Rahu-Ketu Saturday Vrat Katha - राहु-केतु शनिवार व्रत कथा
व्रत कथा

Rahu-Ketu Saturday Vrat Katha – राहु-केतु शनिवार व्रत कथा

Rahu-Ketu Saturday Vrat Katha – राहु-केतु शनिवार व्रत कथा

राहु-केतु शनिवार व्रत कथा – धनसेन नामक राजा की सन्तति पर अल्पायु दोष के निवारण की कथा

एक समय का प्रकरण है। अवन्ती नगरी में धनसेन नामक एक क्षत्रिय राजा राज्य करता था। धनसेन अत्यन्त प्रतापी, धर्मनिष्ठ एवं प्रजा-पालक था, किन्तु उसके जीवन में एक अत्यन्त विकट व्यथा थी। उसके चार पुत्र हुये तथा चारों ही पुत्र अल्पायु में असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो गये थे। राजा-रानी ने अनेक तीर्थ यात्रायें, दान, यज्ञ, ग्रह-शान्ति आदि प्रयास किये, किन्तु सन्तान की रक्षा का कोई समाधान प्राप्त नहीं हुआ।

एक दिन संयोगवश नगर में एक अत्यन्त सिद्ध योगी का आगमन हुआ। उन योगी महाराज की दृष्टि तपोदीप्त थी। राजा ने विनम्रतापूर्वक अपने जीवन की पीड़ा उनके समक्ष रखी। योगी ध्यानमग्न हुये तथा बोले – “हे राजन्! कालान्तर में तेरे पूर्वजों द्वारा नागों का अपमान हुआ था। राहु एवं केतु दोनों तुझ पर एवं तेरे वंश पर क्रुद्ध हैं। जब तक उनका शमन नहीं होगा, सन्तान को दीर्घायु नहीं मिल सकती।” योगी महाराज के वचनों को सुनकर राजा ने अत्यन्त चिन्तित होते हुये पूछा – “हे योगिराज्! कृपा करके इस समस्या के समाधान हेतु हमारा मार्गदर्शन करें।”

योगी महाराज ने कहा – “शनिवार के दिन राहु-केतु की पूजा कर उन्हें तृप्त एवं प्रसन्न कर। यह व्रत सात शनिवार तक पूर्ण श्रद्धा से कर। नागों को दूध अर्पित कर, काले तिल एवं उड़द का दान कर तथा काले कुत्ते को रोटी खिला। इस प्रकार व्रत करने से तेरे कुल पर लगे छाया ग्रहों का दोष शान्त हो जायेगा। राहु-केतु शनिवार व्रत जीवन के अन्धकारमय काल को प्रकाशित करने वाला व्रत है। श्रद्धा, संयम, क्षमा तथा सत्कर्मों सहित यह व्रत करने से कर्मजन्य दोषों की भी शान्ति सम्भव है। जो भक्त इस व्रत को विधिपूर्वक करता है, उसे मानसिक स्थिरता, आरोग्य तथा जीवन में अदृश्य शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है।”

राजा-रानी ने योगी जी के निर्देशानुसार श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन किया। उन्होंने राहु-केतु की मूर्ति स्थापित कर शनिवार का व्रत किया, काले वस्त्र धारण किये, तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित कर राहु-केतु के मन्त्रों का जाप किया। 7वें शनिवार को राहु-केतु ने स्वप्न में आकर राजा को दर्शन दिया तथा कहा – “हे राजन्! हम तुमसे प्रसन्न हैं। अब तेरे कुल में कोई बाधा नहीं आयेगी। तेरा वंश दीर्घायु एवं तेजस्वी होगा। जो कोई यह व्रत करेगा, उसे भी हमारी कृपा प्राप्त होगी।”

कालान्तर में व्रत के पुण्य प्रभाव से धनसेन को पाँचवें पुत्र की प्राप्ति हुयी। वह पुत्र दीर्घायु था तथा भविष्य में एक महान पराक्रमी सम्राट बना। व्रत की महिमा से प्रेरित होकर सम्पूर्ण प्रजा भी इस व्रत को करने लगी तथा इस प्रकार राहु-केतु के अशुभ प्रभाव से सुरक्षा का यह व्रत जन साधारण में लोकप्रिय हो गया।

राहु एवं केतु केवल भय के प्रतीक नहीं, अपितु कार्मिक सन्तुलन एवं अध्यात्म का माध्यम हैं। इनकी तामसिक ऊर्जा को पूजन, व्रत तथा दान के द्वारा शान्त किया जाता है, जिसके फलस्वरूप जीवन में आ रही समस्याओं का समाधान होता है। शनिवार, भगवान शनिदेव का भी दिन है, छाया ग्रहों की शान्ति हेतु इसे सर्वोत्तम दिवस माना जाता है।

Rahu-Ketu Saturday Vrat Katha – राहु-केतु शनिवार व्रत कथा

राहु-केतु शनिवार व्रत कथा – धनसेन नामक राजा की सन्तति पर अल्पायु दोष के निवारण की कथा

एक समय का प्रकरण है। अवन्ती नगरी में धनसेन नामक एक क्षत्रिय राजा राज्य करता था। धनसेन अत्यन्त प्रतापी, धर्मनिष्ठ एवं प्रजा-पालक था, किन्तु उसके जीवन में एक अत्यन्त विकट व्यथा थी। उसके चार पुत्र हुये तथा चारों ही पुत्र अल्पायु में असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो गये थे। राजा-रानी ने अनेक तीर्थ यात्रायें, दान, यज्ञ, ग्रह-शान्ति आदि प्रयास किये, किन्तु सन्तान की रक्षा का कोई समाधान प्राप्त नहीं हुआ।

एक दिन संयोगवश नगर में एक अत्यन्त सिद्ध योगी का आगमन हुआ। उन योगी महाराज की दृष्टि तपोदीप्त थी। राजा ने विनम्रतापूर्वक अपने जीवन की पीड़ा उनके समक्ष रखी। योगी ध्यानमग्न हुये तथा बोले – “हे राजन्! कालान्तर में तेरे पूर्वजों द्वारा नागों का अपमान हुआ था। राहु एवं केतु दोनों तुझ पर एवं तेरे वंश पर क्रुद्ध हैं। जब तक उनका शमन नहीं होगा, सन्तान को दीर्घायु नहीं मिल सकती।” योगी महाराज के वचनों को सुनकर राजा ने अत्यन्त चिन्तित होते हुये पूछा – “हे योगिराज्! कृपा करके इस समस्या के समाधान हेतु हमारा मार्गदर्शन करें।”

योगी महाराज ने कहा – “शनिवार के दिन राहु-केतु की पूजा कर उन्हें तृप्त एवं प्रसन्न कर। यह व्रत सात शनिवार तक पूर्ण श्रद्धा से कर। नागों को दूध अर्पित कर, काले तिल एवं उड़द का दान कर तथा काले कुत्ते को रोटी खिला। इस प्रकार व्रत करने से तेरे कुल पर लगे छाया ग्रहों का दोष शान्त हो जायेगा। राहु-केतु शनिवार व्रत जीवन के अन्धकारमय काल को प्रकाशित करने वाला व्रत है। श्रद्धा, संयम, क्षमा तथा सत्कर्मों सहित यह व्रत करने से कर्मजन्य दोषों की भी शान्ति सम्भव है। जो भक्त इस व्रत को विधिपूर्वक करता है, उसे मानसिक स्थिरता, आरोग्य तथा जीवन में अदृश्य शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है।”

राजा-रानी ने योगी जी के निर्देशानुसार श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन किया। उन्होंने राहु-केतु की मूर्ति स्थापित कर शनिवार का व्रत किया, काले वस्त्र धारण किये, तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित कर राहु-केतु के मन्त्रों का जाप किया। 7वें शनिवार को राहु-केतु ने स्वप्न में आकर राजा को दर्शन दिया तथा कहा – “हे राजन्! हम तुमसे प्रसन्न हैं। अब तेरे कुल में कोई बाधा नहीं आयेगी। तेरा वंश दीर्घायु एवं तेजस्वी होगा। जो कोई यह व्रत करेगा, उसे भी हमारी कृपा प्राप्त होगी।”

कालान्तर में व्रत के पुण्य प्रभाव से धनसेन को पाँचवें पुत्र की प्राप्ति हुयी। वह पुत्र दीर्घायु था तथा भविष्य में एक महान पराक्रमी सम्राट बना। व्रत की महिमा से प्रेरित होकर सम्पूर्ण प्रजा भी इस व्रत को करने लगी तथा इस प्रकार राहु-केतु के अशुभ प्रभाव से सुरक्षा का यह व्रत जन साधारण में लोकप्रिय हो गया।

राहु एवं केतु केवल भय के प्रतीक नहीं, अपितु कार्मिक सन्तुलन एवं अध्यात्म का माध्यम हैं। इनकी तामसिक ऊर्जा को पूजन, व्रत तथा दान के द्वारा शान्त किया जाता है, जिसके फलस्वरूप जीवन में आ रही समस्याओं का समाधान होता है। शनिवार, भगवान शनिदेव का भी दिन है, छाया ग्रहों की शान्ति हेतु इसे सर्वोत्तम दिवस माना जाता है।

॥इति श्री राहु-केतु शनिवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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