Aniruddha Chaturthi Vrat Katha - अनिरुद्ध चतुर्थी व्रत कथा
व्रत कथा

Aniruddha Chaturthi Vrat Katha – अनिरुद्ध चतुर्थी व्रत कथा

Aniruddha Chaturthi Vrat Katha – अनिरुद्ध चतुर्थी व्रत कथा

अनिरुद्ध चतुर्थी व्रत कथा – राजा भद्रसेन के राज्य में मूषक, तोतों तथा कीट-पतंगों के आक्रमण की कथा

राजा दशरथ ने ऋषि वशिष्ठ से कहा कि – “हे मुनिपुंगव! आपके श्रीमुख से सिद्धिप्रदायक चतुर्थी व्रत की कथा श्रवण कर मेरा हृदय आनन्दित हो रहा है, किन्तु हे प्रभो! मेरा मन अभी भी अतृप्त है, अतः कृपया आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी व्रत का माहात्म्य वर्णित करने की कृपा करें।”

राजा का निवेदन सुनकर वशिष्ठ मुनि बोले – “हे राजन्! मैथिल प्रदेश में गण्डकी नामक एक महानगर था। उस नगर में भद्रसेन नाम के राजा राज्य करते थे। वे राजा समस्त प्रकार के आयुधों में कुशल एवं युद्ध विद्या में निपुण थे। वे अपनी वीरता एवं पराक्रम से अन्य राज्यों को जीत लेते थे, अतः सम्पूर्ण भूलोक पर उनका ही शासन था। राजा भद्रसेन सदैव जप, तप, दान, यज्ञादि धर्म-कर्मों में तत्पर रहते थे तथा देवताओं एवं ब्राह्मणों के प्रिय थे।

राजा भद्रसेन का शासन समस्त भूमण्डल पर होने के कारण अन्य सभी राजा उनके अधीन थे तथा समयानुसार उन्हें कर प्रदान करते थे। राजा भद्रसेन अनन्त सेना के स्वामी थे। परन्तु हे राजन्! एक समस्या ने राजा भद्रसेन को व्याकुल कर दिया था।

हे दशरथ! एक समय राजा भद्रसेन के राज्य में तोते, मूषक तथा विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगों ने विशाल सङ्ख्या में आक्रमण कर दिया। अपार सङ्ख्या में वे सभी जीव बलपूर्वक राज्य में अन्न एवं वस्त्र आदि वस्तुओं को नष्ट करने लगे। राजा ने उनसे मुक्ति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयास किये तथा अनेक कीट-पतंगों एवं चूहों आदि को अग्नि-शस्त्र से भस्म करवा दिया। किन्तु वह जीव इतनी अधिक सङ्ख्या में थे कि अत्यन्त शीघ्रता से पुनः अन्य जीव उत्पन्न हो जाते थे, यह देखकर राजा हतप्रभ रह गया। सम्पूर्ण राज्य में प्रत्येक स्थान पर कीट-पतंगे, छिपकली आदि विषैले कीट विचर रहे थे। नाना प्रकार के प्रयास करने पर भी जब कीटों के प्रकोप से मुक्ति प्राप्त नहीं हुयी, तो व्याकुल होकर उसने वन जाने का निश्चय किया। राजा ने व्यथित मन से वन में अन्न का त्याग कर दिया। राजा निराहार होकर वन में तपस्या करने लगे तथा भगवान शिव के ध्यान में लीन होकर रौद्रभाव से उनका पूजन किया।

एक वर्ष व्यतीत होने पर दैवयोग से महर्षि बकदाल्भ्य उस वन में उपस्थित हुये। वन में भ्रमण करते हुये महर्षि बकदाल्भ्य ने राजा भद्रसेन को तपस्या में लीन देखा।

राजा ने मुनिवर का पूजन किया तथा भोजन आदि कराकर व्यथित होकर पूछा – ‘हे मुनिवर! मेरे राज्य में मूषक, कीट-पतंगे तथा तोते आदि जीव अत्यन्त पीड़ित कर रहे हैं। वे मेरे राज्य के अन्न, वस्त्र तथा मनुष्यों का भक्षण कर रहे हैं। अतः हे भगवन्! मैंने नाना प्रकार के उपाय किये किन्तु सभी उपाय व्यर्थ हो गये तथा इस समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ। इसी दुख के कारण मैं राज्य त्यागकर वनवास कर रहा हूँ। मैं वन में भगवान शिव की आराधना कर रहा था, उन्हीं की कृपा से मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। अतः हे प्रभो! आप मुझे इस सङ्कट का समाधान बताने की कृपा करें।’

राजा भद्रसेन के वचन सुनकर महर्षि बकदाल्भ्य ने कहा – ‘हे नृपश्रेष्ठ! मुझे भगवान शिव ने ही यहाँ तुम्हारे लिये भेजा है। अतः हे राजन्! आप मेरे महान एवं दुःखनाशक वचन श्रवण करो। हे भद्रसेन! वर्तमान में तुम्हारे राज से चतुर्थी नामक व्रत समाप्त हो गया है। चतुर्थी व्रत के लोप के कारण ही तुम इस विघ्न से ग्रसित हुये हो। इसीलिये तुम्हारी प्रजा में भय व्याप्त हो गया है, क्योंकि दुष्ट राजा के राज्य करने पर अवश्य हो प्रजा भय से व्याकुल हो जाती है। अतः हे अधम राजन्! चतुर्थी व्रत के लोप के कारण तुम नरक में जाओगे। इसीलिये हे राजन्! तुम्हें सम्पूर्ण प्रजा सहित सदैव चतुर्थी व्रत का पालन करना चाहिये, क्योंकि यह व्रत चारों पुरुषार्थ प्रदान करता है तथा समस्त विघ्नों को नष्ट करता है।

हे राजन्! यदि तुमने चतुर्थी व्रत का पालन नहीं किया तो तुम्हारे द्वारा किये हुये सभी कर्म निरर्थक हो जायेंगे तथा तुम चारों पुरुषार्थ, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष से हीन हो जाओगे। इसीलिये हे महामते! श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करो।’ ऐसा कहकर ऋषि बकदाल्भ्य ने व्रत का सम्पूर्ण माहात्म्य राजा को सुनाया।

चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का श्रवण कर राजा बोले – ‘हे मुनिवर! यह व्रत कैसा है? कृपया इस व्रत का स्वरूप वर्णित करें। उन सर्वदेवेश को ज्ञात कर मैं भक्तिपूर्वक उनका भजन करूँगा।’

बकदाल्भ्य मुनि ने कहा – ‘हे राजन्! मुझसे सम्बन्धित एक अत्यन्त प्राचीन वृत्तान्त है, जिसके द्वारा तुम भगवान गणेश को भलीभाँति जान जाओगे। पूर्वकाल में एक समय मैं तपस्या कर रहा था तथा तप काल में मात्र वायु का भक्षण कर रहा था, अर्थात् मैं पूर्णतः निराहार था। तदुपरान्त मेरे तप के महान तेज से समस्त चराचर भयकम्पित हो गया।

तथापि हे राजन्! उस तपस्या के फलस्वरूप समस्त जड़ एवं चेतन में विद्यमान रहने वाले, सर्वज्ञ तथा सर्वत्र विद्यमान रहने वाले विश्वरूप का पुण्यशाली दर्शन प्राप्त हो गया। उस दर्शन के द्वारा मैं ज्ञानभाव से औघड़ पन्थ एवं उन्मत्तादिक योग में लग गया। तदुपरान्त शम एवं दम परक होकर मन नियन्त्रित कर मैंने पूर्णयोग की साधना की।

हे राजन्! इस प्रकार क्रमशः ब्रह्मभूत स्वभाव से सहज ब्रह्म में सम्यक् प्रकार से स्थित हो गया, तब मैं अत्यन्त प्रसन्न हो गया। तत्पश्चात् अतिमोह से रहित होकर स्वाधीन रूप को देखा, तब उससे मैं भ्रान्त हो गया कि ब्रह्म मैं ऐसा क्यों है? तदनन्तर मैंने भगवान शिव की शरण ग्रहण करके, नाना प्रकार के स्तोत्रों से स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया तथा प्रार्थना करते हुये कहा – ‘हे प्रभो! मुझे योगमार्ग का ज्ञान प्रदान करें।’

भगवान शिव ने कहा कि – ‘हे ऋषिवर! सत्य एवं असत्य दोनों समान हैं तथा सहज से युक्त हैं। अपनी आत्मा के बोध से स्वानन्द में उत्पन्न समझो। संयोग में स्वयं का स्वरूप ज्ञात होना चाहिये, ऐसा वेदों में वर्णित है तथा अयोग में सम्पूर्ण संयोग नष्ट हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। हे महामते! संयोग एवं अयोग इन दोनों के योग को योगियों ने शान्ति प्रदान करने वाला योग कहा है। अतः तुम योग शान्तिमय गणेश का ध्यान करो, वे ही साक्षात् ब्रह्मनायक हैं। अतः तुम विधिवत् रूप से उन्हीं की आराधना करो। ऐसा करने से तुम अवश्य ही ब्रह्मलीन होकर स्वयं ब्रह्म हो जाओगे। हे मुनिश्रेष्ठ! गण शब्द में गकार वर्ण संयोगवाचक है तथा णकार अयोगवाचक है। उन दोनों के स्वामी गणेश हैं। इनको विशेष रूप से वेदों में देखो।’

हे राजन्! ऐसा कहकर भगवान शिव ने मुझे योग प्रदान करने वाला भगवान गणेश का एकाक्षर मन्त्र विधि-विधान सहित प्रदान कर दिया। तदुपरान्त शिव जी को प्रणाम करके मैं वन में चला गया तथा उनके द्वारा प्रदत्त मन्त्र के जप में लीन होकर भगवान गणेश का भजन किया। गणेश जी की कृपा से मुझे शान्ति की प्राप्ति हो गयी। तथापि मैं उनके पूजन में लीन रहा तथा उनका मन से ध्यान करता रहा।

तदुपरान्त भगवान गणेश ने मुझे अपने सूँड़ युक्त स्वरूप का दर्शन दिया, उनका दर्शन प्राप्त कर मैंने उन्हें प्रणाम किया तथा भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगा। तदुपरान्त अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान कर भगवान गजानन वहाँ से अन्तर्धान हो गये। हे महाभाग! मैं प्रेमपूर्वक गाणपत्य, अर्थात् भगवान गणेश का भक्त हो गया।’

ऐसा कहकर बकदाल्भ्य मुनि ने राजा भद्रसेन को गणेश जी का पाँच अक्षरों वाला मन्त्र प्रदान किया तथा वहाँ से अन्तर्धान हो गये। मुनिवर को प्रणाम करके राजा पुनः अपने नगर में लौट आये एवं मन्त्र की आराधना में लीन हो गये। तदुपरान्त राजा ने सम्पूर्ण प्रजा सहित भक्तिपूर्वक आषाढ़ शुक्लपक्ष में उस चतुर्थी के उत्तम व्रत को किया। तदनन्तर वह चतुर्थी व्रत समस्त भूलोक पर प्रशस्त हो गया। हे राजन्! सभी मनुष्य शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को व्रत का पालन करने लगे।

जब राजा भद्रसेन के राज्य में राजा सहित सभी मनुष्य चतुर्थी व्रत करने लगे, तो उसके राज्य में तोते, मूषक, छिपकली तथा कीट-पतंग आदि सब नष्ट होने लगे। कीट-पतंगों के नष्ट होते ही सम्पूर्ण प्रजा धन-धान्य से सम्पन्न हो गयी तथा सभी लोग स्वस्थ हो गये। समस्त कष्टों से मुक्त होकर सभी आनन्दपूर्वक स्वानन्दवासी एवं ब्रह्मभूत हो गये।

तदुपरान्त राजा भद्रसेन अपने राज्य का कार्यभार पुत्र को सौंपकर पत्नी सहित वन में चले गये तथा अनन्य रूप से भगवान गणेश का भजन करने लगे। हे राजन्! अन्त में राजा अपनी पत्नी सहित स्वानन्दवासी होकर ब्रह्म में लीन हो गये।”

वशिष्ठ मुनि कहते हैं – “हे अजनन्दन दशरथ! अब आप आषाढ़ मास की वर प्रदान करने वाली चतुर्थी के व्रत से उत्पन्न पुण्य-वृद्धि करने वाले तथा भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाले अन्य माहात्म्य का वर्णन श्रवण कीजिये। वंग देश में एक वैश्य के घर में अत्यन्त दुष्ट एवं पापी पुत्र उत्पन्न हुआ। उस वैश्य का पुत्र अपने धर्म को त्यागकर दुष्ट कर्म करने लगा। वह नित्य द्यूत क्रीड़ा, मद्यपान, हत्या तथा बलात्कार जैसे दुष्कर्मों में लिप्त रहता था। वह पापी वैश्यपुत्र परस्त्रियों को बलपूर्वक अधीन कर दुष्कर्म करता था। उसके पापकर्मों के कारण उसके पिता ने अनेक बार उसे घर से तिरस्कृत किया, अन्ततः अपने घर से बारम्बार तिरस्कृत होने से क्षुब्ध होकर उस पापी ने अपने पिता को विष देकर उनकी हत्या कर दी।

विषबाधा से मृत्यु होने के पश्चात् उसने अपने पिता के शव को अग्नि में भस्म कर दिया। तदुपरान्त माता से बलपूर्वक समस्त धन लूट लिया। उसके निन्दनीय कृत्य के विषय में ज्ञात होने पर लोगों को अत्यधिक दुःख हुआ।

तदुपरान्त उस नगर के श्रेष्ठ जन राजा के समीप उपस्थित हुये तथा राजा को वैश्य पुत्र के पापों से अवगत कराया। राजा भी उसके दुष्कृत्यों के विषय में जानकर अत्यन्त आहत हुये तथा तत्क्षण उसे दरबार में बुलवाया। राजा के आदेश पर उस दुष्ट को दरबार में प्रस्तुत किया गया। तदनन्तर हे राजन्! राजा ने उस दुष्ट को मृत्युदण्ड देने का आदेश दिया तथा सभी मनुष्यों ने उस पापी को शूल पर लटका दिया। दैवयोग से उस दिन आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथि थी। उस दिन उस दुष्ट वैश्य पुत्र को अन्न-जल आदि प्राप्त नहीं हुआ था, अर्थात् वह पूर्णतः निराहार था। हे राजन्! अनभिज्ञता में ही व्रत सम्पन्न हो जाने के पुण्यफल से तथा उस व्रत के प्रभाव से वह पापी भी स्वानन्दगामी हो गया। स्वानन्द में पहुँचकर उस दुष्ट ने भगवान गणेश जी का दर्शन किया तथा ब्रह्मभूत हो गया। इस प्रकार व्रत के प्रभाव से अनेकों मनुष्य ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म ही हो गये। इस व्रत के द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करने वाले मनुष्यों की गणना तो किसी योगी के लिये भी दश सहस्र वर्षों में भी करना असम्भव है।

ज्ञानपूर्वक श्रद्धापूर्वक चतुर्थी व्रत का अनुष्ठान करने से निःसन्देह मनुष्य ब्रह्ममय हो जाता है, अर्थात् उसे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इस आषाढ़ मास की वरदा चतुर्थी के माहात्म्य का श्रद्धापूर्वक पाठ एवं श्रवण करने से मनोवाञ्छित फल प्राप्त होता है।”

॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥

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