Shukra Friday Vrat Katha - शुक्र शुक्रवार व्रत कथा
व्रत कथा

Shukra Friday Vrat Katha – शुक्र शुक्रवार व्रत कथा

Shukra Friday Vrat Katha – शुक्र शुक्रवार व्रत कथा

शुक्र शुक्रवार व्रत कथा – भगवान शुक्र, एक वृद्धा एवं उसकी बहु की कथा

प्राचीन समय की बात है, किसी ग्राम में एक वृद्धा अपने पुत्र एवं बहु के साथ निवास करती थी। वृद्धा के मन्दिर में भगवान शुक्र की एक अत्यन्त सुन्दर मूर्ति विराजमान थी। वह वृद्धा प्रतिदिन नियमपूर्वक भगवान शुक्र की मूर्ति को स्नान कराकर विधवत् पूजा-अर्चना करती थी। इसके अतिरिक्त वह प्रत्येक शुक्रवार को शुक्रवार व्रत का पालन करती थी। शुक्रदेव की कृपा से उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण था। उसका पुत्र किसी अन्य नगर में जीवकोपार्जन करता था तथा प्रति माह घर पर कुटुम्ब से भेंट करने आता था। शुक्रदेव की छत्रछाया में सम्पूर्ण कुटुम्ब आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था।

एक बार वृद्धा ने तीर्थाटन करने का निर्णय किया तथा वह अपनी बहु से बोली – “बहु! मैं विभिन्न तीर्थों के दर्शन करने हेतु तीर्थयात्रा करने जा रही हूँ। यात्रा से लौटने तक तुम नियमपूर्वक प्रतिदिन शुक्रदेव को स्नान कराकर उनकी पूजा-अर्चना करना तथा उन्हें भोग आदि अर्पित करने के उपरान्त ही स्वयं भोजन ग्रहण करना।” बहु ने कहा – “जैसी आपकी आज्ञा माँ जी! मैं अवश्य ही विधिपूर्वक शुक्रदेव का पूजन करूँगी। आप निश्चिन्त होकर अपनी तीर्थयात्रा सम्पन्न कीजिये।” इस प्रकार बहु को पूजन आदि का उत्तरदायित्व सौंपकर वृद्धा ने तीर्थाटन हेतु प्रस्थान किया।

अगले दिवस जब बहु शुक्रदेव को स्नान करवा रही थी तो वह मूर्ति बहु को देखकर हँसने लगी। मूर्ति को हँसता देखकर बहु भयभीत हो गयी। उसी समय वहाँ पनिहारिन आ गयी। बहु ने उससे कहा – “यह मूर्ति मुझे देखकर हँस रही है, क्या तुम इसे अपने घर ले जा सकती हो?” पनिहारिन बोली – “बहन! मेरे घर में भी बहु-बेटी हैं, मैं ऐसी मूर्ति को अपने घर नहीं ले जा सकती। किन्तु मेरे पास एक सुझाव है, तुम मुझे यह मूर्ति दो मैं इसे गड्ढा खोदकर भूमिगत कर देती हूँ। तदुपरान्त तुम्हें इससे कोई भय नहीं रहेगा।” उसके सुझाव को स्वीकार करते हुये बहु ने शुक्रदेव की मूर्ति उसे प्रदान कर दी। पनिहारिन ने वह मूर्ति वृद्धा के घर के बाहर ही एक गड्ढे में भूमिगत कर दी।

बहु के इस कृत्य से भगवान शुक्र अत्यन्त क्रोधित हो गये। शुक्रदेव के कुपित होते ही उस घर में विनाश का क्रम आरम्भ हो गया। वृद्धा के पुत्र की आजीविका बन्द हो गयी। उसे कोई भी कार्य नहीं मिल रहा था। बहु नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित हो गयी। उनके जीवन से सभी प्रकार के भोग-विलास नष्ट हो गये। धन के अभाव में भोजन तक का सङ्कट उत्पन्न हो गया। उसी समय वृद्धा तीर्थयात्रा सम्पूर्ण कर घर लौट आयी। रात्रिकाल का समय एवं यात्रा की थकान होने के कारण वृद्धा आते ही शयन करने चली गयी।

स्वप्न में भगवान शुक्र ने वृद्धा को दर्शन दिया तथा कहा कि – “हे माता! तुम्हारी बहु ने मेरा अपमान किया है। उसने मेरी पूजा-अर्चना का नियम भङ्ग किया तथा मेरी मूर्ति को भी घर से निष्कासित कर दिया। अतः मेरे कोप के कारण अब इन्हें घोर दरिद्रता भोगनी पड़ रही है। तुम मेरी मूर्ति को वहाँ से निकाल कर विधि-विधान से सपरिवार पूजन एवं व्रत करो। इसके उपरान्त ही तुम्हें इस दरिद्रता एवं कष्ट से मुक्ति प्राप्त होगी।”

प्रातः उठते ही वृद्धा सर्वप्रथम घर के मन्दिर में गयी तो देखा कि वहाँ शुक्रदेव की मूर्ति नहीं हैं। वृद्धा ने इसके विषय में बहु से प्रश्न किया तो उसने कहा कि – “मैंने वह मूर्ति पनिहारिन को दे दी।” पनिहारिन से पूछने पर उसने कहा कि – “मैंने वह मूर्ति आपकी बहु के कहने पर आपके घर के बाहर ही एक गड्ढे में गाड़ दी है।” यह सुनकर वृद्धा अत्यन्त व्याकुल हुयी तथा भागी-भागी अपने घर पहुँची। घर पहुँचकर तत्काल वृद्धा ने शुक्रदेव की मूर्ति को गड्ढे से निकालकर स्नान आदि कराया तथा पूर्ण भक्तिभाव से भगवान शुक्र का विधिपूर्वक पूजन एवं व्रत किया।

भगवान शुक्र की कृपादृष्टि से पुनः उनके घर में धन-धान्य की वृद्धि होने लगी। वृद्धा, उसकी बहु एवं पुत्र सभी नियमपूर्वक प्रतिदिन शुक्रदेव का पूजन एवं शुक्रवार का व्रत करने लगे। उनका जीवन समस्त प्रकार की सुख-सुविधाओं एवं आनन्द से परिपूर्ण हो गया। जिस प्रकार शुक्र भगवान ने उस वृद्धा का जीवन सुखमय किया उसी प्रकार इस शुक्रवार कथा को पढ़ने एवं सुनने वाले के जीवन में भी समस्त प्रकार के सुखों का आगमन होता है।

॥इति श्री शुक्र शुक्रवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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