बुध बुधवार व्रत कथा - हठी पति एवं उसकी नवविवाहिता की विदायी की कथा
भौम मङ्गलवार व्रत कथा - नन्दक ब्राह्मण एवं स्वर्ण उत्सर्जित करने वाली कन्या की कथा
एक समय का वृत्तान्त है, भगवान विष्णु के निर्देशानुसार अमृत की प्राप्ति हेतु दैत्य एवं दानव समुद्रमन्थन कर रहे थे।
प्राचीनकाल में किसी राज्य में एक वृद्धा निवास करती थी। वह वृद्धा प्रति रविवार नियमपूर्वक प्रातः स्नानादि कर्मों से निवृत होकर समस्त घर को गोबर से लीपती थी।
"हे महामते! आपने भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु समस्त प्रदोष व्रतों का वर्णन किया। कृपया अब शनि प्रदोष व्रत की महिमा का वर्णन करें।"
तीनों मित्रों के मध्य अत्यन्त घनिष्ठता थी। उन मित्रों में एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण पुत्र तथा तीसरा एक धनिक का पुत्र था।
शौनक आदि अट्ठासी हजार ऋषियों के समक्ष बृहस्पति त्रयोदशी प्रदोष व्रत की कथा का वर्णन करते हुये सूतजी कहते हैं
मङ्गल प्रदोष व्रत की कथा सुनाने के उपरान्त सूतजी, शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं कि "अब मैं बुध त्रयोदशी प्रदोष की कथा का वर्णन करता हूँ, आप सभी ध्यानपूर्वक श्रवण करें
सोम प्रदोष व्रत कथा का श्रवण करने के पश्चात् शौनक ऋषि सूतजी से बोले - "कृपया अब मङ्गल प्रदोष की कथा का वर्णन करने की कृपा करें।"
रवि प्रदोष व्रत की कथा श्रवण करने के पश्चात् शौनकादि ऋषि ने कहा - "हे मुनिश्रेष्ठ सूतजी! अब आप हमें सोम त्रयोदशी प्रदोष की कथा सुनाने की कृपा करें।"


