Pithori Amavasya Vrat Katha - पिठोरी अमावस्या व्रत कथा
व्रत कथा

Pithori Amavasya Vrat Katha – पिठोरी अमावस्या व्रत कथा

Pithori Amavasya Vrat Katha – पिठोरी अमावस्या व्रत कथा

पिठोरी अमावस्या व्रत कथा – विदेहा नामक ब्राह्मणी के आठ मृत पुत्रों के पुनर्जीवित होने की कथा

इन्द्राणी ने माता पार्वती से निवेदन किया कि – “हे पार्वती जी! जिस सर्वोत्तम व्रत का पालन करने से निपुत्री को पुत्र तथा इस लोक में एवं परलोक में अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्यफल प्राप्त हो, ऐसे व्रत का वर्णन करने की कृपा करें।”

माता पार्वती ने उत्तर दिया – “पूर्वकाल में एक अत्यन्त धनाढ्य ब्राह्मण था जिसका नाम श्रीधर था। उसके आठ पुत्र थे। उसकी धर्मपत्नी का नाम सुमित्रा था जो सदैव गृहधर्म के अनुरूप ही आचरण करती थी। उसके ज्येष्ठ पुत्र का नाम शङ्कर था एवं उसकी विदेहा नामक एक पत्नी थी। अज्ञात कारणों से शङ्कर की पत्नी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी। एक समय की बात है श्रीधर के पिता के श्राद्ध के दिन विदेहा प्रसूता हुयी एवं मृत शिशु को जन्म दिया। इस पर उसकी माँ सुमित्रा ने विदेहा को बहुत डाँटा। माँ की डाँट से क्षुब्ध होकर विदेहा मृत शिशु को लेकर वन की ओर चल पड़ी। वह वन में मृत शिशु को लेकर निराश्रय होकर इधर-उधर भटक रही थी।

कुछ समय पश्चात् उसे एक मठ दृष्टिगोचर हुआ। वहाँ एक विशाल नदी भी थी। वह जाकर उसी मठ में बैठ गयी। मठ में उपस्थित सभी लोग आश्चर्यपूर्वक उसे बारम्बार देखने लगे एवं विचार करने लगे कि – ‘सभी सुलक्षणों से युक्त यह स्त्री कौन है एवं कहाँ से आयी है?’ मठ के स्वामियों ने शीघ्र ही आपस में विचार-विमर्श करके विदेहा से कहा कि – ‘यहाँ भयङ्कर एवं विकराल यक्ष निवास करते हैं। तू यहाँ से अन्यत्र चली जा अन्यथा वे सभी तेरा भक्षण कर लेंगे।’

यह सुनकर विदेहा बोली कि – ‘हे प्रभो! मैं दुःखों से पीड़ित हो वन-वन भटक रही हूँ, मेरा अन्यत्र कोई आश्रय नहीं है। वे यक्ष भी भला मेरा क्यों ही भक्षण करेंगे? मेरा कल्याण कैसे हो, कृपया मार्गदर्शन करें।’

विदेहा की व्यथा सुनकर मठ की मुख्य स्त्री सदय हृदय से बोली – ‘इस स्थान पर चौंसठ योगिनी एवं दिव्य योगी आदिक निवास करते हैं। वे सभी पूजा-अर्चना करने हेतु यहाँ उपस्थित होते हैं। यदि उनसे प्रार्थना करोगी तो वे तुम्हारे कार्य को अवश्य पूर्ण कर देंगे। वे तेरे बालकों को भी जीवित कर देंगे। इस समय तुम बेलपत्रों में छुप जाओ। जब वे पूछें, कोई अतिथि है? उस समय “है” कहकर उनके समक्ष प्रकट हो जाना।’ मठनारी के वचन सुनकर विदेहा को दृढ़ विश्वास हो गया तथा वह उनके निर्देशानुसार बेलपत्रों में छुपकर बैठ गयी। कुछ समय पश्चात् ही वे सभी झोटिंग अर्थात् बड़े-बड़े केशों वाले यक्ष मठ के मध्य में उपस्थित हुये। उन्हें मनुष्य की गन्ध की अनुभूति हुयी तो वे बोले – ‘घर में मनुष्य की गन्ध कहाँ से आ रही है?’ वह इस प्रकार चर्चा कर ही रहे थे कि सुन्दर मन्दहास वाली चौंसठ योगिनी मध्यरात्रि में वहाँ उपस्थित हो गयीं। वे अनेकों महारत्न एवं नाना प्रकार के फलों से वहाँ विराजमान मठदेवी की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने लगीं। उस दिन श्रावण (पूर्णिमान्त भाद्रपद) कृष्ण अमावस्या थी।

पूजन सम्पन्न करके वह बोली कि – ‘कोई अतिथि है क्या?’ यह सुनते ही “मैं हूँ” कहकर विदेहा उनके सम्मुख प्रकट हो गयी। विदेहा ने योगनियों से अपनी व्यथा वर्णित करते हुये निवेदन किया कि – ‘हे माताओं! मैं पापिन बन गयी, मेरे शिशु की मृत्यु हो गयी, मैं उस शिशु सहित आपके समक्ष उपस्थित हूँ, इसी प्रकार मेरे सात बालक हुये एवं मृत्यु को प्राप्त हो गये, इसी कारण में अत्यन्त दुखी हूँ। आज मेरे सौभाग्य से आपका दर्शन हुआ है। आपकी कृपा से मेरे बालक जीवित हो जायें तथा भविष्य में जन्म लेने वाले शिशुओं की मृत्यु न हो, ऐसी कृपा करें।’

विदेहा के करुण वचन सुनकर योगनियों को अत्यन्त दया आयी, उन्होंने वहाँ जो नैवेद्य रखा हुआ था वह विदेहा को प्रदान कर दिया। चौंसठ योगिनी उससे प्रसन्न होकर बोलीं कि – ‘हे श्रीधर की पुत्रवधू! शङ्कर की प्राणप्यारी! हमारा यह वरदान है कि इस लोक में तू पुत्र-पौत्रादि का सुख भोगकर स्वर्गलोक में पूज्य होगी। तेरे आठों पुत्र जीवित होकर तेरे समीप अभी उपस्थित होंगे, तुम जिस मार्ग से आयी हो उसी से लौट जाओ।’ इस प्रकार वर प्रदान कर योगनी अन्तर्धान हो गयीं।

उसी समय आठों पुत्र जीवित होकर विदेहा के समीप आ गये। वह योगनियों का ध्यान करती हुयी अपने नगर एवं घर आ गयी। श्रीधर, सुमित्रा, शङ्कर एवं उसके भ्राता विदेहा को आठ पुत्रों सहित आते देख अत्यन्त प्रसन्न हुये तथा मङ्गल उत्सव सहित उसका स्वागत-सत्कार किया। पुत्रवधू एवं पुत्रों को पुनः प्राप्त कर उनके कुटुम्ब में सभी आनन्दित हुये। तदुपरान्त विदेहा ने पिठोरी अमावस के दिन ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रपाठ, ढोलक, नक्काड़े, मृदङ्ग आदि की ध्वनि, गायन, वादन एवं नृत्य आदि अनेक प्रकार के मङ्गलाचार सहित श्रद्धापूर्वक एक साथ चौंसठों योगिनियों का पूजन किया।

इन योगनियों के स्मरण मात्र से स्त्री को पुत्र, पौत्र एवं धन-सम्पदा की प्राप्ति होती है तथा वह इन्द्राणी के समान सुखी हो जाती है। हे इन्द्राणि! उनके नामों का श्रवण करो जो इस प्रकार हैं – दिव्ययोगी, महायोगी, सिद्धयोगी, गणेश्वरी, प्रेताक्षी, डाकिनी, काली, कालरात्रि, निशाचरी, झकारी, रौद्रवेताली, भुत्तली, भूतडंवरी, ऊर्ध्वकेशी, विरूपाक्षी, शुष्काङ्गी, नरभोजिनी, भट्टारी, वीरभद्रा, धूम्राक्षी, कलहप्रिया, राक्षसी, घोरक्ताक्षी, विश्वरूपा, भयङ्करी, चण्डिका, वीरकौमारी, वाराही, मुण्डधारिणी, सासुरी, रोद्रग्रहणी, चक्री, कंकाली, भुवनेश्वरी, खट्वाङ्गी, दीर्घलम्बोष्टी, मालिनी, मन्त्रयोगिनी, कालाग्निहणी, चित्रिणी, कंकाली, भुवनेश्वरी, कटकी, कीटिनी, रौद्री, यमदूती, गरालिनी, कोराक्षी, कार्मुकी, काकदृष्टि, अधोमुखी, मुण्डाग्रधारिणी, व्याघ्री, किंकिनी, प्रेतभाषिणी, कालरूपा, कामाक्षी, उष्ट्रिणी, योगपीठिका, महालक्ष्मी, एकवीरा, कालरात्रि, पीठिका एवं गान्धारी, ये चौसठ योगिनियाँ हैं। इन्हीं नामों से श्रद्धा एवं भक्तिभाव से इनका पूजन करना चाहिये। इनसे प्रार्थना करते हुये कहें कि – ‘मैं आप चौंसठ देवियों की शरण में हूँ, मैंने पुत्र एवं लक्ष्मी की वृद्धि की कामना से भक्तिपूर्वक आपका पूजन किया है।'”

माता पार्वती कहती हैं – “हे इन्द्राणि! इस पिठोरी नाम के महाव्रत का वर्णन मैंने आपके सम्मुख किया है। जो स्त्रियाँ इस व्रत का श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक पालन करेंगी उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे एवं वे कृतकृत्य हो जायेंगी। इस व्रत को करने वाली स्त्रियाँ चौंसठ योगिनियों की कृपा से पुत्र एवं पौत्रों से युक्त हो जायेंगी।” इस प्रकार भविष्यपुराण में वर्णित पिठोरी व्रत सम्पूर्ण होता है।

॥इति श्री पिठोरी अमावस्या व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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