Jayaparvati Vrat Katha - जयापार्वती व्रत कथा
व्रत कथा

Jayaparvati Vrat Katha – जयापार्वती व्रत कथा

Jayaparvati Vrat Katha – जयापार्वती व्रत कथा

जया पार्वती व्रत कथा – वामन एवं सत्या नामक निःसन्तान ब्राह्मण दम्पति की कथा

देवी श्रीमहालक्ष्मी कहती हैं – “हे स्वामी आपको नमन है! हे व्रताध्यक्ष! हे भगवन्! आप ही सृष्टि में वृद्धि एवं क्षय के कर्ता हैं। कृपया आप सभी व्रतों में उत्तम व्रत का वर्णन कीजिये। उस व्रत को सर्वप्रथम किसने किया तथा वह मृत्युलोक में किस प्रकार प्रचलित हुआ उसका वर्णन कीजिये। हे जगत्पति! कृपया करके आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें।”

भगवान श्रीविष्णु बोले – “हे देवि! मैं देवी पार्वती की कथा का वर्णन करता हूँ। इस कथा के श्रवण मात्र से प्राणी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। आप श्रद्धापूर्वक श्रवण करें।

कृतयुग के समय एक कौडिन्य नगर नामक अत्यन्त मनोरम स्थान था। उस नगर में एक वेदवेत्ता, सत्यवान, गुणवान शीलवान एवं धर्म पारायण ब्राह्मण निवास करता था जिसका नाम वामन था। उसकी एक सर्वगुण सम्पन्न धर्मपत्नी थी जिसका नाम सत्या था। उन दोनों के घर में समस्त प्रकार की सुख-सम्पत्ति एवं धन-वैभव था, किन्तु पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप उनके घर में कोई सन्तान नहीं थी। सन्तान सुख की चिन्ता में वे दोनों अत्यन्त दुर्बल हो गये थे।

एक दिन सौभाग्यवश उनके घर पर देवर्षि नारद का आगमन हुआ। वामन ने सपत्नीक नारद जी को अर्घ्य अर्पित कर पाद-प्रक्षालन आदि किया एवं करबद्ध निवेदन करते हुये कहा – ‘हे देवर्षि! आप सभी ज्ञानियों में अग्र एवं मुनियों में श्रेष्ठ हैं, कृपया मुझ अधम पर कृपा करके मेरे इस दुःख की निवृत्ति का कोई मार्ग बतायें। हे मुनीन्द्र! वह कौन सा व्रत, पूजन, दान अथवा तीर्थ है जिसके द्वारा मुझे सन्तान प्राप्त हो। हे करुणा के सागर! कृपा करके मुझे सन्तान प्राप्ति का उपाय प्रदान करें।’

वामन की करुण प्रार्थना सुनकर नारद जी का हृदय द्रवित हो उठा एवं वह बोले – ‘हे विप्रवर! तुम निश्चिन्त हो जाओ, मैं आश्वासन देता हूँ कि तुम्हें सन्तान अवश्य प्राप्त होगी। इस वन की दक्षिण दिशा में बिल्व वृक्षों के समूह के मध्य भगवान शिव देवी पार्वती सहित लिङ्ग रूप में विराजमान हैं। तुम श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा-पूजा करो, वह शीघ्र ही प्रसन्न होकर तुम्हें सन्तान सुख प्रदान करेंगे। क्योंकि अपूज्य शिवलिङ्ग की पूजा करने से व्यक्ति को सन्तान की प्राप्ति होती है।’ इतना कहकर मुनिश्रेष्ठ नारद स्वर्गलोक को चले गये।

सन्तान की कामना से वह ब्राह्मण दम्पति वन में पहुँचे। देवर्षि नारद के कथनानुसार उन्हें वन में बिल्व वृक्षों के समूह के मध्य एक प्राचीन शिवलिङ्ग का दर्शन हुआ। वह शिवलिङ्ग चारों ओर से सूखे बिल्वपत्रों से ढका हुआ था। वामन एवं उसकी पत्नी सत्या ने जल व पञ्चामृत से अभिषेक कर बिल्वपत्रों द्वारा भगवान शिव की पूजा-अर्चना की। वामन नियमपूर्वक प्रतिदिन शिव-पूजन करने लगा। इस प्रकार उसने पाँच वर्ष तक माता पार्वती सहित भगवान शिव का श्रद्धापूर्वक पूजन किया।

एक दिन वामन प्रतिदिन की भाँति शिव-पूजन हेतु पुष्प एकत्रित करने गया। वह शिवजी का स्मरण करते हुये पुष्प तोड़ ही रहा था कि उसी समय उसे एक भयङ्कर सर्प ने काट लिया। सर्पदंश के प्रभाव से वामन तत्क्षण धराशायी हो गया। अनेकों सिंहों एवं बाघों से युक्त उस वन में वह ब्राह्मण निश्चेतस् पड़ा हुआ था। तीन मुहूर्त तक प्रतीक्षा करने पर भी जब वामन घर नहीं लौटा तो उसकी सहधर्मिणी मन ही मन विचार करने लगी कि – ‘बहुत विलम्ब हो गया, मेरे स्वामी अभी तक वन से पुष्प लेकर क्यों नहीं आये?’ उसका हृदय किसी अनहोनी की आशंका से व्याकुल हो उठा तथा वह रुदन करती हुयी उसी वन में पहुँची।

वन में अपने पति को भूमि पर पड़ा देख वह भी मूर्छित हो गयी। जब उसकी मूर्छा भङ्ग हुयी तो वह करुण स्वर से वन देवता को पुकारने लगी। उसी समय वहाँ देवी पार्वती प्रकट हो गयीं। उस ब्राह्मणी को विलाप करता देख माता पार्वती ने अपने कर-कमलों से उस ब्राह्मण को अमृत पान कराया। जिस प्रकार निद्रा में लीन व्यक्ति मध्यरात्रि में सहसा चौंककर उठ जाता है उसी प्रकार वह ब्राह्मण भी जीवित हो उठा। उस ब्राह्मण दम्पति ने विनम्रतापूर्वक माता पार्वती के चरण-कमलों को पकड़ लिया तथा पूर्ण भक्तिभाव से उनका पूजन किया।

उन दोनों की निर्मल भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने कहा – ‘हे सुव्रते! मैं तेरे पूजन से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तू वर माँग, में तेरी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करूँगी।’ ब्राह्मणी ने कहा – ‘हे माता! आपका कोटि-कोटि धन्यवाद! आपकी कृपा से मेरी कामना पूर्ण हुयी है, मेरे पति के प्राण पुनः लौट आये। इसके अतिरिक्त मेरे हृदय में मात्र एक ही पीड़ा है कि मेरी कोई सन्तान नहीं है।’

माता पार्वती ने कहा – ‘तू जया नामक मेरे व्रत का पूर्ण विधि-विधान से पालन कर। हे सुभगे! यह व्रत तीनों लोकों में श्रेष्ठ एवं पवित्र है। संसार में यह जया पार्वती व्रत के रूप में प्रसिद्ध है। हे पुत्रि! यह व्रत आषाढ़ माह में किया जाता है। बिना नमक के स्वादरहित अन्न द्वारा पाँच दिन तक इस वृत का श्रद्धापूर्वक एवं दृढ़ता से पालन करना चाहिये। आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से प्रारम्भ कर कृष्ण पक्ष की तृतीया तक पाँच दिवस तक यह व्रत करना चाहिये। अतः शुक्ल पक्ष में व्रत प्रारम्भ कर कृष्ण पक्ष में इसका समापन करना चाहिये। यावनाल (एक प्रकार के विशेष अन्न अथवा ज्वार) से पाँच वर्ष तक व्रत करना चाहिये। तदुपरान्त पाँच वर्ष तक नमक रहित यव (जौ) से व्रत करना चाहिये। तदनन्तर मीठे चावलों से पाँच वर्ष व्रत करना चाहिये। अन्ततः पाँच वर्ष मूँग से व्रत करना चाहिये। इस प्रकार बीस वर्ष व्रत करने के उपरान्त उद्यापन करना चाहिये।

उद्यापन हेतु तृतीया तिथि पर स्त्री-पुरुषों को वस्त्राभूषण दान कर सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराना चाहिये। बीस वर्ष होने के एक वर्ष पूर्व से अपनी सामर्थ्यानुसार पाँच-पाँच परिधान एवं भोजन देना चाहिये। भोजन अनेकविध रसों से युक्त होना चाहिये। सौभाग्य वृद्धि हेतु सुहागिन स्त्री को घृत एवं खांड युक्त भोजन देना चाहिये। प्रतिवर्ष अपनी सामर्थ्यानुसार कुमकुम एवं कज्जल दान करना चाहिये। व्रत में रात्रि जागरण करने से अक्षुण्ण पुण्य की प्राप्ति होती है। व्रत का त्याग करने से स्त्री जन्म-जन्मान्तरों तक विधवा होती है तथा नाना प्रकार के कष्ट पाकर सौभाग्यहीन रहती है। पति की भक्ति, सन्तुष्टि तथा उत्तम दान एवं व्रतों को करने से अखण्ड सौभाग्य प्राप्त करती है।’

इस प्रकार जया व्रत का विस्तृत वर्णन कर माता पार्वती अन्तर्धान हो गयीं। तदुपरान्त वामन एवं सत्या हर्षपूर्वक अपने घर आ गये। उन्होंने उपरोक्त विधि से जया पार्वती व्रत का पालन किया जिसके पुण्य प्रभाव से उन्हें एक गुणवान पुत्ररत्न की प्राप्ति हुयी। दोनों पति-पत्नी को सन्तान सुख एवं सत्या को अखण्ड सौभाग्य प्राप्त हुआ। भूलोक पर नाना प्रकार के सुख भोगने के पश्चात्, अन्त समय में वे दोनों शिवलोक को चले गये। इस व्रत को भावपूर्वक करने वाला भगवान शिव का सानिध्य प्राप्त कर शिवलोक में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस कथा का विधिपूर्वक श्रवण करने मात्र से ही प्राणी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।” इस प्रकार भविष्योत्तरपुराण में वर्णित जया पार्वती व्रत सम्पूर्ण होता है।

॥इति श्री जया पार्वती व्रत कथा सम्पूर्णः॥

Leave a Reply