Kokila Vrat Katha - कोकिला व्रत कथा
व्रत कथा

Kokila Vrat Katha – कोकिला व्रत कथा

Kokila Vrat Katha – कोकिला व्रत कथा

कोकिला व्रत कथा – ऋषि वसिष्ठ एवं देवी कीर्तिमाला की कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा – “हे प्रभो! ऐसे व्रत का वर्णन करने की कृपा करें, जिस व्रत को करने से कुलीन स्त्रियों का अपने पति के प्रति परस्पर विशुद्ध प्रेम एवं सौहार्द सदैव अनवरत रहे।”

राजा युधिष्ठिर द्वारा पूछे गये इस लोक कल्याणार्थ प्रश्न का उत्तर देते हुये भगवान श्री कृष्ण ने कहा – “हे धर्मराज! यमुना के पावन तट पर मथुरा नामक एक अत्यन्त दिव्य एवं सुन्दर नगरी स्थित है। भगवान श्रीराम ने अपने भ्राता शत्रुघ्न को मथुरा के राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया था। शत्रुघ्न की अर्धाङ्गिनी का नाम कीर्तिमाला था। वह अत्यन्त पतिव्रता थी। एक दिन कीर्तिमाला ने अपने कुलगुरु ऋषि वसिष्ठ जी को सादर नमन करते हुये कहा – ‘हे मुनिश्रेष्ठ! कृपया आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतायें, जिससे मेरे अखण्ड सौभाग्य की वृद्धि हो।’

वसिष्ठ जी ने कहा – ‘हे पुत्रि कीर्तिमाले! मैं एक अत्यन्त श्रेष्ठ व्रत का वर्णन करता हूँ, तुम सावधानीपूर्वक श्रवण करो। कल्याण की कामना करने वाली स्त्री को आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को सायाह्नकाल में निम्नोक्त सङ्कल्प करना चाहिये कि – ‘श्रावण मास पर्यन्त मैं नित्य स्नान, रात्रि भोजन एवं भूमि शयन करूँगी।’ तदुपरान्त प्रातःकाल सामग्री लेकर नदी, सरोवर आदि पर जाना चाहिये। वहाँ दन्तधावन कर आरम्भ के आठ दिवस तक सुगन्धित द्रव्य, तिल एवं आँवले का उबटन लगाकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिये। तदुपरान्त आगामी आठ दिवस तक सर्वौषधियों अर्थात् कूट, जटामांसी, पीली एवं काली हल्दी, मुरा, शिलाजीत, चन्दन, वच, चम्पक तथा नागरमोथा का उबटन लगाकर स्नान करना चाहिये। इन्हें दशौषधी भी कहा गया है। तदनन्तर आठ दिवस तक वच का उबटन लगाकर स्नान करना चाहिये। अन्त के छः दिवस तक तिल-आँवले के चूर्ण एवं सर्वौषधियों के जल से स्नान करना चाहिये।

भविष्यपुराण में वर्णित विधान के अनुसार आरम्भ के आठ दिवस सुगन्धित द्रव्य, तिल एवं आँवले के उबटन से, आगामी आठ दिवस सर्वौषधियों के उबटन से तथा शेष दिनों में वच के उबटन से स्नान करना चाहिये। तत्पश्चात् भगवान सूर्य का ध्यान करना चाहिये। ध्यानोपरान्त तिल के चूर्ण से कोकिला पक्षी की मूर्ति का निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर रक्त चन्दन, चम्पा के पुष्प, पत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, अक्षत्, दूर्वा आदि से उसका पूजन करना चाहिये। तिल एवं तण्डुल का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। पूजनोपरान्त निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये –

तिलसहे तिलसौख्ये तिलवर्णे तिलप्रिय।
सौभाग्यद्रव्यपुत्रांश्च देहि में कोकिल नमः॥

अर्थात् – ‘तिलसहे कोकिला देवी! आप तिल के समान कृष्ण वर्ण वाली हैं। आपको तिल से सुख प्राप्त होता है तथा आपको तिल अत्यन्त प्रिय है। आप मुझे सौभाग्य, सम्पत्ति तथा पुत्रसुख प्रदान करें। आपको नमस्कार है।’

इस प्रकार पूजन सम्पन्न करके घर आकर भोजन ग्रहण करना चाहिये। उपरोक्त विधि से एक माह व्रत करते हुये अन्त में तिलपिष्ट अर्थात् तिल के चूर्ण से कोकिला का निर्माण कर उसमें रत्नमय नेत्र एवं सुवर्णमय पंख लगाकर तथा वस्त्राभूषण से सुसज्जित कर ताम्रपात्र में स्थापित करें। तदुपरान्त वस्त्र, धान्य, गुड़ एवं दक्षिणा सहित सास, ससुर, ज्योतिषी, पुरोहित, दैवज्ञ अथवा ब्राह्मण को दान करना चाहिये। उपरोक्त विधि से जो भी नारी श्रद्धापूर्वक कोकिला व्रत करती है, वह सात जन्म तक अखण्ड सौभाग्यवती रहती है तथा इस लोक में प्रेमपूर्वक पोषण करने वाले पति का सुख भोगकर अन्त समय में उत्तम विमान में आरूढ़ होकर गौरीलोक, अर्थात् माता पार्वती के धाम को गमन करती है।’

वसिष्ठ मुनि के श्रीमुख से व्रत का विधान श्रवण कर कीर्तिमाला ने उनके निर्देशानुसार कोकिला व्रत का अनुष्ठान किया। व्रत के फलस्वरूप उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र, सुख-समृद्धि की प्राप्ति हुयी तथा शत्रुघ्न जी का विशेष स्नेह, प्रेम एवं अनुग्रह भी प्राप्त हुआ। अन्य जो भी स्त्रियाँ श्रद्धा, भक्ति एवं निष्ठापूर्वक इस व्रत का पालन करती हैं, उन्हें भी माता गौरी की कृपा से सुख-सौभाग्य आदि की प्राप्ति होती है।” इस प्रकार भविष्यपुराणोक्त कोकिला व्रत सम्पन्न होता है।

॥इति श्री कोकिला व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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