार का सम्पूर्ण लेन-देन, बही खाता, ग्राहकों को माल विक्रय करना आदि समस्त कार्यों को करने लगा। साहूकार के 7-8 सेवक थे, वे सभी यह देखकर अचम्भित रह गये कि कैसे उस नवयुवक ने अपनी चतुरायी से सभी कार्यों में कुशलता अर्जित कर ली है। साहूकार भी उसके कार्य से अत्यन्त प्रभावित था। इसीलिये उसने तीन माह में ही उसे आधे व्यापार का साझेदार बना लिया। उस वृद्धा का वह सातवाँ पुत्र जो कोई कार्य नहीं करता था, 12 वर्षों के उपरान्त वही पुत्र एक अत्यन्त विख्यात धनिक अर्थात् सेठ बन गया। उसका स्वामी साहूकार अपना समस्त व्यापार उसे सौंपकर कहीं अन्यत्र चला गया।

उस युवक के परदेश गमन के पश्चात् उसकी पत्नी का जीवन कैसा व्यतीत हुआ, उसकी व्यथा सुनो – पति के परदेश गमनोपरान्त सास-ससुर उसे प्रताड़ित करने लगे। जब वह अबला समस्त गृहस्थी का कार्य सम्पन्न कर लेती तब उसे लकड़ी लेने के लिये वन भेजने लगे। उस बहु को भोजन हेतु आटे की भूसी की रोटी तथा टूटे नारियल के खोपरे में जल प्रदान किया जाता था। वह निस्सहाय होकर इसी प्रकार कष्ट में दिन व्यतीत करती रही। एक दिन वह वन में लकड़ियाँ लेने हेतु जा रही थी, मार्ग में उसने बहुत सी स्त्रियों को सन्तोषी माता का व्रत करते हुये देखा। कथा सुनकर वह बोली – “बहनों! यह तुम किस देवी-देवता का व्रत कर रही हो? इसको करने से क्या पुण्यफल प्राप्त होता है? इस व्रत का क्या विधान है? यदि तुम इस व्रत का विधान बताने की कृपा करोगी तो मैं तुम्हारी आभारी रहूँगी।”

उनमें से एक स्त्री ने कहा – “बहन! यह सन्तोषी माता का व्रत है, इस व्रत को करने से निर्धनता एवं दरिद्रता का नाश होता है तथा लक्ष्मी का आगमन होता है। मन की चिन्ताओं का निवारण होता है। घर में सुख-शान्ति तथा मन को प्रसन्नता एवं आनन्द की प्राप्ति होती है। पुत्रहीन को पुत्र तथा अविवाहित कन्या को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है। प्रीतम परदेश में हो तो शीघ्र ही लौट आता है। राजद्वार में विवाद का निस्तारण होता है। सभी प्रकार से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। धन का सञ्चय होता है। पैतृक सम्पत्ति का लाभ होता है। समस्त रोगों से मुक्ति मिलती है तथा व्रती के सभी मनोरथ सन्तोषी माता की कृपा से सिद्ध हो जाते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है।” व्रत की महिमा सुनने के पश्चात् बहु ने प्रश्न किया – “यह व्रत किस प्रकार करना चाहिये? कृपया इसका विधि-विधान वर्णित कीजिये, आपकी अत्यन्त कृपा होगी।”

स्त्री व्रत का विधान वर्णित करते हुये बोली – “सामर्थ्यानुसार सवा रुपये, सवा पाँच रुपये अथवा सवा ग्यारह रुपये का गुड़-चना लेना। सहजता, श्रद्धा एवं प्रेम से जितना सम्भव हो, उतनी मात्रा में ही सामग्री लेना। प्रत्येक शुक्रवार को उपवास करते हुये कथा सुनना व सुनाना। व्रत का क्रम टूटना नहीं चाहिये। निरन्तर नियम का पालन करना है। यदि कथा श्रवण करने के लिये कोई न मिले तो घी का दीपक प्रज्वलित करके, उसके समक्ष पात्र में जल रखकर कथा का पाठ करना किन्तु नियम भङ्ग नहीं होना चाहिये। जब तक कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक व्रत का पालन करना और कार्य सम्पन्न हो जाने पर ही व्रत का उद्यापन करना। तीन माह में माता सम्पूर्ण फल प्रदान करती हैं। यदि किसी की ग्रह-दशा अत्यन्त ही विपरीत है तो भी माता की कृपा से एक वर्ष में कार्य अवश्य सम्पन्न होता है। कार्य पूर्ण होने पर ही इस व्रत का उद्यापन करना चाहिये, मध्य में नहीं। उद्यापन में ढाई सेर आटे का खाजा तथा इतनी ही खीर एवं चने का साग बनाना। आठ बालकों को भोजन कराना। जहाँ तक सम्भव हो तो देवर, जेठ, भाई-बन्धु, कुटुम्ब के लड़कों को आमन्त्रित करना। यदि लड़के न मिलें तो सगे-सम्बन्धियों, पड़ोसियों के लड़कों को निमन्त्रित करना, उन्हें भोजन कराना, सामर्थ्यानुसार दक्षिणा प्रदान करके माता का व्रत-नियम पूर्ण करना। किसी को उस दिन घर में खटाई का सेवन मत करने देना। इस प्रकार इस व्रत का विधान पूर्ण होता है।”

उस स्त्री से व्रत का विधान ज्ञात करने के उपरान्त वृद्धा की बहु अपने घर की ओर चल पड़ी। मार्ग में उसने उस लकड़ी के गट्ठर को बेच दिया तथा अर्जित धन से उसने माता के व्रत हेतु गुड़ और चना ले लिया तथा पुनः चलने लगी। मार्ग में उसे सन्तोषी माता का एक मन्दिर दृष्टिगोचर हुआ। वह मन्दिर में जाकर माता के चरणों में लोटने लगी तथा व्याकुल होकर उनसे प्रार्थना करने लगी – “माँ! मैं अज्ञानी मूर्ख हूँ! मुझे व्रत के नियम आदि कुछ ज्ञात नहीं। मैं अत्यन्त व्यथित हूँ। हे माता! मेरे कष्टों का निवारण करो। मैं आपकी शरण में हूँ।” माता का हृदय अपनी भक्त की करुण पुकार से द्रवित हो गया।

एक शुक्रवार व्यतीत ही हुआ था कि दूसरे शुक्रवार को पति का पत्र आ गया तथा तीसरे शुक्रवार को उसके पति द्वारा भेजा हुआ धन भी उसे प्राप्त हो गया। यह सब देखकर उसकी जेठानी ईर्ष्यावश कहने लगी – “इतने दिवस में थोड़ा सा धन आया, इसमें क्या ही प्रशंसनीय कार्य है? उसके लड़के व्यङ्ग करने लगे – “काकी को अब पत्र प्राप्त होने लगे हैं, धन आने लगा है। अब तो काकी की आओ-भगत होगी। अब तो काकी बुलाने पर भी नहीं आयेंगी।”

यह सब सुनकर वह बहु कहती – “भैया! पत्र आये, धन आये तो हम सभी के लिये ही उपयुक्त है।” ऐसा कहकर वह अश्रुपूर्ण नेत्रों से सन्तोषी माता के मन्दिर में आ गयी तथा माता के चरणों में शीष रख रुदन करते हुये कहने लगी – “माँ! मैंने आपसे रुपया-पैसा, धन इत्यादि की कामना नहीं की थी। मुझे भला धन की क्या आवश्यकता, मुझे तो अपने सुहाग की आवश्यकता है। मुझे तो बस अपने स्वामी के दर्शन एवं सेवा की अभिलाषा है।” उसकी करुण प्रार्थना सुनकर माता ने कहा – “तथास्तु! शीघ्र ही तेरे स्वामी का आगमन होगा।” यह सुनकर बहु प्रसन्नतापूर्वक घर आकर गृहकार्य करने लगी।

उधर सन्तोषी माँ मन ही मन यह विचार कर रही थीं कि, “मैंने उस पुत्री को यह वरदान दे तो दिया है कि तेरा पति शीघ्र आयेगा, किन्तु उसे तो स्वप्न में भी इसका स्मरण नहीं होता है। प्रतीत होता है कि मुझे स्वयं ही उसे उसकी धर्मपत्नी के विषय में स्मरण कराना होगा।” यह निश्चय कर माता ने उस वृद्धा के पुत्र को स्वप्न में दर्शन दिया तथा उससे प्रश्न किया – “साहूकार के पुत्र! तू शयन कर रहा है अथवा जाग रहा है।” वह बोला – “मध्यावस्था में हूँ। कहिये क्या आज्ञा है?” माँ ने कहा – “तेरी कोई घर-ग्रहस्थी है या नहीं? वह बोला – “हाँ माता! माता-पिता, भ्राता-बहन, पत्नी आदि मेरे कुटुम्ब में सभी हैं।” माता ने कहा – “हे भोले पुत्र! तेरी धर्मपत्नी अत्यन्त कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही है। तेरे माता-पिता उसे प्रताड़ित कर रहे हैं। वह निरन्तर ही तेरे लिये नाना प्रकार के कष्टों को सहन कर रही है। तुझे उसकी सुधि लेनी चाहिये।” वह बोला – “हाँ माँ! यह तो मुझे ज्ञात है, किन्तु मैं जाऊँ तो जाऊँ कैसे? मैं परदेश में हूँ, लेन-देन का कोई विवरण नहीं है। यहाँ से प्रस्थान करने का कोई विकल्प नहीं मिलता। यह सब त्यागकर कैसे चला जाऊँ?”

माँ ने कहा – “मेरी आज्ञा का पालन कर, प्रातः स्नानादि करके सन्तोषी माता का नाम लेकर उनका स्मरण करना, घी का दीप प्रज्वलित करना, माता को दण्डवत् प्रणाम करना। कुछ ही समय में तेरा समस्त लेन-देन चुक जायेगा। संगृहीत माल का विक्रय हो जायेगा। सन्ध्या पर्यन्त धन का भण्डार भर जायेगा।” प्रातःकाल वृद्धा के उस भोले पुत्र ने अपने स्वप्न के विषय में सभी को बताया तो सभी उसकी बात अनसुनी कर उपहास करते हुये कहने लगे कि, “ऐसे सपने भी कहीं सच होते हैं?” किन्तु एक वृद्ध व्यक्ति ने उस युवक से कहा – “सुनो भाई! मेरा कहना मानो, इस प्रकार असमंजस में रहने के स्थान पर जैसा देव शक्ति ने स्वप्न में कहा है, वैसा करने में तेरा क्या अहित है?”

उस वृद्ध की बात मानकर युवक ने प्रातः शीघ्र ही स्नान किया तथा माता को दण्डवत् प्रणाम कर घी का दीप प्रज्वलित कर दुकान पर जाकर बैठ गया। कुछ ही समय व्यतीत हुआ था कि, देनदार धन दे गये, लेनदार अपने धन का लेखा-जोखा कर गये तथा व्यापारी नकद धन देकर उसके वस्तु भण्डार को क्रय करने लगे। सायह्नकाल तक धन का ढेर लग गया। माता की इस लीला से प्रसन्न होकर मन में माता का स्मरण करके वह युवक अपने घर की ओर प्रस्थान करने हेतु वस्त्र, आभूषण आदि क्रय करने लगा। समस्त कार्य सम्पन्न कर उसने घर की ओर यात्रा आरम्भ कर दी।

उधर उसकी पत्नी वन में लकड़ी लेने के लिये जाती है। वहाँ से लौटते समय वह मार्ग में पड़ने वाले माँ के मन्दिर में विश्राम करती है। वह प्रतिदिन उसी मन्दिर में विश्राम करती थी। अभी मन्दिर में आकर बैठी ही थी की उसे दूर से धूल उड़ती हुयी दिखायी देती है। धूल को उड़ता देख उसने माता से पूछा – “हे माँ! यह इतनी अधिक धूल क्यों उड़ रही है?” माता ने कहा – “हे पुत्री! तेरा पति परदेश से पुनः अपने घर लौटकर आ रहा है। अब तू सुन, मैं जैसा कहती हूँ, वैसा कर। इन लकड़ियों के तीन गट्ठर बना ले, एक को नदी के तट पर, दूसरे को मेरे मन्दिर में तथा तीसरे को अपने सिर पर रख ले। तेरे पति को लकड़ी का गट्ठर देखकर लालच उत्पन्न होगा, वह वहाँ रुकेगा जलपान करेगा, तदुपरान्त माँ से भेंट करने जायेगा। तब तक तू लकड़ियों का भार लेकर घर पहुँचना तथा चौक के मध्य में गट्ठर डालकर तीन बार तीव्र स्वर से पुकारना – ‘लो सासू माँ! लकड़ियों का गट्ठर लो। भूसी की रोटी दो और नारियल के खोपरे में जल दो। आज कौन अतिथि आया है?’ ठीक इसी प्रकार करना।”

सन्तोषी माता के वचन सुन बहु ने कहा – “उचित है! मैं ऐसा ही करूँगी माँ।” ऐसा कहकर उसने प्रसन्नतापूर्वक लकड़ियों के तीन गट्ठर बना दिये। एक गट्ठर नदी के तट पर तथा एक माता के मन्दिर में रखा ही था कि, एक यात्री वहाँ आ पहुँचा। सूखी हुयी लकड़ियाँ देखकर उसके मन में उसी स्थान पर विश्राम एवं जलपान करने की इच्छा उत्पन्न हुयी। उसने विचार किया कि यहीं कुछ भोजन बनाकर, ग्रहण कर तदुपरान्त ग्राम हेतु प्रस्थान किया जाये। उन्हीं लकड़ियों के उपयोग से भोजन आदि तैयार कर उसने विश्राम व जलपान किया तथा अपने ग्राम पहुँच गया।

उसी समय बहु सिर पर लकड़ी का गट्ठर लेकर आती है तथा उसे आँगन में डालकर तीन बार पुकारती है – “लो सासू माँ! लकड़ी का गट्ठा लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खप्पर में जल दो। आज कौन अतिथि आया है? यह सुनकर सास बाहर आकर अपने किये हुये अत्याचारों पर पश्चाताप करते हुये कहती है – “बहु! ऐसा क्यों कहती है? तेरा स्वामी ही तो आया है। आकर यहाँ बैठ जा, मीठा भात ग्रहण कर, भोजन कर, वस्त्राभूषण धारण कर।” इतने में ही उसकी ध्वनि सुनकर उसका स्वामी बाहर आता है तथा उसकी अगूँठी देखकर व्याकुल होकर माँ से पूछता है – “माँ! यह कौन है?” माँ कहती है – “पुत्र! यह तेरी पत्नी है। 12 वर्ष व्यतीत हो गये तुझको यहाँ से परदेश गमन किये हुये। उसी समय से यह तेरे विरह में पूरे ग्राम में पशु की भाँति भटकती रहती है। घर का कुछ काम-काज नहीं करती। चार समय आकर बस भोजन कर जाती है। अब तुझे यहाँ उपस्थित देख भूसी की रोटी और नारियल के खोपरे में जल माँग रही है।”

पुत्र ने लज्जावश कहा – “माँ! मैंने तुम्हारा और इसका दोनों का व्यवहार देखा है। अब मुझे दूसरे कक्ष की चाबी दे दो, मैं उसमें ही निवास करूँगा।” माँ ने कहा – “ठीक है पुत्र! तेरा निश्चय उचित ही है, ले ये ले चाबियाँ। इतना कहकर उसने चाबियों का गुच्छा पुत्र के समक्ष डाल दिया।” पुत्र ने उसे उठाया और तृतीय तल पर स्थित दूसरे कक्ष में अपना समस्त सामान व्यवस्थित कर दिया।

रातों-रात उनकी परिस्थिति परिवर्तित हो गयी। वह दोनों पति-पत्नी राजाओं की भाँति राजसी सुख-सुवधाओं के साथ जीवन व्यतीत करने लगे। कुछ दिवस पश्चात् शुक्रवार आया। बहु ने पति से कहा – “मुझे सन्तोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है।” पति ने प्रसन्नतापूर्वक उसे उद्यापन करने की आज्ञा दे दी। वह प्रफुल्लित हृदय से उद्यापन की व्यवस्था करने लगी। किन्तु उसकी जेठानी अपने बालकों से कहती है कि – “जब भोजन के निमन्त्रण में जाओ तो खटाई माँगना, जिसके कारण उसका उद्यापन सम्पन्न नहीं हो पायेगा।” बहु ने जेठानी के बालकों को भोजन हेतु निमन्त्रित किया, बालकों ने पेट भरकर खीर ग्रहण की, किन्तु ज्यों ही उन्हें जेठानी की बात का स्मरण हुआ, वे कहने लगे – “हमें खटाई चाहिये, खटाई दो। खीर हमें प्रिय नहीं। इसे तो देखकर ही अरुचि होती है।

बहु ने कहा – “किसी को भी खटाई नहीं दी जायेगी। यह सन्तोषी माता का प्रसाद है।” यह सुनकर बालक तुरन्त खड़े हो गये तथा बहु से बोले हमें दक्षिणा दो। भोली बहु को इस विषय में कुछ ज्ञात नहीं था। अतः उसने उन्हें पैसे दे दिये। जेठानी के बालक दक्षिणा के उन पैसों से इमली लाकर खाने लगे। इस कारण देवी सन्तोषी उस बहु पर कुपित हो गयीं। उसी समय देवयोग से वहाँ राजा के दूत उपस्थित हो गये तथा उसके पति को बन्दी बनाकर ले गये। इस घटनाक्रम के उपरान्त जेठ-जेठानी नाना प्रकार के दुर्वचन बहु को सुनाते हुये कहने लगे – “तेरे पति ने अवश्य ही लोगों को लूट-लूटकर धन एकत्रित किया था, इसीलिये ही तो राजा के दूत उसे पकड़कर ले गये। तुझे सब ज्ञात हो जायेगा, जब तेरा पति कारागार में बन्दी बनकर रहेगा” जेठ-जेठानी के इन कटु वचनों से बहु के हृदय को गहरा आघात पहुँचा। वह रुदन करती हुयी सन्तोषी माता के मन्दिर पहुँची और कहने लगी – “हे माँ! आप मेरे साथ यह कैसी लीला कर रही हैं? मुझे सुख प्रदान करने के उपरान्त यह कष्ट क्यों दे रही हो माँ?

माता ने कहा – “पुत्री! तूने विधिवत् उद्यापन न करके मेरा व्रत भङ्ग किया है। इतनी शीघ्र तूने वह प्रकरण विस्मृत कर दिया?” बहु बोली – “माँ! मुझे सब स्मरण है, मैं निरपराध हूँ! मुझे तो जेठानी के बालकों ने भ्रमित कर दिया था, इसीलिये भूलवश मैंने उन्हें दक्षिणा के रूप में धन दे दिया तथा उससे उन्होंने इमली का सेवन कर लिया। मुझे क्षमा कर दो माँ! मैं पुनः आपका उद्यापन पूर्ण विधि-विधान से करूँगी।” माता ने कहा – “अब पुनः ऐसी त्रुटि मत करना।” बहु बोली – “नहीं होगी माते, किन्तु मेरे पति मुझे पुनः कैसे प्राप्त होंगे? माता ने कहा – “पुत्री! तू यहाँ से प्रस्थान कर, तेरा पति तुझे मार्ग में ही प्राप्त हो जायेगा।”

बहु हर्षित मन से घर की ओर आने लगी। मध्य मार्ग में ही उसे उसका पति मिल गया। पत्नी ने अधीर होकर पूछा – “आप कहाँ चले गये थे? मेरा मन कितना व्याकुल हो रहा था।” वह कहने लगा – “मैंने अत्यधिक धन अर्जित किया है न, इसीलिये राजा ने उसका कर माँगा था। अतः मैं कर प्रदान करने गया था।” यह ज्ञात कर उसकी पत्नी अत्यन्त प्रफुल्लित हुयी तथा दोनों प्रसन्नतापूर्वक घर आ गये। कुछ दिवस उपरान्त पुनः शुक्रवार आया। उसने अपने पति से कहा – “मुझे सन्तोषी माता का उद्यापन करना है।” उसके पति ने कहा – “अवश्य ही करो।” वह पुनः जेठ के बालकों को भोजन हेतु निमन्त्रित करने पहुँची। जेठानी ने उसे कुछ कटु वचन सुनाये तथा अपने बालकों को पुनः यह कह दिया कि, “भोजन में पहले ही खटाई की इच्छा प्रकट करना।” निमन्त्रण में आसन ग्रहण करते ही बालक कहने लगे – “हमें खीर आदि प्रिय नहीं है, इससे हमारा मन विचलित होता है। हमें कोई खटाई युक्त व्यञ्जन प्रदान करें। बहु ने स्पष्ट कह दिया – “खटाई नहीं मिलेगी, यदि इच्छा हो तो भोजन ग्रहण करें अन्यथा यहाँ से प्रस्थान करें।” यह सुनकर जेठानी के लड़के वहाँ से चले गये। तदुपरान्त बहु ने श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण बालकों को भोजन कराया। दक्षिणा में धन के स्थान पर उसने यथाशक्ति उन्हें एक-एक फल प्रदान किया। इस प्रकार उद्यापन सम्पन्न करने पर सन्तोषी माता प्रसन्न हुयीं। माता के आशीर्वाद एवं कृपा से नवमें माह में उसे चन्द्र के समान रूपवान एक सुन्दर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी। वह प्रतिदिन अपने पुत्र को लेकर सन्तोषी माता के मन्दिर में जाने लगी।

एक दिन माता ने विचार किया – “यह प्रतिदिन मेरे मन्दिर आती है, आज में ही इसके घर चलती हूँ। मैं भी तो ज्ञात करूँ इसका आश्रय स्थल कैसा है?” यह निश्चय कर माता ने एक अति भयङ्कर रूप धारण किया। उनके मुख पर गुड़ और चना लगा हुआ था, सूँड के समान उनके ओष्ठ थे। अनेक प्रकार के कीट-पतंगे आदि उनके समीप विचर रहे थे। ज्यों ही माता इस भयानक रूप में बहु के द्वार पर उपस्थित हुयीं, उसकी सास भयभीत होकर पुकारने लगी – “देखो-देखो! प्रतीत होता है कोई डाकिनी अथवा चुड़ेल आदि इसी ओर चली आ रही है। पुत्रों! भगाओ इसे, अन्यथा यह हम मैं से किसी का भक्षण कर लेगी।” उसके पुत्रों ने भयभीत होकर अपने कक्ष की खिड़कियाँ आदि बन्द कर दीं। छोटी बहु ने सास की पुकार सुनकर ज्यों ही वातायन से देखा तो वह आनन्दपूर्वक चिल्लाने लगी – “आज तो मेरे पुण्य जागृत हो गये, साक्षात् मेरी सन्तोषी माता मेरे घर पधारी हैं। इतना कहकर वह अपने दूध पीते शिशु को गोद से हटाती ही है कि उसकी सास कुपित होकर कहती है – “कलमुही! कुल्टा! इसे देखकर कैसी उत्साहित हो रही है कि अपने शिशु को गोद से पटक दिया।”

उसी क्षण माता ने अपनी लीला रची और सास को पूरे घर में बालक ही बालक दिखायी देने लगे। छोटी बहु ने कहा – “सासु माँ! यह मेरी वही करुणामयी सन्तोषी माता हैं, जिनका मैं प्रत्येक शुक्रवार व्रत करती हूँ।” यह कहते हुये बहु घर के सभी द्वार खोल देती है। सभी कुटुम्बीजन माता के चरणों में दण्डवत् लेटते हुये अपने अपराधों के लिये क्षमा-याचना करते हुये कहते हैं – “हे माँ! कृपया हमें क्षमा कर दें, हमने आपका व्रत भङ्ग करके घोर पाप किया है, हम मूर्ख-अज्ञानी हैं, हमें आपके व्रत की विधि ज्ञात नहीं, हमें क्षमादान दें माता। हम वचन देते हैं कि, भविष्य मैं ऐसा पुनः कभी नहीं करेंगे, कृपा करें माता, हम पर दया करें।” उन सभी के पश्चाताप एवं करुण प्रार्थना से माता प्रसन्न हो गयीं तथा उन सभी को क्षमा कर दिया। तदुपरान्त वह सभी कुटुम्बीजन नियमपूर्वक शुक्रवार का व्रत करने लगे। व्रत के प्रभाव से उनके सभी कष्टों का निवारण हो गया तथा वे आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।

॥इति श्री सन्तोषी माता शुक्रवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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