Sakat Chauth Vrat Katha – सकट चौथ व्रत कथा
सकट चौथ व्रत कथा – एक कुम्हार तथा वृद्धा के पुत्र की कथा
कालान्तर में एक गाँव में एक कुम्हार निवास करता था। वह मिट्टी के अत्यन्त सुन्दर पात्र बनाता था तथा उन्हें भट्टी में पकाकर कठोर करता था। एक वर्ष जब कुम्हार ने पात्रों को पकाने हेतु भट्टी में डाला, तो उसने देखा की अग्नि पात्रों को पकाने में सक्षम नहीं थी। कुम्हार के निरन्तर प्रयत्नों के पश्चात् भी मिट्टी के पात्र पक नहीं पा रहे थे। अन्ततः कुम्हार ने सहायता हेतु राजा से सम्पर्क किया। कुम्हार की व्यथा सुनने के पश्चात् महाराज ने राजपुरोहित से विचार-विमर्श किया तथा उनसे इस विचित्र समस्या का समाधान माँगा। राजपुरोहित ने सुझाव दिया कि प्रत्येक समय पात्रों को पकाने हेतु भट्टी तैयार करने के अवसर पर एक बालक की बलि दी जाये।
राजपुरोहित का सुझाव सुनकर, महाराज ने राज्य में यह घोषित कर दिया कि सदैव भट्टी तैयार होने के अवसर पर प्रत्येक परिवार को बलि हेतु एक बालक प्रदान करना होगा। महाराज के आदेश का पालन करने हेतु समस्त परिवारों ने एक-एक करके अपनी एक सन्तान को देना आरम्भ कर दिया।
कुछ दिवस पश्चात् एक वृद्ध स्त्री की बारी आयी, जिसका एक ही पुत्र था। उस दिन सकट चौथ का पर्व था। उस वृद्ध स्त्री के कुटम्ब में उसका पुत्र ही उसके अन्तिम क्षणों का एकमात्र सहायक था। महाराज के आदेश की अवेहलना नहीं की जा सकती थी। वृद्ध स्त्री इस विचार से भयभीत थी की सकट के शुभः अवसर पर उसकी एकमात्र सन्तान का वध कर दिया जायेगा।
वह वृद्ध स्त्री, सकट माता की अनन्य भक्त थी। अतः उसने अपने पुत्र को प्रतीकात्मक सुरक्षा कवच के रूप में सकट की सुपारी तथा “दूब का बीड़ा” दिया। वृद्ध स्त्री ने अपने पुत्र से भट्टी में प्रवेश करते समय सकट देवी की प्राथना करने को कहा तथा यह विश्वास दिलाया कि सकट माता की कृपा से यह वस्तुयें भट्टी की अग्नि से उसकी रक्षा करेंगी।
बालक को भट्टी में बैठाया गया। उसी समय वृद्ध स्त्री ने अपने एकमात्र पुत्र की रक्षा हेतु देवी सकट की आराधना आरम्भ कर दी। भट्टी में अग्नि दहन करने के पश्चात् उसे आगामी दिनों में तैयार होने हेतु छोड़ दिया गया।
जिस भट्टी को पकने में अनेक दिनों का समय लगता था, सकट देवी की कृपा से वह एक रात्रि में ही तैयार हो गयी। अगले दिन जब कुम्हार भट्टी का निरीक्षण करने आया तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने ने पाया कि उस वृद्ध स्त्री का पुत्र तो जीवित एवं सुरक्षित है ही, अपितु वह समस्त बालक भी पुनः जीवित हो चुके थे जिनकी बलि भट्टी तैयार करने से पूर्व दी गयी थी।
इस घटनाक्रम के पश्चात् समस्त नगरवासियों ने सकट माता की शक्तियों एवं उनके करुणामय स्वभाव की महिमा को स्वीकार कर लिया। सकट माता के प्रति अटूट निष्ठा व अखण्ड विश्वास हेतु नगरवासियों ने उस बालक व उसकी माँ की अत्यधिक प्रसंशा की। सकट चौथ पर्व सकट देवी के प्रति आभार प्रकट करने हेतु मनाया जाता है। इस अवसर पर मातायें सकट माता की पूजा-अर्चना करती हैं एवं अपनी सन्तानों की समस्त प्रकार की अप्रिय घटनाओं से रक्षा हेतु माता से प्रार्थना करती हैं।
सकट चौथ की अन्य व्रत कथा – देवरानी जेठानी की कथा
प्राचीनकाल का वृतान्त है, एक देवरानी एवं जेठानी थी। उनके पति सगे भाई थे। यद्यपि दोनों भाई एक ही परिवार से थे, तथापि बढ़ा भाई अत्यन्त धनवान एवं छोटा भाई अत्यन्त निर्धन था। छोटा भाई लकड़ी बेचकर अपना जीवन-यापन करता था, जो कि रसोई के लिये प्रयोग की जाती थीं।
छोटे भाई की पत्नी भगवान गणेश की परम भक्त थी तथा प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी व्रत का पालन करती थी। अपने कुटुम्ब का पालन-पोषण करने हेतु वह बड़ी भाभी के घर में कार्य भी करती थी।
एक समय की बात है, सकट चौथ के दिन देवरानी के पास पकाने को कुछ भी नहीं था। इसीलिये उसने अपनी भाभी के घर पर कठिन परिश्रम से कार्य किया ताकि सकट चौथ के शुभ अवसर पर उसे कुछ धन प्राप्त हो जाये। परन्तु जेठानी ने पूजा के दिन पारिश्रमिक देने से मना कर दिया तथा कहा कि पूजा के अगले दिन ही देवरानी को पारिश्रमिक देगी। देवरानी थकी-हारी खाली हाथ घर लौट आयी। इस अन्याय से भगवान गणेश जेठानी भाभी पर कुपित हो गये।
सन्ध्याकाल में जब देवरानी का पति काम से लौटा, तो पत्नी भोजन परोसने में असमर्थ थी। पति भी क्रोधित था क्योंकि सकट चौथ के दिन किसी ने भी लकड़ियाँ क्रय नहीं की थीं। भोजन न पकाने के कारण पति ने क्रोध में पत्नी की पिटाई कर दी। वह दुखी पत्नी बिना भोजन करे ही शयन करने चली गयी।
रात्रि के समय भगवान गणेश स्वयं उसके घर आये। जब उन्होंने द्वार खोलने को कहा, तो उसे प्रतीत हुआ कि यह उसका स्वप्न है। देवरानी ने कहा – “हमारे घर में ताले लगाने जैसा कुछ है ही नहीं, सभी द्वार खुले हैं, आप आ जाइये।” भगवान गणेश ने घर में प्रवेश किया तथा देवरानी से भोजन माँगा। देवरानी ने कहा – “सुबह बथुआ पकाया था, वही चूल्हे पर रखा है, आप ग्रहण कर लीजिये।” गणेश जी ने बथुआ का सेवन करने के उपरान्त कहा कि वे शौच करना चाहते हैं। देवरानी ने उत्तर दिया – “घर के पाँचों स्थान, अर्थात् चारों कोने एवं द्वार आपके लिये खुले हैं।” तदुपरान्त भगवान गणेश ने पोंछने के लिये कुछ माँगा। भूखी एवं क्रोधित देवरानी ने कहा – “आप मेरे मस्तक का ही उपयोग कर लीजिये।”
अगले दिन जब वह देवरानी उठी, तो देखा कि उसका माथा, घर के चारों कोने तथा प्रवेश द्वार आदि सभी स्थान बहुमूल्य हीरे, स्वर्ण तथा आभूषण आदि से भरे हुये हैं। तब उसे बोध हुआ कि यह सपना नहीं था, वास्तव में भगवान गणेश स्वयं उसके कुटुम्ब को आशीर्वाद प्रदान करने हेतु पधारे थे। तदुपरान्त वह इस अथाह धन को तौलने हेतु अपनी भाभी के घर तराजू माँगने गयी।
बड़ी भाभी ने तराजू के नीचे गोंद लगा दी थी। जब जेठानी ने तराजू लौटाया, तो उस पर कुछ आभूषण चिपक गये थे जिससे जेठानी को सत्य ज्ञात हो गया। जेठानी के बारम्बार विनती करने पर देवरानी ने अपने घर पर गणेश जी के आगमन का सम्पूर्ण प्रकरण जेठानी के समक्ष वर्णित कर दिया।
तत्पश्चात् देवरानी की भाँति ही धन-सम्पदा प्राप्त करने हेतु जेठानी ने देवरानी के घर में काम करना आरम्भ कर दिया। अगले वर्ष, जेठानी ने भी वही प्रक्रिया दोहराई जो देवरानी ने की थी, यहाँ तक कि सकट चौथ के दिन जेठानी ने पति से स्वयं की पिटाई भी करवायी ताकि वैसा ही फल प्राप्त हो जैसा देवरानी को हुआ था। सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, किन्तु धन-सम्पदा के स्थान पर सम्पूर्ण घर में मल एवं दुर्गन्ध फैल गयी थी। जेठानी द्वारा नाना प्रकार से स्वच्छ करने पर भी वह मल नहीं हट रहा था। पण्डितों ने सलाह दी कि यदि जेठानी अपनी सम्पत्ति को देवरानी के साथ समान भाग में बाँट ले, तो गणेश जी के श्राप का शमन हो सकता है।
जेठानी ऐसा ही किया, परन्तु गन्ध एवं मल नहीं हटा। तदनन्तर यह ज्ञात हुआ कि जेठानी ने एक हार देवरानी से साझा नहीं किया था। जेठानी द्वारा हार देने के उपरान्त भगवान गणेश का श्राप पूर्णतः समाप्त हो गया।
इस कथा का श्रवण करने के उपरान्त भक्तगण देवरानी की भाँति कृपा व आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु भगवान गणेश से प्रार्थना करते हैं।




