Siddhivinayak Chaturthi Vrat Katha – सिद्धिविनायक चतुर्थी व्रत कथा
सिद्धिविनायक चतुर्थी व्रत कथा – राजा भरत के राज्य में अनावृष्टि एवं कण्व मुनि द्वारा समाधान की कथा
मुद्गल मुनि ने प्रजापति दक्ष से कहा – “एक समय महाराजा दशरथ महामुनि ऋषि वशिष्ठ से बोले कि, ‘हे गुरुवर! हे वेदों के ज्ञाता! मैंने आपके श्रीमुख से दोनों चतुर्थी तिथियों के माहात्म्य युक्त आख्यान का श्रवण किया। तथापि हे प्रभो! पूर्वकाल में किस-किस ने इस उत्तम व्रत को किया? व्रत के फलस्वरूप उसे किस प्रकार की सिद्धि एवं सफलता प्राप्त हुयी? तथा किसने साक्षात् भगवान श्रीगणेश के दर्शन प्राप्त किये, कृपया चतुर्थी तिथि के व्रत के इन चरित्रों का विस्तृत वर्णन करने की कृपा करें।'”
मुद्गल मुनि बोले – “हे प्रजापति! दशरथ जी के इस प्रकार प्रश्न करने पर मुनिश्रेष्ठ महायोगी वशिष्ठ जी द्वारा वर्णित महाख्यान का अब तुम ध्यानपूर्वक श्रवण करो। मुनि वशिष्ठ ने राजा दशरथ से कहा कि – ‘आदिकाल में भगवान शिव सहित अन्य देवगणों ने कृष्णपक्ष एवं शुक्लपक्ष दोनों चतुर्थियों का उत्तम व्रत करते हुये साधना की थी। तदुपरान्त स्वायम्भुव आदि ने तथा विभिन्न वर्णों के मनुष्यों ने इस पवित्र व्रत का पालन किया। प्राचीनकाल में भरत नामक एक राजा थे। वे राजा दुष्यन्त के पुत्र थे। राजा भरत अत्यन्त शूरवीर, तेजस्वी तथा शस्त्र विद्या में निपुण थे। समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर उन्होंने धर्मपूर्वक सप्त-द्वीपों वाली पृथ्वी का पालन किया। एक समय दैवयोग से उनके राज्य में अत्यन्त भीषण अनावृष्टि हो गयी जिसके कारण समस्त प्रजा में शोक एवं भय व्याप्त हो गया।
सम्पूर्ण प्रजा की व्याकुलता से द्रवित होकर राजा भरत शान्तचित्त वाले कण्व मुनि की शरण में गये। भरत ने भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनकी पूजा-अर्चना की एवं करबद्ध होकर उनके सम्मुख खड़े हो गये। तब भगवान गणेश के प्रिय कण्व ऋषि राजा भरत से बोले – ‘हे राजन्! आपके यहाँ आगमन का क्या प्रयोजन है? सब कुशल-मंगल तो है? आप आसन ग्रहण कीजिये।’ करबद्ध होकर आसन ग्रहण करते हुये राजा भरत ने कहा – ‘हे महामुने! हे योगीन्द्र! आपकी कृपा से में कुशल हूँ तदपि में व्याकुल हूँ। हे भगवन्! मैंने सदैव धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन किया है, मेरे राज्य में सभी लोग वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हैं, तथापि राज्य में पाप से दुःख उत्पन्न हो गया है। मेरे राज्य में घोर अनावृष्टि हो गयी है जिसके कारण वर्षा के अभाव में पर्वत, नदी, सरोवर आदि जड़ तथा पशु, पक्षी, नर, वानर, कीट आदि चेतन सभी रसहीन हो गये हैं। हे महायोगिन्! मैं विशेष रूप से आपकी शरण में आया हूँ। आपके दर्शन से अवश्य ही मेरा भाग्योदय होगा। अतः आप मुझे वह पाप बताने की कृपा करें जिसके कारण मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया है। मैं उस पाप का शमन कर दूँगा।’
राजा भरत की व्यथा सुनकर ऋषि कण्व बोले – ‘हे राजन्! आपके राज्य में घोर पाप फैला हुआ है। उसी पाप के कारण अनावृष्टि रूपी यह दुःख प्रकट हो गया है। हे राजन्! तुम्हारा राज्य निश्चित ही चार पैरों वाले पशुओं से हीन हो जायेगा, क्योंकि सभी मनुष्यों ने अत्यन्त घोर पाप किया है। तुम्हारे राज्य में कृष्णपक्ष एवं शुक्लपक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला सर्व-सुखदायक एवं लोकप्रिय व्रत भ्रष्ट हो गया है।’
कण्व मुनि ने कहा – ‘हे राजन्! चतुर्थी व्रत करने वाले को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक यह चार प्रकार के कष्ट नहीं होते हैं। सभी कष्टों को नष्ट करने वाला वह व्रत संकष्टी चतुर्थी व्रत है, जिसको मैंने प्रत्येक माह की कृष्णपक्ष की चतुर्थी के दिन करने को कहा है। जो चार प्रकार के सुख प्रदान करती है, वह प्रत्येक माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी है। उसे मैंने वर प्रदान करने वाली माना है। धर्मग्रन्थों में जितने भी व्रत वर्णित हैं, वे सभी चतुर्थी व्रत से हीन एवं निष्फल हैं।’
महर्षि कण्व के मुख से इन वचनों को सुनकर राजा भरत बोले – ‘हे महात्मन्! आप मुझे सिद्धिदायक गणेश जी का माहात्म्य बतायें, मैं सदैव इस व्रत का पालन करूँगा।’
मुनीश्वर कण्व ने कहा – ‘हे राजन्! जो माहात्म्य भगवान ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति क्रतु ने मेरे समक्ष वर्णित किया था, ध्यानपूर्वक उसका श्रवण करो। पूर्वकाल में एक समय मैं अपने आश्रम में तपस्या में लीन बैठा था। मैं मात्र वायु का ही भोजन करते हुये निराहार होकर महान तप कर रहा था। हे राजन्! उसी समय भगवान गणेश के शिष्य, योगीन्द्रों द्वारा पूजनीय महायशा प्रजापति क्रतु मेरे आश्रम पर पधारे। भक्तवत्सल क्रतु मुझ महात्मा को प्रणाम करके एवं पूजन करके बोले – ‘हे महामते! मेरे द्वारा प्रदत्त आसन पर विराजो वत्स! आपका जो भी मनोरथ है, मुझे बताओ, मैं आपके मनोरथ को पूर्ण करूँगा।’
क्रतु जी के मधुर वचन सुनकर मैं अत्यन्त हर्षित हुआ तथा आसन स्वीकार करते हुये मैंने कहा – ‘हे दयानिधान! मैं आपके दर्शन प्राप्त कर कृत-कृत्य हूँ। तथापि आप मुझे शान्ति प्रदान करने वाले योग का वर्णन कीजिये।’
महात्मा क्रतु बोले – ‘हे वत्स! तुमने इस महान श्रेष्ठ योग के विषय में उचित प्रश्न किया है। अतः हे महाभाग! इस विषय में जो ब्रह्मा जी से मैंने श्रवण किया है उसका वर्णन मैं करता हूँ। प्राचीनकाल में हे तात! योगमार्ग में लगे हुये तथा योगभूमि का प्रसाधन करते हुये जब मुझे शान्ति प्राप्त नहीं हुयी, तो अपने सर्वज्ञाता एवं परम पूजनीय पिता ब्रह्मा जी से मैंने योग शान्ति हेतु प्रश्न किया। मैंने पूछा कि – ‘हे स्वामिन्! शान्ति प्रदान करने वाला ब्रह्म कैसा है तथा वह किस योग से प्राप्त हो सकता है? कृपया मार्गदर्शन करने की दया करें।’
ब्रह्मा जी ने कहा – ‘हे पुत्र! तुम योग की सेवा से योग की शान्ति प्रदान करने वाले भगवान गणेश को ही ब्रह्म समझो तथा मन एवं वाणी में जो भी है, उसका त्याग कर दो। वे ब्रह्म अर्थात् गणेश जी मन एवं वाणी के विषय नहीं हैं। उन्हें मन एवं वाणी से ज्ञात करना सम्भव नहीं है। मन से उनका विचार एवं वाणी से उनका बखान करना भी असम्भव है। अर्थात् वे गणेश दोनों प्रकार के हैं, क्योंकि वे मन एवं वाणी का विषय हैं भी और नहीं भी। यह गण शब्द से सिद्ध होता है। वेदों में गकार मन एवं वाणी मय तथा णकार को मन एवं वाणी से विहीन कहा गया है। उन दोनों के ही स्वामी भगवान गणेश हैं, जिनका एक नाम गणपति भी है। अतः गकार एवं णकार का योग वेदों में प्रमाणित किया गया है। हे महामते! जिस गणेश को समाधि युक्त चित्त से प्राप्त किया जा सकता है, उन्हें गकार अक्षर वाला ज्ञान समझना चाहिये तथा जो गणेश चित्त को प्राप्त नहीं हो सकते, उन्हें णकार मानना चाहिये। अतः ज्ञान एवं अज्ञानमय चित्त का त्याग करके ही शान्ति प्राप्त होगी। यही परम गुह्य एवं शान्तिदायक अर्थ मैंने तुम्हें बताया है। इसीलिये तुम भावपूर्वक गणराज की आराधना करो। हे महामते! एक अक्षर वाले महामन्त्र को ग्रहण करो, तदुपरान्त इस ध्यानयोग से श्री गणेश को निःसन्देह प्राप्त करोगे।’
ऐसा कहकर ब्रह्मा जी ने विधिपूर्वक महामन्त्र प्रदान कर दिया। हे तात! उनको प्रणाम करके मैं योग में लीन हो गया तथा मैंने अपने चित्त को भगवान गणेश के भाव में स्थित कर चिन्तामणि में पहुँचा दिया। तदुपरान्त मैं पूर्ण योगी हो गया, अपितु योगियों द्वारा भी पूजनीय हो गया तथा गणेश भक्ति की कामना से उनके ध्यान में लीन हो गया।
तदनन्तर विघ्नपति गणेश ने मुझे साक्षात् दर्शन दिया। मैंने गणेश जी की स्तुति एवं पूजा की तथा उन्होंने मुझे अपनी उत्तम भक्ति प्रदान की। उसी क्षण से मैं भगवान गणेश के मत को मानने वाला अर्थात् गाणपत्य हो गया तथा सभी के द्वारा वन्दनीय हो गया। इसीलिये तुम योग की कामना से भगवान गणेश की आराधना करो।’
कण्व बोले ऐसा कहकर महायोगी क्रतु ने मुझे एकाक्षर मन्त्र प्रदान किया तथा यथान्याय मन्त्र प्रदान कर वे अन्तर्धान हो गये। तदुपरान्त मैंने मुनीश्वर क्रतु के निर्देशानुसार गणेश साधना कर शान्ति प्राप्त कर ली, तथापि मैं अनन्यचित्त से उनका भजन करता हूँ। अतः हे नृपश्रेष्ठ भरत! तुम भी चतुर्थी व्रत सहित निरन्तर विघ्न-विनाशक गणपति का ध्यान करो, जिसके फलस्वरूप तुम भी ब्रह्मभूत हो जाओगे।’
तत्पश्चात् महामुनि कण्व ने राजा भरत को एकाक्षर मन्त्र प्रदान कर दिया। मन्त्र ग्रहण करने के उपरान्त कण्व मुनि को प्रणाम कर राजा भरत अपने नगर की ओर प्रस्थान कर गये। उसी समय शुक्ल पक्ष की भाद्री चतुर्थी तिथि आ गयी। राजर्षि भरत ने राज्य की प्रजा सहित भक्तिपूर्वक चतुर्थी व्रत का पालन किया। राजा ने सम्पूर्ण राज्य में यह घोषणा कर दी कि जो मनुष्य शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी को व्रत नहीं रखेगा तथा व्रत के अनुकूल आचरण नहीं करेगा, वह दण्ड का भागी होगा। इस घोषणा के प्रभाव से सभी मनुष्य व्रत का पालन करने लगे जिसके परिणामस्वरूप उनके राज्य में वर्षा होने लगी। उस दिव्य वर्षा के प्रभाव से सभी मनुष्य हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ एवं निरोगी हो गये तथा भगवान गणेश का भजन करने लगे। राजा भरत भी श्रद्धापूर्वक अनन्यचित्त से श्री गणेश जी का ध्यान करने लगे एवं गाणपत्य प्रिय हो गये।
कुछ समय पश्चात् राजा भरत ने अपना सम्पूर्ण राज्य अपने पुत्र को समर्पित कर दिया तथा स्वयं वन में चले गये। अन्त में राजा भरत आत्मा के आनन्द में लीन होकर ब्रह्मभूत हो गये। चतुर्थी पुण्य योग से भूलोक के सभी मनुष्यों को स्वानन्द की प्राप्ति हुयी।
वशिष्ठ मुनि ने राजा दशरथ से कहा – ‘हे राजन्! उसी समय से राजा भरत के स्पर्श मात्र से मनुष्य एवं पशु, पक्षी, कीट आदि जितने भी प्राणी थे, वे पूर्ण पुण्यरूप एवं स्वानन्दवासी हो गये। पुण्यात्मा राजा भरत ने सभी मनुष्यों को पुण्यशाली बना दिया तथा सम्पूर्ण पृथ्वी को यज्ञों से चित्रित कर दिया। हे राजन्! भरत के समान बल, यश एवं धर्म में श्रेष्ठ कोई अन्य राजा नहीं हुआ। अतः यह चतुर्थी व्रत साधना का ही पुण्यफल है। इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चारों फलों से युक्त एवं ब्रह्मभूय पद प्रदान करने वाली भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की महिमा का वर्णन मैंने किया है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के माहात्म्य का जो श्रवण अथवा पाठ करता है, उसको यह व्रत सर्वस्व प्रदान करता है।
अब मैं भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि से सम्बन्धित एक पुरातन इतिहास वर्णित करता हूँ। हे महाभाग! आप चतुर्थी व्रत के महान माहात्म्य का श्रवण कीजिये।
वशिष्ठ मुनि ने कहा कि – ‘हे राजा दशरथ! द्राविड़ नगर में एक अत्यन्त पापी, कुष्ठ रोगी, स्त्री लम्पट, चाण्डाल निवास करता था। भादों मास की चतुर्थी तिथि को वह ज्वर से पीड़ित हो गया तथा ज्वर की पीड़ा अत्यन्त तीव्र हो गयी। उसका ज्वर इतना तीव्र हो गया कि वह अन्न-जल ग्रहण करने योग्य भी नहीं रहा तथा पञ्चमी तिथि के दिन उसकी मृत्यु हो गयी। पञ्चमी को देह त्यागने के कारण वह चाण्डाल विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक को गया। उसके अङ्ग से स्पर्श करके जो वायु यमलोक में गयी, उस वायु ने जिन भी नर्कगामी प्राणियों को स्पर्श किया, वे सभी विमानारूढ़ होकर स्वानन्दपुर में चले गये। वहाँ भगवान गणपति के दर्शन कर सभी प्राणियों सहित वह चाण्डाल भी ब्रह्मभूत हो गया।
यदि कोई अज्ञानता में भी इस दिन व्रत करता है, अर्थात् किसी कारणवश भोजन नहीं करता है तो भी यह व्रत फल प्रदान करने वाला माना गया है। यदि कोई यथाविधि इस व्रत का पालन करता है, उसपर तो गणेश जी की अपार कृपा होती है। अतः इस चतुर्थी की महिमा का वर्णन करना असम्भव है। इस व्रत का पालन करने मात्र से चारों पुरुषार्थ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्राप्त होते हैं।'”
मुद्गल मुनि ने कहा – “हे प्रजापति दक्ष! महर्षि वशिष्ठ के वचन सुनकर राजा दशरथ उनसे बोले कि – ‘हे प्रभो! महाभाग! उस चाण्डाल ने तो भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति बनाकर यथाविधि पूजन नहीं किया था, हे स्वामिन् वह दोषी व्यक्ति कैसे ब्रह्मभूत हो गया।?’
वशिष्ठ मुनि बोले – ‘हे राजन्! तुमने उचित प्रश्न किया है। अतः अब सन्देह का समाधान करने वाले ज्ञान का श्रवण कीजिये। वह दुष्ट चाण्डाल तो चतुर्थी तिथि के माहात्म्य से अनभिज्ञ था। अतः न उसने पूजन किया एवं न ही उल्लङ्घन किया। इसीलिये वह दोषमुक्त था, क्योंकि वह पूजन एवं उल्लङ्घन दोनों से रहित था। वह अज्ञानी था तथा व्रत के विषय में उसे कुछ ज्ञात ही नहीं था, इसीलिये वह स्वानन्द को प्राप्त हो गया। इस प्रकार अनेकों ऐसे मनुष्य जो अज्ञानता में ही व्रत का पालन कर लेते हैं, वे भी स्वानन्दवासी होते हैं। हे राजन्! सैकड़ों वर्षों तक भी गणेश जी का माहात्म्य सङ्क्षेप में भी वर्णित करना सम्भव नहीं है।'”
॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥




