Mangala Gauri Vrat Katha - मंगला गौरी व्रत कथा
व्रत कथा

Mangala Gauri Vrat Katha – मंगला गौरी व्रत कथा

Mangala Gauri Vrat Katha – मंगला गौरी व्रत कथा

मंगला गौरी व्रत कथा – धर्मपाल नामक पुत्रहीन धनिक की कथा

प्राचीन काल का वृत्तान्त है, कुण्डिन नामक एक भव्य नगर था। उस नगर में धर्मपाल नामक एक धनिक निवास करता था। धर्मपाल की पत्नी अत्यन्त पतिव्रता एवं सती स्वभाव की थी। वे दोनों एक आदर्श दम्पति थे। उनका जीवन समस्त प्रकार की सुख-सुविधाओं से सम्पन्न था। किन्तु सब कुछ होते हुये भी उनके जीवन में एक अभाव था कि उनकी कोई सन्तान नहीं थी। अतः नाना प्रकार की सुख-सम्पदा होते हुये भी वे दम्पति अत्यन्त व्यथित रहा करते थे। उनके द्वार पर एक जटाधारी भिक्षुक प्रतिदिन आया करते थे। वे अवधूत वेश में रहते थे तथा उनके कण्ठ में रुद्राक्ष की माला सुशोभित रहती थी।

एक दिन सेठानी ने विचार किया कि यदि भिक्षुक को स्वर्ण आदि कुछ धन प्रदान कर दें तो सम्भवतः उसके पुण्य प्रभाव से उसे पुत्र की प्राप्ति हो जाये। सेठानी ने इस विषय में अपने पति धर्मपाल से भी विचार-विमर्श किया तथा पति की सहमति से उन भिक्षुक की झोली में अन्न में छुपाकर कुछ स्वर्ण भी डाल दिया। किन्तु सेठानी को यह ज्ञात नहीं था कि वह भिक्षुक अपरिग्रही थे, अर्थात् वह किसी भी प्रकार के दृव्य या धन आदि का स्पर्श व संग्रह नहीं करते थे। सेठानी द्वारा उनकी झोली में स्वर्ण डालने से उनका अपरिग्रही व्रत भङ्ग हो गया। इससे क्रोधित होकर उन भिक्षुक भगवान ने धर्मपाल एवं उसकी पत्नी को अनपत्यता अर्थात् निःसन्तानता का श्राप दे दिया।

श्राप मिलते ही धनिक अपनी पत्नी सहित उनके चरणों में पड़ गया तथा वे दोनों नाना प्रकार से अपनी त्रुटि हेतु क्षमा-याचना करने लगे। उन दोनों की प्रार्थना से भिक्षुक महाराज का क्रोध शान्त हो गया तथा उन्होंने सेठानी को श्रावण माह में मंगला गौरी व्रत करने का निर्देश दिया। साधु जी ने सेठानी के समक्ष व्रत का विधान भी वर्णित किया। तदुपरान्त सेठानी साधु जी के निर्देशानुसार श्रद्धापूर्वक श्रावण माह में मंगला गौरी व्रत का पालन करने लगी। सेठानी की निश्छल श्रद्धा एवं भक्ति से माता पार्वती प्रसन्न हो गयीं तथा उन्होंने भगवान शिव से उस दम्पति को एक पुत्र प्रदान करने का आग्रह किया।

उसी रात्रि में धर्मपाल को स्वप्न में एक दिव्य शक्ति ने दर्शन दिया तथा कहा कि – “समीपवर्ती वन में एक आम के वृक्ष के नीचे भगवान गणेश का श्री विग्रह विराजमान है, तुम उस वृक्ष से आम तोड़कर अपनी पत्नी को ग्रहण करवा देना। ऐसा करने से तुम्हें अवश्य ही एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।”

प्रातःकाल होते ही धर्मपाल ने अपनी पत्नी को स्वप्न का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया तथा उस आम के वृक्ष की खोज में वन की ओर चल पड़ा। सम्पूर्ण वन में इधर से उधर वह उस आम के वृक्ष को खोज रहा था किन्तु उसे वह वृक्ष नहीं मिला। बहुत समय तक खोजने के उपरान्त जब वह व्याकुल हो उठा तभी उसकी दृष्टि एक आम के वृक्ष पर पड़ी जिसके मूल में भगवान श्रीगणेश की एक अत्यन्त सुन्दर प्रतिमा विराजमान थी।

धर्मपाल प्रसन्नता पूर्वक आम तोड़ने का प्रयास करने लगा किन्तु आम अत्यन्त ऊँचाई पर थे। अतः वह पत्थर मारकर आम तोड़ने का प्रयत्न करने लगा। उसके पत्थरों के प्रहार से एक आम तो टूट गया किन्तु उनमें से ही एक पत्थर सीधा गणेश जी को लग गया। धनिक की इस उद्दण्डता से गणेश जी कुपित हो उठे एवं यथास्थान प्रकट हो गये। गणेश जी को साक्षात् अपने समक्ष पाकर वह हतप्रभ रह गया। इससे पूर्व की वह धनिक कुछ कह पाता, क्रोधित भगवान गणेश ने उसे श्राप देते हुये कहा – “हे दुष्ट धनिक! तूने स्वयं की स्वार्थ सिद्धि हेतु आम तोड़ने के लिये मुझ पर प्रहार किया। तू ने मुझे क्षति पहुँचायी है। माता पार्वती की कृपा दृष्टि से तुझे पुत्र की प्राप्ति तो होगी किन्तु वह पुत्र अल्पायु होगा। उसकी मृत्यु इक्कीस वर्ष की आयु में ही हो जायेगी।” इतना कहकर गणेश जी वहाँ से अन्तर्धान हो गये।

गणेश जी से श्राप पाकर धनिक भयभीत एवं व्यथित हो उठा तथा आम लेकर अपने घर आ गया। उसने अपनी पत्नी से वन में गणेश जी से प्राप्त श्राप के विषय में कुछ नहीं कहा एवं उसे वह आम खिला दिया। शनैः शनैः समय व्यतीत हुआ तथा भगवान शिव एवं देवी पार्वती की कृपा से उन दोनों को एक सुन्दर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी। पुत्र प्राप्ति से उनके जीवन में आनन्द एवं उल्लास का सञ्चार हो गया किन्तु धर्मपाल मन ही मन गणेश जी के श्राप के विषय में विचार कर चिन्तित हो रहा था।

कालान्तर में वह बालक बीस वर्ष का हो गया तथा अपने पिता के व्यापार आदि कार्यों में सहायता करने लगा। एक दिन यात्रा से लौटते समय धर्मपाल एवं उसका पुत्र मार्ग में एक सरोवर के तट पर वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन कर रहे थे। उसी समय वहाँ कमला एवं मंगला नाम की दो कन्यायें जल भरने एवं वस्त्रादि धोने हेतु आयीं। वे दोनों वस्त्र धोते हुये चर्चा कर रही थीं। कमला, मंगला से कह रही थी कि – “मैंने इस श्रावण माह में प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत करने का सङ्कल्प लिया है। तुम्हें भी माता पार्वती का यह सौभाग्यदायक व्रत अवश्य करना चाहिये। इस व्रत को करने से माता पार्वती प्रसन्न होती हैं तथा अपनी विशेष कृपा एवं आशीर्वाद प्रदान करती हैं। यह व्रत मनोवाञ्छित वर एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति में सहायक होता है।” कमला के वचन सुनकर मंगला ने भी इस व्रत को करने का निश्चय कर लिया।

कमला एवं मंगला के मध्य हुये इस सम्पूर्ण वार्तालाप को धनिक धर्मपाल ने सुन लिया। धनिक ने मन ही मन यह विचार किया कि – “यह कन्या मंगला गौरी व्रत का पालन करती है। अतः व्रत के फलस्वरूप इसे अवश्य ही अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होगी। यही मेरे पुत्र से विवाह हेतु एक उपयुक्त कन्या है।” इस प्रकार विचार करते हुये वह अपने पुत्र का विवाह प्रस्ताव लेकर कन्या के पिता के समक्ष उपस्थित हुआ।

धनिक धर्मपाल अपने ग्राम का अत्यन्त लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति था। सभी ग्रामीण उसका अत्यधिक मान-सम्मान करते थे। अतः कमला के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह हेतु धनिक पुत्र का सम्बन्ध स्वीकार कर लिया। तदुपरान्त पूर्ण विधि-विधान से उन दोनों का विवाह करवा दिया गया। विवाहोपरान्त भी कमला विधिपूर्वक मंगला गौरी का व्रत करने लगी।

कमला की श्रद्धा एवं भक्ति से माता पार्वती प्रसन्न हो गयीं तथा उसे स्वप्न में दर्शन देते हुये कहा – “मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसीलिये तुम्हें अखण्ड सौभाग्य का वरदान देती हूँ। किन्तु तुम्हारा पति अल्पायु है, इसीलिये अगले माह मंगलवार के दिन एक विषैला सर्प तुम्हारे पति का अन्त करने हेतु आयेगा। तुम उस सर्प के लिये एक पात्र में मधुर दुग्ध रख देना तथा दुग्ध के पात्र के समीप ही एक मटका भी रख देना। तुम्हारे ऐसा करने से सर्प दुग्ध पान करेगा तथा उस मटके में चला जायेगा। तत्पश्चात् तुम उस मटके के मुख को एक वस्त्र से ढक देना। इस प्रकार तुम्हारे पति के प्राणों की रक्षा होगी।”

आगामी मंगलवार को कमला ने माता पार्वती के निर्देशानुसार, एक पात्र में मधुर दुग्ध रख दिया तथा उसके समीप एक मटकी भी रख दी। कुछ समय पश्चात् सर्प ने आकर दुग्ध पान किया तथा मटकी के अन्दर चला गया। कमला ने उस मटकी के मुख को वस्त्र से बाँधकर उसे वन में रख दिया। माता पार्वती की दया एवं कृपा से कमला के पति के प्राणों की रक्षा हुयी। इस प्रकार मंगला गौरी व्रत के पुण्य फल से धनिक पुत्र श्रापमुक्त हो गया।

कमला ने घर में सभी को माता के इस चमत्कार के विषय में बताया। माता पार्वती के व्रत की महिमा ज्ञात कर सभी विस्मित हो गये। तदुपरान्त धनिक एवं उसकी पत्नी ने अपने पुत्र एवं पुत्र वधु को आशीष प्रदान किया एवं सम्पूर्ण कुटुम्ब माता की क्षत्रछाया में आनन्द पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।

॥इति श्री मंगला गौरी व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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