Moon Monday Vrat Katha – चन्द्र सोमवार व्रत कथा
चन्द्र सोमवार व्रत कथा – भगवान शिव से चन्द्रदेव को वरदान प्राप्ति की कथा
एक समय का वृत्तान्त है, भगवान विष्णु के निर्देशानुसार अमृत की प्राप्ति हेतु दैत्य एवं दानव समुद्रमन्थन कर रहे थे। समुद्रमन्थन में हलाहल विष निकलते ही समस्त लोकों में हाहाकार हो गया। विष के प्रभाव से समस्त प्राणियों को श्वास लेने में कठिनाई होने लगी। समस्त सृष्टि को नष्ट होता देख भगवान शिव ने संसार की रक्षा हेतु हलाहल विष का पान कर लिया। भगवान शिव ने उस अनिष्टकारी विष को अपने कण्ठ में धारण कर लिया जिसके प्रभाव से उनका कण्ठ नीला हो गया तथा वे नीलकण्ठ के नाम से प्रसिद्ध हुये।
हलाहल के प्रभाव से भगवान शिव की देह अत्यन्त दहकने लगी तथा उन्हें अत्यन्त ऊष्मा की अनुभूति होने लगी। नाना प्रकार के उपाय करने पर भी जब शिव जी की पीड़ा शान्त नहीं हुयी तब चन्द्रदेव वहाँ उपस्थित हुये तथा बोले – “हे भोलेनाथ! मैं सृष्टि में अपनी शीतलता के लिये ही विख्यात हूँ, अतः आप मुझे अपने मस्तक पर धारण करने का सौभाग्य मुझे प्रदान करें। ऐसा करने से निश्चित् ही विष के कारण उत्पन्न ऊष्मा शान्त हो जायेगी तथा आपको शीतलता का अनुभव होगा।”
भगवान शिव ने चन्द्रदेव का अनुरोध स्वीकार करते हुये उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लिया जिसके कारण उन्हें अत्यन्त शीतलता प्राप्त हुयी तथा विष जनित पीड़ा का अन्त हो गया। उस समय भगवान शिव ने प्रसन्न होकर चन्द्रदेव को यह वरदान देते हुये कहा कि – “हे चन्द्रदेव! आपने अपनी शीतलता से हमारी पीड़ा का शमन किया है। हम आपको यह वरदान प्रदान करते हैं कि आज से संसार में सोमवार को हमारी पूजा के साथ आपकी पूजा-अर्चना भी की जायेगी। सोमवार को जो भी पूर्ण भक्तिभाव से चन्द्रदेव के निमित्त व्रत का पालन करेगा तथा सन्ध्याकाल में अर्घ्य अर्पण कर व्रत सम्पन्न करेगा उसकी समस्त मानसिक समस्याओं का अन्त होगा तथा उसे सुख-शान्ति प्राप्त होगी।” इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से चन्द्रदेव तीनों लोकों में पूजनीय हो गये।
अग्निपुराण में प्राप्त कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि सृजन के उद्देश्य से मानस पुत्रों की रचना की। इन्हीं मानस पुत्रों में एक अत्रि ऋषि थे। अत्रि ऋषि का विवाह महर्षि कर्दम की कन्या देवी अनसूया से हुआ। देवी अनसूया को त्रिदेवों से वरदान स्वरूप तीन पुत्र प्राप्त हुये जो ऋषि दुर्वासा, भगवान दत्तात्रेय एवं सोम अर्थात् चन्द्रदेव के नाम से विख्यात हुये।
कालान्तर में दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रदेव से किया था। विवाहोपरान्त चन्द्र केवल रोहिणी से सर्वाधिक प्रेम करने लगे तथा अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे। उनके इस कृत्य से आहत होकर दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याओं ने अपनी यह व्यथा अपने पिता के समक्ष वर्णित की। दक्ष प्रजापति ने चन्द्रदेव को इस विषय में नाना प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया। किन्तु रोहिणी के मोह में वशीभूत चन्द्रदेव पर दक्ष प्रजापति के वचनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्ततः दक्ष प्रजापति कुपित हो उठे तथा उन्होंने चन्द्रदेव को श्राप दे दिया कि – “हे चन्द्रदेव! अपने जिस रूप-रंग के मद में चूर होकर तुम अपनी अन्य पत्नियों का निरादर कर रहे हो, तुम्हारा वही रूप क्षयरोग से ग्रस्त हो जाये।”
दक्ष प्रजापति द्वार दिये श्राप के कारण चन्द्रदेव तत्काल क्षयरोग से ग्रस्त हो गये। चन्द्रदेव के क्षयरोग से ग्रस्त होते ही पृथ्वी पर सुधा-शीतलता तथा वर्षण आदि का क्रम बाधित हो गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि होने लगी। चन्द्रदेव भी अत्यन्त द्रवित एवं चिन्तित थे। उन्हें अपनी त्रुटि का अनुभव हो गया था। उन्होंने अपनी पीड़ा देवराज इन्द्र से कही। चन्द्र के निवेदन पर इन्द्रादि देवगण, वसिष्ठ आदि ऋषिगण सहित उनकी समस्या के समाधान हेतु ब्रह्माजी के समीप उपस्थित हुये। ब्रह्माजी ने कहा – “हे चन्द्र! अपने शाप-विमोचन हेतु तुम अन्य देवगणों सहित पवित्र प्रभासक्षेत्र में मृत्युञ्जय भगवान शिव की आराधना करो। उनकी कृपा से अवश्य ही तुम रोगमुक्त हो जाओगे।”
ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार चन्द्रदेव ने भगवान शिव के मृत्युञ्जय मन्त्र से घोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर मृत्युञ्जय भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा इच्छित वर माँगने को कहा। चन्द्रमा ने रोगमुक्त होने का वरदान शिव जी से माँगा। भगवान शिव ने चन्द्रदेव को अमरत्व का वर प्रदान करते हुये कहा – “हे चन्द्रदेव! तुम व्यथित मत हो, मेरे वरदान के प्रभाव से तुम्हारे श्राप का निवारण होगा।” यह कहते हुये भगवान शिव ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया तथा सोमेश्वर नाथ के रूप में प्रतिष्ठित हुये।
भगवान शिव ने कहा – “दक्ष प्रजापति के श्राप की मर्यादा रखते हुये हम उसे पूर्णतः खण्डित नहीं करेंगे। परन्तु कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी तथा पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से उसमें वृद्धि होती जायेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चन्द्रत्व प्राप्त होता रहेगा। इसके अतिरिक्त जो भी प्राणी तुम्हारे निमित्त सोमवार व्रत एवं पूजन करेगा तथा अर्घ्य अर्पित करेगा, उसे भी विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति प्राप्त होगी।” चन्द्रदेव को वरदान प्राप्त होने से समस्त लोकों के प्राणी हर्षित हो उठे। भगवान चन्द्र पुनः दसों दिशाओं में सुधा-वर्षण का कार्य पूर्ववत् करने लगे।
॥इति श्री चन्द्र सोमवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥




