Shraavan Maahaatmy Ki Kathaayen - श्रावण माहात्म्य की कथायें
व्रत कथा

Shraavan Maahaatmy Ki Kathaayen – श्रावण माहात्म्य की कथायें

Shraavan Maahaatmy Ki Kathaayen – श्रावण माहात्म्य की कथायें

अध्याय पहला – सूत जी का कथन

एक बार सूत जी शौनक तथा अन्य ऋषिगणों की सभा में पधारे। सूतजी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया और बैठने के लिए आसन दिया।

उनके बैठने के बाद मुनिश्रेष्ठ शौनकजी ने सूत जी से पूछा, “हे प्रभु! हम सब मुनियों की इच्छा हो रही है कि आप हमें कोई ऐसी कथा सुनाइये जिसे सुनकर हम सब तृप्त हो जाएँ। हमने आपके मुख से अनेक आख्यान सुनकर आनन्द प्राप्त किया है। आपके मुख से हमने तुला राशि का सूर्य होने पर कार्तिक मास का महात्म्य, मकर राशि का सूर्य होने पर माघ मास का महात्म्य तथा मेष राशि का सूर्य होने पर बैशाख मास का महात्म्य सुना है। अब इन मासों से भी उत्तम कोई मास हो तो हम उसका महात्म्य सुनना चाहते हैं।”

शौनक जी का आग्रह सुनकर सूत जी बड़े प्रेम पूर्ण शब्दों में बोले कि श्रोताओं में निम्नलिखित बारह गुण होने चाहिए – दम्भ रहित, आस्तिक बुद्धि, शठता रहित, परमात्मा में भक्ति, भगवत चर्चा सुनने की तीव्र इच्छा, नम्रता, ब्राह्मण भक्त, सुशील स्वभाव, धैर्यवान, पवित्र, तपस्वी, तथा दोषारोपण रहित।

ये सब गुण आप सज्जनों में विद्यमान हैं। इसलिए मैं प्रसन्नतापूर्वक आपको तत्त्व की बात सुनाता हूँ। एक बार ब्रह्मा पुत्र सनत्कुमार ने भगवान शिव से पूछा, “हे महादेव! हमारे हृदय में ऐसे मास के महात्म्य को सुनने की इच्छा हो रही है जो सब मासों में श्रेष्ठ हो। उस मास में कर्मों के करने से अनन्त फल की प्राप्ति हो। संसार के कल्याण के लिए ऐसे मास के सभी धर्मों का वर्णन विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।”

भगवान शिव ने सनत्कुमारों की इच्छा जानकर कहा, “वर्ष के बारह महीनों में श्रावण मास मुझे सबसे अधिक प्रिय है। पूर्णिमा को श्रावण नक्षत्र का योग हो जाने से इस मास का नाम श्रावण पड़ा है। श्रावण मास में सिद्धि प्राप्त होने के कारण इस मास का नाम श्रावण पड़ा। आकाश के समान स्वच्छ हो जाने से नभा नाम कहा है। श्रावण मास के फलों को कहने के लिए ब्रह्माजी हुए। इसका महामात्य को देखने के लिए इन्द्र हुए और भगवान अनन्त ने इसके फल को कहने के लिए दो सहस्त्र जिह्वा धारण की थीं। इसलिए श्रावण मास के धर्मों की गणना करने के लिए पृथ्वी पर किसी में भी सामर्थ्य नहीं है। इस मास की कला को भी अन्य मास प्राप्त नहीं कर सकते। इस मास का कोई भी दिन व्रत शून्य नहीं है। इस मास की सब तिथियाँ व्रत वाली हैं।”

सनत्कुमार बोले, “हे महादेव! आपने अभी बताया कि इस मास की प्रत्येक तिथि व्रत वाली है। अतः आप मुझे बताइये कि किस तिथि में कौन सा व्रत रखा जाता है। उस व्रत का अधिकारी कौन है? उसका फल क्या मिलता है तथा उस व्रत को करने की विधि क्या है? किसने इस व्रत को किया है? उसकी उद्यापन विधि क्या है? उसका देवता कौन है? पूज्य कौन है? पूजन सामग्री क्या है? प्रधान पूजन किसका करना है? जागरण विधि क्या है? किस व्रत का क्या समय है? हे प्रभु! आप मुझे ये सब बातें कृपा कर विस्तापूर्वक बताने की कृपा करें। श्रावण मास आपको क्यों प्रिय हुआ? इसे पवित्रतम किस कारण से कहा गया है? इस मास में कौन अवतार उत्तम माना गया है। इस मास में कौन सा अनुष्ठान करने योग्य माना गया है? हे प्रभु! आप सब प्राणियों के लाभार्थ मुझसे कहें।”

रविवार से शनिवार तक जो व्रत आदि किये जाते हैं वह कृपा कर बताने का कष्ट करें। आप सब देवताओं में बड़े होने के कारण महादेव कहलाते हैं। पीपल के पेड़ में तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का निवास कहा गया है। उसमें भी आपका निवास सबसे ऊपर कहा गया है। आप कल्याण रूप होने के कारण शिव, पापनाशक होने के कारण हर कहलाते हैं।

शरीर में गणेशजी का अधिष्ठान रूप चार दल का मूलाधार नाम का चक्र है। उसके ऊपर छः दल का ब्रह्माजी का अधिष्ठान नाम का दूसरा चक्र है। सबसे ऊपर दस दल का भगवान विष्णु का मणिपुर नामक तीसरा चक्र है। चौथा चक्र हृदय में बारह दल का अनाहत नाम का है। इस चौथे चक्र में आपकी स्थिति कही गई है। आपका निवास सबसे ऊपर होने के कारण आपको मुख्यतः कहा गया है। इसलिए आपका पूजन करने से पंचायतन का पूजन हो जाता है।

अन्न को ब्रह्ममय कहा गया है। भगवान विष्णु जल रूप कहे गये हैं। जब आप उस अन्न और जल को ग्रहण करते हैं तो आपकी प्रवीणता में किसी को लेश मात्र भी संदेह नहीं रह जाता। आपका श्मशान और पर्वत पर निवास सब प्राणियों को विरक्ति का सन्देश देता है। आपके यश का वर्णन करना वाणी से परे की बात है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “सूत जी का कथन” नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥


दूसरा अध्याय – श्रावण मास का धर्म पालन

भगवान शंकर सनत्कुमार जी से बोले, “हे ब्रह्मा पुत्र! आप नम्र हैं। आप श्रद्धालु हैं। समस्त बारह गुणों से युक्त श्रोता हैं। आपने श्रावण मास के बारे में जो पूछा है तथा जो पूछने से रह गया है, वह सब मैं तुम्हें विस्तापूर्वक बताता हूँ। आपके पिता ब्रह्मा बहुत उद्दण्ड थे इसलिए उन्हें अपना पांचवाँ सिर गंवाना पड़ा। वे मत्सरता को छोड़ मेरी शरण में आये। मैं जो कुछ बताने जा रहा हूँ उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो –

श्रावण मास में नियमों का पालन कर व्रत रखकर सायंकाल को चार बजे भोजन करना चाहिए। एक मास तक रुद्राभिषेक करना चाहिए। अपनी प्रिय किसी एक वस्तु का त्याग करे। पुष्प, फल, धान्य, तुलसी की मंजरी युक्त पत्ती और बेल-पत्रों से मेरी लक्ष पूजा करे। कोटिलिंग पूजन करे। ब्राह्मणों को प्रेमपूर्वक भोजन कराये। नियम का पालन करे। मुझे पंचामृत से अभिषेक अति प्रिय है। अतः उसे भी करे। इस मास में किया जानेवाला कृत्य अनन्त फल देनेवाला है। इस मास में भूमि पर शयन करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। सत्य बोलना चाहिए। पत्तल में भोजन करे। प्रातः काल स्नान ध्यान करे। इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए। एकाग्र मन से प्रतिदिन मेरी पूजा करे। इस महीने में मन्त्रों का पुरश्रवण भी उत्तम सिद्धि देनेवाला है। “गायत्री मन्त्र” और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें। श्री सूक्त का जाप और भी अधिक फलदायक है। ग्रहयज्ञ, कोटिहोम, लक्षहोम तथा अयुत होम करने पर सद्य फलता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। जो प्राणी इस महीने में एक दिन भी व्रत को छोड़ देता है वह महाप्रलय तक घोर नरक में जाता है। मुझे श्रावण मास से अधिक और कोई भी मास प्रिय नहीं है।

यह मास फलदायक है तथा निष्काम भाव से किये गये कर्म के फलस्वरूप मोक्ष प्रदान करने वाला है। हे सनत्कुमार! इस मास में करने योग्य जो धर्म कहे गये हैं उन्हें ध्यानपूर्वक सुनो। रविवार को सूर्य का व्रत करना चाहिए। सोमवार का दिन मेरी पूजा का दिन है। श्रावण मास के प्रथम सोमवार से प्रारम्भ करके साढ़े तीन मास तक अर्थात् कार्तिक मास की अमावस्या तक होनेवाला सम्पूर्ण कामना का अर्थसिद्धि प्रदाता रोटक नामक व्रत कहलाता है। मंगलवार के दिन मंगला गौरी का व्रत रखा जाता है। बुधवार को बुध का व्रत, बृहस्पतिवार को गुरुदेव का व्रत, शुक्रवार को “जीवन्तिका देवी” का व्रत रखते हैं। शनिवार को हनुमान तथा नृसिंह का व्रत रखा जाता है।

अब मैं तुम्हें तिथियों के अनुसार होनेवाले व्रतों को बताता हूँ। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को “औदुम्बर” नाम का व्रत होता है। शुक्ल पक्ष की तृतीया को “गौरी” का व्रत होता है। श्रावण शुक्ल चतुर्थी को “दूर्वा गणपति” नामक व्रत होता है। इसे विनायक चतुर्थी व्रत या “गणेश चौथ” का व्रत कहते हैं। श्रावण शुक्ल पंचमी को “नाग पूजन” का व्रत रखा जाता है। श्रावण शुक्ल षष्ठी के दिन “सूपोदन” व्रत रखा जाता है। श्रावण शुक्ल सप्तमी को “शीतला देवी” का व्रत रखा जाता है। “अष्टमी और चतुर्दशी” तिथि में देवी का पवित्रारोपण करना चाहिए। श्रावण मास की कृष्ण तथा शुक्ल पक्ष की नवमी को “नक्त व्रत” का विधान है। शुक्ल पक्ष दशमी को “आशा” नामक व्रत किया जाता है। कोई-कोई मनुष्य श्रावण मास की दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की एकादशी को “आशा व्रत” रखते हैं। श्रावण शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भगवान विष्णु का “पवित्रारोपण” करना कहा गया है। इसलिए इस तिथि को भगवान हरि का श्रीधर नाम से अर्चन उत्तम गति प्रदान कराता है। श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को उत्सर्जन, उपाकर्म, सभादीप, रक्षा- बन्धन, श्रावणी कर्म, सर्पबलि तथा हयग्रीव जयन्ती मनाई जाती है। हयग्रीव नामक भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। उपरोक्त सातों व्रत श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाये जाते हैं।

श्रावण कृष्ण चतुर्थी को “संकट चतुर्थी”, जिसे आम भाषा में सकंट चौथ कहते हैं, तथा कृष्ण पक्ष की पंचमी को “मानवकल्पादि” व्रत रखा जाता है। श्रावण कृष्ण अष्टमी को भगवान श्री विष्णु ने श्री कृष्ण नाम से सोलह कलाओं से युक्त अवतार लिया था। उस दिन व्रत तथा महोत्सव मनाया जाता है। श्रावण मास की अमावस्या के “पिठोरा व्रत” का विधान है। इस दिन कुशोत्पादन करें और वृषभों का पूजन करें।

श्रावण शुक्ल पक्ष की प्रथमा से लेकर समस्त तिथियों के अलग-अलग देवी-देवता हैं। प्रतिपदा (प्रथमा) के अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा, तृतीया तिथि की गौरी, चतुर्थी तिथि के गणेश, पंचमी तिथि के नाग, षष्ठी तिथि के स्कन्द, सप्तमी तिथि के सूर्य, अष्टमी तिथि के भगवान शिव, नवमी तिथि की दुर्गा, दशमी तिथि के यम, एकादशी तिथि के विश्वदेव स्वामी हैं। द्वादशी तिथि के श्री हरि, त्रयोदशी तिथि के कामदेव, चतुर्दशी तिथि के शिव और पूर्णिमा के स्वामी चन्द्रमा हैं। अमावस्या के स्वामी पितर हैं।

जिस देव की जो तिथि है उस तिथि को उस देवता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इस श्रावण मास में प्रायः अगस्त्य नक्षत्र का उदय होता है। सिंह राशि पर सूर्य के संक्रमण के दिन से बारह अंश चालीस घड़ी बीत जाने पर अगस्त्य नक्षत्र (ऋषि) का उदय होता है। अगस्त्य ऋषि को सात दिन पहले से ही अर्घ्य देना शुरू कर दें।

बारह महीनों में सूर्य भगवान अलग-अलग नाम से प्रज्ज्वलित होते हैं। श्रावण मास में “गर्भास्त” नाम से प्रज्ज्वलित होते हैं। इसलिए श्रावण मास में भक्तिपूर्वक सूर्य देव का पूजन करना चाहिए। श्रावण मास में साग का त्याग करना चाहिए। भाद्रपद मास में दही, आश्विन मास में दूध और कार्तिक मास में दाल का त्याग करना चाहिये। यदि कोई भक्त यह सम्पूर्ण विधान करने में असमर्थ हो तो उसे सभी मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। हे मुनि श्रेष्ठ! इस श्रावण भास में मनाये जाने वाले व्रत और धर्मों का सविस्तार रूप से वर्णन करना कई सौ वर्षों में भी पूरा नहीं हो सकता।

भक्त जन मेरे या श्री हरि के प्रीत्यर्थ सम्पूर्ण व्रत करें। मेरे और श्री हरि में कोई भेद नहीं है। मेरे भक्त श्री हरि को प्रिय हैं और श्री हरि के भक्त मुझे प्रिय हैं। जो प्राणी इसमें भेदभाव की कल्पना करते हैं या करेंगे वे नरकगामी होते हैं। हे सनत्कुमार! आप श्रावण मास में धर्म पालन करें।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण मास का धर्म पालन” नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥


तीसरा अध्याय – नक्त व्रत

सनत्कुमार भगवान शंकर से बोले, “आपने व्रत समुदाय का उद्देश्य बताया परन्तु मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई है। आप विस्तारपूर्वक इन व्रतों को बताने की कृपा करें। आप खोलकर मुझे समझायें जिसे सुनकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँ।”

सनत्कुमार की प्रार्थना पर भगवान महादेव बोले, “जो भक्त श्रावण मास को “नक्त व्रत” कर व्यतीत करता है वह सम्पूर्ण वर्ष इस नक्त व्रत का फल भोगता रहता है।” दिन की समाप्ति से तीन घड़ी पहले रात्रि भोजन को “नक्त व्रत” कहा जाता है। नक्त व्रत भोजन में सूर्यास्त से तीन घंटे पहले के समय को छोड़कर शेष समय लिया जाता है। सूर्यास्त से पहले के तीन घंटों को संध्याकाल कहा जाता है। संध्याकाल में आहार, मैथुन, निद्रा तथा स्वाध्याय करना वर्जित है।

अब मैं तुम्हें गृहस्थ एवं संन्यासी के भेद से नक्त भोजन की दो प्रकार की व्यवस्था बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। जब सूर्यदेव के मन्द होने पर अपने शरीर की छाया दुगुनी हो जाए, उस समय को संन्यासी के लिए नक्त भोजन व्रत कहा है। शास्त्रों में गृहस्थ के लिए नक्षत्र के उदय होने पर रात्रि भोजन करने को नक्त भोजन व्रत कहा है। शास्त्रों में संन्यासियों के लिए रात्रि काल में भोजन निषिद्ध हो जाने से दिन के अष्ट्म भाग में भोजन करना बताया है। गृहस्थी को विधि द्वारा रात्रि में नक्त व्रत का भोजन करना चाहिए। संन्यासी, विधवा तथा विधुर को सूर्यास्त से पहले ही भोजन करने का विधान है। पुत्रवान, आश्रयहीन तथा स्त्री विहीन पुत्रवान विधुर को रात्रि में भोजन करना निषिद्ध है। श्रावण मास में नक्त व्रत करने वाले प्राणी उत्तम गति को प्राप्त होते हैं।

श्रावण मास के प्रारम्भ होने पर प्रतिपदा तिथि में प्रातःकाल मनुष्य यह प्रतिज्ञा करे कि मैं पूरे श्रावण मास में ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा तथा प्रतिदिन प्रातः स्नान करूँगा। नक्त व्रत, रात्रि शयन तथा अन्य प्राणियों पर दया भाव रखूँगा। वह यह भी संकल्प करे कि यदि मैं इस व्रत के प्रारम्भ होने के बाद और इस व्रत के समाप्ति से पूर्व मर जाऊँ तो हे भगवान! उस स्थिति में आपके प्रसाद से मेरा व्रत परिपूर्ण हो जाये। नक्त व्रत करता हुआ प्राणी मुझे अति प्रिय हो जाता है। ब्राह्मण द्वारा या स्वयं रुद्र का एक मास तक जो अभिषेक करता है, उसपर मेरी सदैव कृपा दृष्टि रहती है क्योंकि मुझे जलधारा अति प्रिय है। श्रावण मास में जो प्राणी अधिक स्वादिष्ट भोजन या उपयोगी वस्तु ब्राह्मण को देता है वह मुझे बहुत प्रिय है।

हे सनत्कुमार! अब मुझसे उत्तम “लक्ष पूजा” विधि को ध्यानपूर्वक सुनो। लक्ष्मी की इच्छा प्राप्ति वाला मनुष्य विल्व पत्रों से, शान्ति की कामना करनेवाला मनुष्य दूर्वाओं से तथा आयु की इच्छा वाला मनुष्य चम्पा के फूलों से भगवान श्री हरि की पूजा-अर्चना करे।

विद्या की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति मल्लिका तथा चमेली के फूलों से पूजा-अर्चना करे। तुलसी दल से भगवान श्री हरि और मैं स्वयं प्रसन्न होते हैं। पुत्र की कामना रखनेवाला व्यक्ति कटेरी के फूलों से पूजा अर्चना करे। जिसे बुरे-बुरे स्वप्न दिखाई देते हों, वह उनके नाश के लिए उत्तम धान्य से पूजा अर्चना करे। देव के सम्मुख रंगबल्ली, पद्म, स्वास्तिक और चक्र आदि बनाकर भगवान विभु की पूजा अर्चना करे। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए सब पुष्पों से मनुष्य को पूजा अर्चना करनी चाहिए। लक्ष्मी पूजा करने से मैं (भगवान शिव) सदा प्रसन्न रहता हूँ। अन्त में उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन के लिए मंडप बनवाकर उसके तीसरे भाग में वेदी बनानी चाहिए। पुण्याह वाचन कर आचार्य का वरण करना चाहिये। मंडप में बैठकर रात्रि जागरण कर वेद पाठ कराना चाहिये। वेदी पर उत्तम चतुर्लिंगतोभद्र बनाकर उसके मध्य भाग में चावलों से सुन्दर कैलाश का निर्माण करना चाहिए। उस वेदी में यथास्थान ताँबे का कलश स्थापित करना चाहिए। उसमें पंचपल्लव तथा सूक्ष्म वस्त्र रखने चाहिए। उसमें भगवान शंकर की स्वर्ण की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराकर स्थापित कर अर्चना करें। नैवेद्य युक्त धूप, दीप, गीत, वाद्य, नृत्य तथा वेदशास्त्र, पुराण द्वारा रात में जागरण करना चाहिए तथा प्रातःकाल होने पर स्नान करना चाहिए।

पवित्र शास्त्रोक्त विधान से वेदी बनानी चाहिए। तिल, घी, पायस, मूलमंत्र, गायत्री, शिव सहस्त्रनाम से हवन करना चाहिए। जिस मन्त्र से पूजन किया है उसी मन्त्र से हवन करना चाहिये। खांड, घी, चावल से हवन करना चाहिये। हवन समाप्ति पर पूर्णाहुति देनी चाहिये। प्रातः वस्त्र, अलंकार, आभूषण से आचार्य का अर्चन करना चाहिए। ब्राह्मणों का पूजन कर उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए।

जिन मंत्रों से भगवान शिव की “लक्षपूजा” की है, उन चीजों को दान करना होता है। स्वर्ण निर्मित भगवान शंकर की मूर्ति का अर्चन करें। यदि एक महीने तक दीप जलाया हो तो उसको दान में देना चाहिये। सम्पूर्ण इच्छाओं की सिद्धि हेतु स्वर्ण की बत्ती, चाँदी का निर्मित दीप बनवाकर उसमें गौ का घी भरकर दान देना चाहिये। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें। इस प्रकार जो मेरी अर्चना करता है मैं उसपर सदैव प्रसन्न रहता हूँ।

जो मनुष्य श्रावण मास में अपनी प्यारी वस्तु का त्याग करता है और वह मुझे अर्पण की जाती है तो हे मुने! उस फल को सुनो। इस लोक में तथा परलोक में वह वस्तु लाख गुणा होकर मिलती है। निष्काम भाव से त्यागने पर उत्तम गति की प्राप्ति होती है। जो भक्त मेरा रुद्री पाठ करता है वह प्रति अक्षर करोड़ वर्ष तक रुद्रलोक में निवास करता है। पंचामृत के अभिषेक से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्रावण मास में धरती पर सोने वाले मनुष्य को हाथी दाँत से बनी हुई या चन्दन निर्मित, नवरत्न से जड़ी हुई, मृदु, गरुड़ चिह्न वाली, रुई से भरी कपड़े के रिजाई और तकियों से सम्पन्न शय्या प्राप्त होती है। वह शय्या उसे सुन्दर स्त्री, अन्न, रत्नों से विभूषित मिलती है।

श्रावण मास में जो आदमी ब्रह्मचर्य का पालन करता है उसका वीर्य अत्यधिक पुष्ट हो जाता है। तेजस्विता, बल, शरीर, दृढ़ता और धर्म कार्य में समस्त उपकारी चीजें उसे मिल जाती हैं।

जो आदमी इस मास में मौन व्रत धारण करता है वह श्रेष्ठ वक्ता हो जाता है। मौन व्रत दिन-रात, दिन या रात या भोजन के समय रखा जा सकता है। मौन व्रत में यदि मनुष्य घंटा तथा पुस्तकें दान करता है तो उसको सब शास्त्रों की जानकारी स्वयं प्राप्त हो जाती है। वह मौन व्रत के प्रभाव से बृहस्पति के समान बुद्धिवाला बन जाता है। मौन व्रत करने वाले मनुष्य की किसी से कलह नहीं होती।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “नक्त व्रत” नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥


चौथा अध्याय – धारण-पारण व्रत

भगवान शंकर ने ब्रह्मापुत्र से कहा, “हे ऋषिवर! अब मैं तुम्हें धारण-पारण व्रत के बारे में बताऊँगा।” पूर्व प्रतिपदा तिथि को पुण्याहवाचन करवाने के बाद मेरा व्रत धारण करना चाहिए। एक दिन धारण और दूसरे दिन उसका पारण करना चाहिये। धारण में उपवास तथा पारण में भोजन विहित है। मास की समाप्ति पर उद्यापन करना चाहिए। श्रावण मास की समाप्ति पर कीर्तन, पुण्याहावचन कराकर आचार्य तथा दूसरे ब्राह्मणों का वरण करना चाहिए। शंकर-पार्वती की सोने की प्रतिमा को घट के ऊपर स्थापित करना चाहिए। रात्रि में भक्तिपूर्वक शिवमहापुराण का श्रवण, कीर्तन आदि करके रात्रि जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल हवन करना चाहिये। “त्र्यम्बकं यजामहे…” मंत्र से तिल और चावलों की आहुति देनी चाहिए। “वामदेवाय विदमहे महादेवाय धीमहि। तन्नो रूद्रः प्रचोदयात।” मंत्र से घृत और चावल की आहुति देनी चाहिए। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र से खीर की आहुति देनी चाहिए। इसकी पूर्णाहुति देकर होम समाप्त करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और आचार्य का पूजन करना चाहिये। इस प्रकार व्रत को पूर्ण करने से ब्रह्म हत्या आदि पापों से मनुष्य मुक्त हो जाता है, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है।

हे सनत्कुमार! अब तुम श्रावण मास में उपवास की विधि सुनो। श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि को मनुष्यों एवं स्त्रियों को संयतात्मा एवं जितेन्द्रिय होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए। अमावस्या के दिन लोगों को वृषभध्वज भगवान महादेव का षोड़शोपचार विधि से पूजन करना चाहिए। ब्राह्मणों को वस्त्र, अलंकार देकर उनका पूजन करना चाहिये। उन्हें भोजन कराकर दक्षिणा देकर हाथ जोड़कर विदा करना चाहिए।

इसी तरह मास उपवास का व्रत मुझे प्रीतिदायक है। एक लाख संख्या वाली रुद्रवर्ती विधि से करना चाहिए। इस विधि को हे सनत्कुमार ध्यानपूर्वक सुनो। यह सम्पूर्ण सिद्धियों को देनेवाली है। साधारण रुई की ग्यारह-ग्यारह बत्तियाँ निर्मित करें। यह बत्तियाँ “रुद्रबति” नाम से जानी जाती है। श्रावण मास के प्रथम दिन इस विधि से संकल्प करें। “श्रावण मास में देवों के देव महादेव हैं। मैं भक्ति पूर्वक गौरीश की एक लाख बत्तियों से आरती करूँगा।” यह संकल्प कर प्रतिदिन एक हजार बत्तियों द्वारा पूजन करना चाहिए। व्रत की समाप्ति पर इकहत्तर हजार बत्तियों से आरती करनी चाहिए या प्रतिदिन तीन हजार बत्तियों से आरती कर अन्तिम दिन तेरह हजार बत्तियों से आरती करनी चाहिये या एक ही दिन में एक लाख बत्तियों से आरती करनी चाहिए। यह बत्तियाँ मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। इनको शुद्ध घी से ही प्रज्ज्वलित करना चाहिये। इसके बाद सदाशिव का पूजन करके कथा सुननी चाहिये।

सनत्कुमार भगवान रुद्र से बोले, “हे महादेव! मुझे अब आप यह बताने का कष्ट करें कि इस व्रत का प्रभाव क्या है? इस व्रत को किसने किया है और इस व्रत के उद्यापन की विधि क्या है? ये सब बातें मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये।”

भगवान शिव ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से बोले, “तुमने जो मुझसे पूछा है उसको मैं तुम्हें बताता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। यह व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ और महान पुण्य प्रदान करने वाला है तथा सम्पूर्ण उपद्रवों को नाश करने वाला है। यह व्रत पुत्र, पौत्र तथा सौभाग्य को प्रदान करने वाला माना जाता है। सत्य तो यह है कि तीनों लोकों में रुद्रवर्ती जैसा दूसरा कोई भी व्रत नहीं है। इसके सम्बन्ध में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ।”

क्षिप्रा नदी के किनारे उज्जयिनी नाम की एक सुन्दर नगरी है। उस नगर में सुगन्धा नाम की एक अत्यन्त सुन्दर वैश्या रहती थी। उस वैश्या ने कई युवा पुरुषों तथा ब्राह्मणों के धर्म भ्रष्ट किये। बार-बार बहुत से राजाओं तथा राजकुमारों को बिगाड़ा। इस प्रकार उसने अनेकों व्यक्तियों को बुरी तरह से लूटा और लूटने के बाद धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया। अब वे सम्मानित नागरिक शर्म के मारे किसी को अपना मुँह तक न दिखा सकते थे। उस सुगन्धा वैश्या के शरीर से निकली सुगन्धी एक कोस तक फैलती रहती थी। पृथ्वी पर उसके रूप लावण्य की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। वह गायन विद्या में छः राग तथा छत्तीस रागनियों में निपुण थी। नृत्य में वह रम्भा आदि देवांगनाओं को पीछे छोड़ चुकी थी।

एक बार वह वैश्या क्षिप्रा नदी के तट पर गई। वहाँ उसने सब ओर ऋषियों को देखा। कुछ ब्राह्मण स्नान कर रहे थे तो कुछ भगवान शिव या भगवान विष्णु की अर्चना कर रहे थे। उसने वहाँ ऋषि वशिष्ठ को बैठे देखा। उनके दर्शन मात्र के प्रभाव से उस वैश्या की बुद्धि परिवर्तित हो गई। उसका मन वैश्या के जीवन तथा विषयों से हट गया। वह वैश्या महर्षि वशिष्ठ के चरणों में गिरकर अपने पाप कर्मों के नाश का उपाय पूछने लगी। सुगन्धा वैश्या ने कहा, “प्रभु! मैंने आजतक बहुत पाप किये हैं। आप मुझे उन पापों से छुटकारा दिलाने का कोई उपाय बताइये।”

महर्षि वशिष्ठ उस वैश्या की बात सुनकर बोले, “तुम मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। तेरे पापों का नाश जिस पुण्य के करने से होगा वह सब उपाय तुम्हें मैं बताता हूँ। तू वाराणसी में जाकर रुद्रवर्ती नामक व्रत को कर। यह व्रत महान पुण्य देनेवाला तथा शिव शंकर की भक्ति में मन को लगाने वाला है। इस व्रत के करने से तुम्हारी सद्गति हो सकती है।”

महर्षि वशिष्ठ के वचन सुनकर वह सुगन्धा नामक वैश्या अपना खजाना नौकरों व मित्रों को लेकर वाराणसी चली गई। उसने महर्षि वशिष्ठ द्वारा बताये व्रत को विधि विधान सहित किया। जिसके फलस्वरूप वह वैश्या पंच भौतिक शरीर को त्यागकर भगवान शंकर के शरीर में विलीन हो गई। जो भी स्त्री इस व्रत को जिस इच्छा को लेकर करती है उसे वह अवश्य प्राप्त होती है।

हे सनत्कुमार! अब तुम माणिकवर्तियों का महात्म्य सुनो। माणिकवर्तियों का व्रत करने से स्त्री मेरे अर्धासन की भागीदार बन जाती है। वह स्त्री महाप्रलयान्त तक मेरी प्रिया होकर निवास करती है। अब मैं तुम्हें इस व्रत की पूर्ति के लिए इसकी व्रतोद्यापन विधि बताता हूँ।

इस व्रत को करने वाली स्त्री पार्वती सहित शंकर की प्रतिमा स्थापित करे। शिव पार्वती की प्रतिमा स्वर्ण की बनी होनी चाहिए तथा वृषभ की प्रतिमा चाँदी की बनी होनी चाहिए। यथाविधि पूजन करके रात्रि जागरण करे। प्रातःकाल नदी में जाकर स्नान करे। भक्ति पूर्वक आचार्य का वरण करे तथा ग्यारह ब्राह्मणों के द्वारा घी, पायस एवं बेल-पत्रों से हवन कराना चाहिए अथवा रुद्रसूक्त, रुद्रगायत्री या मूल मंत्र द्वारा हवन कराना चाहिये। पूर्णाहुति कर आचार्य आदि की पूजा करके ग्यारह ब्राह्मणों को जोड़े सहित भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार जो भी स्त्री व्रत पूरा करती है वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाती है। स्थापित सामग्री, घट, शिव पार्वती प्रतिमा आदि आचार्य को समर्पित करनी चाहिये। इस व्रत को करनेवाली स्त्री एवं उसके पति को एक हजार अश्वमेघ यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “धारण-पारण व्रत” नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥


पाँचवाँ अध्याय – कोटिलिंग महात्म्य एवं रविवार व्रत कथा महात्म्य

भगवान शंकर बोले, “हे सनत्कुमार! कोटिलिंग का महात्म्य तथा पुण्य का विधान बताना या वर्णन करना बहुत कठिन है। जब एकलिंग महात्म्य की कथा का वर्णन करना असम्भब है तो कोटिलिंग के महात्म्य को कौन वर्णन कर सकता है? यदि मनुष्य में कोटिलिंग निर्माण करने की शक्ति न हो तो उसे एक हजार लिंगों का निर्माण करना चाहिए। यदि इसमें भी समर्थ न हों तो सौ लिंग या फिर एकलिंग ही श्रावण मास में बनवाना चाहिए। एकलिंग के बनाने से भी जीव मेरे पास निवास करता है। कामदेव के शत्रु भगवान शंकर का “ॐ नमः शिवाय” मंत्र से पूजन करना चाहिए। घर में यज्ञ करके उद्यापन करना चाहिए। हवन करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। इस व्रत को करने से असमय में मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। इस मास का व्रत बन्ध्यत्व का हरण करके सम्पूर्ण आपत्तियों को दूर करता है। रोग, शोक, सन्ताप मिटाता है। जो प्राणी पंचामृत से श्रावण मास में मेरा अभिषेक करता है वह इस शरीर को छोड़कर कैलाश में एक कल्प तक मेरे पास निवास करता है। वह प्राणी पंचामृत पीने वाला, गौ तथा धन आदि से युक्त, अत्यन्त मधुर भाषी, त्रिपुरासुरहन्ता भगवान शंकर का प्यारा बन जाता है।”

जो मनुष्य श्रावण मास में हविष्यान्न भोजन करता है, वह चावल आदि सम्पूर्ण धान्यों की अक्षयनिधि से युक्त हो जाता है। जो मनुष्य श्रावण मास में पत्तल पर भोजन करता है, उसे भोजन के लिए सोने के बर्तन प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य श्रावण मास में जमीन पर सोता है वह कैलाश पर निवास करता है। जो मनुष्य श्रावण मास में एक दिन भी ब्रह्म-मुहूर्त में स्नान करता है उसे पूरे महीने तक नहाने का फल मिलता है। इस माह में जो मनुष्य जितेन्द्रिय होता है उसे इन्द्रियजन्य बल की प्राप्ति होती है।

इस महीने में स्फटिकमणि, पाषाण, मिट्टी तथा मरमकतमणि से निर्मित शिवलिंग या स्वयं उत्पन्न या बनाये हुए, या पिसान निर्मित अथवा पीतल या चन्दन, मक्खन निर्मित शिवलिंग में एक बार अर्चन करने से सौ ब्रह्महत्या का पाप मिट जाता है। सूर्य ग्रहण, चन्द्रग्रहण या अन्य किसी सिद्ध क्षेत्र में लक्ष जप करने से जो सिद्धि प्राप्त होती है वह सिद्धि श्रावण मास में केवल एक बार जप करने से मिल सकती है।

किसी दूसरे समय में किये गये नमस्कार तथा प्रदक्षिणा से जो एक हजार बार में फल मिलता है वह फल श्रावण महीने में एक बार नमस्कार या प्रदक्षिणा करने से मिल जाता है। यह श्रावण मास मुझे अत्यधिक प्यारा है। इस महीने में वेदपारायण करने पर सब वेद मंत्रों की अच्छी तरह सिद्धि हो जाती है। इस महीने का एक दिन भी बिना श्री सूक्त पाठ किये न बितावे। जो इसको अर्थवाद मात्र कहता है वह मनुष्य नरक को प्राप्त होता है। मनुष्य को समिधा, चरु, तिल और घी से ब्रह्मयज्ञ करना चाहिए। धूप, गन्ध, पुष्प, नैवेद्य आदि के द्वारा अर्चना करनी चाहिए। भगवान शंकर के रूपों का यथोचित ध्यान कर शक्ति द्वारा कोटिहोम, लक्षहोम और अयुत हवन करना चाहिए। तिलों का व्याहृति मंत्रों द्वारा हवन करना चाहिए। इसी को ग्रह यज्ञ का नाम दिया गया है।

हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें रविवार व्रत की कथा, महात्म्य, विधि तथा पारायण को बताता हूँ। उसे ध्यानपूर्वक सुनो। प्रतिष्ठानपुर में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उसका नाम सुकर्मा था। वह भिक्षा माँग कर गुजारा करता था। एक दिन वह एक गृहस्थ के घर में भिक्षा हेतु गया। वहाँ स्त्रियाँ रविवार का व्रत कर रही थीं। उस ब्राह्मण भिक्षुक को देखकर उन स्त्रियों ने अर्चना सामग्री को ढक दिया। उधर ब्राह्मण के मन में अर्चन विधि जानने की इच्छा जाग्रत हुई। वह बोला, “हे साध्वी महिलाओ! आप सबने इस व्रत की सामग्री को क्यों ढक दिया है? आप दयालु हैं, कृपा कर मुझे भी इस व्रत को करने की विधि बतायें। मैं अपनी दरिद्रावस्था से दुःखी हूँ। यह उत्तम व्रत श्रवण कर मैं भी इस व्रत को करना चाहता हूँ। इस व्रत के विधान तथा फल को मुझे भी बताइये।”

स्त्रियों ने कहा, “हे ब्राह्मण देवता! यदि व्रत में उन्माद या प्रमाद अथवा विस्मरण, भक्ति हीनता या अनास्था करोगे तो यह व्रत निष्फल हो जायेगा। अतः इस व्रत को तुम्हें हम कैसे बता दें। ब्राह्मण बोला, “मैं ऐसा नहीं करूँगा।”

उसकी ऐसी बात सुनकर उन महिलाओं में से एक प्रौढ़ महिला ने ब्राह्मण को उस व्रत की विधि बता दी। उसने बताया श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को मौन धारण कर प्रातः उठें। शीतल जल से स्नान कर पान के पत्ते पर बारह परिधि वाला मंडल लिखना चाहिए। उसे लाल चन्दन से सूर्य नारायण के तुल्य गोलाकार लिखना चाहिए। उस मंडल में संज्ञा नाम वाली स्त्री सहित सूर्य का लाल चन्दन से पूजन करना चाहिए। घुटने जोड़कर, जमीन पर बैठकर सूर्य के बारह मंडलों पर अलग-अलग लाल चन्दन से युक्त लावा तथा जपा (ओडहुल) पुष्प से युक्त अर्घ्य को श्रद्धाभक्ति से सूर्यनारायण को दें। अर्घ्य को रक्ताक्षत, जपा पुष्प और उपचारों द्वारा युक्त करें। नारिकेल बीज और खाँड से युक्त सूर्य के मंत्रों को कहकर नैवेद्य दें।

सूर्य का बारह मंत्रों द्वारा स्तवन करें। बारह बार नमस्कार करें। बारह बार प्रदक्षिणा करें और छः सूतों को एक में मिलाकर उसमें छः ग्रन्थी लगावें। उस सूत्र को सूर्य नारायण को अर्पण कर अपने गले में पहन लें। बारह प्रकार के फल का बायना ब्राह्मण को दें। कुपात्र को इस व्रत की विधि नहीं बतानी चाहिए।

हे द्विज! इस व्रत के करने से निर्धन धनवान हो जाता है। निःसन्तान पुत्रवान हो जाता है। कोढ़ी का कोढ़ मिट जाता है। रोगी का रोग दूर हो जाता है। प्राणी जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह उसको इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हो जाती है। श्रावण मास के महीने चार या पाँच जितने भी रविवार पड़ें सब रविवारों का व्रत करना चाहिए। व्रत के फल की प्राप्ति हेतु उद्यापन भी करना चाहिए। इस प्रकार रविवार का व्रत करने से कार्यसिद्धि होती है।

गरीब ब्राह्मण रविवार के व्रत की विधि प्राप्त कर अपने घर को लौट गया। घर आकर उसने अपनी दोनों पुत्रियों को भी रविवार व्रत की कथा एवं विधि से अवगत कराया। उस व्रत के सुनने और अर्पण तथा दर्शन मात्र से उसकी दोनों पुत्रियाँ सुन्दर बन गईं। उसी दिन से गरीब ब्राह्मण के घर लक्ष्मीजी निवास करने लगीं। अब वह ब्राह्मण भगवान की कृपा से धन कुबेर बन गया।

एक दिन वहाँ का राजा ब्राह्मण के घर के सामने से गुजर रहा था तो उसकी दृष्टि ब्राह्मण की रूपवती कन्याओं पर पड़ी। वह उनकी सुन्दरता को देखकर ठगा सा रह गया। राजा ने उन कन्याओं से विवाह करने का निश्चय कर महलों को लौट गया। राजा ने अपने पुरोहित को ब्राह्मण के यहाँ उसकी दोनों पुत्रियों से विवाह करने का सन्देश लेकर भेजा। ब्राह्मण ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह राजा से कर दिया। राजमहल में जाकर दोनों कन्याओं ने रविवार का व्रत किया और वे पुत्र-पौत्रों से युक्त हो गईं।

हे सनत्कुमार! जिस व्रत के सुनने मात्र से सब आकांक्षाओं की पूर्ति हो जाती है तो इसके अनुष्ठान के फल का क्या कहना?

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “कोटिलिंग महात्म्य एवं रविवार व्रत कथा महात्म्य” नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


छठा अध्याय – सोमवार व्रत कथा

सनत्कुमार ने भगवान शंकर से कहा, “हे महादेव! मैंने सब सुखों को देनेवाले महात्म्य को सुना। अब मेरी इच्छा श्रावण महीने के सोमवार व्रत की कथा सुनने की हो रही है। कृपया मेरी जिज्ञासा शान्त करें।”

भगवान शंकर ने ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से कहा, “हे सनत्कुमार! रवि मेरी आँख है। उसका महात्म्य भी श्रेष्ठ है। क्या मैं पार्वती सहित सोम महात्म्य का वर्णन कर पाऊँगा? मुझसे सोम महात्म्य का जो वर्णन हो सकेगा उसे मैं तुम्हें बताने का प्रयत्न करता हूँ। चन्द्रमा का दूसरा नाम सोम है। सोम ब्राह्मणों के राजा हैं। यज्ञ साधन सोमलता का नाम है। अब तुम ध्यानपूर्वक इन नामों के कारण को सुनो।

सोमवार मेरा स्वरूप है। बारह महीनों में सोमवार का व्रत करना उत्तम है। यदि वर्ष के सब सोमवार के व्रत करने में कोई असमर्थ है तो श्रावण मास के सोमवारों का व्रत करना चाहिए। श्रावण मास के सब सोमवारों का व्रत करने से वर्ष भर के सोमवारों के व्रतों का फल मिल जाता है।”

श्रावण मास के सब सोमवारों का व्रत करने का संकल्प करके प्रति सोमवार की शाम को भगवान सदा शिव महादेव का अर्चन करें। षोड़शोपचार से पूजन करें और एकाग्र मन से कथा सुनें। मैं तुम्हें सोमवार व्रत की विधि बताता हूँ। ध्यान लगाकर सुनो –

श्रावण मास के पहले सोमवार के दिन भली भाँति स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण कर काम, क्रोध, अहंकार, द्वेष, चुगली आदि को त्याग देना चाहिए। मालती, मल्लिका आदि के सफेद पुष्पों तथा अन्य पुष्पों से तथा अभीष्ट उपचारों से मूल मंत्र “ॐ नमः शिवाय” या “त्र्यम्बक” मंत्र से पूजा करनी चाहिए और हाथ जोड़कर भोले नाथ का ध्यान करना चाहिए। उग्र, उग्रनाथ भव शशिमौलि का ध्यान करना चाहिए। देवेश का मनोहर उपचारों से अर्चन करें। इस व्रत के पुण्य फलों को तुम्हें बताता हूँ –

सोमवार के दिन जो भक्त पार्वती सहित मेरी पूजा अर्चना करते हैं वे पुनरावृत्ति से रहित दुर्लभ लोक प्राप्त कर लेते हैं। इस महीने के नक्त व्रत के पुण्य को संक्षेप मात्र से कहता हूँ। देव तथा दानवों से सात जन्म के अभेद्य पाप “नक्त भोजन” से नष्ट हो जाते हैं। इस उत्तम व्रत को उपवास रखकर करना चाहिए। इस व्रत के करने से पुत्र एवं धन दोनों की प्राप्ति होती है। वह व्यक्ति इस लोक के सभी भोगों को भोग कर उत्तम विमान द्वारा शिव लोक को जाता है और वहाँ सब का पूजनीय बन जाता है।

इस संसार को असार जानकर तन, मन, धन को चलायमान जानकर व्रतोद्यापन करना चाहिए। धन का लोभ और मन के मोह को त्यागकर अपनी शक्ति के अनुसार भगवान शिव-पार्वती की वृषभ पर स्थित स्वर्ण की प्रतिमा बनानी चाहिये। सुन्दर लिंगतोभद्र मंडल बनाकर उस पर घट स्थापित करें, दो सफेद वस्त्र से ढकें। घड़े के ऊपर ताँबे या काँसे का पात्र रखकर उसके ऊपर स्वर्ण निर्मित शिव-पार्वती की प्रतिमा रखें। श्रुति, स्मृति तथा पौराणिक मंत्रों द्वारा शिवजी की पूजा करें। पुष्पों का मंडल बनाकर उसके ऊपर एक रमणीक चंदोवा बाँधें। रात्रि जागरण करें। अपने “गृहसूत्र विधान” द्वारा बुद्धिमान को अग्नि की स्थापना करनी चाहिए। सर्व भवनाशन आदि एकादशं नामों से हवन करना चाहिए। पलाश की लकड़ियों से १०८ आहुतियाँ देनी चाहिएँ। घी, तिल तथा बेलपत्र आदि द्वारा “ॐ नमः शिवाय” मंत्र से हवन करना चाहिए। इसके बाद आचार्य का पूजन अर्चन कर दक्षिणा में गौ देनी चाहिए। ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनको काँसे के घड़े देने चाहिए। देवता पर चढ़ी सामग्री आचार्य को दें और प्रार्थना करें कि मेरा व्रत पूर्ण हो। इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न हों। आदरपूर्वक हाथ जोड़कर पहले ब्राह्मणों को फिर आचार्य को विदा करें। इसके बाद बंधु बाँधवों सहित भोजन करें। जो विधि विधान से इस व्रत को करता है उसकी सारी इच्छाएँ पूरी होती हैं। अन्त में वह उत्तम विमान में बैठकर शिवलोक में जाता है जहाँ उसे आदर सम्मान प्राप्त होता है। सबसे पहले सोमवार व्रत को भगवान वासुदेव ने किया था। सोमवार व्रत के महात्म्य को जो प्राणी सुनेगा वह भी इस व्रत के फल का भागी होगा।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “सोमवार व्रत कथा” नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥


सातवाँ अध्याय – मंगलवार व्रत कथा

भगवान शंकर ने सनत्कुमार से कहा, “अब मैं तुम्हें मंगलवार व्रत कथा का महात्म्य सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। इस व्रत को मंगलागौरी व्रत भी कहते हैं। इसके करने से वैधव्य के भोग का नाश होता है। विवाह के पश्चात् पाँच वर्ष तक इस व्रत को करना चाहिये। विवाह के पश्चात् पहले श्रावण शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार को इस व्रत को आरम्भ करना चाहिए।”

पुष्प मंडप का निर्माण कर उसे केले के स्तम्भों से सुशोभित करना चाहिए। उसे अनेक प्रकार के फलों तथा रेशमी कपड़ों से विभूषित करें। मंडप में देवी की सोने की प्रतिमा अथवा किसी अन्य धातु की प्रतिमा बनवाकर स्थापित करनी चाहिए। उस प्रतिमा में मंगलागौरी का षोड़श उपचारों से, सोलह दूर्वा दलों से, सोलह चिड़चिड़ा दलों से, सोलह चावल तथा सोलह चने की दाल के दानों से अर्चना करनी चाहिए। सोलह बत्तियों वाले दीपक या सोलह दीपक जलाकर भक्ति पूर्वक दही तथा चावलों का नैवेद्य अर्पण करना चाहिए। देवी के निकट सिल-लोढ़ा रखना चाहिए। इस तरह विवाहोपरान्त पाँच वर्ष तक व्रत करना चाहिए। पाँच वर्ष पश्चात् उद्यापन करके माता को बायना देना चाहिए।

अब मैं तुम्हें बायने के बारे में बताता हूँ –

मंगला गौरी की एक पल सोने की प्रतिमा या अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने की प्रतिमा बनवायें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने अथवा चाँदी आदि से निर्मित घड़े को चावलों से भरें। उसके ऊपर पहनने के वस्त्र (साड़ी, ब्लाउज आदि) रखें, उसके ऊपर मंगलागौरी की प्रतिमा रखें। देवी के समीप सिल-लोढ़ा रखें। सिल-लोढ़ा सोने या चाँदी का होना चाहिए। इस प्रकार माता के लिए बायना देना चाहिए।

इसके बाद सोलह सुहागन ब्राह्मणियों को भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार व्रत करने मात्र से सात जन्म तक सौभाग्य अटल रहता है।

ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार ने भगवान शंकर से पूछा, “इस व्रत को पहले किसने किया और उसका क्या फल मिलता है? भगवान शंकर ने बताया, “पूर्वकाल में कुरु देश में श्रुतकीर्ति नामक राजा रहता था। वह शास्त्रों का ज्ञाता था। उसका कोई शत्रु नहीं था। वह चौंसठ कलाओं का ज्ञाता, धनुर्विद्या में निपुण था। उसे सब प्रकार का सुख था परन्तु उसके कोई सन्तान नहीं थी। इसी कारण वह दुःखी रहता था।”

उसने सन्तान के लिए देवी की आराधना की। एक दिन देवी ने उसकी आराधना से प्रसन्न होकर उसे साक्षात् दर्शन दिये और उससे वर माँगने के लिए कहा। श्रुतकीर्ति ने देवी से एक पुत्र की माँग की। राजा के वचन सुनकर देवी मुस्कराई। देवी बोली, “हे राजन! तुमने एक दुलर्भ वस्तु की याचना की है फिर भी मैं तुमको पुत्र अवश्य दूँगी। तुम्हें एक गुणवान पुत्र प्राप्त होगा परन्तु उसकी आयु सोलह वर्ष की है। हाँ यदि एक सुन्दर तथा विद्याविहीन पुत्र चाहिए तो वह बहुत समय तक जीवित रहेगा। अब बताओ तुम्हें कैसा पुत्र चाहिए? राजा ने अपनी रानी से विचार विमर्श कर गुणी पुत्र की माँग की।”

देवी ने कहा, “हे राजन! मेरे मंदिर के मुख्य द्वार पर आम का जो पेड़ है उसका एक आम तोड़कर ले जाओ और उसे रानी को खिला दो। तुम्हारी इच्छापूर्ण होगी। राजा ने देवी की आज्ञानुसार रानी को आम्रफल ले जाकर खिला दिया। दसवें महीने में रानी को एक सुन्दर पुत्र पैदा हुआ। हर्ष शोक से सम्पन्न राजा ने राजकुमार का जातकर्म आदि संस्कार कर दिया। राजा ने राजकुमार का नाम चिरायु रखा।

राजकुमार चाँद की तरह बढ़ने लगा। अब वह पन्द्रह साल का गुणी, सम्पन्न और सुन्दर बालक हो गया। राजकुमार का सोलहवाँ साल शुरू हुआ तो राजा रानी को चिन्ता होने लगी।

राजा ने सोचा कि यह पुत्र बड़े ही कष्टों से प्राप्त हुआ है। मैं इसकी मृत्यु अपनी आँखों के सामने कैसे देखूँगा। यह सोचकर राजा ने राजकुमार चिरायु को उसके मामा के साथ काशी भेजने का निश्चय कर लिया। रानी ने अपने भाई से कहा, “तुम कार्यटिक का वेष धारण कर राजकुमार चिरायु को काशी ले जाओ। मैंने इसके जन्म से पूर्व भगवान मृत्युंजय से प्रार्थना की थी कि हे विश्वदेव! पुत्र की प्राप्ति पर जगतपति की यात्रा के लिए भेजूंगी। इसलिए तुम इसे काशी ले जाओ। इसकी रक्षा का भार अब तुम्हारे कंधों पर है।

अपनी बहन की आज्ञा मानकर वह राजकुमार चिरायु को काशी ले गया। कई दिन की यात्रा के बाद वे आनन्द नगर पहुँचे। आनन्द नगर के राजा का नाम वीरसेन था। राजा के सर्वगुण सम्पन्न रूपलावण्य वाली मंगलागौरी नाम की राजकुमारी थी। उस समय वह राजकुमारी सखियों सहित बगीचे में खेल रही थी। उसी समय वहाँ चिरायु और उसका मामा वहाँ पहुँचे। वे दोनों बालिकाओं की क्रीड़ा देखने के लिए वहाँ रुक गए। राजकुमारी की सहेलियों में से एक सहेली ने क्रोध में भरकर राजकुमार चिरायु को रण्डा कहा। राजकुमारी ने अपनी सहेली से कहा, “हे सखी! तुम दुर्वचन क्यों बोल रही हो? मेरे साथ अयोग्य वाणी बोलने वाली कोई भी नहीं है। देखो मंगलागौरी के प्रसाद एवं मंगलागौरी व्रत के प्रभाव से मेरे हाथ से जिसके माथे पर चावल गिर जायें, उसके साथ मेरा विवाह हो जाने पर यदि वह अल्पायु वाला है तो भी चिरायु हो जायेगा।”

इसके बाद सब बालिकाएँ अपने-अपने घरों को लौट गईं। राजकुमारी भी राजमहल में चली गई। उस दिन राजकुमारी मंगलागौरी का विवाह बाल्हिक देश के राजा दृढ़ धर्मा के पुत्र सुकेतु के साथ होनेवाला था। परन्तु सुकेतु मूर्ख, कुरूप और बहरा था। इस बात का पता राजा वीरसेन को नहीं था। अतः वर पक्ष वालों ने विवाह मंडप में एक अन्य अच्छा वर ले जाने का निश्चय किया। विवाहोपरान्त प्रस्तुत वर को भगा दिया जायेगा। इस प्रकार सुकेतु राजकुमारी को अपने देश ले जायेगा।

ऐसा विचार कर वर पक्ष के कुछ आदमी चिरायु के मामा के पास आकर जोले, “यह बालक तुम हम दे दो। इसके द्वारा हमारा काम सिद्ध होनेवाला है। इस पृथ्वी पर परोपकार से बढ़कर कोई दूसरा काम नहीं है। उन आदमियों की बात सुनकर राजकुमार चिरायु का मामा राजी हो गया क्योंकि वह बगीचे में मंगलागौरी की बात सुन चुका था। वह उन आदमियों से बोला, “आप लोग इस लड़के को क्यों चाहते हैं? विवाह के लिए वस्त्र गहने तो माँगे जा सकते हैं लेकिन वर को थोड़े ही माँगा जाता है। फिर भी आपकी बात रखते हुए लड़का आपके साथ भेज रहा हूँ। वर पक्ष के लोग राजकुमार चिरायु को विवाह मंडप में ले गये और विवाह कार्य सम्पन्न हो गया। विवाह के बाद रात में जब राजकुमार चिरायु मंगलागौरी के साथ सोया उसी दिन उसका सोलहवाँ वर्ष समाप्त हो रहा था। ठीक उसी समय काल साँप का रूप धारण कर वहाँ आया। संयोगवश उसी समय राजकुमारी मंगलागौरी की नींद खुल गई। उसने साँप को देखा तो राजकुमारी ने साँप की पूजा की। उसे पीने के लिए बहुत-सा दूध दिया। मंगलागौरी ने कहा, “मैं उत्तम व्रत करूँगी। मेरे पतिदेव को छोड़ दो तथा उन्हें चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दो।”

देखते ही देखते साँप कमण्डल में घुस गया। राजकुमारी ने अपनी चोली से कमण्डल का मुख बन्द कर दिया। उसी समय राजकुमार चिरायु अपने शरीर के अंगों को ऐंठते हुए उठ बैठा। उसने राजकुमारी से कहा, “मुझे बहुत भूख लगी है।” राजकुमारी ने माता के समीप जाकर लड्डू आदि लाकर राजकुमार को खाने के लिए दिये। राजकुमार ने प्रसन्नता से लड्डू खाये। हाथों को धोते समय उसके हाथ से अंगूठी गिर गई। वह पान खाकर फिर सो गया। राजकुमारी कमण्डल में बन्द सर्प को बाहर फेंकने गई, लेकिन विधि के विधान से बाहर जाने पर चमकते हार की कान्ति देख वह चकित रह गई। उसने हार को अपने गले में पहन लिया। कुछ रात शेष रहने पर चिरायु का मामा उसे ले गया। चिरायु के जाने के बाद वर पक्ष के लोग सुकेतु को ले आये। मंगलागौरी ने सुकेतु को देखा तो वह बोली यह मेरा पति नहीं है। सभी बराती कहने लगे, “हे शुभे! यह तुम क्या कह रही हो? यदि कोई पहचान हो तो बताओ।”

इस पर मंगलागौरी ने कहा, “रात को मेरे पति ने मुझे जो जड़ाऊ हार दिया है उस हार के रत्नों की सुन्दरता के बारे में यह बतावें। रात्रि में आम्रसेचन के समय मेरे पतिदेव का केशरयुक्त पैर मेरी जांघ में लगा हुआ है उसे देखकर सब लोग बतायें कि यह पैर का निशान किसका है? रात्रि के समय जो बातचीत हम दोनों के बीच हुई थी तथा जो भोजन करा था उसके बारे में यह बतायें।”

सुकेतु मंगलागौरी के एक भी प्रश्न का उत्तर न दे सका। इस पर कन्या पक्ष वालों ने बारात को बिना दुल्हन के वापिस भेज दिया। मंगलागौरी के पिता महाराजा वीरसेन ने एक महान यज्ञ कराया। उसे यह भी पता चल गया कि वर पक्ष वालों ने अपने कुरूप राजकुमार के स्थान पर किसी अन्य सुन्दर युवक को विवाह के मंडप में ले आये थे और उस अनजान युवक के साथ मंगलागौरी का विवाह हुआ था।

अब मंगलागौरी राजमहल के बरामदे में एक चिक की ओट में बैठ गई और आते-जाते प्रत्येक व्यक्ति को देखने लगी। इधर चिरायु भी वहाँ के हाल-चाल जानने की इच्छा से अपने मामा के साथ उधर आया। जैसे ही चिरायु महल के आगे से गुजरा तो मंगलागौरी ने उसे पहचान लिया। वह अपने पिता राजा वीरसेन से बोली, “यह आदमी जो अभी-अभी गया है यही मेरा पति है।” राजा न दोनों मामा-भांजे का बुलाया। मंगलागौरी की बताई हुई निशानियाँ चिरायु में मौजूद थीं। राजा ने विवाहोत्सव के वस्त्राभूषण आदि अश्व, गज, रथ तथा बहुत सी चीजें देकर मंगलागौरी को बिदा किया। मामा अपने भांजे चिरायु को तथा मंगलागौरी को लेकर अपनी बहन के यहाँ चल दिया। जब चिरायु के माता-पिता ने उसके आने का समाचार सुना तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि भाग्य विपरीत कैसे हो सकता है। इसी बीच चिरायु अपने माता-पिता के पास पहुँच गया और उनके चरण स्पर्श किए। पुत्र वधू को सास ने अपनी गोदी में बैठाकर सब बातें पूछीं।

मंगलागौरी ने उसको व्रत महात्म्य तथा पिछला समस्त घटनाक्रम बतलाया। मंगलागौरी के कारण ही तभी से यह व्रत “मंगलागौरी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसे जो कोई भी सुनेगा अथवा इसका कीर्तन करेगा उसके सभी मनोरथ सिद्ध हो जायेंगे।

श्री सूतजी बोले, “हे ऋषिगण भगवान शंकर ने सनत्कुमार से इस व्रत को कहा और वह इस कार्य की सिद्धि वाले व्रत को सुनकर गद्गद् हो उठे। उनको इसके सुनने से परमानन्द की प्राप्ति हुई।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “मंगलवार व्रत कथा” नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


आठवाँ अध्याय – बुधवार और बृहस्पतिवार व्रत की कथा

भगवान शंकर बोले, “हे सनत्कुमार अब मैं तुमसे पाप को हरने वाले बुध तथा बृहस्पति व्रत को बताता हूँ जिन्हें श्रद्धा के साथ करने से प्राणी उत्तम सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।”

ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मणों के राज्यासन पर अभिषिक्त किया था। किसी समय चन्द्रमा की दृष्टि बृहस्पति की पत्नी तारा पर पड़ी। तारा रमणीय, रूपलावण्य सम्पन्न स्त्री थी। चन्द्रमा उसके रूपलावण्य पर मोहित हो काम के वश में हो गए। चन्द्रमा ने देवताओं की गुरु पत्नी को जबरदस्ती अपने घर में रख लिया। कुछ काल पश्चात् उससे एक पुत्र पैदा हुआ। पुत्र का नाम बुध रखा गया। बुध विद्वान् रूपवान तथा सर्वगुण सम्पन्न था।

देवगुरु बृहस्पति अपनी पत्नी को खोजते हुए चन्द्रमा के निवास पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपनी पत्नी तारा को देखा। बृहस्पति चन्द्रमा से बोले, “तुमने गुरु-पत्नी के साथ गमन किया है। इस पाप से तुम कैसे बचोगे? इस महापाप की ओर तुम्हारी बुद्धि कैसे प्रवृत्त हो गई? अब तुम चुपचाप मेरी पत्नी को मुझे लौटा दो और तुम इस पाप से बचने के लिए प्रायश्चित्त करो। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो मैं तुम्हारी शिकायत इन्द्र से करूँगा।”

बृहस्पति के कहने पर भी चन्द्रमा उनकी पत्नी को लौटाने को तैयार नहीं हुआ तो देव गुरु ने राजा इन्द्र से चन्द्रमा की शिकायत कर दी कि इसने मेरी पत्नी का अपहरण कर लिया है। हे इन्द्र! आप देवराज हैं। आप चन्द्रमा से कहकर मेरी पत्नी मुझे वापिस दिलवायें। ऐसा न करने पर चन्द्रमा ने जो पाप किया है वह आपको लगेगा क्योंकि राज्य का पाप शास्त्र के अनुसार राजा को ही भोगना पड़ता है।

देवराज इन्द्र ने चन्द्रमा को बुलाया और उसे आज्ञा दी कि तुम देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को लौटा दो। किसी दूसरे की पत्नी के साथ गमन करने को पाप माना जाता है तथा गुरु पत्नी के साथ गमन करना महापाप है।

देवराज इन्द्र का आदेश पाकर चन्द्रमा गुरु पत्नी तारा को बृहस्पति को लौटाने को तैयार हो गया परन्तु तारा से उत्पन्न अपना पुत्र मैं वापिस नहीं करूँगा। चन्द्रमा की बात सुनकर देवताओं को संशय हो गया कि यह किसका पुत्र है? इस बात की पुष्टि तो तारा ही कर सकती है कि यह किसका पुत्र है? देवताओं ने तारा को बुलाकर पूछा, “हे कल्याणी! तुम सच सच बताओ यह पुत्र किसका है?” लज्जायुक्त होकर तारा ने कहा, “यह बालक चन्द्रमा का औरस तथा बृहस्पति का क्षेत्रज पुत्र है। अब जिसको ठीक समझें उसे इस बालक को सौंप दीजिए।”

तारा की बात सुनकर बालक बुध को चन्द्रमा को सौंप दिया। इससे गुरु बृहस्पति खिन्न हो गये। उन्हें खिन्न देखकर देवों ने दोनों को वर दिया। चन्द्रमा से कहा, “यह तुम्हारा पुत्र है। अब तुम घर जाओ। चन्द्रमा तथा बृहस्पति पुत्र बुध ग्रह होगा। हे आचार्य और भी शुभ वर को ग्रहण करो। जो प्राणी दोनों का मिलकर एक साथ व्रत करेगा, उसे सब सिद्धियों की प्राप्ति होगी।”

भगवान शिव के प्रिय मास श्रावण में जो लोग बुध और गुरुवार के दिन अर्चना करेंगे उनके खजाने भरे रहेंगे तथा उनका क्षय नहीं होगा। नैवेद्य दही भात से दोनों मूर्तियाँ लिखनी चाहिये। जो दोनों मूर्तियों को झूले पर रखकर अर्चन करता है वह दीर्घायु तथा सम्पूर्ण गुणों से युक्त पुत्र प्राप्त करता है। पाकशाला में लिखकर अर्चना करने से पाक वृद्धि और देवागार में लिखकर अर्चना करने से देव की दया होती है। सोने के कमरे में लिखकर अर्चना करने से पत्नी का वियोग कभी नहीं होता। इस प्रकार यथा स्थान पर उसका फल प्राप्त होता है। सात वर्ष तक व्रत करने के पश्चात उसका उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन में पहले रात में जागरण करें। सोने की प्रतिमा का निर्माण कर विधि पूर्वक अर्चन करें। षोड्श उपचार द्वारा अर्चना कर हवन करें। तिल, घी तथा खीर प्रज्ज्वलित अग्नि में देनी चाहिये। चिंचीड़ा तथा पीपल की समिधाओं से हवन करके पूर्णाहुति डालनी चाहिए। इसके बाद मामा भांजे को भोजन कराकर अन्य ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उन्हें हाथ जोड़कर विदा करने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। इस प्रकार सात वर्ष तक व्रत करने वाला प्राणी सब इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है। जो विद्या की कामना करता है उसे विद्या की प्राप्ति होती है, वह वेदों और शास्त्रों का मर्म जान लेता है। उसे बुध ज्ञान एवं गुरु बृहस्पति गुरुता प्रदान करते हैं।

सनत्कुमार ने भगवान शंकर से पूछा, “आपने पहले मामा तथा भांजे को भोजन कराने का विधान बताया है। इसका कारण क्या है? भगवान शंकर ने कहा, “हे सनत्कुमार! पहले समय में मामा और भांजा दोनों दरिद्र थे। एक दिन दोनों भोजन के लिए घूमते-घूमते एक सुन्दर नगर में पहुँच गये। उन्होंने वहाँ प्रत्येक मकान में श्रावण के महीने में प्रत्येक वार का व्रत करते लोगों का देखा परन्तु बुध और बृहस्पति का व्रत करते कहीं नहीं देखा। दोनों मामा भांजे ने बहुत समय तक आपस में विचार किया कि सब जगह सूर्य और अन्य वारों का व्रत तो हो रहा है परन्तु बुध और गुरु का व्रत देखने को कहीं नहीं मिला। अतः हम दोनों बुध और गुरु का व्रत करें तो अच्छा रहेगा क्योंकि अभी तक किसी ने भी इन दोनों वारों का व्रत किया ही नहीं है। यह अनुच्छिष्ट व्रत है। इसे हम करेंगे। लेकिन विधि विधान न जानने के कारण दोनों संशय में पड़ गये। तब रात्रि में उन्हें विधि विधान का स्वप्न में पता चल गया। स्वप्न से ज्ञात विधि द्वारा दोनों ने इस व्रत को किया। व्रत करने से वे धन धान्य से सम्पन्न हो गये। सात वर्ष तक दोनों मामा भांजे व्रत को करते रहे और वे पुत्र- पौत्र, धन-सम्पदा आदि से सम्पन्न हो गये। बुध और गुरु (बृहस्पति) ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन दोनों को वर दिया कि आप लोगों ने हमारे व्रत का सुविचार किया। आज से जो भी इस व्रत को करेगा और मामा भांजे को पहले भोजन करायेगा, वह उत्तम सिद्धियों को प्राप्त करेगा।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “बुधवार और बृहस्पतिवार व्रत की कथा” नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


नौवाँ अध्याय – शुक्रवार की कथा

भगवान शंकर ने सनत्कुमार से कहा अब मैं तुम्हें शुक्रवार की कथा कहता हूँ जिसे सुनकर प्राणी समस्त विपत्तियों से छूट जाता है। पांडव वंश में एक राजा था जिसका नाम सुशील था। उसके यहाँ कोई सन्तान नहीं थी। उसकी पत्नी का नाम सुकेशी था। पुत्र न होने के कारण वह उदास रहने लगी। रानी स्त्री स्वभाव के कारण हर महीने कपड़ों को अपने पेट पर बाँधकर पेट की वृद्धि करती रही। इस प्रकार साहस के कारण, स्व प्रसूति के अनुसार सुकेशी किसी गर्भवती स्त्री को खोजती रही। संयोगवश उसने गर्भवती पुरोहित की पत्नी को देखा। कपटी रानी ने प्रसव के समय में दाई का कार्य करने वाली अन्य किसी स्त्री को इस काम के लिये नियुक्त किया। उस दाई को एकान्त में बहुत सा धन दिया और अपने गर्भ के अनुकरण की सब बातें कह सुनाई। पुरोहित की पत्नी का प्रसव का समय नजदीक आया। यह सुन उसी तरह दाई ने भी अपने वचन का पालन किया। पुरोहित की पत्नी दाई की बात नहीं जानती थी। अतः वह दाई की बातों का पालन करती थी। दाई ने पुरोहित की स्त्री के नेत्रों पर पट्टी बाँध दी और उसके उत्पन्न हुए पुत्र को रानी के पास भेज दिया। इस प्रकार रानी के पास उस पुरोहितानी के पुत्र के पहुँच जाने की किसी को कानो-कान खबर न हुई। इस नाटक को कोई न जान सका। रानी ने अपनी दासियों द्वारा राजा को खबर करा दी कि उनके यहाँ लड़का पैदा हुआ है। उधर दाई ने पुरोहितानी के नेत्रों से पट्टी खोल दी। वह अपने साथ मांस की एक पिण्डी लाई थी। दाई ने पुरोहितानी को वह मांस की पिण्डी दिखाते हुए कहा, “यह अनिष्ट हुआ है। अपने पति से इसकी शान्ति करवाना। पुत्र नहीं हुआ तो न सही तुम्हारे प्राण तो बच गये।”

पुरोहित की स्त्री सोचने लगी- कही दाई ने मेरे साथ कपट तो नहीं किया?

राजा ने जब पुत्र उत्पन्न होने की बात सुनी तो जातकर्म आदि करके ब्राह्मणों को गज, अश्व, रथ आदि दान में दिये। जो बन्दी बन्दीखाने में बन्द थे सबको छोड़ दिया। राजा ने उसका नाम प्रियव्रत रखा।

श्रावण मास प्रारम्भ होने पर पुरोहित की स्त्री ने शुक्रवार के दिन भक्ति द्वारा “जीवन्तिका” की पूजा अर्चना की। दीवार पर बहुत से लड़कों के सहित जीवन्तिका की तस्वीर बनाई। और पाँच दीपक जलाकर पुष्प माला से पूजा अर्चना की। गेहूँ के आटे के दीपक बनाकर जलाती और स्वयं भी गेहूं के आटे को शुद्ध घी में पकाकर भोजन करती। भोजन के पश्चात् जीवन्तिका से प्रार्थना करती जहाँ पर भी मेरा पुत्र हो, उसे सुरक्षित रखना। इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात् वह कथा सुनती और यथा विधि नमस्कार करती।

जीवन्तिका के प्रसाद से वह बालक राजा के यहाँ चाँद की तरह बढ़ने लगा और जीवन्तिका उसकी रात-दिन रक्षा करने लगी। कुछ समय बाद राजा का स्वर्गवास हो गया। पितृभक्त पुत्र ने पिता की पारलौकिक क्रिया सम्पन्न कराई। इसके बाद मंत्रिमंडल ने उसको राजसिंहासन पर बैठा दिया। उसने कुछ काल तक राज्य का शासन भली-भाँति किया। इसके बाद वह राज्य का भार मंत्रियों को सौंप कर पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए “गयाजी” को रवाना हो गया। उसने यह यात्रा कार्पटिक वेष में की। रास्ते में वह किसी गृहस्थी के घर पर ठहरा। उस गृहस्थी के यहाँ पुत्र हुआ था। इससे पहले के पाँच पुत्रों को षष्ठी देवी ने मार डाला था परन्तु इस बालक को षष्टी देवी नहीं मार सकी। राजा के वहाँ रहने के कारण जीवन्तिका देवी उसकी रक्षा कर रही थी। गृहस्थ ने जब अपने लड़के को जीवित अवस्था में देखा तो उसको पक्का विश्वास हो गया कि यह बालक अतिथि (राजा) के कारण ही जीवित है। उसने राजा से एक दिन घर पर ठहरने की कृपा की क्योंकि आपकी कृपा से ही मेरा यह छठा पुत्र जीवित है।

गृहस्थ के प्रार्थना पर राजा एक दिन के लिए उनके यहाँ रुक गया। फिर वह गयाजी चला गया और वहाँ पिण्ड देने लगा। पिण्ड देते समय उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने देखा कि पिण्ड को ग्रहण करने के लिए दो हाथ बाहर निकले हैं। एक विद्वान ब्राह्मण से उसने पूछा यह सब क्या मामला है? ब्राह्मण बोला, ये दोनों हाथ तुम्हारे पिता के हैं। घर जाकर अपनी माता से पूछना कि ऐसा क्यों हुआ? तुम्हारी माता ही बतायेगी।

लौटते समय राजा फिर उसी गृहस्थी के यहाँ ठहरा। उसके यहाँ अब दूसरा पुत्र पैदा हुआ था जो केवल सात दिन का था। इस लड़के को लेने जब षष्ठी देवी आई तो जीवन्तिका देवी ने उसे बालक को नहीं ले जाने दिया। षष्ठी देवी ने जीवन्तिका देवी से पूछा आप इन लड़कों को क्यों बचा रही हैं? इसकी माँ ने कौन सा व्रत किया है जो दिन रात आप इसकी रक्षा करती है?

राजा भी उस समय जाग रहा था। वह दोनों देवियों की बात सुन रहा था। वह नींद का बहाना करके पड़ा रहा। जीवन्तिका बोली, “इनके यहाँ जो अतिथि ठहरा हुआ है उसकी माँ श्रावण के महीने में शुक्रवार के दिन मेरा पूजन तथा व्रत नियमानुसार करती है। वह नियम क्या है और किस प्रकार किया जाता है वह सब तुम्हें बताती हूँ।”

इसकी (राजा) माँ उस दिन हरे रंग के वस्त्र और हरे रंग की चूड़ियाँ नहीं पहनती। चावल के धोवन (मांड) को कभी नहीं लाँघती। हरे पत्तों के मंडप के नीचे नहीं जाती। हरे रंग की साग-सब्जी नहीं खाती। यह सब कुछ वह मेरे लिए ही करती है। इसलिए मैं उसकी तथा उसके पुत्र की रक्षा करती हूँ।

षष्ठी देवी और जीवन्तिका देवी का वार्त्तालाप सुनकर राजा सुबह उठकर अपने राज्य में आया। राजा ने अपनी माता से पूछा, “हे माता! आप जीवन्तिका का व्रत करती हैं तो उसकी विधि क्या है? राजा की माता ने उत्तर दिया, “मैं जीवन्तिका का व्रत नहीं करती इसलिए मुझे उसकी विधि का ज्ञान नहीं है।” यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और सोचने लगा कि मेरी माता कौन है?

राजा ने गया यात्रा के फल प्राप्त्यर्थ ब्राह्मणों तथा सुहागिनियों को भोजन कराने की इच्छा प्रकट कर उनके यहाँ हरे वस्त्र, हरी चूड़ियाँ आदि परीक्षार्थ भिजवाये। दूत ने सबके यहाँ संदेशा दिया कि आप सब राजा के यहाँ भोजन करने आएँ।

पुरोहित की पत्नी ने राजदूत से कहा, “मैं हरे रंग की कोई चीज नहीं लेती। राजा को यह समाचार मिलने पर उसने पुरोहित पत्नी के लिए लाल रंग के वस्त्र और लाल रंग की चूड़ियाँ भेजीं। पुरोहित पत्नी ने उन चीजों को ले लिया और राजमहल में आई।”

पुरोहित पत्नी को देखकर राजा ने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया और नियम का पालन करने का कारण पूछा। उसने इसका कारण शुक्रवार व्रत बताया। राजा को देखकर उसी समय उसके स्तनों से मातृ प्रेम के भाव के कारण दूध निकलने लगा। उस दुग्ध से राजा भली प्रकार सिंचित हो गया।

गया में दो हाथ निकलने से तथा रास्ते में गृहस्थी के यहाँ देवी से बातचीत और स्तनों से – दूध निकलने से राजा को पक्का विश्वास हो गया कि यही उसकी माता है।

राजा ने पूछा, “हे माते! भय मत करो और मुझे मेरे जन्म का सही-सही हाल बताओ। सुकेशिनी ने उसके जन्म के सब तथ्य बता दिये। राजा ने प्रसन्न होकर अपना जन्म देने वाले माता-पिता को नमस्कार किया और उनको सम्पत्ति देकर उनका मान बढ़ाया।”

एक दिन रात को राजा ने जीवन्तिका से प्रार्थना की, “हे देवी! मेरे जन्मदाता पिता तो मौजूद हैं, फिर गया में पानी से दो हाथ किसके निकले थे?” देवी ने राजा को ख्वाब में ही उत्तर दिया, “हे राजन्! मैंने तुम्हें विश्वास दिलाने हेतु ऐसी माया रची थी, इसमें तुम कोई सन्देह न करो।”

भगवान शंकर बोले, “हे सनत्कुमार! मैंने तुम्हें शुक्रवार के व्रत करने का माहात्म्य कह सुनाया। इस व्रत को श्रावण के मास में करने से मनुष्य की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “शुक्रवार की कथा” नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


दसवाँ अध्याय – शनिवार व्रत कथा (श्री हनुमान, श्री नृसिंहजी तथा शनि व्रत)

भगवान शंकर ने ब्रह्मा पुत्र सनत्कुमार से कहा, “अब मैं तुम्हें शनिवार व्रत की विधि और माहात्म्य कहूँगा। तुम ध्यान लगाकर सुनो।”

श्रावण मास में शनिवार को तीन देवताओं श्री हनुमान, श्री नृसिंहजी तथा शनि की पूजा की जाती है। प्रथम मैं तुम्हें श्री हनुमान जी को प्रसन्न करने की विधि बताता हूँ। श्रावण महीने के शनिवार को हनुमान जी को खुश रखने के लिए अभिषेक तिलों के तेलों द्वारा रुद्र मंत्रों से करें। तेल मिश्रित सिंदूर उनके शरीर में लगायें। जपा, अर्क तथा मंदार की माला से पूजा कर नैवेद्य के लिए उड़द का बड़ा (पकौड़ा) तथा उपचारों द्वारा पूजन करें। हनुमान जी के प्रीत्यर्थ बारह नामों का – जाप करें। उनके बारह नाम इस प्रकार हैं- हनुमान, अंजनीपुत्र, वायुपुत्र, महाबली, रामेष्ट, फाल्गुन सखा, पिंगाक्ष, अमितविक्रम, अवधिक्रमण, सीताशोक विनाशक, लक्ष्मण प्राणवता तथा दशग्रीवदर्पाहा। जो सुबह उठकर इन बारह नामों का जाप करता है उसे कभी कष्ट की अनुभूति नहीं होती। उसको सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है। श्रावण मास में जो हनुमानजी की शनिवार को आराधना करता है उसका शरीर वज्र की भाँति कठोर होकर मजबूत बन जाता है। उसकी बुद्धि तीव्र हो जाती है। उसके शत्रु निस्तेज हो जाते हैं। मित्रों की संख्या भी बढ़ जाती है। हनुमान जी के मंदिर में बैठकर जो व्यक्ति हनुमान कवच का एक लाख पाठ करता है, वह अणिमा आदि सिद्धियों का साधक हो जाता है। उसके दर्शन मात्र से यक्ष, राक्षस और बेताल आदि उसके सामने नहीं ठहर पाते।

अब मैं तुम्हें भगवान नृसिंह की कथा व पूजन विधि बताता हूँ। दीवार पर या स्तम्भ पर नृसिंह जी का चित्र बनाकर लक्ष्मी जी सहित हल्दी सहित चन्दन, नीले या पीले फूलों द्वारा पूजन करना चाहिए। खिचड़ी और हाथीचक्क की सब्जी के नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए। प्रसाद ग्रहण कर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। इसके बाद भगवान नृसिंह को तिल के तेल या शुद्ध घी से स्नान कराना चाहिए। शनिवार के दिन स्वयं सपरिवार शरीर में तेल लगाकर नहाना चाहिए। उड़द की दाल की खिचड़ी बनानी चाहिए। इससे भगवान नृसिंह खुश हो जाते हैं।

इस प्रकार श्रावण मास के समस्त शनिवार को व्रत रखें। इस व्रत से लक्ष्मी का निवास घर में हर समय रहता है। धन धान्य की वृद्धि होती है। प्राणी इस संसार में हर तरह का सुख भोग कर बैकुण्ठ को जाता है। भगवान नृसिंह के वरदान तथा प्रसाद से उसकी चारों ओर कीर्ति फैलती है।

अब मैं तुम्हें शनिदेव के व्रत की कथा एवं उसका महात्म्य बताता हूँ। श्रावण के समस्त शनिवार को शनि का व्रत करें। किसी लंगड़े ब्राह्मण या उसके न मिलने पर किसी अन्य ब्राह्मण को तिल का तेल लगाकर गरम पानी से स्नान करायें। इसके बाद नृसिंह व्रत में बताये अनुसार अन्न से उसे भोजन कराना चाहिए। शनि के प्रीत्यर्थ तेल, लोहा, तिल, उड़द तथा काला कम्बल दान करें। अब मैं शनिदेव के रूप-रंग का वर्णन करता हूँ। शनिदेव का श्याम वर्ण है। गति मन्द है, कश्यप गोत्र है। शनि का जन्म सौराष्ट्र में हुआ है। ये सूर्य नारायण के पुत्र हैं। ये इन्द्रनीलमणि तुल्य हैं। इन्होंने बाण, धनुष तथा त्रिशूल धारण कर रखा है। इनकी सवारी गिद्ध है। इनके यम अधिदेवता हैं। इनको कस्तूरी, अगर, चन्दन तथा गुग्गल और नैवेद्य में उड़द की खिचड़ी प्रिय हैं।

शनि की पूजा में इनकी लोहे की प्रतिमा रखी जाती है। दान देने के लिए श्याम वर्ण का ब्राह्मण उत्तम है। ब्राह्मण को दो काले कपड़े तथा काले रंग की गाय, बछड़े सहित दान में देनी चाहिये और उसकी स्तुति करनी चाहिये।

एक बार राजा नल का राज्य छिन जाने पर राजा नल ने शनिदेव की आराधना की थी। शनिदेव ने उन पर कृपा की और खोया राज्य वापिस प्राप्त हो गया। मनुष्य को चाहिए कि वह इस प्रकार शनिदेव की आराधना कर कहे कि मेरे ऊपर शनिदेव प्रसन्न हों। नीलान्जन के समान कांतिमान, अतिमन्द भ्रामी, छाया नाम वाली स्त्री से सूर्य द्वारा उत्पन्न शनिदेव को मैं हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ। मंडल कोण में स्थित पिंगल नामक शनिदेव को प्रणाम करता हूँ। हे शनिदेव! मुझ अति दीन पर कृपा करो। इस प्रकार बार-बार उनकी स्तुति करनी चाहिए। शनिदेव की आराधना में “शन्नो देवी” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

जो प्राणी सावधान होकर विधि विधान से शनिदेव की पूजा करता है उसे स्वप्न में भी किसी प्रकार का भय नहीं रहता। शनि जन्म राशि से पहले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, सातवें, आठवें, नवें या बारहवें स्थान में हो तो सदा पीड़ा पहुँचाता है। इसलिए उसकी शांति के लिए “शामाग्नि” मंत्र का जाप करना चाहिए और इन्द्रनीलमणि का दान करना चाहिए।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “शनिवार व्रत कथा” नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


ग्यारहवाँ अध्याय – तिथि माहात्म्य (प्रतिपदा एवं द्वितीया का व्रत)

श्री सनत्कुमार जी ने भगवान शंकर से इच्छा प्रकट की, हे प्रभु! आपने मुझे सब वारों का माहात्म्य बताया। अब मुझे तिथि माहात्म्य के बारे में जानने की इच्छा हो रही है।

श्री उमापति बोले, “हे सनत्कुमार! श्रावण का महीना मुझे सब महीनों में सबसे अधिक प्रिय है। श्रावण मास की प्रतिपदा यदि सोमवार को पड़ती है तो श्रावण मास में पाँच सोमवार होंगे। ऐसा होने पर यह “रोटक व्रत” कहलाता है। उस दिन मनुष्य को व्रत रखना चाहिए। यह साढ़े तीन मास का भी होता है। रोटक व्रत लक्ष्मी की वृद्धि करने वाला, सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला और समस्त सिद्धियों को देने वाला है।”

अब मैं तुमको रोटक व्रत को करने का विधान बताता हूँ। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को प्रातः उठकर रोटक व्रत करने का इस प्रकार संकल्प करना चाहिए- आज से मैं रोटक व्रत करूँगा। हे जगद्गुरु! मुझ पर कृपा करें। इस प्रकार संकल्प कर प्रतिदिन मेरा (भगवान शंकर) पूजन करना चाहिए। अखण्डित बेल पत्र, तुलसी पत्र, नील कमल, कमल, कल्हार, कुसुम, चम्पा, मालती, कुन्द, अर्क आदि पुष्पों तथा अनेक प्रकार के ऋतुकालीन फूलों से, धूप, दीप, नैवेद्य तथा अनेक प्रकार के फलों से पूजा करनी चाहिए। पुष्पहार नाम से पाँच रोटक बनाने चाहिए। उनमें से दो रोटक ब्राह्मण को देने चाहिये। एक रोटक नैवेद्य के रूप में मुझे समर्पित करना चाहिये। दो रोटक व्रतधारी को खाने चाहिये।

केला, नारिकेल, जम्बीरी, बिजौरा नींबू, खजूर, ककड़ी, दाख, नारंगी, मातुलिंग, अखरोट, अनार और ऋतु में पाये जाने वाले फलों से अर्घ्य दान के लिए उत्तम कहा गया है। इस व्रत को पूर्ण कर लेने पर सबे कामना पूरी हो जाती हैं।

हे सनत्कुमार! अब इस व्रत का पुण्य फल सुनो। जितना फल सात समुद्र पर्यन्त भूमि दान करने से मिलता है उतना ही फल इस व्रत को विधि पूर्वक करने से प्राप्त हो जाता है। इस व्रत को पाँच वर्ष तक करने से अतुल धन सम्पत्ति प्राप्त होती है। इसके उद्यापन में सोने के दो रोटक बनाने चाहिये। पहले दिन अधिवासन करके अन्य दिनों में प्रातःकाल शिव मंत्र द्वारा घी तथा बेल- पत्रों से हवन करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य की सब मनोकामना पूरी होती हैं।

हे सनत्कुमार! अब तुम द्वितीया के व्रत को सुनो। इस व्रत को करने वाला प्राणी लक्ष्मीवान तथा पुत्रवान हो जाता है। यह व्रत ओदुम्बर नाम से प्रसिद्ध है। यह सब पापों को नाश करने वाला है। मनुष्यों को श्रावण मास की द्वितीया तिथि को प्रातः संकल्प करके विधिवत व्रत करना चाहिये। इस व्रत में गूलर (उदुम्बर) के पेड़ की पूजा की जाती है। गूलर का पेड़ न मिल सके तो दीवार पर गूलर के पेड़ का चित्र बना लेना चाहिये। अर्चन विधि – हे उदुम्बर! आपको नमस्कार है। हे हेमपुष्पक! आपको नमस्कार है। जन्तुफलयुक्त लाल अण्ड तुल्य शलियुक्त आपको नमस्कार है। इसके बाद शिव तथा शुक्र की पूजा करनी चाहिये। गूलर के तैंतीस फलों से ग्यारह फल ब्राह्मण को, ग्यारह फल देवता को और शेष ग्यारह फल को स्वयं ग्रहण कर खाने चाहिये।

इस दिन अन्न नहीं खाना चाहिये। रात में शुक्र तथा मेरा (भगवान शंकर) अर्चन करते हुए जागरण करना चाहिये। इस प्रकार यह व्रत ग्यारह वर्ष तक करें। फिर इसका उद्यापन करें। उद्यापन में सोने का फल, पुष्प, पत्ते आदि के साथ गूलर का पेड़ बनवाकर, उसमें स्वर्ण की बनी हुई शुक्र तथा मेरी मूर्तियाँ रखकर पूजन करना चाहिये।

दूसरे दिन प्रातःकाल छोटे-छोटे गूलर के फलों से एक सौ आठ हवन करें। उदुम्बर की लकड़ी, घी तथा तिलों द्वारा हवन करना चाहिए। हवन की समाप्ति पर आचार्य का पूजन करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

फल (परिणाम) : जिस प्रकार गूलर का पेड़ फलों से लदा रहता है उसी प्रकार व्रती के यहाँ भी बहुत से पुत्र होते हैं तथा वंश वृद्धि होती है। उसे कभी धन धान्य की कमी नहीं होती।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “तिथि माहात्म्य” नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


बारहवाँ अध्याय – तृतीया व्रत शुक्ल पक्ष

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, “अब तुम श्रावण शुक्ल तृतीया तिथि को किया जाने वाला “स्वर्ण गौरी” व्रत सुनो।”

उस दिन प्रातःकाल स्नान करके सोलह उपचार से भगवान शिव एवं माता गौरी की इस प्रकार पूजा करनी चाहिए। “हे देवाधि देव! मेरे द्वारा की गई पूजा को आप स्वीकार करें। गौरी माता के व्रत की पूर्ति के लिए सोलह बायने दंपतियों को देकर कहना चाहिए – मैं माता गौरी के प्रीत्यर्थ तथा व्रत पूर्ति के लिए उत्तम ब्राह्मण दम्पतियों को बायना देता हूँ।”

चावल के आटे से निर्मित सोलह पकवान बाँस की सोलह टोकरियों में रखकर, उनपर वस्त्र रखकर सपत्नीक सोलह ब्राह्मणों को बुलाकर निवेदन करे – “मैं व्रत की सम्पूर्णता और फल प्राप्ति के लिए यह बायना देता हूँ। अलंकार आदि से सम्पन्न पतिव्रत धर्म युक्त, शोभन सुवासिनी इसे आप स्वीकार करें। इस प्रकार सोलह, आठ, चार या एक वर्ष व्रत करके उद्यापन करना चाहिये। पूजा की समाप्ति पर कथा श्रवण कर व्यासजी का पूजन करना चाहिये।”

सनत्कुमार भगवान शंकर से बोले, “हे प्रभु! इस व्रत को सबसे पहले किसने किया? इसका क्या माहात्म्य है? उद्यापन की विधि क्या है? इसके जानने की मेरी तीव्र उत्कण्ठा है।”

भगवान भोले नाथ ने कहा, “हे ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार! मैं तुम्हारी जिज्ञासा अवश्य पूरी करूँगा। प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर सुविला महानगरी थी। उसके राजा का नाम चन्द्रप्रभा था। उसके महादेवी और विशाला नाम की दो रूप और लावण्य युक्त पत्नियाँ थीं। राजा चन्द्रप्रभा महादेवी रानी को अधिक प्यार करता था। राजा उसपर अपनी जान छिड़कता था। एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए वन में गया। वहाँ उसने शार्दूल, सिंह, बाराह, अरना भैंसे, हाथी आदि का शिकार किया। अब राजा को प्यास व्याकुल करने लगी। राजा वन में पानी के लिए इधर-उधर घूमने लगा। घूमते हुए वह एक तालाब पर पहुँचा। उसने तालाब के जल से अपनी प्यास बुझाई। पानी पीने के बाद राजा ने इधर-उधर देखा तो उसने देखा कि तालाब के किनारे कुछ अप्सराएँ गौरी की पूजा कर रही हैं। राजा ने उनसे पूछा, “आप किसकी पूजा कर रही हैं?”

अप्सराओं ने उत्तर दिया, “हम स्वर्ण गौरी का पूजन कर रही हैं।”

राजा ने फिर पूछा, “देवियो! इस व्रत को करने की विधि एवं व्रत का क्या फल मिलता है? बताने की कृपा करें।”

अप्सराओं ने उत्तर दिया, “श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन यह व्रत किया जाता है। इस व्रत में भगवान शंकर और भगवती पार्वती का पूजन किया जाता है। इस व्रत में सोलह धागों का डोरा – पुरुष अपने दाएँ हाथ में तथा स्त्रियाँ अपने बाएँ हाथ में बाँधती हैं। यही इस व्रत को करने की विधि है। इस व्रत को करने से भगवान शंकर की कृपा से सब मनोकामना पूरी होती हैं। यही इस व्रत का फल है।”

यह सुनकर राजा चन्द्रप्रभा ने भी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को अपनी दाईं भुजा में सोलह धागों वाला डोरा बाँधकर व्रत किया। राजा ने कहा, “हे माता गौरी! मैं इस डोरे को व्रत के लिए बाँधता हूँ। मेरे ऊपर आप कृपा करना। इस प्रकार व्रत धारण कर राजा अपने महलों में आ गया।”

रानी महादेवी ने राजा के दाएँ हाथ में बँधे डोरे को देखा तो पूछा यह क्या है? इस पर राजा ने व्रत के बारे में बता दिया। इस पर रानी क्रोध में भर गई और राजा के हाथ में बँधे डोरे को तोड़ कर एक सूखे पेड़ पर फेंक दिया। राजा ने रानी से कहा, “ऐसा कर तुमने अच्छा नहीं किया है। यह तुमने माता गौरी का अपमान किया है।”

इधर राजा की दूसरी रानी ने देखा कि सूखा पेड़ डोरे के प्रभाव से हरा-भरा हो गया है। छोटी रानी ने उस डोरे को अपनी बाईं भुजा में बाँध लिया। ऐसा करने से छोटी रानी डोरे के प्रभाव से राजा की सर्वाधिक प्रिय हो गई। इधर बड़ी रानी व्रत का अपमान करने से राजा द्वारा त्याग देने के कारण दुःखी होकर वन में चली गई। वन में वह महादेवी का ध्यान कर पवित्र मुनियों के आश्रमों में ठहरी। परन्तु मुनियों ने उसे देखकर कहा, “अरी पिशाचनी! यहाँ से चली जा। राजा और मुनियों द्वारा तिरस्कृत रानी महादेवी घोर जंगल में घूमती हुई थककर एक जगह बैठ गई। वह गौरी का स्मरण कर पश्चाताप के आँसू बहाने लगी।”

रानी को दुःखी देखकर देवी को उसपर दया आ गई और उसे दर्शन दिये। रानी ने देवी को दण्डवत् प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगी, “हे देवी! आपकी जय हो! आपको बारम्बार नमस्कार है। हे भक्तवरप्रद! आपकी जय हो! हे मंगले मंगलरूपे! आपकी जय हो!”

इस प्रकार भक्ति के द्वारा देवी से वर प्राप्त करके बड़ी रानी ने गौरी अर्चन करके व्रत किया। व्रत के प्रभाव से राजा बड़ी रानी महादेवी को वनों से महलों में ले आया। देवी के प्रसाद से राजा तथा उसकी दोनों रानियों की सब इच्छाएँ पूर्ण हुईं। दोनों रानियों सहित राजा सम्पूर्ण राज्य का उपभोग कर समृद्धिशाली हो गया। अन्त में राजा व दोनों रानियाँ देह त्यागकर शिवलोक चली गईं।

शिवजी बोले, “हे तात्! जो शोभना पार्वती का व्रत करता है वह मेरा तथा पार्वती का अत्यन्त प्रिय प्राणी हो जाता है। इस लोक में सुख सुविधा भोग कर और अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके अन्त में मेरे लोक को चला आता है।”

अब मैं तुम्हें इस व्रत की उद्यापन विधि बताता हूँ। शुभ तिथि, शुभ वार, चन्द्रबल, ताराबल हो जाने पर मण्डप में अष्टदल कमल के ऊपर धान्य, उसके ऊपर घट स्थापित करना चाहिए। उस घट पर सोलह पल का बना तांबे का पूर्णपात्र रखना चाहिये। उस पूर्णपात्र में तिल भरकर उसके ऊपर पार्वती तथा भगवान शंकर की प्रतिमा रखनी चाहिए। इसके ऊपर दो श्वेत कपड़े और श्वेत रंग का यज्ञोपवीत रखा जाता है। विधि पूर्वक वेद मंत्रों से पूजन कराकर रात में जागरण करना चाहिए। अगले दिन प्रातःकाल पूजन करके हवन करें। पहले ग्रह होम फिर आधान होम करना चाहिये। जौ मिश्रित तिल को घी में मिलाकर एक हजार या एक सौ प्रधान आहुतियाँ देनी चाहियें।

इसके बाद वस्त्र, अलंकार, धेनु आदि से आचार्य की पूजा करनी चाहिये। सोलह बायने निकाल कर ब्राह्मणों को देना चाहिये और उन्हें भोजन कराना चाहिये तथा भोजनोपरांत दक्षिणा भी देनी चाहिए। इसके बाद अपने मित्रों, संबंधियों को भोजन कराना चाहिये तथा स्वयं भी भोजन करना चाहिये।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “तृतीया व्रत शुक्ल पक्ष” नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


तेरहवाँ अध्याय – श्रावण शुक्ल चतुर्थी व्रत

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, “अब तुम्हें श्रावण शुक्ल चतुर्थी को किये जाने वाले व्रत “दुर्गा गणपति व्रत” के बारे में बताता हूँ। त्रैलोक्य में प्रसिद्ध इस व्रत को भगवती पार्वती ने श्रद्धापूर्वक किया था। इस व्रत को सरस्वती, इन्द्र, विष्णु, कुबेर, अन्य देवता, मुनि, गंधर्व, किन्नर आदि कर चुके हैं।”

यह व्रत सब प्रकार के पापों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। श्रावण शुक्ल चतुर्थी के दिन एकदंत वाले गणेशजी की सोने की मूर्ति बनवाकर सोने के सिंहासन पर स्वर्ण की दूर्वा बिछाकर ताँबे के कलश पर स्थापित करनी चाहिये। लाल कपड़ा बिछाकर सर्वतोभद्र मंडप का निर्माण कर उसपर कलश स्थापित करें। लाल फूल तथा पाँच पत्रों- अपामार्ग, शमी, दूर्वा, तुलसीदल, विल्वपत्र, इस मौसम में होने वाले सुगंधित पुष्पों तथा फलों आदि का नैवेद्य रखकर सोलह उपचार से गणेशजी की पूजा करके प्रार्थना करनी चाहिए, “इस स्वर्ण निर्मित प्रतिमा में विघ्न विनाशक गणेशजी का आवाहन करता हूँ। इसमें वे पधारें। रत्नों से जड़ित उत्तम स्वर्ण सिंहासन बैठने के लिए देता हूँ। आप इसे स्वीकार करें।”

हे पार्वती पुत्र! हे विश्वव्यापिन! हे सनातन! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मेरे विघ्नों का नाश करें। हे सुरश्रेष्ठ! लाल चन्दनचर्चित मैंने भक्तिपूर्वक वन अक्षतों को चढ़ाया है। आप इसे स्वीकार करें। लोकों के अनुग्रह के लिए तथा दानवों के विनाश हेतु एकदन्त। यह आपका पतवार है। प्रसन्नतापूर्वक धूप को स्वीकार करें। इस दीपक को मैं आपको देता हूँ। आपको नमस्कार करता हूँ।

“गणनांत्वा” वैदिक मंत्र से लड्डू तथा खीर, कपूर तथा इलायची युक्त पान आपको समर्पित कर रहा हूँ। हे गणेश्वर! हे गणाध्यक्ष! हे गजानन! हे गौरी पुत्र! मेरा व्रत आपके प्रसाद से परिपूर्ण हो। जो प्राणी पाँच वर्ष तक व्रत कर उद्यापन करता है वह अपने मनवांछित पदार्थों तथा वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है और अन्त में देह त्यागकर मेरे लोक को प्राप्त करता है। यदि इस व्रत को कोई तीन वर्ष तक करे तो उसे सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं और अन्त में मेरे लोक में जाता है।

इस उत्तम व्रत को जो प्राणी उद्यापन के बिना करता है तो यथा विधि पूरा व्रत करने पर भी उसका व्रत निष्फल हो जाता है। उद्यापन अवश्य करना चाहिए। उद्यापन के दिन तिलों को जल में मिलाकर स्नान करना चाहिये। फिर गणेश जी की एक पल या आधा पल या चौथाई पल की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाकर उसको पंचगव्य द्वारा स्नान कराकर दूर्वा से पूजा करनी चाहिये। निम्नलिखित मंत्र द्वारा पूजन करना चाहिये –

“हे गणाधीश! उमासुत! विघ्ननाशक! आपको नमस्कार है। हे विनायक! हे ईशपुत्र! हे सर्वसिद्धि प्रदायक! हे हेमवक्त्र! हे मूषकवाहन! हे कुमारगुरो! आपको नमस्कार है।”

उपरोक्त सभी नामों से अलग-अलग पूजन करना चाहिये। पहले दिन अधिवासन करना चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल हवन करना चाहिए। ग्रहहोम कर, दूर्वा तथा लड्डू से प्रधान होम करना चाहिए। दूब तथा लड्डू के प्रधान होम के बाद पूर्णाहुति करके आचार्य आदि ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार अधिक दूध देनेवाली गाय बछड़े सहित दान करनी चाहिए। ऐसा व्रत करने से मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को पूरी कर सकता है।

मैं अपने प्रिय पुत्र के व्रत करनेवाले को सभी सुख प्रदान करता हूँ। अन्त में सद्गति प्रदान करता हूँ।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण शुक्ल चतुर्थी व्रत” नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


चौदहवाँ अध्याय – नाग पंचमी व्रत

भगवान शंकर ने सनत्कुमार से कहा, “अब मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल पंचमी को किये जाने वाले व्रत नाग पंचमी व्रत के बारे में बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो।”

साधक को चाहिए कि वह एक दिन पहले केवल एक समय भोजन करे। पंचमी वाले दिन स्वर्ण या रजत निर्मित नाग लेकर नक्तव्रत करना चाहिये। नक्तव्रत रखकर बढ़ई या कुम्हार से पाँच फनों वाला नाग बनवाकर उसकी पूजा करनी चाहिए।

अपने घर के मुख्य द्वार के दोनों तरफ गोबर से पाँच फनों का नाग बनाकर कटोरे में दूध रखकर उसकी धूप, दीप, गन्ध, अक्षत, करवीर, मालती, चमेली तथा चम्पा के फूलों से पूजा करनी चाहिये।

ब्राह्मणों को शुद्ध घी के लड्डू तथा खीर का भोजन करवाना चाहिए। कालीय नाग, तक्षक नाग, शंखपाल, वासुकि, शेषनाग, पद्मनाग आदि नागों को हल्दी व चन्दन से दीवार पर बनाकर तथा नागमाता कद्रू को भी अंकित कर पुष्पों से पूजा करनी चाहिए। पूजन के पश्चात् घी और खांड मिलाकर उनको दूध पिलाना चाहिये।

उस दिन लोहे की कढ़ाई में पकवान बनाने वर्जित हैं। गेहूँ और दूध की खीर बनाकर भुने चने, धान का लावा और भुने जौ नागों को देने चाहिए एवं स्वयं भी उपरोक्त वस्तुओं का भोजन करना चाहिए। परिवार वालों को भी भोजन में ये ही वस्तुएँ देनी चाहियें। साँपों की बाँबी के पास गान वाद्य द्वारा उत्सव मनाना चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्यों को जीवन भर कभी सर्प डसने का भय नहीं रहता।

सर्प के दर्शन करने से ही मनुष्य अधोगति को प्राप्त होता है। सर्प तमोगुणी होता है। विधिपूर्वक ब्राह्मण सहित नाग का निर्माण कर पूजा करनी चाहिए। इस तरह बारह महीनों की शुक्ल पक्ष की पंचमी का व्रत करना चाहिए। वर्ष की समाप्ति पर शुक्ल पक्ष पंचमी को फिर से नागों का पूजन करना चाहिए।

श्री नारायण जो सब स्थानों पर स्थित हैं, सब वस्तुओं को प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, जो अपराजित हैं उनको स्मरण कर निम्न वचन कहने चाहिएँ –

हे प्रभु! मेरे वंश में हमारे पूर्वजों में से जो भी सर्पों के दंश से अधोगति को प्राप्त हुए हों, वे इस व्रत से तथा दान से मुक्ति को प्राप्त हो जायें। इस प्रकार उच्चारण कर सफेद चंदनयुक्त चावल के पानी को भक्तिपूर्वक वासुदेव श्री कृष्ण के निमित्त जल में छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार व्रत, पूजा और दान से साधक के वंश में सर्प दंश के कारण मरे होंगे या भविष्य में मरने वाले होंगे, हे सनत्कुमार! वे सब सर्प योनि से मुक्त होकर स्वर्ग लोक में पहुँच जायेंगे। इस प्रकार व्रत करने वाला अपने वंश का उद्धार कर शिवजी के सान्निध्य में पहुँच जाता है।

हे सनत्कुमार! जो मनुष्य नाग की हत्या करते हैं, उनके परिवार में अगले जन्म में पुत्र नहीं होता और यदि होता है तो अधिक समय तक जीवित नहीं रहता। महिलाओं की कृपणता के कारण भी प्राणी को सर्प योनि प्राप्त होती है। जो दूसरों की अमानत हजम कर जाते हैं वे भी सर्प योनि में जाते हैं। जो प्राणी विभिन्न कारणों से सर्प योनि में चले जाते हैं उनके उद्धार का एकमात्र रास्ता नागपंचमी का व्रत ही है। जो प्राणी नागपंचमी का व्रत तथा नाग पूजा करते हैं, उनकी भलाई के – लिए नागों के स्वामी शेषनाग और वासुकि नाग भगवान विष्णु से और भगवान शंकर से हाथ – जोड़कर प्रार्थना करते हैं। शेषनाग और वासुकि नाग की प्रार्थना पर भगवान विष्णु और भगवान शंकर उन लोगों की सब मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। वे प्राणी नागलोक में अनेक तरह के भोगों को भोगकर बैकुण्ठ लोक में जाते हैं।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “नाग पंचमी व्रत” नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


पन्द्रहवाँ अध्याय – सूपोदन नामक व्रत

भगवान शंकर ने सनत्कुमार को बताया कि श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को महा मृत्यु विनाशक उत्तम “सूपोदान” नामक व्रत किया जाता है। मंदिर में या घर पर रहकर ही शिवजी की पूजा करने के बाद दाल, आटा, चावल का नैवेद्य, नमक सहित आम की सब्जी रखनी चाहिये। ब्राह्मणों को नैवेद्य पदार्थों का बायना देना चाहिए। जो व्यक्ति नियम पूर्वक इस व्रत को करता है, उसे बड़े भारी अनन्त पुण्य प्राप्त होते हैं। इस संबंध में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ।

प्राचीन काल में एक राजा था। उसका नाम रोहित था। बहुत समय तक उसे सन्तान का मुख देखने को न मिला। उसने सन्तान प्राप्ति हेतु कठिन तप किया। तपस्या के प्रभाव से ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने राजा से कहा, “तुम्हारे भाग्य में सन्तान का सुख नहीं है।” परन्तु राजा ने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी। भक्त ने प्रभु को दुबारा प्रकट होने के लिए मजबूर कर दिया। ब्रह्माजी दुबारा प्रकट हुए और राजा रोहित से बोले, “मैं तुम्हें पुत्र तो दे सकता हूँ परन्तु वह अल्पायु होगा।”

इस पर राजा और रानी ने सोचा कि पुत्र प्राप्ति से बंध्यापन तो हट जायेगा। लोक में पुत्र न होने की निन्दा तो समाप्त हो जायेगी। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है। राजा और रानी ने अल्पायु पुत्र के लिए ही अपनी सहमति प्रदान कर दी। समय आने पर ब्रह्माजी के वरदान से रानी को पुत्र पैदा हुआ। राजा ने पुत्र के जातकर्म बड़ी धूमधाम से किया। बालक का नाम शिवदत्त रखा गया। अल्प आयु होने के कारण राजा ने राजकुमार शिवदत्त का विवाह नहीं किया। सोलह वर्ष की अवस्था में उसका निधन हो गया। ब्रह्मचारी के रूप में शिवदत्त का निधन हो जाने से राजा दिन-रात चिन्तित रहने लगा क्योंकि जिस वंश में ब्रह्मचारी की मृत्यु हो जाती है, वह वंश नष्ट हो जाता है।

सनत्कुमार ने भगवान शिव से पूछा, “क्या इसका कोई उपाय नहीं है? यदि कोई उपाय हो तो मुझे बतायें जिसके करने से दोष दूर हो जाये।”

भगवान शकर बोले, “मृतक यदि स्नातक या ब्रह्मचारी है तो उसका अर्क विधि से विवाह संयोग करके पीपल का पेड़ तथा ब्रह्मचारी को मिलाकर देश, काल, गोत्र तथा नाम का उच्चारण करते हुए कहना चाहिए कि मैं मृतक ब्रह्मचारी की शान्ति के लिए नैसर्गिक व्रत करता हूँ। सोने से आभ्युदयिक करके पीपल के वृक्ष की शाखा तथा शव को हल्दी और तेल से लेप कर पीले सूत द्वारा वेष्टित करना चाहिये। फिर अग्नि की स्थापना करके विवाह विधि द्वारा आधारान्त हवन कर अग्नि, बृहस्पति, काम, चार व्याहृतियों से हवन कर स्विष्कृत संज्ञक होम कर, कर्म को समाप्त करें। इसके बाद पीपल की डाल तथा मृत शव का अग्नि संस्कार करना चाहिये।”

मृत्यु की सम्भावना हो तो इस व्रत को छः वर्ष तक करना चाहिये। तीस ब्रह्मचारियों को नये कौपीन देना चाहिये। खड़ाऊँ, छत्र, माला, चन्दन, मणि, प्रवाल तथा आभूषण देने चाहिएँ। इस प्रकार करने से कोई विघ्न नहीं रहता।

राजा ने इस विधि को ब्राह्मण के मुख से सुनकर सोचा कि यह अमुख्य अर्क विवाह मुझे अच्छा नहीं लगा। विवाह होना ही मुख्य बात है। मैं राजा हूँ, जो कोई इस लड़के के साथ अपने पुत्री की शादी करेगा, मैं उसे धन दौलत से मालामाल कर दूँगा। उसके राज्य में एक ब्राह्मण रहता था जो किसी कार्य से बाहर गया हुआ था। उसकी प्रथम पत्नी से एक पुत्री थी। उसकी दूसरी पत्नी बड़ी दुष्ट प्रकृति की थी। उसने धन के लालच में लड़की को देना स्वीकार कर लिया। उसने एक लाख रुपया लेकर अपनी सौत की दस वर्षीय कन्या को राजा के मृत पुत्र के साथ शादी कर दी।

उस बाला को लेकर राजा के सेवक श्मशान भूमि में गये और शव के साथ उस लड़की को सती होने की व्यवस्था करने लगे। तब वह अबोध बाला बोली, “आप यह क्या कर रहे हैं? लड़की की बात सुनकर वे सब दुःखी मन से कहने लगे, “तुम्हारा पति मर गया है। तुम्हें इसके साथ सती होना है।” यह सुनकर लड़की रोने लगी और बोली, “आप मेरे स्वामी को क्यों जलाते हैं, मैं उन्हें जलाने नहीं दूंगी। आप सब लोग जायें, मैं यहाँ अकेली रहूँगी, यह जब उठेंगे तब उनके साथ ही आऊँगी।”

लड़की का हट देखकर सब करुणा से द्रवित होकर चले गये। अब छोटी सी लड़की जो न कुछ समझती थी, न जानती थी, शव के पास अकेली बैठकर भगवान शिव-पार्वती को याद करने लगी। बार-बार पुकारने पर करुणा के सागर शिव-पार्वती नन्दी पर सवार होकर श्मशान में लड़की के पास पहुँचे। बालिका ने जब शिव- पार्वती को देखा तो वह उनके चरणों में गिरकर अपने पति के प्राणों की भीख माँगने लगी।

शिव-पार्वती बालिका के बाल स्वभाव से प्रभावित होकर बोले, “तुम्हारी माता ने सूपोदान का व्रत किया था। तिल तथा जल लेकर उसके फल का संकल्प कर अपने पति को दो तथा अपने मृत पति से कहो, “मेरी माँ ने सूपोदान नामक व्रत किया था, उसके प्रभाव से मेरा पति पुनः जीवित हो जाये। भोली-भाली बालिका ने भगवान शिव-पार्वती के आदेशानुसार वैसा ही किया। शिवदत्त तुरन्त ऐसे उठकर बैठ गया जैसे कोई सोता हुआ उठकर बैठ जाता है। शिव-पार्वती उस बालिका को व्रतोपदेश देकर अन्तर्धान हो गये।”

शिव-पार्वती के अन्तर्धान होने के बाद शिवदत्त ने उस बालिका से पूछा, “तुम कौन हो? मैं यहाँ श्मशान भूमि में क्यों हूँ? बालिका ने सारी कथा उसे बता दी। अगले दिन नदी के तट पर स्नान करने के लिए आये हुए लोगों ने वापिस लौटकर राजा को बताया कि उसका पुत्र उस बालिका के प्रभाव से जीवित हो गया है।”

यह सुनकर राजा की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वह प्रसन्न होकर गाजे-बाजे के साथ नदी तट पर आया। राजा ने पुत्र वधू की प्रशंसा की। मेरी यह पुत्र वधू सुभागा और धन्य है। इसके सजीव पुण्य से राजकुमार को जीवन दान मिला है। राजा ने ब्राह्मणों को दान दिया और भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की। ब्राह्मणों के कहने के अनुसार नगर में प्रवेश करने हेतु शान्ति यज्ञ किया।

मनुष्यों को चाहिए कि इसे पाँच वर्ष तक व्रत करने के बाद उद्यापन करें। शंकर-पार्वती का प्रतिदिन अर्चन कर, पूर्व विधान से व्रत में नैवेद्य तथा बायना देना चाहिये। इस व्रत के करने से प्राणी चिरायु पुत्र प्राप्त कर अन्त में शिव लोक को जाता है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “सूपोदन नामक व्रत” नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


सोलहवाँ अध्याय – शीतला सप्तमी व्रत

भगवान शंकर श्री सनत्कुमार से बोले, “अब मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल सप्तमी व्रत के विषय में बताता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। पहले दीवार पर बावली का चित्र बनायें। उसमें अशरीरी संज्ञक दिव्य स्वरूपधारी सात जल देवता बनायें। दो लड़कों के साथ पुरुषत्रयसंज्ञित नारी, एक घोड़ा, बैल, नरवाहन सहित पालकी के चित्र बनायें। सोलह उपचार द्वारा जलदेवी की पूजा कर ककड़ी, दही और चावल का नैवेद्य समर्पण करें। नैवेद्य पदार्थों का बायना निकाल कर ब्राह्मण को अर्पण करना चाहिये। इस प्रकार सात वर्ष तक व्रत करके सात सौभाग्यवती स्त्रियों को भोजन कराकर उद्यापन करना चाहिये।”

एक सोने के पात्र में सात जल देवताओं की प्रतिमाएँ रखकर पहले दिन अपने पुत्र के साथ उन प्रतिमाओं का पूजन करना चाहिये। दूसरे दिन ग्रहहोम सहित चरु होम करना चाहिये। अब तुम इस व्रत के फल के बारे में सुनो –

महाराष्ट्र प्रदेश में शोभन नाम का एक नगर था। उसमें एक धार्मिक विचारों वाला धनी व्यक्ति रहता था। उसने निर्जन वन में एक बावड़ी बनवायी। बावड़ी में उतरने के लिये उसने मूल्यवान पत्थरों की सीढ़ियाँ बनवाई। परन्तु उस बावड़ी में एक बूँद भी पानी नहीं आया। धनी ने दुःखी होकर सोचा, “मेरा परिश्रम व धन दोनों ही बेकार हो गये।” वह इन विचारों में ग्रस्त रात को वहीं बावड़ी के पास सो गया।

रात को उसे स्वप्न आया कि यदि तुम अपने पौत्र की बलि दो तो तुम्हारी बनवाई बावड़ी जल से भर जायेगी। सुबह होने पर वह धनिक अपने घर आया और अपने पुत्र द्रविड़ से रात के स्वप्न के बारे में बताया। उसका पुत्र द्रविड़ भी धार्मिक वृत्ति वाला था। उसने पिता की बात सुनकर कहा, “पिताश्री आप मेरे जन्मदाता हैं। इस प्रकार आप अपने पौत्रों के भी जन्मदाता हुए। यह तो एक धार्मिक कार्य है। आपके शीतांशु और चण्डांशु दो पौत्र हैं। आप बिना हिचक अपने बड़े पौत्र शीतांशु की बलि दे दें। परन्तु यह बात आप स्त्रियों से गुप्त रखें। इसका कारण यह है कि मेरी पत्नी गर्भवती है। प्रसव का समय निकट होने के कारण वह अपने मायके जाने वाली है। उसके साथ आपका छोटा पौत्र चण्डांशु भी जायेगा। उसके मायके जाने के बाद यह काम निर्विघ्न समाप्त हो जायेगा। धनिक अपने पुत्र के ऐसे विचार सुनकर गद्गद हो गया और बोला तुम धन्य हो। इसी बीच उसकी पत्नी सुशीला को उसके मायके से बुलावा आ गया। वह मायके जाने की तैयारियाँ करने लगीं। तभी द्रविड़ सुशीला से बोला, “शीतांशु यही मेरे पास रहेगा और चण्डांशु तुम्हारे साथ चला जायेगा। सुशीला ने अपने पति की बात मान ली। सुशीला के जाने के बाद पिता और पुत्र ने शीतांशु के शरीर में तेल मलकर नहलाया और मूल्यवान कपड़ों तथा आभूषणों से उसे सज्जित किया। वरुण नक्षत्र पूर्वाषाढा के आ जाने पर दोनों ने उसे बावड़ी के किनारे पर ले जाकर खड़ा कर दिया और प्रार्थना करने लगे कि इस लड़के की बलि से जल देवता प्रसन्न हों। लड़के की बलि देते ही बावड़ी अमृत तुल्य जल से भर गई।”

दोनों बाप बेटे बावड़ी को जल से भरा देखकर प्रसन्न हुए परन्तु पौत्र के बलिदान से दुःखित मन से घर लौट आए। उधर सुशीला के मायके में तीसरा पुत्र पैदा हुआ। तीन मास का पुत्र होने पर वह अपनी ससुराल लौट आयी। रास्ते में जब वह बावड़ी के पास आई तो उसे जल से परिपूर्ण देखकर चकित रह गई। वह उसमें स्नान करके बोली मेरे ससुर का परिश्रम व धन का खर्च यथोचित रहा।

उस दिन श्रावण शुक्ल सप्तमी तिथि थी। सुशीला ने शीतला का शुभ व्रत करा और वहीं पर दही तथा चावल मंगवाकर स्वादिष्ट भोजन बनाया। जल देवता की पूजा करके दही, चावल और ककड़ी का नैवेद्य देकर बायना ब्राह्मणों को दे दिया। वहाँ से सुशीला की ससुराल चार कोस थी। अब सुशीला दोनों लड़कों के साथ बावड़ी से घर की ओर चल दी। इधर जल देव आपस में कहने लगे इसका बड़ा पुत्र हमें वापिस लौटा देना चाहिये क्योंकि इसने बड़े प्रेम से हमारा व्रत किया है। उन्होंने सुशीला का बड़ा पुत्र जल से बाहर निकाल दिया। माँ को देखकर शीतांशु माँ के पीछे भागता हुआ माँ-माँ कहता हुआ आया। सुशीला अपने बड़े लड़के शीतांशु को देखकर चकित रह गई। उसने उसे अपनी गोद में बैठाकर उसका सिर सूँघा। वह अपने मन में सोचने लगी कि यदि इसे यहाँ से पकड़कर चोर ले जाते तो क्या होता? क्योंकि इसने बहुमूल्य आभूषण पहन रखे हैं। यदि इसको घर से भूत पिशाच पकड़ कर लाये होते तो वे इसे अब क्यों छोड़ते? घर के सम्बन्धी चिन्ता के सागर में गोते लगा रहे होंगे। परन्तु उसने शीतांशु से कुछ पूछा नहीं कि तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे थे?

इधर सुशीला के आने का समाचार पाकर पिता पुत्र सोचने लगे कि सुशीला जब अपने बेटे के बारे में पूछेगी तो हम क्या कहेंगे?

इसी बीच तीनों बालकों के सहित सुशीला अपने घर पहुँच गई। ससुर और पति बड़े पुत्र शीतांशु को देखकर बड़े अचम्भे में पड़ गये। तथा इसके साथ ही प्रसन्न होकर सुशीला से पूछा, “हे सुभद्रे! तुमने किस पुण्य या व्रत को किया था? निश्चय ही तुम कोई पवित्र आत्मा हो। इस शीतांशु को मरे हुए दो महीने बीत चुके हैं। फिर तुमने इसे कहाँ से प्राप्त किया है। जाते समय तुम अपने साथ एक लड़का ले गई थी। और आते समय तीन पुत्रों को लेकर आयी हो यह बड़े आश्चर्य की बात है। तुमने हमारे वंश का उद्धार किया है। मैं तुम्हारी कैसे और किस प्रकार स्तुति करूँ। इस प्रकार उसके ससुर ने उसकी प्रशंसा की और पति ने उसे प्यार भरी नजरों से देखा। सास ने भी उसकी प्रशंसा की। सुशीला ने प्रसन्न होकर कहा यह सब सुमार्ग पर चलने का फल है। हे सनत्कुमार! तुमसे मैंने शीतला सप्तमी का व्रत एवं उसकी कहानी सुनाई है। इस व्रत में दही, चावल, ठण्डा जल, ककड़ी, फल, बावड़ी जल और शीतला माता को देवता कहे गये हैं। इसे करने वाले तीनों प्रकार के तापों से मुक्त हो जायेंगे। इसलिये श्रावण शुक्ल सप्तमी का यथार्थ नाम शीतला सप्तमी हुआ।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “शीतला सप्तमी व्रत” नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


सत्रहवाँ अध्याय – पवित्रा रोपण

भगवान शंकर ने सनत्कुमार से कहा, “हे देवेश! मैंने तुम्हें अभी श्रावण शुक्ल सप्तमी का व्रत बताया। अब मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल अष्टमी के विषय में बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो – श्रावण शुक्ल सप्तमी को अधिवासन कर, अष्टमी के दिन पवित्रा रोपण करना चाहिये। जो मनुष्य पवित्रा बनवाता है उसका फल कहता हूँ। पवित्रा बनवाने वाला यज्ञ, व्रत, दान तथा सब तीर्थाभि-सेचन का फल प्राप्त कर लेता है। क्योंकि सर्वगता शिवा सबमें निवास करती है। अतः उसे न आधि-व्याधि, दुःख, पीड़ा होती है और न शत्रु का भय रहता है। उसे कोई ग्रह भी पीड़ा नहीं पहुँचा सकता। उसके समस्त कार्य अपने आप सिद्ध हो जाते हैं। राजाओं के पुण्य की वृद्धि करने वाला इससे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है।”

श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन अधिवासन करके देवी के लिए उत्तम पुष्प, फल, गन्ध, सब प्रकार की पूजन सामग्री लेकर अनेक प्रकार के नैवेद्य, वस्त्र, आभूषण आदि एकत्र करें, फिर पवित्रा निर्माण करके पंचगव्य प्राशन करना चाहिये। फिर चरु द्वारा दिग्बलि और अधिवासन कर सुन्दर वस्त्रों से पवित्रा का आच्छादन करना चाहिये। सौ बार देवी के मूलमंत्र से अभिमंत्रित करके पवित्रा को देवी के सामने स्थापित करना चाहिये। देवी का सुन्दर मण्डप का निर्माण कर रात्रि जागरण करना चाहिए। अगले दिन प्रातःकाल स्नान करके दिशाओं में बलि देनी चाहिये। विधिवत् देवी की पूजा करने के बाद स्त्रियों तथा ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए तथा दक्षिणा देनी चाहिये।

राजा को दृढ़ता के साथ नियमों का पालन कर उसे स्त्री, जुआ, शिकार और मांस का त्याग करना चाहिये। ब्राह्मणों और आचार्यों को स्वाध्याय का, वैश्यों को व्यापार और खेती का कार्य बन्द करके कम से कम आधा दिन देवी के ध्यान में अपने मन को लगाना चाहिये। हो सके तो पाँच या सात दिन देवी का ध्यान करना चाहिये। जो ज्ञानी सविधि पवित्रारोपण नहीं करता उसका पूरे वर्ष का अर्चन निष्फल हो जाता है। अतः मनुष्यों को भक्तिपूर्वक देवीपरायण होकर प्रति वर्ष पवित्रारोपण करना चाहिये। कर्क अथवा सिंह का सूर्य हो जाने पर, श्रावण शुक्ल अष्टमी के दिन देवी के लिए पवित्रारोपण करना चाहिये। इसे नित्य कर्म समझकर करना चाहिये।

सनत्कुमार ने कहा, “हे देवादिदेव, महादेव! आपने जो पवित्रारोपण बताया है, उसके निर्माण की विधि ठीक तरह से मुझे समझाइये।”

भगवान महादेव बोले, “हे सनत्कुमार! रेशमी वस्त्र, कुश या कांस से निर्मित या ब्राह्मणी द्वारा रुई से बना सूत होना चाहिये। सूतों (धागों) को तीन गुना कर पुनः तिगुणित करने पर उनकी संख्या ३६० होनी चाहिए। तीन सौ साठ सूतों को उत्तम, दो सौ सत्तर को मध्यम और एक सौ अस्सी सूनों को निकृष्ट कहा है। सौ ग्रन्थि का उत्तम, पचास ग्रन्थि का मध्यम तथा सोलह ग्रन्थि का पवित्रा कनिष्ठ होता है। छः-तीन, चार-दो, बारह- चौबीस, बारह-आठ ग्रन्थि का कनिष्ठ पवित्रा होता है। देवी प्रतिमा की नाभि तक सीमित पवित्रा कनिष्ठ, जांघ तक मध्यम, जानु तक की पवित्रा उत्तम मानी जाती है। इस पवित्रा की सब गाँठों को केसर से रँगना चाहिये। तथा सर्वर्ताभद्र वेदी पर देवी का पूजन करके देवी के समक्ष कलश या बांस पात्र पर पवित्रा को रखें। तीन सूतों में ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का आवाहन करना चाहिए। नौ सूतों में ओंकार, सोम, वह्नि, नाग, रवि, ईश और विश्वदेव का आवाहन करना चाहिए।”

हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें ग्रन्थियों में देवों की स्थापना की विधि बताता हूँ। क्रिया, पौरुषी, वीरा, विजया, अपराजिता, मनोन्मनी, जया, भद्रा, मुक्ति और ईशा नामों के आदि में प्रणव लगाकर ग्रन्थि संख्या के अनुसार आवृत्ति करके आवाहन तथा चन्दन से पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार प्रणव द्वारा अभिमंत्रित कर देवी को पवित्रारोपण का विधान तुम्हें बताया है।

जिन दूसरे देवों को प्रतिपदा आदि तिथियों में पवित्रारोपण करना चाहिए उनके विषय में सुनो। धनद, श्री, गौरी, गणेश, चन्द्रमा, गुरु, सूर्य, चण्डिका, अम्बा, वासुकि, ऋषि, चक्रपाणी, अनन्त, शिव, ब्रह्मा और पितृ आदि देवों का प्रतिपदा आदि तिथि में पूजा करें। यह पवित्रारोपण प्रधान देवों का है, उनके सह देवों को तीन तार वाला पवित्रा समर्पण करें।

श्रावण शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि का माहात्तम –

दोनों पक्षों की नवमी के दिन यथा विधि ‘कुमारी’ नामक देवी का अर्चन कर नक्त व्रत कर दूध और शहद मिला हुआ भोजन करना चाहिये या उपवास रखकर इस दिन ‘कुमारी’ नाम से देवी का निरन्तर पूजन करें। चाँदी की प्रतिमा बनाकर उसमें भक्तिपूर्वक दुर्गा पापनाशिनी का कनेर के फूल, गन्ध, अगर, चन्दन, दशांग, धूप और लड्डू द्वारा पूजन करना चाहिए। कुमारी लड़कियों को भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिए। फिर मौर धारण कर बिल्वपत्र भोजन करना चाहिए। नवमी का व्रत प्राणियों के सब पापों को नष्ट करने वाला, समस्त सम्पत्तियों को प्रदान करने वाला, पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि करने वाला और सद्‌गति प्रदान करने वाला है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “पवित्रा रोपण” नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


अट्ठारहवाँ अध्याय – श्रावण शुक्ल दशमी तिथि का माहात्म्य

भगवान शंकर ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से बोले, “अब मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल दशमी तिथि के विषय में बताता हूँ। ध्यान देकर सुनो – श्रावण शुक्ल दशमी को व्रत का शुभारम्भ कर वर्ष के प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को व्रत रखना चाहिए। इस प्रकार अगले श्रावण शुक्ल दशमी को इसका उद्यापन करना चाहिए। राजा को राज्य की उन्नति के लिए, कृषक को खेती की उन्नति के लिए, वैश्य को व्यापार की उन्नति हेतु, स्त्री को पुत्र प्राप्ति हेतु तथा अन्य प्राणियों को धर्म, अर्थ तथा अपने व्यवसाय की उन्नति हेतु इस व्रत को करना चाहिए। इस व्रत को आशादशमी व्रत कहा गया है। जिसको भी किसी प्रकार का दुःख हो तो उसके निवारण के लिए श्रावण शुक्ल दशमी की रात को स्नान कर व्रत का शुभारम्भ करे। रात को दशों दिशाओं को फूल, पल्लव, चन्दन या जौ के आटे द्वारा अपने घर के चौक को अंकित करके वाहन सहित स्त्री चिह्न द्वारा चिह्नित करके घी से तैयार किया हुआ नैवेद्य देकर अलग-अलग दीपक देना चाहिये। इसके बाद ऋतु के फल देकर अपने मनोरथ को इस प्रकार स्पष्ट करना चाहिये- “मेरी आशा पूर्ण हो, मेरा मनोरथ पूर्ण हो। मेरा कल्याण हो।”

इस प्रकार प्रतिमास निरन्तर व्रत करना चाहिये और ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। वर्ष की समाप्ति पर इसका उद्यापन करना चाहिए। सोने चाँदी की दस दिशा रूप देवताओं की प्रतिमा बनवाकर अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ स्नानादि करके अपने घर के आंगन में भक्ति भाव से दिशाओं का क्रमशः आवाहन, स्थापन तथा पूजा करनी चाहिए। दिशाओं के मंत्र इस प्रकार है – ऐन्द्री! दिशा! दस दिशा रूप देवता, सुर तथा असुर नमस्कृत इस संसार का स्वामी इन्द्र आपके पास निवास करता है। आपको नमस्कार करता हूँ। है आग्ने! अग्निदेवता के रहने से आप आग्नेयी कही जाती हैं। आप तेज रूपी पराशक्ति हैं। अतः हे आग्नेयी! आप मेरे लिए वरदायनी हों।

हे याम्ये! धर्मराज आपके सहारे इस सारे संसार को चलाते हैं। इसलिए आपको संयमनी कहते हैं। हे संयमनी! आप मेरे लिए उत्तम कार्य प्रदान कराने वाली हैं।

हे आशे! हाथों में खड्ग लिये अत्यन्त विकराल रूप मृत्युदेव नैऋत्य स्थान में आपके पास निवास करते हैं। अतः आप नैऋत्यरूपा हैं। आप मेरी आशाओं को पूर्ण करें।

हे वारुणी! भुवन के आधार तथा जल जन्तु के अधिपति वरुण देव का निवास आप में है। हे वारुणी! आप मेरे और धर्म के कार्य के लिए तत्पर हों।

हे वायव्ये! संसार के आदिकारक प्राणरूप वायु देव से आप अधिष्ठित हैं। इसलिए आप मेरे आंगन में प्रतिदिन शांति बनाये रखें।

हे कौवेरि! आप उत्तर दिशा में निवास करती हैं। कुबेर देव का निवास आप में ही है। इसलिए आप मेरे मनोरथों को पूर्ण करें।

हे ऐशान्यी! आप जगदीश शंभु से अलंकृत हैं। हे देवी! मेरे मनवांछित कार्यों को परिपूर्ण करें। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सारे विश्व के ऊपर निवास करने वाली, सदैव कल्याणदात्री, सनक, नन्दन, सनातन और सनत्कुमार आदि मुनियों के साथ रहने वाली आप सदा मेरी रक्षा करें। मेरी रक्षा करें।

सब नक्षत्र, ग्रह, तारागण, नक्षत्र माता, भूत- प्रेत, विनायक तथा भक्ति युक्त मन से जिन देवी देवताओं का मैंने पूजन किया है वे सब मुझे अभिष्ट सिद्धियाँ देने वाले हों। सर्प तथा नेवले से नीचे के लोक में आप सेवित हैं। अतः आप मेरे ऊपर नाग तथा नाग कन्याओं के साथ प्रसन्न हों।

उपरोक्त मंत्रों को बोलकर पुष्प, धूप आदि द्वारा अर्चन करके अलंकार, वस्त्र और फल निवेदन करने चाहिएँ। रात को जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल दुबारा प्रतिमा की पूजा करके उसे ब्राह्मण को दे देना चाहिए। इस विधान द्वारा अर्चन तथा समापन कर प्रणाम करना चाहिए। फिर मित्रों तथा बन्धु बाँधवों सहित भोजन करना चाहिए।

इस प्रकार आदरपूर्वक जो दशमी का व्रत करता है, उसकी सब इच्छाएँ पूरी होती हैं। यह सनातन व्रत विशेष रूप से स्त्रियों के लिए है। यह व्रत धन, यश, दीर्घआयु तथा सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। तीनों लोकों में इस व्रत के तुल्य और दूसरा कोई व्रत नहीं है। यह व्रत मोक्ष प्रदान करने वाला है। इस व्रत के तुल्य न कोई व्रत आज तक हुआ है और न आगे होगा।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण शुक्ल दशमी तिथि का माहात्म्य” नामक अट्ठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


उन्नीसवाँ अध्याय – एकादशी व्रत एवं द्वादशी व्रत

भगवान शंकर ने ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से कहा, “हे महामुने! श्रावण मास के दोनों पक्षों की एकादशी तिथि के दिन क्या करना चाहिए उसे सुनो। एकादशी व्रत के सम्बन्ध में मैंने आज तक किसी को कुछ नहीं बताया है। यह व्रत गुप्त, उत्तम, महान्, पुण्य तथा पाप-ताप को जड़ से नष्ट करने वाला है। श्रावण मास में किये गये पापों का नाश करने वाला तथा सब व्रतों में उत्तम यह पवित्र एकादशी का व्रत है।”

दशमी के दिन प्रातः स्नान कर गुरुदेवों की आज्ञा से वेदवेत्ता, पुराणज्ञाता, जितेन्द्रिय ब्राह्मणों का पूजन करें। भगवान विष्णु का सोलह उपचारों से पूजन करना चाहिये। उनसे प्रार्थना करें, “हे पुण्डरीकाक्ष! मैं दूसरे दिन आने वाली एकादशी का निराहार रहकर व्रत करना चाहता हूँ। आप मेरी रक्षा करें।”

उस दिन गुरुदेव और अग्नि के समीप भूमि पर शयन करना चाहिये। काम, क्रोध और मोह को त्यागकर एकादशी के दिन प्रातःकाल भगवान विष्णु में मन लगाकर श्रीधर का जाप करते रहना चाहिए। तीन दिन तक किसी भी पाखण्डी से वार्त्तालाप न करें। केवल इतना करने मात्र से यह व्रत मोक्ष को प्रदान करने वाला बन जाता है। दोपहर के समय पंचगव्य लेकर नदी के जल में स्नान करना चाहिए। नदी न हो तो कुएँ के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिये। भगवान सूर्य को नमस्कार करके भगवान विष्णु की शरण में जाकर वर्ण के अनुसार सब कार्य करके अपने घर को वापस लौटना चाहिये।

घर आने पर श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक भगवान विष्णु का अर्चन पुष्प, दीप, धूप आदि से करना चाहिये। रात को गीत, वाद्य तथा कथा सुनते हुए जागरण करना चाहिये। फिर कलश स्थापन कर पंचरत्न और स्वर्ण को कलश में डालकर सफेद चन्दन से पूजा कर कलश को दो सफेद कपड़ों से ढक देना चाहिये। देवेश की प्रतिमा शंख, चक्र तथा गदा से युक्त कर उसकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद द्वादशी के दिन प्रातः आह्निक करके “श्रीधर” का जाप करना चाहिये। शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी भगवान विष्णु की पूजा करके ब्राह्मण को सोने की दक्षिणा सहित कलश देना चाहिये। कलश के साथ मक्खन देना न भूलें।

भगवान श्रीधर! आप प्रसन्न होकर मुझे लक्ष्मी प्रदान करें। इस प्रकार उच्चारण कर श्रेष्ठ वेद पाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा देकर बिदा करना चाहिये। अपने नौकरों को भोजन कराकर गौ को भूसा देकर स्वयं बन्धु बांधवों सहित भोजन करना चाहिये। इस प्रकार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों तिथियों के व्रतों का विधान एक समान है। शुक्ल पक्ष में श्रीधर और कृष्ण पक्ष में भगवान विष्णु जनार्दन कहे गये हैं।

अब मैं तुम्हें द्वादशी के दिन भगवान विष्णु के निमित्त पवित्रारोपण के सम्बन्ध में बताता हूँ। हे तात! इसका अधिकारी कौन है? यह जान लेना भी आवश्यक है। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र और स्वधर्म स्थित जनों को भक्ति द्वारा पवित्रारोपण करना चाहिये। स्त्रियों तथा शूद्रों को केवल नाम मात्र द्वारा श्रीहरि का पूजन करना चाहिए। सतयुग में मणि का, त्रेतायुग में स्वर्ण का, द्वापर में रेशमी तथा कलियुग में सूत द्वारा पवित्रा का निर्माण करना चाहिये। सन्यासियों को मानसिक पवित्रारोपण करना चाहिये। पवित्रा को बांस के पात्र में रखकर उसे साफ वस्त्र से ढक कर भगवान श्रीधर के सम्मुख उसे रखकर कहना चाहिये, “हे प्रभु! मैंने अपने क्रियालोपार्थ पवित्रा को ढका है। हे देव! मेरे काम में विघ्न न हो। हे नाथ! आप मुझ पर दया करें। आपको मैं इस पवित्रा द्वारा प्रसन्न करना चाहता हूँ। हे देवेश! आज से लेकर वर्ष भर तक व्रतनाशक काम, क्रोध आदि न हों। आप तब तक मेरी सुरक्षा करें जब तक मेरा व्रत पूर्ण हो।”

कलश पर बांस के पात्र में रखे पवित्रा की नम्रतापूर्वक इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, “हे पवित्रा! एक वर्ष तक किये अर्चन से प्रसन्न होकर आप विष्णु लोक से यहाँ आयी हैं। अतः आपको नमस्कार है। हे देव! विष्णु तेज से उत्पन्न रमणीय तथा पापनाशक, सब इच्छाओं के प्रदाता, आपके शरीर में पवित्रा को धारण करता हूँ। हे देवेश! हे पुराण पुरुषोत्तम! आप मेरे द्वारा आमंत्रित हैं अतः आपका पूजन करता हूँ। आपको नमस्कार है। हे देव! कल प्रातः आपके निमित्त इस पवित्रा को अर्पण करूँगा। इसके बाद पुष्पांजलि देकर रात्रि में जागरण करना चाहिये।”

एकादशी के दिन अधिवासन कर द्वादशी को सुबह पूजा करें। गन्ध, दूब, चावल तथा हाथ में पवित्रा को ग्रहण कर कहें, “हे देवेश! आपको नमस्कार है। इस पवित्रा को आप स्वीकार करें। एक वर्ष तक पुण्य फलप्रद पवित्रा से निवेदन करें- आप मुझे पवित्र करें। हे देव! आपके सुप्रसाद से मेरे से जाने-अनजाने जो पाप हो गये हैं, उन पापों से मैं पवित्र हो जाऊँ। मूल मंत्र द्वारा पवित्रा को सम्पुटित कर नैवेद्य देना चाहिये। मूल मंत्र से अग्नि में घृत तथा पायस द्वारा हवन करना चाहिये। इसी मंत्र द्वारा पवित्रा को विसर्जन करके कहें – हे पवित्रे! एक वर्ष तक किये मेरे अर्चन को सविधि परिपूर्ण करें। हे पवित्रे! विसर्जित हों, विष्णुलोक को लौट जायें। इस प्रकार कहकर उसे ब्राह्मण को दे दें या जल में विसर्जित कर दें। हे वत्स! जो मनुष्य हरि का यह पवित्रारोपण करता है, वह इस संसार में आनन्द भोगकर अन्त में विष्णुलोक को जाता है।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “एकादशी व्रत एवं द्वादशी व्रत” नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


बीसवाँ अध्याय – श्रावण शुक्ल त्रयोदशी व्रत एवं चतुर्दशी व्रत

भगवान शंकर ने कहा, “हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें श्रावण शुक्ल त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि के कार्यों के सम्बन्ध में बताऊँगा। श्रावण शुक्ल त्रयोदशी के दिन कामदेव की षोड्श विधि से पूजा की जाती है। अशोक, मालती, मदन, कौसुम्भ, बकुल तथा अन्य मादक पुष्प तथा लाल चावल, पीले चन्दन, सुगन्धित द्रव्य, पौष्टिक जन्य द्रव्यों तथा दूसरे वीर्यवर्धक द्रव्यों का नैवेद्य समर्पण करके मुख रोचक पान देना चाहिये। उस पान में चिकनी सुपारी, कत्था, चूना, जावित्री, जायफल का चूर्ण, लौंग, इलायची, नारियल के बारीक टुकड़े, केशर और कपूर डालनी चाहिये। ऊपर से चाँदी का वर्क लगाना चाहिये। ऐसे पान को शम्बरासुर के शत्रु की प्रीति के लिये देना चाहिये। मोमबत्तियों से आरती कर पुष्पांजलि देनी चाहिये। कामदेव के नामों का उच्चारण कर प्रार्थना करनी चाहिये। आप बसन्त ऋतु के निमित्तमात्र हैं। आपके मनोरंजन के लिए इन्द्र दिन रात तैयार रहते हैं क्योंकि तपस्वियों से अपने स्थान से च्युत होने के डर से इन्द्र आपसे डरा करते हैं। आपको छोड़कर सुदृढ़ मन से भला दूसरा कौन विरोध कर सकता है? आप भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्ध, सुरप्रभु, मलयांचल संभूत चन्दन तथा अगरु से सुगंधित हैं। संसार को विजय करने में दक्षिण दिशा की मलय वायु आपकी सहायिका है। हे काम मदन! इस संसार में बिरले ही जितेन्द्रिय मिलेंगे जिन्हें आपने वशीभूत न किया हो। हे कामदेव! आप इस पूजा से प्रसन्न हों। श्रावण शुक्ल त्रयोदशी के दिन कामदेव अर्चित हो जाने से प्रवृत्तिमार्ग लंपट जीव को आप अत्यधिक वीर्य तथा पुष्टि देते हैं और निवृत्तिमार्ग में लगे हुये निरत जीव के काम रूपी विकार को हर लेते हैं।”

हे तात! तुम से मैं त्रयोदशी के कार्य कहता हूँ, सुनो मैंने जो तुमको अष्टमी के दिन का पवित्रारोपण बतलाया है, यदि मनुष्य उसे उस दिन न कर पाये तो प्रभु सदाशिव के प्रीत्यर्थ चतुर्दशी के दिन कर लेना चाहिये। देवी तथा विष्णु समान हो पवित्रा का निर्माण करना चाहिये। केवल प्रार्थना तथा नाम भेद की कल्पना करनी चाहिये। विकल्प से यहाँ जो विशिष्ट बात है, उसे मैं अब तुम्हें बता रहा हूँ। ग्यारह, अड़तीस या पचास तार का बराबर की ग्रन्थियों वाला तथा तुल्य मध्य भाग वाला पवित्रा बनाना चाहिये। पवित्रा बारह अंगुल, आठ अंगुल का होना चाहिये। शेष विधि पहले के समान ही है। फल आदि पहले की तरह ही हैं। अन्त में मनुष्य कैलाश को जाता है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण शुक्ल त्रयोदशी व्रत एवं चतुर्दशी व्रत” नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


इक्कीसवाँ अध्याय – पूर्णमासी व्रत

सनत्कुमार ने भगवान शंकर से पूछा, “हे प्रभु! आप अब मुझे पूर्णमासी की विधि बताने की कृपा करें।” भगवान शिवजी बोले, “हे तात! श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को वेदोत्सर्जन उपाकर्म होता है या फिर पौष माह की पूर्णिमा को यह उपाकर्म किया जाता है। उत्सर्जन में पौष माह या माघ माह की प्रतिपदा तिथि या रोहिणी नक्षत्र बताया गया है। दूसरा समय अपनी-अपनी शाखा के अनुसार उत्सर्जन तथा उपाकर्म दोनों एक ही समय करने उत्तम कहे गये हैं।”

इसलिए श्रावण मास पूर्णिमा के दिन उत्सर्जन उचित है तथा बहृच शाखार्थी उपाकर्म में श्रवण नक्षत्र उचित है। अतः चतुर्दशी, पूर्णमासी या प्रतिपदा तिथि के दिनों में जिस दिन श्रवण नक्षत्र हो, उसी दिन ऋग्वेदियों का उपाकर्म होता है। यजुर्वेदियों का उपाकर्म पूर्णिमा में तथा सामवेदियों का उपाकर्म हस्त नक्षत्र में होता है। उपाकर्म गुरु और शुक्रास्त नक्षत्र में भी हो सकता है। गुरु तथा शुक्रास्त नक्षत्र में पहले उपाकर्म का शुभारम्भ न करें, यह शास्त्रों का कथन है। ग्रहण तथा संक्रांति आदि योग या दुष्ट समय आ जाने पर उपाकर्म दूसरे काल में करें। हस्तयुक्त पंचमी या भाद्रपद पूर्णिमा के दिन अपने-अपने ग्रह सूत्र के अनुसार उत्सर्जन उपाकर्म करें। मलमास में शुद्ध पक्ष में उत्सर्जन उपाकर्म करना चाहिये। यह दोनों उत्सर्जन उपाकर्म नित्य हैं। इनको प्रतिवर्ष नियम से करना पड़ता है। उपाकर्म की समाप्ति पर द्विजातियों के समक्ष उसी सभा में श्रेष्ठ सभादीप समर्पण करना चाहिए। उसे आचार्य या अन्य ब्राह्मण को दे देना चाहिये। प्रथम सोने, चाँदी या ताँबे के पात्र में एक कि.ग्रा. गेहूँ रखकर उसके ऊपर आटे का बना दीया बनाकर रखें। उसमें घी या तेल भरकर तीन बत्तियाँ जलानी चाहिये तथा पान सहित ब्राह्मण को देकर दक्षिणा देनी चाहिये।

ब्राह्मण का पूजन कर यह मंत्र बोलें, “यह श्रेष्ठ सभादीप दक्षिणा तथा पान सहित देवदेवार्थ हेतु भेंट कर रहा हूँ। मेरे सभी मनोरथ पूरे हों तथा पुत्र पौत्र आदि का भविष्य उज्ज्वल हो, यश की वृद्धि हो।” इस प्रकार पाँच वर्ष पश्चात् उद्यापन करना न भूलें। ब्राह्मण को यथाशक्ति दक्षिणा देकर विदा करना चाहिये। उसी रात को श्रावणी कर्म करना चाहिये। उसी के समीप सर्प बलि देनी चाहिये। ये दोनों कार्य अपने-अपने गृह्यसूत्रों को देखकर करने चाहियें। इसी तिथि में भगवान हयग्रीव का अवतार हुआ था। उस दिन हयग्रीव जयन्ती महोत्सव मनाना चाहिये।

श्रावण मास पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र में भगवान हयग्रीव का जन्म हुआ था। उसी समय सम्पूर्ण पापनाशक सामवेद गाया गया था। इसलिए इस दिन सामवेद को सुनना चाहिये और उसकी पूजा करनी चाहिये। वहाँ अपने बन्धु बान्धवों तथा मित्रों के साथ भोजन करना चाहिए और मनोविनोद के खेल खेलने चाहियें। हयग्रीव की पूजा करनी चाहिये। शुरू में प्रणव भोजन करना चाहिये। उसके बाद ‘भगवते’ तथा ‘ धर्माय’ कहकर ‘चतुर्थ्यन्तर आत्मविशोधन’ शब्द की योजना करनी चाहिये। अन्त में “नमः” शब्द का उच्चारण करना चाहिये।

यह अठारह अक्षरों का मंत्र सब सिद्धियों को प्रदान करने वाला तथा वश्य, मोहन आदि प्रयोगों का एक ही साधक मंत्र है। इसका पुरश्चरण, अक्षर संख्या के अनुसार अठारह लाख या अठारह हजार है। परन्तु इस कलियुग में इसका चौगुना करना चाहिये। इस प्रकार करने से भगवान हयग्रीव प्रसन्न होते हैं और सभी कामना पूर्ण कर देते हैं।

इसी दिन रक्षा बन्धन का पर्व मनाया जाता है। यह सब रोगों का नाश करने वाला तथा अशुभों का नाश करने वाला है। हे सनत्कुमार! इसके विषय में मैं तुम्हें पुराना इतिहास सुनाता हूँ। पहले इन्द्राणी ने इन्द्र की जय के लिए इसे किया था। पुराने समय में देव और असुरों में संग्राम छिड़ गया था जो बारह वर्ष तक चला। इन्द्राणी ने उसी समय इन्द्र को थका जानकर कहा, “हे देव! आज चतुर्दशी है। कल सुबह मैं रक्षा बन्धन करूँगी। जिसके करने से आप अजेय हो जायेंगे। इतना कहकर इन्द्राणी ने पूर्णिमा के दिन मंगल आदि कर, हर्ष देनेवाली रक्षा को इन्द्र के दाहिने हाथ में बाँध दिया।”

इन्द्र ने रक्षा बंधवाकर ब्राह्मणों के साथ स्वस्तिवाचन किया और इसके बाद असुर सेना पर आक्रमण कर दिया। देखते ही देखते इन्द्र ने बलशाली असरों पर विजय प्राप्त कर ली। भगवान भोलेनाथ बोले, “हे सनत्कुमार! श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनुष्य को प्रातःकाल श्रुति-स्मृति विधान द्वारा स्नान करना चाहिये। संध्या, जप आदि करके पितर, देवता और ऋषि तर्पण करना चाहिए। सोने के पात्र की सुरक्षा बनाकर उसको स्वर्ण के सूत्र से बांधकर मोती आदि द्वारा विभूषित, स्वच्छ रेशम के बने, विचित्र ग्रन्थियुक्त, पत्र गुच्छों से सुशोभित, सरसों चावलों को अन्दर रखकर आकर्षक बनाना चाहिए। वहाँ कलश रखकर उसके ऊपर पूर्णपात्र में रक्षा रखनी चाहिये। सुन्दर आसन पर सगे-सम्बन्धियों सहित बैठकर मंगल गान करना चाहिये। इसके बाद “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां बध्नामि रक्षे माचलः माचलः ॥” मंत्र का उच्चारण करना चाहिये।”

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य व्यक्तियों को भी पहले ब्राह्मणों की पूजा करके रक्षा बंधन करना चाहिये। इस प्रकार जो रक्षा बंधन करता है वह सब दोषों से छूट जाता है। परन्तु रक्षा बंधन का कार्य भद्रा नक्षत्र में कदापि नहीं करना चाहिये। भद्रा नक्षत्र में इसको करने से विपरीत फल प्राप्त होता है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “पूर्णमासी व्रत” नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


बाईसवाँ अध्याय – सर्वकाम फलप्रद संकटहरण व्रत

सनत्कुमार ने भगवान सदाशिव से पूछा, “हे भगवन्! श्रावण शुक्ल चतुर्थी के दिन सर्वकाम फलप्रद संकटहरण देवादेव का किस विधि से व्रत तथा पूजन करें, कब उद्यापन करें? मुझे विस्तार पूर्वक बताने का कष्ट करें।”

भगवान शंकर ने कहा, “चतुर्थी के दिन सुबह उठकर दातुन आदि करके पुण्यदाता शुभ संकट हरण नाम का व्रत का संकल्प करना चाहिये। हे देवेश! मैं आज चन्द्रमा के उदय होने तक निराहार रहूँगा। आपकी पूजा कर भोजन करूँगा। मेरे ऊपर आये संकट को दूर करें। इस प्रकार संकल्प कर काले तिलों से स्नान कर गणाधिपति की पूजा करनी चाहिये।”

अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण, चाँदी या ताँबे की गणेश जी की मूर्ति बनवायें। यदि इतना न हो सके तो मिट्टी की प्रतिमा कुम्हार से बनवायें। पहले अष्टदल कमल के ऊपर घट स्थापित करना चाहिये। उसमें जल भरकर स्वच्छ वस्त्र से ढक दें और उसके ऊपर प्रतिमा रखकर षोड्श उपचार द्वारा वैदिक मन्त्रों या तान्त्रिक मन्त्रों से पूजा करनी चाहिये।

शुद्ध घी के तिल का दस लड्डू बनाये। उनमें से पाँच गणेश जी के लिये रखें। भक्ति द्वारा देवता की भाँति ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिये। और दक्षिणा देकर प्रार्थना करनी चाहिये आपके निमित्त इन पाँच लड्डूओं को फलों तथा दक्षिणा सहित दे रहा हूँ। आप इन्हें ग्रहण करें। आपत्ति से मेरा उद्धार करें। जो कुछ मैंने द्रव्यहीन कम या अधिक दिया है। हे विप्र रूप गणेश्वर! वह सब परिपूर्ण हो। इसके बाद ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराना चाहिये और चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत करने वाले पर गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इस व्रत के करने से विद्यार्थी को विद्या, धनवान को धन और पुत्र की अभिलाषा करने वाले को पुत्र प्राप्त होता है। रोगी को रोग से छुटकारा मिल जाता है।

अब मैं तुम्हें पूजा तथा जप के मन्त्र बतलाता हूँ। पहले ‘ओंकार’ शब्द फिर ‘नमः’ फिर ‘हे रम्ब’ के बाद ‘लंबोदर’ शब्द उसके बाद ‘संकट निवारण’ शब्द को चतुर्थ्यान्त बनाकर, अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द कहना चाहिये। वैसे यह २१ अक्षरों का मंत्र है। मनुष्य को दसों दिशाओं की पूजा करनी चाहिये। निम्नलिखित २१ नामों द्वारा गणेश जी की पूजा करनी चाहिये- उमापुत्र, अग्नाशन, एकदन्त, दंतवक्त्र, मूषकवाहन, विनायक, ईशपुत्र, सर्वसिद्धि प्रदायक, गणाध्यक्ष, स्कन्दगुरो, सर्वसंकटनाशक, लम्बोदर, गोर्यमंगलसम्भव, धूम्रकेतो, भालचन्द्र, असुरमर्दन, विद्याविधान, विकट शूर्पकर्ण, विघ्नराट, अघनाशन।

आप मुझ पर प्रसन्न हो। मेरी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करें। हे प्रभु! मेरे शत्रुओं की बुद्धि का नाश हो तथा मेरे मित्रों का अभ्युदय हो। इस प्रकार प्रार्थना करके अष्टोत्तरशत होम करना चाहिये। व्रत की समाप्ति पर गणेश के प्रीत्यार्थ लड्डुओं का ब्राह्मणों को बायना देना चाहिये। आगे दिये मन्त्र से पाँच बार चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिये। क्षीरोदार्णवसंभूत!! अग्निगोत्रसमुदभूत! शारीन! रोहिणी सहित मेरे दिये हुये इस अर्घ्य को स्वीकार करें। तत्पश्चात ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करवाना चाहिये फिर स्वयं भोजन करना चाहिये। चार मास तक यह व्रत करने के बाद पाँचवें मास में उद्यापन करना चाहिये। साधक को पहले व्रत कुण्ड की शक्ति अनुसार मूर्ति बनानी चाहिये। प्रथम विधि से पूजा करके सुगन्धित चन्दन तथा नाना प्रकार के फूलों द्वारा पूजा करनी चाहिये। सूप और पायस, दक्षिणा सहित गणेश की प्रतिमा कपड़े से लपेट कर ब्राह्मण को देना चाहिये। व्रत समाप्ति के लिये पाँच सेर तिल देना चाहिये और क्षमा प्रार्थना करनी चाहिये। इस प्रकार उद्यापन करने मात्र से ही अश्वमेघ फल की प्राप्ति होती है।

सनत्कुमार मेरे कहने से पूर्व पार्वती ने इस व्रत को चार मास तक संकल्प की प्राप्ति के लिये किया था। पाँचवें मास में उन्होंने पुत्र कार्तिकेय को प्राप्त किया था। महर्षि अगस्त्य ने समुद्रपान के समय इसे किया था। तीन मास पश्चात् उन्हें विघ्नेश के प्रसादस्वरूप सिद्धि प्राप्त हो गई थी। हे मुनिश्वर! इस व्रत को दमयन्ती ने छः मास तक किया था तभी उसने महाराज नल के दर्शन किये थे। अनिरुद्ध को खोजती चित्रलेखा ने इस व्रत को किया। “वह कहाँ गये? उन्हें कौन ले गया? वाणासुर के यहाँ जाने पर प्रद्युम्न व्याकुल हो गये, तब उनसे रुक्मणी ने बड़े प्रेम से कहा, “पुत्र! मैं तुमसे जिस व्रत को कहने जा रही हूँ उसे ध्यानपूर्वक सुनो – पूर्व समय में तेरे जन्मकाल के समय मेरे सौरी घर से तुझको एक राक्षस चुराकर ले गया था। बस मेरा हृदय तेरे वियोग से छलनी हो गया। मैं रोती थी कि मैं अपने लाल का मुख कब देखूँगी? उस समय जब दूसरी स्त्रियों के पुत्रों को देखती तो पुत्र वियोग से पागल हुई मैं कहती कहीं यह मेरा पुत्र तो नहीं? इस तेरे वियोग का दुःख झेलते हुये कई वर्ष व्यतीत हो गये। प्रभु कृपा से हमारे यहाँ लोमश ऋषि आ गये उन्होंने मेरी दशा को देखकर मुझसे संकट चतुर्थी का व्रत करने को कहा। उनकी आज्ञानुसार मैंने चार बार यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से तुमने वापिस लौटकर शम्बरासुर का वध किया था। अतः यदि तुम भी इस व्रत को करोगे तो अवश्य ही तुम्हारे पुत्र का पता चल जायेगा और वह घर वापिस लौट आयेगा। माता के आदेशानुसार प्रद्युम्न ने भी गणेश जी के प्रीत्यार्थ विधिवत् इस व्रत को किया। तभी नारद जी ने आकर उनको बताया कि अनिरुद्ध वाणासुर पुरी में है। उसी समय प्रद्युम्न वाणासुर पुरी में गये और वाणासुर को सैन्य सहित जीतकर अपने पुत्र को पुत्रवधू सहित ले आये। प्राचीन काल में दूसरे देवताओं ने भी विघ्नेश के प्रीत्यर्थ इस व्रत को किया था। मृत्युलोक में इस व्रत के समान सिद्धि देने वाला और कोई व्रत नहीं है। अधिक कहने से क्या लाभ? इस व्रत का उपदेश नास्तिक और शठ को नहीं देना चाहिये। शिष्य या श्रद्धायुक्त साधु को तुम इसका उपदेश दे सकते हो। हे महामुने तुम धर्मिष्ठ विघ्ननन्दन तथा मेरे प्रिय हो, इसलिये मैंने तुमको इस व्रत का उपदेश दिया है।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “सर्वकाम फलप्रद संकटहरण व्रत” नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


तेईसवाँ अध्याय – श्री कृष्ण जन्माष्टमी

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, “श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन वृष राशि के चन्द्रमा में अर्ध रात्रि के समय, इस योग के आने पर देवकी के गर्भ से भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था परन्तु सिंह राशि के सूर्य आने पर इस महोत्सव को मनाना चाहिये। अष्टमी तिथि से पहले सप्तमी के दिन दातुन करके अल्प भोजन करना चाहिए। रात को जितेन्द्रिय होकर सो जाना चाहिये। प्रातः होने पर उपवास नियम करें। केवल उपवास द्वारा श्री कृष्णजन्माष्टमी का पवित्र दिन व्यतीत करना चाहिये। केवल उपवास करने से ही मनुष्य को सात जन्म के किये पापों से छुटकारा मिल जाता है। अष्टमी के दिन तिलों के साथ नदी में स्नान करना चाहिये। शोभन स्थान में देवकी के सूतिका घर को बनाकर उसे नाना प्रकार के रंगों के कपड़ों से कलश तथा फलों से सजाना चाहिये। दीपमाला, पुष्प, चन्दन, अगरबत्ती तथा धूपबत्ती जलाकर वहाँ गोकुल के कृष्ण चरित्र का वर्णन करें। वाद्यशब्द, नृत्यगान आदि से उस दिन को मनायें। सोलह उपचार द्वारा देवकी मंत्र से देवकी की पूजा करें। सतत वेणु-वीणा-निनाद सहित गायन आदि से किन्नरों द्वारा स्तुति की जाती हुई तथा श्रृंगार, दर्पण, दूर्वा, दधि, कलश धारण किये किन्नरों से सेवित अपने निवास स्थान पर खूब प्रसन्न मुख, देवमाता देवकी कृष्ण के सहित वसुदेव के साथ चारपाई पर लेटी हुई दिखानी चाहिये। सब पाप नाशार्थ आदि में ‘प्रणव’ तथा अन्त में ‘नमः’ जोड़कर चतुर्थ्यन्त युक्त अलग- अलग नाम कीर्तन पूजा करनी चाहिये। देवकी, वसुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा की अलग-अलग पूजा करनी चाहिये। चन्द्रमा के निकलने पर श्रीहरि का स्मरण कर चन्द्रमा को अर्घ्य देकर कहना चाहिये, “हे रोहिणीकांत! आप मेरे अर्घ्य को स्वीकार करें।”

श्री कृष्ण अष्टमी का व्रत एक करोड़ एकादशी के व्रतों के तुल्य होता है। इस प्रकार रात को पूजा करके नवमी को प्रातःकाल देवी भगवती विन्ध्यवासिनी का कृष्ण तुल्य महोत्सव करना चाहिये। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर कहना चाहिये, “भगवान वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।”

जो देवी तथा भगवान श्री कृष्ण का प्रतिवर्ष महोत्सव करता है वह उपरोक्त फल प्राप्त करने के साथ-साथ आरोग्य तथा अतुलनीय सौभाग्य भी प्राप्त करता है। अन्त में बैकुण्ठ को जाता है।

उद्यापन विधि : उद्यापन किसी शुभ दिन सविधि करना चाहिये। प्रातःकाल संध्या आदि करके ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर ऋषिओं की पूजा करनी चाहिये। स्वर्ण की भगवान कृष्ण की प्रतिमा बनवानी चाहिये। मण्डप में ब्रह्मादि देवताओं की स्थापना करनी चाहिये। उसपर ताँबे या मिट्टी का कलश रखकर उसमें रजत या बांस का पात्र रखना चाहिये। कपड़े से ढक कर साधक उस पर कृष्ण कन्हैया की वैदिक या तांत्रिक मंत्रों द्वारा षोड्शोपचार द्वारा पूजा करनी चाहिये। शंख में गंगाजल, फल, फूल, चन्दन रखकर, नारिकेल फल युक्त कर भूमि पर घुटने टेककर कहना चाहिये, “हे गोविन्द! आपका अवतार कंस के वध के लिए तथा भूमि का भार कम करने के लिए हुआ है। कौरवों के नाश तथा दैत्यों के विनाश के लिए आपका अवतार हुआ है। आप मेरे इस अर्घ्य को स्वीकार करें। हे प्रभु! वासुदेवात्मज! आपको मेरा नमस्कार है। आप इस भवसागर से मेरी रक्षा करें। इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात् रात्रि जागरण करना चाहिये।”

अगले दिन जनार्दन की पूजा करके मूल मंत्र द्वारा पायस, तिल तथा शुद्ध घी से एक सौ आठ बार होम करके आहुति देनी चाहिये। ‘इदं विष्णुः’ मंत्र से होम करें। व्रत की समाप्ति पर एक कपिला गाय का दान करना चाहिये। आठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा तथा जल से भरे आठ घड़े दान करने चाहिये। इस प्रकार उद्यापन करने से मनुष्य उसी समय पाप से रहित हो जाता है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्री कृष्ण जन्माष्टमी” नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


चौबीसवाँ अध्याय – श्री कृष्ण अवतार तथा राजा महासेन कथा

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, “हे महर्षि! पूर्व कल्प में दैत्यों के अत्याचारों से पीड़ित होकर पृथ्वी ब्रह्माजी के पास गई। पृथ्वी की व्यथा कथा सुनकर पृथ्वी के उद्धार के लिए ब्रह्माजी देवताओं के साथ पृथ्वी को लेकर क्षीरसागर में विष्णु जी के पास गये। ब्रह्माजी के मुख से पृथ्वी की कथा सुनकर भगवान श्रीहरि ने कहा, “आप लोग डरो नहीं। मैं शीघ्र ही देवकी के गर्भ से अवतार लूँगा और पृथ्वी से असुरों का विनाश कर पृथ्वी के कष्टों को दूर करूँगा। आप देवतागण पृथ्वी पर गोकुल में जाकर यादव कुल में जन्म लें।”

भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेने पर कंस के अत्याचारों के डर से वासुदेव उनको गोकुल में नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आए। वहाँ पर उनका लालन-पालन बड़े चाव से किया गया। जब भगवान श्री कृष्ण कुछ बड़े हुए तो उन्होंने कंस तथा उसके गणों का मथुरा आकर वध कर डाला और अपने माता-पिता देवकी वासुदेव को कंस की जेल से छुड़ाया। मथुरा वासियों ने भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना की, “हे शरणागत वत्सल! आपको हम नमस्कार करते हैं। हमारी रक्षा करो। हे देव! किसी को भी आपके जन्मदिन का ज्ञान नहीं है। आपके जन्म दिन का ज्ञान होने पर हम उस दिन ‘वर्द्धापनोत्सव’ मनाना चाहते हैं।”

भगवान श्री कृष्ण ने उनकी भक्ति, श्रद्धा तथा आत्मीयता देखकर उनसे जन्मदिवस में होने वाले कार्य को कहा। उन मथुरावासियों ने भगवान कृष्ण का कथन सुनकर उसी विधान से व्रत किया। भगवान ने उन लोगों को अनेक वर प्रदान किये।

हे सनत्कुमार! इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ। अंग देश में मित्रजित नाम का एक राजा था। उसके पुत्र का नाम महासेन था। वह अत्यन्त साधु स्वभाव वाला राजा था। वह प्रजा की अपने प्राणों से भी अधिक रक्षा करता था। प्रजा भी उस पर अपने प्राण छिड़कती थी।

परन्तु वह अचानक पाखंडियों के सम्पर्क में आ गया। जो राजा अपनी प्रजा को प्राणों से अधिक चाहता था वही अब अधर्म के रास्ते पर चल पड़ा। वह वेद, शास्त्र तथा पुराणों की निन्दा करने लगा और वर्णाश्रम धर्म से द्वेष रखने लगा। हे तात! इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर उसकी मृत्यु हो गई। यमदूत उसे पाश में बाँधकर यम के पास ले गये। यम ने उसे नरक में गिराकर बहुत समय तक यातना पहुँचाई। नरक की यातना भोगकर वह पिशाच योनि में गया। भूख प्यास से व्याकुल वह इधर-उधर घूमता हुआ मारवाड़ में पहुँचा तथा एक वैश्य के शरीर में प्रवेश कर गया। वह वैश्य के साथ मथुरा नगरी में पहुँच गया। मथुरा के रक्षकों ने उसे वैश्य के शरीर से अलग कर दिया।

वहाँ पर वह वनों तथा ऋषियों के आश्रमों में घूमता हुआ भगवान की कृपा से जन्माष्टमी के दिन ऋषियों तथा ब्राह्मणों द्वारा की जाने वाली महापूजा में शामिल हो गया। वह वहाँ रात भर जागता रहा और हरि कीर्तन का आनन्द लेता रहा। वह भगवान की कृपा से उसी क्षण निष्पाप, पवित्र और स्वच्छ चरित्र का होकर प्रेत शरीर को छोड़कर विमान द्वारा विष्णुलोक में पहुँच गया। इस व्रत के प्रभाव से वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।

यह व्रत सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से मनुष्य को सब अभिष्ट प्राप्त हो जाते हैं। विद्वानों का कर्त्तव्य है कि वे श्री कृष्ण जन्म का विधान लिखकर इसका प्रचार, प्रसार करें।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्री कृष्ण अवतार तथा राजा महासेन कथा” नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


पच्चीसवाँ अध्याय – पिठोर व्रत

हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें श्रावण मास की अमावस्या के महात्म्य के बारे में बताता हूँ। इस दिन रखा गया व्रत “पिठोर व्रत” कहलाता है।

सर्वाधिष्ठान होने से घट को “पीठ” कहते हैं। उसमें जो पूजनोपयोगी वस्तु होती हैं उनको “ओर” कहते हैं। इसलिए इस व्रत का नाम “पिठोर व्रत” पड़ गया।

विधि : दीवार को पहले सफेद या पीले रंग से रंगनी चाहिये। फिर तांबे के रंग से रंगनी चाहिये। अब मध्य भाग में पार्वती और शिवलिंग बनायें। उसके चारों ओर संसार की सभी चीजें बनायें। जैसे रसोई घर, देव मंदिर, शयनागार, खजाना, स्त्रियों के सोने का कमरा, अन्तः प्रसाद, अट्टालिका, पेड़, ईंट, पत्थर, चूना, दरवाजा, चारदीवारी, बकरी, गौ, भैंस, ऊँट, हाथी, घोड़ा, पालकी, रथ सब प्रकार के अनाज, सब तरह के पक्षी, दालें, सब्जियाँ, फल, दीपक, दीवट आदि।

उपरोक्त वस्तुओं को बनाकर षोड्श उपचारों से उनकी पूजा करनी चाहिये। अनेक तरह के गंध, धूप, चन्दन आदि देकर ब्राह्मण, बालक, सौभाग्यवती स्त्रियों को भोजन कराना चाहिये। तथा अम्बिका सहित शिवजी से कहना चाहिये। – हे दयासिन्धु! हे शशिशेखर! आप इस व्रत से सन्तुष्ट होकर मेरे सभी मनोरथ पूरे करें। दस प्रकार पाँच वर्ष तक व्रत करने के पश्चात् उद्यापन करना चाहिये। उद्यापन में शिव मंत्र “ॐ नमः शिवाय” द्वारा घृत तथा विल्वपत्र द्वारा हवन करें। पहले दिन अधिवासन करके ग्रह-हवन करें। एक हजार आठ या एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहियें। इसके बाद आचार्य का पूजन करके दक्षिणा देनी चाहिए।

यह व्रत समृद्धि दाता है। इसके तुल्य कोई दूसरा व्रत नहीं है। ऐसा व्रत आज तक न हुआ है और न होगा। हे वत्स! मनुष्य जो भी चीजें दीवार पर बनायेगा वे सब चीजें उसे प्राप्त होंगी।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “पिठोर व्रत” नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


छब्बीसवाँ अध्याय – श्रावण मास की अमावस्या

भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, “अब तुम श्रावण मास की अमावस्या को क्या करना चाहिए, उसके बारे में सुनो। मैंने बहुत समय पहले महाबली, पराक्रमी, संसार-विध्वंसक, देवताओं को हराने वाले दुष्ट दैत्यों के साथ अपने वृषभ पर सवार होकर संग्राम किया था। परन्तु महाबली और पराक्रमी वृषभ ने मेरा साथ युद्ध में कभी नहीं छोड़ा। अन्धकासुर दैत्य ने एक बार वृषभ के शरीर पर तीव्र आघात किया जिससे उसके शरीर से खून बहने लगा। केवल उसके प्राणों की ही रक्षा हो पायी। इस अवस्था में जब मैं दैत्य को मारने चला तो भी उसने मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैंने उस समय नन्दीश्वर के पराक्रम को देखा कि उसने अन्धक दैत्य का अपने सींगों के प्रहार से वध कर डाला। मैं नन्दी के इस कार्य से बहुत प्रसन्न हुआ और मैंने उससे वर माँगने को कहा। तुम जो वर माँगोगे उसे मैं अवश्य पूरा करूंगा।”

नन्दीश्वर बोला, “मुझे कुछ नहीं चाहिये। आप मुझ पर प्रसन्न हैं इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या वरदान हो सकता है। फिर भी संसार की भलाई के लिए आपसे प्रार्थना करता हूँ। आज श्रावण मास की अमावस्या है। आज के दिन गौ के सहित मृत्तिका बैलों का पूजन हो और कामधेनु सदृश्य मेरा जन्म हो।”

मनुष्य भक्ति द्वारा प्रत्यक्ष गौ तथा बैलों का पूजन करें। गेरू से तथा धातुओं से उनके शरीर को सजायें। सींगों को सोने, चाँदी से मढ़ें। दोनों सींगों में रेशमी गुच्छे बाँधकर चित्र-विचित्र नाना रंगों से मिश्रित कपड़े को पीठ पर ढक कर गले में सुमधुर आवाज करने वाली घंटियाँ बाँधें। दिन में गाँव के बाहर ले जाकर शाम को घर वापिस ले आएँ। खली, बिनौले उन्हें खाने को दें। जो ऐसा करे उनके यहाँ गोधन की वृद्धि हो। मैंने वृषभ से कहा, “तुमने जो माँगा है वह सब तुमको अवश्य मिलेगा।”

जो वृषभ आज के दिन किसी काम में न लगाया गया हो, केवल भूसा खाता हो, पानी पीता हो, उसे पोल कहते हैं। उसी नाम से आज का दिन भी पोल कहा जायेगा। आज का दिन जगत् में पोला के नाम से प्रसिद्ध होगा। मनुष्य को आज के दिन सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाले बैलों का उत्सव मनाना चाहिए।

हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें कुशोत्पाटिनी (कुशाग्रहण) विधि बताता हूँ। श्रावण मास की अमावस्या के दिन स्नान करके पवित्र होकर कुशोत्पाटन करना चाहिये। कुश को बार-बार प्रयोग करने पर भी वह शुद्ध रहता है। कुश, काश, भव, दूर्वा, खस, कुंदक, गेहूँ, चावल, मूंज और घास- यह कुशा के दस भेद बताये हैं। “ब्रह्मा द्वारा नैसर्गिक उत्पन्न दर्भ मेरे सब पापों को नष्ट करें। स्वस्तिकारक हों।” यह मंत्र कहकर पूर्व उत्तर के बीच ईशान कोण में मुख करके “हूं फट्” मंत्र द्वारा एक ही बार कुश उखाड़ना चाहिये।

जिन कुशों के अग्र भाग सूखे न हों ऐसे हरे रंग के कुश देवकार्य और जपादि कर्म में, जड़रहित कुश पितृ कार्य में रखना चाहिये। देवकार्य और पितृ कार्य के लिये सात पत्र के कुश उत्तम बताये गये हैं। मध्य में पत्र न हो, ऐसे अग्र भाग सहित आदेश प्रमाण कुश पवित्रा में रखने योग्य हैं। ब्राह्मण के लिए चार कुश का पवित्रा, क्षत्रिय के लिए तीन कुश का पवित्रा, वैश्य के लिए दो कुश का पवित्रा और शूद्र के लिए एक कुश का पवित्रा देना चाहिये।

उत्पवनार्थ के लिए, वर्णों के लिए दो पवित्रा होते हैं। पचास का ब्रह्मा तथा पच्चीस का विष्टर होता है। पवित्रा को आचमन करते समय हाथ से न निकालें। विकिट, अग्निकारण तथा पाद्य समाप्ति पर पवित्रा को त्याग देना चाहिये। दर्भ तुल्य पुण्यदाता अन्य कोई पवित्रा पापनाशक नहीं है। जितने देव और पितृ कार्य हैं वह सब दर्भाधीन हैं। अमावस्या के दिन ऐसे दर्भों को स्वीकार करना चाहिये। यह दर्भ कभी बासी नहीं होते हैं।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण मास की अमावस्या” नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


सत्ताईसवाँ अध्याय – श्रावण मास के अन्य कार्य

“हे सनत्कुमार! श्रावण मास में मनुष्य को जो अन्य कार्य करने चाहिये उनको सुनो।” भगवान शंकर ने कहा। कर्क की संक्रांति से सिंह की संक्रांति तक सब नदियाँ रजस्वला हो जाती हैं। इसलिए उस समय नदियों में स्नान करना निषिद्ध है। समुद्र में गिरने वाली नदियों में स्नान कर सकते हैं, इसमें कोई दोष नहीं लगता। कुछ महर्षियों का कहना है कि कर्क संक्रांति से दक्षिण दिशा में स्थित भगवान अगस्त्य के उदय काल तक नदियाँ रजस्वला रहती हैं। ग्रीष्म ऋतु में भूमि पर जो नदियाँ सूख जाती हैं वे भी रजस्वला रहती हैं। अपने आप जिन नदियों की गति बत्तीस हाथे न हो, उन नदियों में वर्षा ऋतु में दस दिन तक स्नान नहीं करना चाहिये। उन नदियों को नदी न कहकर गर्त शब्द से पुकारें। कर्क संक्रांति के आरम्भ में महानदियाँ रजस्वला होती हैं। जिस प्रकार स्त्रियाँ तीन दिन तक अपवित्र रहती हैं उसी प्रकार महानदियाँ भी तीन दिन तक अपवित्र रहकर चौथे दिन पवित्र हो जाती हैं।

गोदावरी, भागीरथी, वेणिका, तुंगभद्रा, पयोष्ठी और तापी ये छः नदियाँ विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में बहती हैं। सरस्वती, यमुना, नर्मदा, गंगा, विशोका तथा वितस्ता ये छः महानदियाँ विन्ध्य पर्वत के ऊपर बहती हैं। कृष्णा, बन्जरा, कावेरी और देविका ये चार महानदियाँ कर्क संक्रांति पर एक दिन के लिए रजस्वला होती हैं।

कर्क संक्रांति से गौतमी नदी तीन दिन रजस्वला रहती है। सरस्वती, प्लक्षधारा, यमुना, भागीरथी, नर्मदा, सरयू, सिंधु, सती, चन्द्रभागा ये नौ नदियाँ और ‘नद’ नाम से विख्यात शोण, हिरण्य, सिन्धु, कोकिल, शतद्रु, घघ्घर, अर्हित ये सात नदियाँ पवित्र रहती हैं। ये रजस्वला नहीं होतीं। सरस्वती, यमुना, गंगा, धर्मद्रवा ये नदियाँ सब काल में गुप्त रजोदोष वाली होती हैं। ये हमेशा पवित्र रहती हैं। नदी के तट वासियों को रजस्वला जन्म पाप नहीं लगता। गंगा जल में रजोदृष्ट जल मिलने से पवित्र हो जाता है। श्रावणी, उत्सर्ग, प्रातः स्नान, विपत्ति के समय, चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय रजोदोष नहीं होता।

अब मैं सिंह की संक्रांति पर गौ-प्रसव के फल को बताता हूँ। सिंह का सूर्य हो जाने पर जिसकी गौ ब्याई हो, उसकी एक मास में निश्चय ही मृत्यु हो जाती है। उस समय की गौ-प्रसव की शांति का उपाय सुनो जिसके करने से मनुष्य सुखी हो जाता है। उस गौ को ब्राह्मण को दान कर देनी चाहिये। पीली सरसों तथा शुद्ध गऊ घृत द्वारा होम कराना चाहिये। श्री सूक्त या शांति सूक्त द्वारा स्नान करना चाहिये। घी और तिल की एक हजार आहुतियाँ देनी चाहियें।

सिंह राशि में सूर्य के आने पर गऊ ब्याई हो तो अनिष्ट की सम्भावना प्रबल होती है। उसकी शांति के लिये ‘अस्यावाम’ से तथा ‘तद्विष्णो’ मंत्र से तिल, घी द्वारा एक सौ आठ होम करने चाहिये तथा मृत्युंजय विधान द्वारा दस हजार हवन करना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य को किसी प्रकार का भय नहीं सताता।

यदि श्रावण मास में घोड़ी ब्याई हो तो शांति यज्ञ करने से दोष मिट जाता है। अब तुम श्रावण मास में कर्क या सिंह की संक्रांति होने से शुभप्रद दान के सम्बन्ध में सुनो – कर्क के सूर्य में (संक्रांति में) घृत धेनु का, सिंह की संक्रांति में सोने के छाते का दान करना चाहिये। श्रावण मास में वस्त्र दान का बड़ा भारी फल होता है। श्रावण मास में भगवान श्री हरि की प्रीति के लिए साधक को घृत, घृत कुम्भ, घृत धेनु तथा फलों का दान करना चाहिये।

अन्य महीनों की अपेक्षा इस महीने में किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है। मुझे इस महीने से अधिक प्रिय और कोई महीना नहीं है। जो इस महीने में व्रत करता है वह विशेष रूप से मेरी कृपा का पात्र होता है। ब्राह्मणों का राजा चन्द्रमा और प्रत्यक्ष देवता सूर्य है। ये दोनों मेरे नेत्र हैं। अतः उसकी संक्रांति संज्ञा कर्क तथा सिंह संज्ञा हुई।

मनुष्य को चाहिए श्रावण मास में प्रातः स्नान कर शिव पूजन करे और इस मास का माहात्म्य तथा कथा भक्ति के साथ पूरे मास सुनता रहे। श्रावण के महीने के व्रत करने से सात प्रकार की जो बन्ध्यायें हैं, उनको भी पुत्र प्राप्ति हो जाती है।

इस महीने में श्री व्यास जी की भी पूजा करनी चाहिये। जिसने श्री वेदव्यास जी को प्रसन्न कर लिया उसने मानो मुझे प्रसन्न कर लिया। जो श्रावण मास का माहात्म्य सुनकर भगवान वेदव्यास का पूजन नहीं करता यमराज उसके कान काटकर बहरा बना देते हैं। इसलिए इस मास में श्री वेदव्यास जी की पूजा अवश्य करनी चाहिये। जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक इस श्रावण मास के माहात्म्य को पढ़ता, सुनता या सुनाता है उसको महान् पुण्य की प्राप्ति होती है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण मास के अन्य कार्य” नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


अट्ठाईसवाँ अध्याय – अगस्त्य अर्घ्य विधि

भगवान शंकर बोले, “हे सनत्कुमार! अब मैं तुम्हें अगस्त्य अर्घ्य विधि का वर्णन करता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। इसके करने से मनुष्य की सब इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। अगस्त्योदय से पहले ही समय का निर्धारण करना चाहिये। सात रात उदय होने में शेष हो तो पहले सात रात पूर्व से प्रतिदिन अर्घ्य देना चाहिये।

विधि : मनुष्य सुबह श्वेत तिल से नहाकर सफेद कपड़ा तथा माला धारण करे। सोने से निर्मित कलश की स्थापना कर, पंचरत्न युक्त, घी पात्र युक्त अनेक प्रकार के भोजनीय फल तथा माला और कपड़े से विभूषित करके उसके ऊपर तांबे का पूर्ण पात्र रखना चाहिये। उस पर कुम्भोद्भव महर्षि अगस्त्य की प्रतिमा रखें। प्रतिमा मोटी, लम्बे हाथों वाली, दक्षिणाभिमुख, जटायुक्त, हाथ में कमण्डल, बहुत से शिष्यों से घिरी हुई, दर्भ, अक्षत धारी तथा लोपामुद्रा सहित होनी चाहिये। उसका गन्ध, पुष्प आदि षोड्श उपचारों सहित पूजन करना चाहिये। बहुत विस्तार द्वारा नैवेद्य समर्पण करना चाहिये। भक्तिपूर्वक दुध्योदन बलि तथा अर्घ्य देना चाहिये।”

विधान : स्वर्ण, चाँदी, ताँबा या वेणु में नारंगी, खजूर, नारियल, करेला, पेठा, केला, अनार, विजोरा नींबू, अखरोट, पिस्ता, नीलकमल. कमल, कुश, दूर्वा तथा अन्य फल एवं पुष्प, सातों धान, सात अंकुर, पंचपल्लव, पांच कपड़े रखकर प्रतिमा की पूजा करें। पृथ्वी पर घुटनों के बल बैठकर पात्र को सिर नवाकर मस्तक झुकाकर कुम्भोद्भव मुनि का ध्यान कर श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर कहें काशपुष्प तुल्य वाले! वह्नि-मारुत- संभव! हे मित्रावरुण! कुम्भयोने! आपको नमस्कार है। जिसने आतापी और महाबली वातापी को भक्षण किया, जो श्रीमान लोपमुद्रा के पति हैं, उन्हें नमस्कार है। जिसके उदय से पाप विलीन होते हैं। त्रिविध व्याधि, त्रिविध पाप नष्ट होते हैं, उनको मेरा नमस्कार है।

वैदिक लोगों को अगस्त्य मंत्र से, स्त्री तथा शूद्र पौराणिक मंत्र द्वारा अगस्त्य को अर्घ्य देकर प्रणाम करना चाहिये। हे राजपुत्री! हे महाभागे! हे ऋषिपत्नी! हे वरानने! हे लोपमुद्रे! आपको मेरा नमस्कार है। मेरे इस अर्घ्य को आप स्वीकार करें। मंत्र से वेत्ता को घी द्वारा अर्घ्य मंत्र से एक हजार आठ या एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहियें। इस प्रकार होम करके विसर्जन करना चाहिये।

हे अचिन्तचरित अगस्त्य! मैंने आपका यथा विधि पूजन किया है। इस संसार या परलोक कार्य की सिद्धि करके आप यहाँ से विदा हों। इस प्रकार अगस्त्य का विसर्जन करके इस मूर्ति को ब्राह्मण को दे देना चाहिये।

वेद वेदांग के ज्ञाता दरिद्र तथा कुटुम्बी ब्राह्मण का अभिनन्दन करना चाहिये। चित्त में यह भावना होनी चाहिये कि अगस्त्य मुनि इनको द्विज रूप से स्वीकार करें। इसे अगस्त्य ऋषि ग्रहण करते तथा देते हैं। दोनों के तारक अगस्त्य हैं। अतः अगस्त्य ऋषि को नमस्कार है। द्विज लोग वैदिक और शूद्र पौराणिक मंत्र पढ़ें।

हे सनत्कुमार! अगस्त्योदय के पहले सातवें दिन दक्षिणा सहित धेनु का दान करना चाहिये। इस प्रकार निष्काम होकर सात रात, अर्घ्य दान करने से जन्म जन्म का भय मिट जाता है। ब्राह्मण चारों वेदों और छः शास्त्रों का विद्वान् बन जाता है। वैश्य को धन तथा गौ-धन की प्राप्ति होती है। क्षत्रिय समुद्र तक भूमि प्राप्त कर लेता है। शूद्र की गरीबी दूर हो जाती है। स्त्री को पुत्र, सौभाग्य और घर की प्राप्ति होती है। जिन देशों में लोग अगस्त्यार्चन करते हैं, उन देशों में मेघ कामवर्षी हो जाते हैं। टिड्डी दलों की समाप्ति और रोगों का नाश हो जाता है। जो निष्काम होकर यावज्जीवन करते हैं, वह मुक्ति पथ के भागीदार बन जाते हैं।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अगस्त्य अर्घ्य विधि” नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


उनत्तीसवाँ अध्याय – श्रावण मास के व्रतों के कृत्य

भगवान शंकर ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से बोले, “हे पुत्र! अब मैं तुम्हें श्रावण मास के व्रतों के कृत्यों के संबंध में बतलाऊँगा कि किस समय क्या करना चाहिये? हे महामुने! उसे सुनें। श्रावण महीने की तिथि किस समय की लेनी चाहिये? किस समय क्या विधान है? पूजन तथा जागरण कैसे करना चाहिये? नक्त व्रत का उषाकाल, उस व्रत कर्म में कहा है। रात में भोजन तथा भोजनाभाव दिन में कहा है। प्रातःकाल उस व्रत काल में उद्यापन कहा है। पंचांग द्वारा शुद्ध समय में अधिवासन करना चाहिये, दूसरे दिन विधि पूर्वक होम करना चाहिये। धारण तथा पारणा में ह्रासवद्धि नहीं होती।”

श्रावण शुक्ल प्रतिपदा के दिन संकल्प करके उपवास करें। दूसरे दिन हविष्यान पारण में स्वीकार करना चाहिये। पारण का दिन एकादशी में हो तो तीन उपवास करने चाहिये। रविवार व्रतार्चन काल प्रातःकाल ही है। सोमवार में सायंकाल का समय प्रधान कहा गया है। मंगल, बुध तथा गुरु की पूजा में मुख्य समय सुबह का है। शुक्र पूजा सुबह तथा रात में जागरण करें। नृसिंह और शनि की पूजा शाम को की जाती है। शनि व्रत का दान का समय मध्याह्न है।

हनुमान जी की पूजा मध्याह्न तथा अश्वत्थ पूजा का समय प्रातःकाल है। रोटक व्रत में प्रतिपदा तथा सोमवार सहित त्रिमुहूर्तोहार स्वीकृत है या पहिले की तिथि ग्राह्य है। उदुम्बरी द्वितीया, संध्याव्यापिनी तृतीया युक्त पूर्ववेधित लेनी चाहिये। स्वर्णगौरी में चतुर्थायुक्त तृतीया तिथि है। गणेश पूजा में तृतीयाविद्ध चतुर्थी है। नागपूजा में षष्टीयुक्त पंचमी है। सूपोदन व्रत सायं व्यापिनी सप्तमीयुक्त षष्टी है। शीतलाव्रत में मध्याह्न व्यापिनी सप्तमी है। देवी के पवित्रारोपण में रात्रियुक्त अष्टमी तिथि है। कुमारी में रात्रि व्यापिनी नवमी उत्तम है। आशा में रात्रिव्यापिनी दशमी है।

हे तात! दशमी विद्धा एकादशी अग्राह्य है। उसके वेध को मैं बताता हूँ। अरुणोदय समय दशमी वेध वैष्णवों के यहाँ होता है। अरुणोदय समय में स्मार्तों के यहाँ दशमी वेध होता है। इस रीति द्वारा द्वादशी पवित्रारोपण की कही गयी है। अनंग व्रत में रवि व्यापिनी त्रयोदशी है। द्वितीय प्रहर व्यापिनी हो जाने से प्रशस्ततर होती है। शिव पवित्रारोपण में चतुर्दशी रात्रिव्यापिनी है। अर्ध रात्रिव्यापिनी अधिक उत्तम है। उपाकर्म तथा उत्सर्ग में पूर्णिमा और श्रावण नक्षत्र ग्राह्य है। यदि अन्य दिन पूर्णिमा तीन मुहूर्त की है तो दूसरे दिन व्रत करना चाहिये। या ऋग्वेद तैत्तिरीय शाखा वालों को पहले दिन करना चाहिये। तैत्तिरीय शाखा वाले यजुर्वेदियों को अन्य दिन पूर्णिमा तीन मुहूर्त रहने पर भी उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों पूर्व दिन ही करने चाहिये। पूरे दिन पूर्णिमा तथा श्रवण नक्षत्र एक मुहूर्तेत्तर सम्बन्ध हो तो और अन्य दो दिन मुहूर्त के भीतर पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र समाप्त हो तो पूर्व दिन करना चाहिये। अपराह्न काल में सामवेदियों को हस्तनक्षत्र हो तो उपाकर्म उत्सर्ग करना चाहिये। दोनों दिन हस्तनक्षत्र अपराह्न काल व्यापिनी हो तो पहले दिन करना चाहिये। उपाकर्मोत्तर सभादीप करना चाहिये।

श्रवण कर्म तथा सर्पबली को सूर्यास्त समय व्यापिनी पूर्णिमा उत्तम है। ह्यग्रीवोत्सव में पूर्णिमा मध्याह्रव्यापिनी लेनी चाहिये। रक्षा बन्धन कार्य में अपराह्नव्यापिनी पूर्णिमा ग्राह्य है। चन्द्रोदय व्यापिनी संकट चतुर्थी स्वीकृत है। चतुर्थी चन्द्रोदयव्यापिनी दोनों दिन हो या न हो तो पहले दिन करना चाहिये। क्योंकि तृतीया के दिन चतुर्थी हो जाने से वह महत्त्व पुण्य का फलप्रद होती है।

हे वत्स! व्रती पहले दिन गणनाथ को प्रसन्न करने वाली चतुर्थी का व्रत करें। गणेश, गौरी तथा बहुला को छोड़कर दूसरे देवों की पूजा में पंचमी बिद्ध ली गई है। श्रीकृष्ण पूजा में अर्द्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी विधि है। निर्णय के बारे में सर्वत्र छः तिथि मान्य हैं। एक तो दोनों दिन पूर्ण व्याप्ति, दोनों दिन केवल अव्याप्ति, दोनों दिन अंश द्वारा समव्याप्ति, दोनों दिन अंश द्वारा विषम व्याप्ति तथा अन्य दिन अंश द्वारा अव्याप्ति, पूर्व दिन अंश से व्याप्ति, अन्य अव्याप्ति छः पक्षों में से तीन पक्षों में सन्देह नहीं है। अब उसे सुनो – पूर्णव्याप्ति में अंशव्याप्ति से अधिक व्याप्ति श्रेष्ठ मानी जाती है। एक दिन जो पूर्ण तिथि है वही अन्य दिन अपूर्ण कही गई है। एक अव्याप्ति, अन्य दिन अंशव्याप्ति हो तो श्रेष्ठ अंशव्याप्ति होती है। अंशव्याप्ति जब हो तथा वह सम हो तो वहाँ संशय हो जाता है तो भेद वाक्य-निर्णय करना चाहिये।

युग्म वाक्यों से, कहीं-कहीं वार-नक्षत्र योगबल से, कही प्रधान दो योग में, कहीं पुराण योग से, जन्माष्टमी व्रत में सन्देह हो यानी इन पक्षों में परा हो तो प्रातःकाल में पारण करना चाहिये। यदि तीन प्रहर अष्टमी समाप्त हो या बाद तक रहती हो तो सुबह में पारण करना चाहिये। पिठोरा व्रत में मध्याह्न व्यापिनी अमा शुभ है। वृषभ अर्चन में सायंकाल व्यापिनी अमावस्या ली गई है। दूर्वी के संचय में सम्भव समय है। सूर्य की कर्क संक्रांति में तीस घड़ी पहले पुण्य समय माना है। सिंह संक्रांति में सोलह घड़ी पहले तथा सोलह घड़ी बाद में पुण्य समय आ जाता है। कुछ ऋषि सिंह की संक्रांति के पहले सोलह घड़ी पुण्य समय मानते हैं। अगस्त्य अर्घ्य समय व्रत सहित ही कहा है। हे वत्स! मैंने यह कर्मों का काल निर्णय बताया है। इस अध्याय को जो सुनाता है तथा जो सुनता है, उसको श्रावण मास के सभी व्रतों का फल प्राप्त हो जाता है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण मास के व्रतों के कृत्य” नामक उनत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


तीसवाँ अध्याय – श्रावण मास का संक्षिप्त माहात्म्य तथा उसके सुनने का फल

भगवान शंकर बोले, “हे वत्स! श्रावण मास का जो माहात्म्य मैंने तुम्हें बताया है उसे यदि कोई सौ वर्ष तक उसका वर्णन करता रहे तो भी वह पूरी तरह नहीं कह सकता। सती ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने शरीर का होम करने के बाद, हिमालय की पुत्री के रूप में पैदा होकर इसी श्रावण मास का सेवन किया था, जिसके कारण उसने मुझे पति रूप में प्राप्त किया है। इसलिए यह महीना मुझे बहुत प्रिय है।”

इस महीने की यह विशेषता है कि इसमें न अधिक ठंड पड़ती है और न अधिक गर्मी पड़ती है। इस माह में राजा और प्रजा दोनों को अपने शरीर में वैदिक मंत्रों द्वारा सफेद भस्म लगानी चाहिये या जल मिश्रित बारह त्रिपुण्ड मस्तक, छाती, नाभि, दोनों भुजाओं, दोनों कुल्हों, दोनों कन्धों, सिर, कंठ और पीठ में ‘मानस्तोके’ इस मंत्र से धारण करते हैं। “सद्योजातादि” इससे या षड्क्षर मंत्र से सर्वांग में भस्म लगानी चाहिये। शरीर में एक सौ आठ रुद्राक्षों को धारण करना चाहिये। बत्तीस रुद्राक्ष गले में, बाईस मस्तक में, बारह दोनों कानों में, चौबीस दोनों हाथों में, आठ- आठ दोनों भुजाओं में, एक भाल में और एक शिखाग्र भाग में धारण करने चाहिए। “पंचाक्षरी मंत्र” ॐ नमः शिवाय का जाप करना चाहिये।

श्रावण मास को मेरा प्रिय मास जानकर इस मास में मेरी तथा केशव की पूजा करनी चाहिए। मुझे इस महीने में कृष्ण जन्माष्टमी अधिक प्रिय है। इसी दिन देवकी के गर्भ से श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। हे वत्स! मैंने तुमसे श्रावण महीने का लेशमात्र माहात्म्य कहा है। अब तुम क्या सुनना चाहते हो? सनत्कुमार बोले, “हे भगवन! श्रावण महीने के जिन कर्मों को आपने बताया उन्हें सुनने के समय आनन्द रूपी सागर में मग्न हो जाने से तथा अधिक हो जाने के कारण सब बातें स्मरण नहीं रहीं। हे नाथ! तथ्य रूप से आप सुनायें। जिससे क्रम से पता चले तथा मैं भक्ति पूर्वक ग्रहण कर सकूँ।”

भगवान सदाशिव बोले, “समाहित हो, शुभ अनुक्रमणिका सुनो। शौनक ऋषि का पूर्व प्रश्न है। अनन्तर सूत जी का उत्तर है। सुनने वालों के गुणों की कथा, तुम्हारे प्रश्न और श्रावण मास की तथा श्रावण की स्तुति। हे मुनिश्रेष्ठ! फिर सविस्तार तुम्हारा प्रश्न हुआ। तुम्हारे द्वारा मेरी स्तुति नाम निर्वचन आदि सहित हुई। फिर उत्तर क्रम से जिसमें सब उद्देश्य हैं। विशिष्ट तरह से तुम्हारा प्रश्न नक्त व्रत रुद्राभिषेक तथा लक्ष-पूजन विधान, दीपदान माहात्म्य, किसी प्रिय चीज का त्यागना, रुद्राभिषेक का फल, रुद्राभिषेक का पंचामृत से फल, भूमि शयन तथा मौन व्रत फल, धारण पारण विधि, मासोपवास कथन, सोमख्यान में लक्षवर्ती विधि कथन, कोटिलिंग विधान, अन्नोदन व्रत-कथन, हविष्यान्न भोजन, पत्तल पर भोजन, शाक त्याग, भूशयन, प्रातःकाल स्नान, दमशम कथन, स्फटिक आदि के लिंगों की अर्चना, जप पूजन फल, प्रदक्षिणा, नमस्कार, वेद पारायण, पुरुषसूक्त विधि, ग्रह यज्ञ विधि, क्रम से रवि, चन्द्र तथा भौम का व्रत कथन, बुध और गुरु व्रत, शुक्र के दिन जीवन्तिका व्रत, शनि के दिन नृसिंह व्रत, शनि, हनुमान और पीपल व्रत कथन, रोटक व्रत तथा औदुम्बर व्रत माहात्म्य, स्वर्ण-गौरी तथा दूर्वा-गणपति व्रत कथन, पंचमी में नाग व्रत, षष्टी को सूपदन, सप्तमी को शीतला व्रत तथा पवित्रारोपण विधि, नवमी को दुर्गा कुमारी पूजा, दशमी को आशा व्रत, एकादशी द्वय व्रत, द्वादशी विष्णुप्रीत्यर्थ पवित्रारोपण, त्रयोदशी को कामदेव व्रत, चतुर्दशी को शिवप्रीत्यर्थ पवित्रारोपण, पूर्णिमा को उपाकर्म उत्सर्ग तथा श्रावणी कर्म विधि, सर्पबलि, ह्यग्रीव जयन्ती महोत्सव, सभादीप, रक्षाबन्धन तथा गजानन का संकटनाशन व्रत, कृष्ण जन्माष्टमी व्रत एवं कथा विधि, पिठोर व्रत, पोला संज्ञक वृषभ व्रत, दर्भ संग्रह, नदियों का रजस्वला काल, सिंह की संक्रांति में गौ प्रसव होने पर अनिष्ट शांति, कर्क-सिंह श्रावण में दान, स्नान युक्त मास माहात्म्य श्रवण एवं कथन, व्यास पूजा, अगस्त्य ऋषि विधि, कर्म तथा व्रतों के फल का निर्णय एवं मास माहात्म्य के सुनने से मास के समस्त व्रतों के फल का भागी होना है।”

हे सनत्कुमार! तुम अपने मन में इसी क्रम को ग्रहण करो। जो प्राणी इस अध्याय का श्रवण करता है, वह पूरे मास के व्रतों का फल अनायास ही प्राप्त कर लेता है। हे विप्रेन्द्र! प्राणी इस मास के किसी एक व्रत को करने से मुझे सर्व प्रिय हो जाता है।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा कि हे ऋषिवृन्द! सनत्कुमार श्रावण मास की स्तुति करके और देवाधिदेव भगवान श्री सदाशिव का अपने मन में स्मरण करते हुये उन सब ऋषियों की आज्ञा लेकर अपने आश्रम को चले गये। इस अद्भुत रहस्य को आप भी हर किसी से न कहना। यह तो आप सबको उचित पात्र जानकर ही मैंने प्रकट कर दिया है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “श्रावण मास का संक्षिप्त माहात्म्य तथा उसके सुनने का फल” नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥

Leave a Reply