रवि प्रदोष व्रत की कथा श्रवण करने के पश्चात् शौनकादि ऋषि ने कहा - "हे मुनिश्रेष्ठ सूतजी! अब आप हमें सोम त्रयोदशी प्रदोष की कथा सुनाने की कृपा करें।"
प्राचीन काल में एक समय ऋषियों ने भागीरथी के पवित्र तट पर एक विशाल गोष्ठी का आयोजन किया।
हे गुरुवर! मलमास में जो वरदायक चतुर्थी आती है, उसके सिद्धिदायक माहात्म्य का वर्णन करने की कृपा करें।
हे मुनिवर! मैं अभी भी कथामृत का पान कर तृप्त नहीं हुआ हूँ। अतः कृपया अब आप फाल्गुन शुक्लपक्ष चतुर्थी का माहात्म्य वर्णित करने की कृपा करें।
राजा दशरथ ने ऋषि वशिष्ठ से कहा - "हे महायोगिन्! चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का श्रवण करके मुझे अत्यन्त आनन्द एवं प्रसन्नता हो रही है।
हे मुनिश्रेष्ठ! आपने मार्गशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के व्रत का वर्णन किया। हे गुरुश्रेष्ठ! आपके वर्णन से मैं पूर्णतः सन्तुष्ट हो गया हूँ।
हे मुनिवर! भगवान गणेश की कथा श्रवण करके मेरा मन आनन्दित हो रहा है। अतः है महामुने! मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष चतुर्थी के विषय में वर्णन करने की कृपा करें।
वशिष्ठ मुनि ने राजा दशरथ से कहा - "हे राजन्! कार्तिक शुक्ल चतुर्थी सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली है। हे महाभाग!
वशिष्ठ मुनि ने राजा दशरथ से कहा कि - "हे राजन्! आश्विन शुक्लपक्ष चतुर्थी वर-प्रदायक मानी गयी है।
एक समय महाराजा दशरथ महामुनि ऋषि वशिष्ठ से बोले कि, 'हे गुरुवर! हे वेदों के ज्ञाता! मैंने आपके श्रीमुख से दोनों चतुर्थी तिथियों के माहात्म्य युक्त आख्यान का श्रवण किया।


