Bhairav ​​Sunday Vrat Katha - भैरव रविवार व्रत कथा
व्रत कथा

Bhairav ​​Sunday Vrat Katha – भैरव रविवार व्रत कथा

Bhairav ​​Sunday Vrat Katha – भैरव रविवार व्रत कथा

भैरव रविवार व्रत कथा – भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी के मध्य विवाद की कथा

एक बार सुमेरु पर्वत पर विराजमान भगवान ब्रह्मा के समक्ष देवताओं ने उनसे अविनाशी तत्व का वर्णन करने का अनुरोध किया। भगवान शिव की माया से मोहित ब्रह्माजी उस तत्व के विषय में कुछ ज्ञात न होते हुये भी इस प्रकार कहने लगे – “मैं ही इस सृष्टि को उत्पन्न करने वाला स्वयम्भू, ईश्वर, अजन्मा तथा परब्रह्म हूँ। मैं ही प्रवृत्ति एवं निवृत्ति का आधार हूँ तथा मैं ही परम तत्व हूँ।” ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर वहाँ उपस्थित भगवान विष्णु ने उन्हें समझाते हुये कहा कि – “हे ब्रह्मा! मेरी ही आज्ञा से तो तुम सृष्टि सृजन का कार्य करने हेतु रचयिता बने हो। अतः केवल अपने प्रभुत्व का बखान कर मेरा अपमान क्यों कर रहे हो?”

इस प्रकार भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी के मध्य स्वयं का प्रभुत्व सिद्ध करने हेतु विवाद होने लगा। दोनों ही स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने हेतु अपने कथन के समर्थन में वेदवाक्यों का उदाहरण देने लगे। उसी समय चारों वेद वहाँ मूर्तिमान स्वरूप में उपस्थित हो गये।

सर्वप्रथम ऋग्वेद ने कहा – “जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं, जिससे समस्त चराचर प्रवृत्त होता है तथा जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह एक मात्र रुद्र ही हैं।” तदुपरान्त यजुर्वेद ने कहा – “जिसके द्वारा वेद भी प्रमाणित होते हैं, जिन्हें सम्पूर्ण यज्ञों तथा योगों द्वारा स्मरण किया जाता है, वे सर्वदृष्टा भगवान शिव ही हैं।” सामवेद ने कहा – “जो समस्त संसारी जनों को विस्मृति करते हैं, जिन्हें योगी जन खोजते हैं तथा जिनके तेज से सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है, वे एक त्र्यम्बक शिव ही हैं।” अथर्ववेद ने कहा – “जिसकी भक्ति से साक्षात्कार होता है तथा जो सभी प्रकार के सुख-दुःख से रहित हैं, जो साक्षात् ब्रह्म हैं, वे मात्र एक भगवान शङ्कर ही हैं।”

वेदों के इन वचनों का श्रवण कर भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी ने कहा – “वेदों! यह मात्र तुम्हारी अज्ञानता है। निरन्तर शिवा से रमण करने वाले, नग्न रहने वाले, वृपन वाही, निःसङ्ग, भस्म एवं धूलि-धूसरित शिव को भला परम तत्व कैसे कह सकते हैं?” ब्रह्मा एवं विष्णु जी के मध्य इस विवाद को सुनकर ओंकार ज्योति ने कहा – “भगवान शिव ही नित्य एवं सनातन परब्रह्म हैं। वे लीलाधर हैं अतः विभिन्न लीलायें करते रहते हैं। किन्तु निःसन्देह वे ही परमात्मा हैं।” परन्तु शिव माया से मोहित ब्रह्मा-विष्णु की मति परिवर्तित नहीं हुयी।

उसी समय उन दोनों के मध्य एक अनादि एवं अनन्त विशाल ज्योति प्रकट हुयी। उस ज्योति के तेज से ब्रह्माजी का पञ्चम सिर जलने लगा। उसी समय त्रिशूलधारी नील-लोहित भगवान शिव वहाँ प्रकट हुये। अज्ञानतावश ब्रह्मा जी उन्हें अपनी शरण में आने को कहने लगे।

ब्रह्मा के अपमानजनक वचनों को सुनकर शिवजी अत्यन्त कुपित हो उठे। उनके इस अत्यन्त तीव्र क्रोध से भैरव नामक एक पुरुष उत्पन्न हुआ। भगवान शिव ने भैरव से कहा – “भैरव! तुम ब्रह्मा पर शासन करो तथा सृष्टि का पालन करो। तुम साक्षात् काल के समान हो अतः तुम कालभैरव के रूप में पूजे जाओगे। हे कालराज! मुक्ति प्रदायनी काशीपुरी समस्त पुरियों में श्रेष्ठतम है। मैं सदैव के लिये तुम्हें काशीपुरी का अधिपति घोषित करता हूँ। उस पुरी में जो भी पापी होंगे तुम उनको सूचिबद्ध करोगे।”

भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हुये भैरव ने अपनी बायीं अँगुली के नखाग्र से ब्रह्माजी का पञ्चम सिर काट डाला। ब्रह्मा जी अत्यन्त भयभीत हो गये तथा शतरुद्री का पाठ करते हुये शिवजी के शरणागत हो गये। ब्रह्मा एवं विष्णु दोनों को सत्य का भान हो गया तथा वे दोनों भगवान शिव का गुणगान करने लगे। यह देख शिवजी का क्रोध शान्त हुआ तथा उन्होंने दोनों देवों को अभयदान दिया।

भीषण स्वरूप होने के कारण भैरव, काल को भी भयभीत करने वाले – कालभैरव कहलाये, तथा भक्तों के पापों को तत्क्षण नष्ट करने के कारण पापभक्षक के नाम से समस्त लोकों में प्रतिष्ठित हुये। भगवान शिव के कथनानुसार वे काशीपुरी के अधिपति बन गये।

तदुपरान्त भगवान शिव ने कहा कि – “भैरव तुम इन ब्रह्मा-विष्णु का सम्मान करते हुये ब्रह्मा के कपाल को धारण करके इसी के आश्रय से भिक्षावृत्ति करते हुये वाराणसी चले जाओ। वहाँ उस नगरी के प्रभाव से तुम ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे।”

शिवजी की आज्ञा से भैरव जी ने हाथ में कपाल लेकर ज्योंही काशी की ओर प्रस्थान किया, ब्रह्महत्या उनके पीछे-पीछे चलने लगी। विष्णु जी ने ब्रह्महत्या से स्वयं को उनकी माया से मोहित न होने का वरदान माँगा। विष्णु जी ने ब्रह्महत्या से भैरव जी का पीछा करने का कारण पूछा तो ब्रह्महत्या ने कहा कि – “मैं स्वयं की पवित्रता एवं मुक्ति हेतु भगवान भैरव का अनुसरण कर रही हूँ।”

काशी पधारते ही भैरव जी के हाथ से चिमटा एवं कपाल छूटकर पृथ्वी पर गिर गया। तब से वह स्थान कपालमोचन तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। धर्मग्रन्थों के अनुसार इस तीर्थ में सम्पूर्ण विधि-विधान से पिण्डदान एवं देव-पितृ तर्पण आदि करने से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से निवृत्त हो जाता है। इस प्रकार भगवान शिव ने सृष्टि के कल्याणार्थ भैरव जी को प्रकट किया था। भैरव जी की इस कथा का पाठ भैरव रविवार व्रत के दिन किया जाता है।

॥इति श्री भैरव रविवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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