Gauri Ganesh Chaturthi Vrat Katha – गौरीगणेश चतुर्थी व्रत कथा
गौरीगणेश चतुर्थी व्रत कथा – सोम नामक राजा के राज्य में पड़े अकाल एवं उससे मुक्ति की कथा
राजा दशरथ ने ऋषि वशिष्ठ से कहा – “हे महायोगिन्! चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का श्रवण करके मुझे अत्यन्त आनन्द एवं प्रसन्नता हो रही है। जिस प्रकार अमृतपान करने से तृप्ति नहीं होती उसी प्रकार चतुर्थी व्रत की महिमा का श्रवण कर मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ! मनुष्यों को सुख प्रदान करने वाली माघ शुक्ल चतुर्थी के श्रेष्ठ माहात्म्य का वर्णन करने की कृपा करें।”
वशिष्ठ मुनि ने कहा – “हे राजन्! माघ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन भगवान गणेश ऋषि कश्यप के घर में साक्षात् अंगार युक्त रूप में अवतरित हुये थे। अब मैं इस व्रत से सम्बन्धित एक पुरातन इतिहास का वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवण से सभी सुखों की प्राप्ति होती है।”
कथा आरम्भ करते हुये वशिष्ठ मुनि कहते हैं – “कर्णाटक राज्य की भानुपूरी नगरी में एक अत्यन्त धर्मात्मा एवं पराक्रमी राजा शासन करते थे। उनका नाम सोम था। राजा सोम सदैव देवताओं, ब्राह्मणों एवं अतिथियों का सम्मान करते थे तथा नीतिपूर्वक राज्य करते थे। वे शस्त्र विद्या में दक्ष थे तथा वीरता एवं साहस से राज्य की रक्षा करते थे। उन्होंने समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर अपने सौराज्य की स्थापना की थी। राजा सोम की एक धर्मपत्नी भी थी, जिनका नाम यशोवती था। यशोवती परम पतिव्रता, दानशील, रूपवती तथा धर्माचरण का पालन करने वाली थी।
राजा सोम के श्रेष्ठ शासन करने पर भी एक समय दीर्घकाल तक राज्य में वर्षा नहीं हुयी। वर्षा न होने के कारण राजा अत्यन्त दुखी हुये। इस अनावृष्टि के निवारण हेतु राजा सोम शौनक मुनि के समीप वन में गये। शौनक मुनि वन में निवास कर गणेश जी की भक्ति में लीन रहते थे। महावन में ऋषि के आश्रम पर पहुँचकर राजा ने शौनक ऋषि को साष्टाङ्ग प्रणाम किया तथा करबद्ध निवेदन करते हुये ऋषिवर से कहा – ‘हे मुनिश्रेष्ठ! आपका दर्शन पाकर मेरे जन्म एवं कर्म आदि सब कृत-कृत्य हो गये। आपको कोटि-कोटि नमन है।’
राजा के ऐसा कहने पर ऋषि शौनक ने कहा – ‘हे राजन्! हे महाभाग! आपके इस दुर्गम वन में आगमन का क्या कारण है? आप निश्चिन्त होकर अपना मनोरथ मुझसे कहिये।’
तब राजा सोम बोले – ‘हे ऋषिवर! कर्णाटक में भानुपूरी नामक नगरी है। मैं वहाँ का राजा हूँ तथा धर्मपूर्वक शासन कर रहा हूँ। किन्तु हे भगवन! दीर्घकाल से मेरे राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। अतः मैं अनावृष्टि रूपी इस सङ्कट से व्यथित हूँ। यद्यपि मैंने धर्म, नीति एवं न्यायपूर्वक राज्य का पालन किया है, तथापि ज्ञात नहीं क्यों एवं किस पापयोग के कारण प्रजा सहित मुझे भी यह कष्ट प्राप्त हुआ है। अतः हे महामुने! आप परम योगीश्वर हैं, कृपया मुझे इस दुःख के निवारण का कोई मार्ग बताने की कृपा करें, मैं आपकी शरण में हूँ।’
राजा सोम के इन करुण वचनों को सुनकर शौनक मुनि ने कहा – ‘हे राजन्! ध्यानपूर्वक श्रवण करो, तुम्हारे राज्य में घोर महापाप हुआ है। उस पाप के फलस्वरूप राज्य के सभी मनुष्य रोगी एवं वन्ध्यता दोष से युक्त हो गये हैं। उसी पाप के कारण अनावृष्टि रूपी यह आपदा तुम्हारे राज्य पर आयी है। हे अधम राजन्! तुम्हारे राज्य में चतुर्थी व्रत का लोप हो गया है जो प्रत्येक माह के शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष चतुर्थी पर किया जाता है। इस व्रत के अभाव में आप सहस्रों वर्षों तक भी सुख प्राप्त नहीं कर पायेंगे। अतः हे राजन! आप यत्नपूर्वक इस लोकप्रिय व्रत का पालन कीजिये। इस व्रत के पुण्यफल से ही आपके राज्य में वर्षा होनी सम्भव है।’
ऐसा कहकर शौनक मुनि ने राजा के समक्ष चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन किया। माहात्म्य का श्रवण कर राजा विस्मित होकर मुनिवर से बोले – ‘हे ब्रह्मन्! भगवान गणेश के शान्ति-प्रदायक स्वरूप का वर्णन करने की कृपा करें।’
शौनक मुनि बोले – ‘हे नृपश्रेष्ठ! पूर्वकाल में मैं अपने आश्रम में अन्तर्निष्ठ भाव से तपस्या कर रहा था। तपस्या करते हुये मैं ब्रह्म के चिन्तन में लीन था। तदनन्तर मुझपर कृपा करने हेतु सभी योगियों के मूल महायोगी, भृगु ऋषि मेरे आश्रम में पधारे। उनका दर्शन होते ही तत्क्षण उठकर मैंने उन्हें प्रणाम किया तथा आसन प्रदान करके श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा की। तदुपरान्त करबद्ध होकर मैं उनके सम्मुख खड़ा हो गया।
मुझे इस प्रकार खड़ा देख महामुनि भृगु बोले – ‘हे तात! क्या योग में तुम्हारी निष्ठा है? क्या तुम शान्ति प्राप्त करने के इच्छुक हो? तुम्हारी क्या कामना है? वह मुझसे कहो। तुम्हारी जो भी इच्छा हो वह मैं तुम्हें प्रदान करूँगा। हमारे कुल में तुम सभी प्रकार के सद्गुणों से युक्त हो, इसीलिये मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। अतः तुम मनोवाञ्छित वर माँगों।’
तपोनिधि भृगु जी के वचनों को श्रवण कर मैंने प्रसन्नतापूर्वक कहा – ‘हे महामुने! कृपया मुझे योगशान्ति प्रदान करने वाले पूर्णयोग का ज्ञान प्रदान करें। आपकी कृपा से यह ज्ञान प्राप्त करके मैं पूर्णतः तृप्त हो जाऊँगा।’
महर्षि भृगु ने कहा – ‘हे तात शौनक! तुम शान्तिमय योग को जानो तथा विधि-विधान से ब्रह्मनायक गणेश का भजन करो। ऐसा करने से तुम्हें अवश्य ही शान्ति प्राप्त होगी। हे तात! चित्त पाँच प्रकार का है एवं वहाँ चिन्तामणि स्थित है। हे पुत्र! उसे जानकर ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि ब्रह्मभूत हो गये। चित्त अथवा मन से जो ज्ञान होता है, उसमें मोह प्रवृत्त होता है। अतः मोह उत्पन्न करने वाले चित्त को त्यागकर स्वयं चिन्तामणि हो जाओ। यह चित्त मन एवं वाणीमय है तथा मन एवं वाणी से रहित भी है। इस प्रकार के चित्त का त्याग करके तुम सुखी हो जाओ।’ ऐसा कहकर महायोगी भृगु ने निम्नोक्त मन्त्र मुझे प्रदान किया तथा अन्तर्धान हो गये।’
गणानां त्वा गं हवामहे कवीं कवीनामुपश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मस्पत आ नः शृण्वत्रूतिभिः सीद सादनम्॥
अब शौनक मुनि ने राजा सोम से कहा – ‘हे राजन्! जब से महर्षि भृगु ने चित्त को नियन्त्रित करने का प्रयास करते हुये श्री गणेश का ध्यान एवं भजन करने का उपदेश दिया, उसी समय से मैं योग द्वारा भगवान गणेश की वन्दना कर रहा हूँ तथा गणपति की कृपा से ही मैं उन गणपति का भजन करता हूँ। तदुपरान्त भगवान गणेश मुझे वर प्रदान करने हेतु प्रकट हुये तथा उन्होंने मुझे गाणपत्य कर दिया। अर्थात् उस क्षण से मैंने गाणपत्य धर्म स्वीकार कर लिया।’
इस प्रकार वृत्तान्त वर्णित कर शौनक मुनि ने राजा सोम को ‘गणानां त्वा गं हवामहे’ यह मनुमन्त्र प्रदान कर दिया। तदुपरान्त राजा सोम ने शौनक मुनि को प्रणाम किया तथा उनकी आज्ञा लेकर अपने राज्य में आ गये। तदनन्तर माघ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी आने पर राजा ने सम्पूर्ण प्रजा सहित चतुर्थी व्रत का श्रेष्ठ अनुष्ठान किया।
हे राजन्! दशरथ! तत्पश्चात् राजा सोम एवं उसकी प्रजा ने सम्पूर्ण भूलोक पर माघ मास के शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन किया। व्रत के पुण्यफल से उस राज्य में वर्षा होने लगी, जिससे सभी मनुष्य हर्षित हुये एवं गणेश जी का भजन करने लगे। राजा सोम के हृदय में भी गणेश जी के प्रति इतनी श्रद्धा एवं प्रेम उत्पन्न हो गया कि उन्होंने भव्य गणेश मन्दिर का निर्माण करवाया। राजा ने उस मन्दिर में अत्यधिक धन निवेश कर गणेश जी की बहुमूल्य मूर्ति की स्थापना की तथा वरद नामक गणेश जी की नित्य आराधना करने लगे। राजा ने पुत्र-पौत्रादि सहित श्रेष्ठ रूप से शासन किया। सम्पूर्ण प्रजा सुख एवं आनन्द से युक्त हो गयी तथा सभी के रोग एवं सन्तानहीनता का भी निवारण हो गया। राजा सोम ने भगवान गणेश का भजन करते हुये निष्ठापूर्वक राजधर्म का पालन किया तथा अन्त समय में वे प्रजा सहित स्वानन्द में गणेश जी का दर्शन प्राप्त कर ब्रह्मभूत हो गये।”
ऋषि वशिष्ठ राजा दशरथ से कहते हैं कि – “हे राजन्! इस प्रकार माघ शुक्ल चतुर्थी का पुरातन इतिहास का वर्णन मैंने किया है, अब तुम इस व्रत से सम्बन्धित एक अन्य माहात्म्य चरित्र का श्रवण करो। कौण्डिन नामक नगर में एक शूद्र से भी निम्न जाति का अन्त्यज निवास करता था। उसका नाम भानु था तथा वह घोर पापी एवं दुष्टात्मा था। भानु नित्य परस्त्रीगमन, मद्यपान तथा द्यूत क्रीड़ा आदि पाप कर्मों में लिप्त रहता था। वह लोभी मार्ग में पथिकों की हत्या कर उनका धन भी लूट लेता था। हे राजन्! वह दुष्ट इतना अधम हो गया कि अकारण ही किसी भी जीव की हत्या कर देता था। यहाँ तक कि कार्यहीनता के कारण वह ब्राह्मणों की हत्या भी करने लगा। इस प्रकार वह अन्त्यज अत्यन्त निर्दयी हो गया था।
एक समय दैवयोग से वह वन में भ्रमण कर रहा था। उस दिन माघ शुक्ल चतुर्थी थी। वन में भ्रमण करते हुये वह पर्वत शृङ्खला के मध्य घूमने लगा। संयोगवश वन मैं उसे किसी भी प्रकार का आहार एवं अन्न-जल आदि प्राप्त नहीं हुआ। क्षुधा एवं तृष्णा से व्याकुल होकर वह पापी वहीं वन में एक स्थान पर बैठ गया। प्रातःकाल शीघ्र उठकर वह अपने घर आ गया तथा तृष्णा से व्याकुल होकर उसने शीघ्रता से जलपान किया। परन्तु जल ग्रहण करते ही उसे वमन अर्थात् उल्टी हो गयी।
हे राजन्! जल की उल्टी होने के कारण उस पापात्मा की मृत्यु हो गयी। तदुपरान्त गणेश जी के दूत भानु को उनके समीप ले गये। भगवान गणेश का दर्शन करते ही वह पापमुक्त एवं ज्ञानी हो गया तथा उसे गणेश जी का सायुज्य प्राप्त हुआ। हे राजन्! अज्ञानता में ही चतुर्थी व्रत हो जाने के पुण्यफल से अन्त्यज जाति में उत्पन्न महापापी भानु भी ब्रह्मभूत हो गया। माघ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि महापुण्यशाली मानी गयी है। उसके माहात्म्य का वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ। हे राजन्! इस प्रकार चतुर्थी व्रत के प्रभाव से अनेकों मनुष्य ब्रह्मभूत अर्थात् ब्रह्म में लीन हो गये। माघ शुक्लपक्ष चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का श्रवण अथवा पाठ करने से सिद्धि प्राप्त होती है।”
॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित माघ शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥




