Durva Ganpati Chaturthi Vrat Katha - दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत कथा
व्रत कथा

Durva Ganpati Chaturthi Vrat Katha – दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत कथा

Durva Ganpati Chaturthi Vrat Katha – दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत कथा

दूर्वा गणपति चतुर्थी व्रत कथा – राजा अश्वसेन को भीषण ज्वर पीड़ा एवं उससे मुक्ति की कथा

राजा दशरथ ने गुरु वसिष्ठ से कहा – “हे गुरुवर! ब्रह्म पद प्रदान करने वाली इस चतुर्थी का माहात्म्य श्रवण कर मेरा मन तृप्त नहीं हो रहा है। अतः हे मुनिवर! वर प्रदान करने वाली श्रावण शुक्ल चतुर्थी के माहात्म्य का वर्णन करने की कृपा करें।”

मुनि वशिष्ठ बोले – “हे राजन्! अङ्ग देश में श्रमन्! शततार नामक नगर था। उस नगर में अश्वसेन नामक राजा धर्मपूर्वक शासन करते थे। राजा अश्वसेन अत्यन्त वीर, साहसी तथा पराक्रमी थे। वे विभिन्न प्रकार के दान, व्रत आदि धर्म-कर्म करते थे तथा देवताओं, ब्राह्मणों एवं अतिथियों के प्रिय थे। अपनी युद्ध कला एवं शस्त्र विद्या के बल से उन्होंने समस्त भूलोक पर विजय प्राप्त कर ली थी। वे राजा सार्वभौम, अर्थात् समस्त भूमण्डल के राजा के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। तीनों लोकों में राजा का यश प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने अपने बाहुबल से सभी राजाओं को वशीभूत कर लिया तथा वे सभी राजा अश्वसेन के सेवक होकर उन्हें कर प्रदान करने लगे। इस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण भूमण्डल को अधीन कर लिया था।

कालान्तर में एक समय राजा अश्वसेन अत्यन्त दाहक ज्वर से ग्रसित हो गये। ज्वर की पीड़ा के कारण राजा को रात्रि में निद्रा भी नहीं आती थी। राजा के उपचार हेतु नाना प्रकार के उपाय किये गये किन्तु राजा को उस ज्वर से मुक्ति नहीं मिली। इस प्रकार ज्वर से पीड़ित होते हुये एक वर्ष का समय व्यतीत हो गया। ज्वर के कारण राजा अत्यन्त दुर्बल हो गये तथा उनकी देह में मात्र अस्थि एवं चर्म ही शेष रह गया। तदुपरान्त अत्यन्त व्यथित होकर राजा अश्वसेन ने विष का सेवन कर प्राण त्यागने का निश्चय किया। उसी समय सहसा योगियों में श्रेष्ठ ऋषि देवल वहाँ प्रकट हुये। देवल मुनि को वहाँ देख राजा ने उन्हें प्रणाम कर बन्धु-बान्धवों सहित उनका पूजन किया तथा ऋषि को भोजन आदि अर्पित किया।

ऋषिवर द्वारा भोजन आदि ग्रहण करने के उपरान्त राजा ने प्रणाम करते हुये उनसे निवेदन किया – ‘हे मुनिवर! आज आपका दर्शन पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया। मेरे द्वारा किये गये जप-तप, यज्ञ-हवन तथा दान आदि कर्म सार्थक हो गये। हे मुनिवर! मैं घोर ज्वर से अत्यन्त पीड़ित हूँ, यह पीड़ा इतनी अधिक हो गयी है कि अब मैंने विषपान करने का निश्चय कर लिया था, किन्तु उसी समय हे मुनिवर! मुझे आपका पावन दर्शन प्राप्त हुआ। यदि विषपान करके मेरा प्राणान्त हो गया तो मुझे आत्महत्या नहीं प्राप्त होगी। आपके दर्शन मात्र के फलस्वरूप मैं मुक्त होकर परम धाम को प्राप्त हो जाऊँगा।’ ऐसा कहकर राजा रुदन करते हुये विलाप करने लगे।

तदुपरान्त गम्भीर होकर सभी शास्त्रों के ज्ञाता देवल मुनि ने राजा अश्वसेन से कहा – ‘हे राजन्! तुम्हारे राज्य में चतुर्थी नामक श्रेष्ठ व्रत का लोप हो गया है। उस व्रत के समाप्त होने के कारण तुम रोगयुक्त हो गये हो तथा तुम मृत्योपरान्त नरक में यातना भोगोगे। हे नृप! यह व्रत चारों पदार्थों, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है तथा इस व्रत का पालन न करने से समस्त कर्म फलों से हीन हो जायेंगे। हे राजन्! आपके द्वारा किये हुये अनेकों महान पुण्य, चतुर्थी व्रत के अभाव में चारों पदार्थों से हीन हो जायेंगे। अर्थात् चतुर्थी व्रत के अतिरिक्त अन्य कोई भी व्रत धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चार पुरुषार्थों को प्रदान करने वाला नहीं है।’

ऐसा कहकर ऋषि देवल ने चतुर्थी व्रत से सम्बन्धित एक कथा राजा को सुनायी, जिसे सुनकर राजा ने मुनिवर से कहा – ‘आपके श्रीमुख से मैंने चतुर्थी व्रत के अद्भुत माहात्म्य का श्रवण किया। हे महामुने! भगवान गणेश का माहात्म्य वर्णित करने की कृपा करें।’

हे राजन्! महामुनि देवल ने कहा – ‘भगवान गणेश का माहात्म्य वर्णित करने में मैं असमर्थ हूँ। मैं उपाधि से युक्त गणेश जी के स्वरूप का वर्णन करूँगा, जो मैंने अपने पिता असित मुनि के श्रीमुख से श्रवण किया है। मैं अब समस्त कार्यों में सफलता प्रदान करने वाले ब्रह्मयोग का प्रकाश करने वाले पूर्ण माहात्म्य का वर्णन कर रहा हूँ।

पूर्वकाल में मैं तपस्या कर रहा था, उसी समय वहाँ पर शैव मतानुयायी महायोगी महर्षि जैगीषव्य प्रकट हो गये। मैंने ऋषि जैगीषव्य का श्रद्धापूर्वक आदर-सत्कार एवं पूजन किया तथा उनकी स्तुति करने लगा। तदुपरान्त वे मौन होकर मेरे आश्रम में विराजमान हो गये। सम्यक् प्रकार से उनकी पूजा आदि करके उनके समक्ष नतमस्तक होकर मैंने उन योगी से कहा – ‘हे महायोगिन्! अपने इस कुशिष्य को भवसागर से पार कीजिये। हे दयानिधि! मैं इस संसार के भ्रम में फँसा हुआ हूँ, कृपा करके मुझे इस भ्रम से मुक्त कीजिये।’

जैगीषव्य मुनि ने कहा कि – ‘हे मुनिवर! तुम यत्न धारण करने वाले हो, इसीलिये हिंसात्मक कार्य मत करो तथा अहं ब्रह्मास्मि!, अर्थात् “मैं ब्रह्म हूँ!” के बोध द्वारा शम एवं दम परक होकर इन्द्रियों को शान्त करने वाले एवं उनका दमन करने वाले हो जाओ। जो तुम्हारी आज्ञा के वश में है, तुम उसका भजन करो। इसके फलस्वरूप तुम ही निःसन्देह समस्त संसार में योगी हो जाओगे।’

ऐसा कहकर वे जैगीषव्य मुनि अन्तर्धान हो गये तथा मैं हिंसा को त्यागकर उनकी आज्ञानुसार योग में स्थित हो गया। तदुपरान्त मेरे माता-पिता तीव्र रोदन करते हुये कहने लगे कि – ‘अहो! देवल कर्म को परित्याग करके हमारी उपेक्षा कर रहा है। देवल ने जब सभी कर्मों का त्याग कर दिया, तो अब हमारा पालन-पोषण कौन करेगा। अब हम क्षुधा एवं तृष्णा से युक्त होकर निराधार हो गये हैं। अब कौन हमें अन्न-जल प्रदान करेगा?’ अपने माता-पिता को इस स्थिति में देखकर मैं दुःखी हो गया तथा मैं कर्म करने को उद्यत हो गया। तदुपरान्त महायोगियों द्वारा जिनकी स्तुति एवं वन्दना की जाती है, ऐसे अपने पिता असित की शरण में गया। मैंने महर्षि असित को प्रणाम करके उनसे योगशान्ति पूर्ण सनातन ब्रह्म के विषय में पूछा।

तदुपरान्त ऋषि असित मुझसे बोले – ‘हे पुत्र! जिन्हें योगीगण सदैव योग स्वरूप तथा शान्ति प्रदान करने वाला कहते हैं, तुम ऐसे भगवान गणेश का नित्य आदरपूर्वक ध्यान करो। क्योंकि गणेश जी में संयोग एवं अयोग दोनों ही निहित हैं। गण में जो गकार वर्ण हैं, वह संयोगसूचक है एवं णकार अयोगवाचक है तथा दोनों के योग में विद्वानों के द्वारा गणेश जी को ज्ञात किया जाता है।’ ऐसा कहकर उन प्रसन्नात्मा गणपति के भक्त मेरे पिता ने मुझे भगवान गणेश का एकाक्षर मन्त्र प्रदान किया तथा गणेश जी का भजन करने का आदेश दिया।

हे राजन! तत्पश्चात् उनको प्रणाम करके मैं अपने आश्रम में गया तथा वहाँ भगवान गणपति का ध्यान करके उनकी पूजा एवं जप करने लगा। गणेश आराधना के फलस्वरूप कुछ ही समय में मैंने शान्ति प्राप्त कर ली तथा योगियों द्वारा वन्दनीय हो गया, अर्थात् योगीजन भी मेरी वन्दना करने लगे। तत्पश्चात् मैं निरन्तर गणेश जी के भजन में लीन रहने लगा। एक वर्ष व्यतीत होने के उपरान्त भक्तवत्सल भगवान गणेश ने मुझे दर्शन दिया। मैंने प्रसन्नतापूर्वक गणेश जी की स्तुति एवं पूजन किया। भगवान गणेश ने मुझे अपने पिता के समान ही गाणपत्य करके, अर्थात् मुझे अपना भक्त बनाकर वे ब्रह्मपति लम्बोदर अपने स्वानन्दकपुर धाम में चले गये।’

ऐसा कहकर देवल मुनि ने राजा अश्वसेन को भगवान गणेश का दशाक्षर मन्त्र प्रदान किया है तथा वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तदुपरान्त वे राजा भगवान गणेश की आराधना में लीन हो गये। कुछ समय पश्चात् वहाँ श्रावण शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथि आ गयी। उस समय राजा ने अपनी सम्पूर्ण प्रजा सहित विधिवत् चतुर्थी व्रत का पालन किया तथा पञ्चमी तिथि में उस व्रत का पारण किया। तदुपरान्त गणेश आराधना के फलस्वरूप राजा अश्वसेन को उस भीषण ज्वर एवं दाह से मुक्ति प्राप्त हो गयी। उनके राज्य में सभी मनुष्य रोगमुक्त, स्वस्थ तथा पुत्र-पौत्र एवं धन-धान्य से सम्पन्न हो गये। राजा ने समस्त भूमण्डल पर चतुर्थी व्रत को विख्यात कर दिया तथा धरातल पर सभी मनुष्य शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी व्रत का पालन करने लगे।

तदुपरान्त राजा को शान्ति प्राप्त हो गयी। शान्ति परायण होकर राजा ने अपना राजपाट अपने पुत्र को समर्पित कर दिया तथा स्वयं एकान्तवास करते हुये पत्नी सहित भगवान गणेश का भजन करने लगे। अन्ततः राजा स्वानन्दवासी होकर ब्रह्म में लीन हो गये। तदनन्तर क्रमशः सभी मनुष्य ब्रह्मलीन हो गये।”

वशिष्ठ मुनि ने कहा कि – “हे दशरथ! इस प्रकार मैंने आपको सर्वसिद्धिदायक चतुर्थी व्रत का माहात्म्य सुनाया है। अब हे राजन्! इस व्रत से सम्बन्धित एक अन्य कथानक का श्रवण कीजिये।

गुजरात प्रदेश में एक पाप कर्म करने वाला दुर्बल क्षत्रिय निवास करता था। वह अधर्मी क्षत्रिय बाल्यकाल से ही नाना प्रकार के पापकर्म करता था। वह पापी स्त्रियों से बलात्कार, मदिरापान तथा मांस भक्षण आदि कर्मों में लिप्त रहता था। यहाँ तक कि एक समय उसने अपने गुरु की भी हत्या कर दी तथा उनका सम्पूर्ण धन लूटकर वन में भाग गया। इस प्रकार उसने अपने जीवन में नाना प्रकार के घृणित पाप कर्म किये। एक समय वह दुष्ट क्षत्रिय भयङ्कर ज्वर से पीड़ित हो गया। वह नीच ज्वर से अत्यन्त व्याकुल हो गया। दैवयोग से उसी समय श्रावण शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि आ गयी। उस दिन उसे किसी प्रकार का अन्न-जल प्राप्त नहीं हुआ। अतः अनभिज्ञता में ही उसका चतुर्थी उपवास हो गया तथा पञ्चमी तिथि में उसने कुछ अन्न प्रेमपूर्वक ग्रहण कर लिया। अतः चतुर्थी व्रत के प्रभाव से वह पापी भी रोगमुक्त हो गया, परन्तु उसने पापकर्म का त्याग नहीं किया एवं निरन्तर दुष्कृत्य करता रहा।

कालान्तर में उस पापी की मृत्यु हो गयी तथा अज्ञान में किये हुये व्रत के पुण्य प्रभाव से भगवान गणेश के दूत उस पापी को लेने आ गये। गणेश जी के दूत उस दुष्ट क्षत्रिय को लेकर चले गये तथा उसे ब्रह्मभूत कर दिया। अतः हे राजन्! जब अनभिज्ञता में किये हुये व्रत के पुण्यफल से वह दुष्ट क्षत्रिय स्वानन्द को प्राप्त हो गया, तो जो ज्ञानपूर्वक इस चतुर्थी व्रत का पालन करेंगे, वह तो निश्चित् ही स्वानन्द को प्राप्त होकर ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। इस प्रकार अनेकों मनुष्य चतुर्थी व्रत के पुण्य प्रभाव से ब्रह्मलीन हो गये।”

वसिष्ठ मुनि ने कहा कि – “हे राजन्! यह जो श्रावणी चतुर्थी व्रत का माहात्म्य मैंने वर्णित किया है, वह चतुर्थी वरप्रदायक है तथा जो मनुष्य इस माहात्म्य का श्रवण अथवा पाठ करेगा, वह समस्त मनोवाञ्छित फल प्राप्त करेगा।”

॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित श्रावण शुक्ल चतुर्थी व्रत माहात्म्य सम्पूर्ण होता है।॥

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