Maa Kali Saturday Vrat Katha - माँ काली शनिवार व्रत कथा
व्रत कथा

Maa Kali Saturday Vrat Katha – माँ काली शनिवार व्रत कथा

Maa Kali Saturday Vrat Katha – माँ काली शनिवार व्रत कथा

माँ काली शनिवार व्रत कथा – सेवानिवृत्त प्राध्यापक की मांगलिक पुत्री के विवाह में विलम्ब की कथा

किसी महानगर में कालीचरण नामक एक सेवानिवृत्त प्राध्यापक निवास करते थे। उनके साथ ही उनकी पत्नी शीला देवी, पुत्र दीपक, पुत्री पूजा एवं पुत्रवधू दुर्गा भी रहते थे। सेवानिवृत्ति के समय दीपक 22 वर्ष एवं पुत्री पूजा 15 वर्ष की थी। सेवानिवृत्ति के उपरान्त कालीचरण जी ने अपनी लगभग समस्त जमा पूँजी गृह निर्माण में लगा दी। जो कुछ धन शेष था वह पुत्र दीपक के विवाह में व्यय हो गया था।

घर की आर्थिक स्थिति यह थी कि पुत्री पूजा 22 वर्ष की हो चुकी थी और उसके विवाह हेतु धन ही नहीं था। एक अन्य बाधा यह भी थी कि पूजा की कुण्डली में मङ्गल दोष था, अतः वह माङ्गलिक थी एवं उससे विवाह हेतु वर का भी माङ्गलिक होना आवश्यक था।

एक दिन पुत्रवधू दुर्गा की किसी सहेली ने उसे माँ काली का शनिवार व्रत करने का सुझाव दिया। उसकी सहेली ने कहा – “माँ काली का 9 शनिवार व्रत करने से माता की कृपा से समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा विघ्न बाधाओं का निवारण होता है।” कुटुम्ब के सभी सदस्य पूजा के विवाह हेतु अत्यन्त दुखी एवं चिन्तित रहते थे। अतः सास, बहू एवं ननद तीनों ने यह व्रत करने का निश्चय किया।

अभी उन सभी ने दो शनिवार व्रत किया ही था कि माँ की कृपा से पूजा को एक अच्छी नौकरी मिल गयी। दो माह में ही पूजा की कार्यनिष्ठा व कुशलता के कारण उसकी पदोन्नति सहित वेतन वृद्धि हो गयी। गृहस्थी का आर्थिक भार दीपक वहन कर रहा था। वे लोग पूजा के वेतन का अधिकांश भाग उसके विवाह हेतु सङ्गृहीत करने लगे। तदनन्तर दीपक को भी पदोन्नति मिल गयी।

एक दिन बातों ही बातों में दीपक के एक सहकर्मी मित्र ने उससे कहा कि – “मेरे मामा जी का पुत्र मङ्गली है जिसके कारण उसके विवाह हेतु कन्या ढूँढने में अत्यन्त कठिनाई हो रही है, यदि कोई माङ्गलिक एवं सुलक्षणी कन्या मिल जाये तो वे बिना किसी दान-दहेज के ही अपने पुत्र का विवाह कर देंगे।”

दीपक अपने मित्र के मामा जी के घर गया तथा वहाँ उनसे एवं उनके पुत्र शिवकुमार से भेंट की। मित्र के मामा एवं उनके पुत्र से भेंट करने के उपरान्त दीपक ने घर आकर यह शुभ-सूचना सभी कुटुम्बीजनों को दी। पुत्री के विवाह की आशा से सभी अत्यन्त प्रसन्न हुये तथा माँ काली को धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया।

आगामी रविवार को शिवकुमार के माता-पिता अपने परिवार सहित दीपक के घर आये। पूजा उनके लिये जलपान आदि लेकर आयी तथा दोनों परिवारों में वार्तालाप होने लगा। दोनों परिवारों के मध्य विवाह के विषय में चर्चा हो रही थी। दीपक के माता-पिता, पत्नी तथा पूजा को शिवकुमार विवाह हेतु उचित लगा। शिवकुमार के पिता जी भी पूजा से अत्यन्त प्रभावित थे, उन्होंने कालीचरण जी से कहा – “हमें पूजा अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार है, हमें कोई दान-दहेज नहीं चाहिये, हम एक साड़ी में ही इसे विदा करके ले जायेंगे। आप शीघ्रातिशीघ्र पण्डित जी से विवाह का उत्तम मुहूर्त निकलवा लीजिये।”

माँ काली के 9 शनिवारों के व्रत के उद्यापन से छः माह के अन्दर ही माँ की कृपा से यह दुर्गम कार्य सिद्ध हो गया था। सन्ध्याकाल में पूरे परिवार ने माँ काली की विधिवत् पूजा-अर्चना करते हुये पुत्री पूजा के निर्विघ्न विवाह हेतु प्रार्थना की। पूजनोपरान्त सभी ने माँ काली से विवाह के समुचित प्रबन्ध का अनुरोध करते हुये कहा कि – “हे माता! हम सभी पूर्ण श्रद्धाभाव से 9 शनिवार आपका व्रत करेंगे। विवाह का सम्पूर्ण प्रबन्ध आपको ही करना है।”

तदुपरान्त परिवार के सभी सदस्य नित्य-निरन्तर माँ काली की भक्ति में लीन रहने लगे। पूर्ण कुटुम्ब दोनों समय माँ भगवती काली की आराधना करता था। पूजा नौकरी पर जाती थी तथा प्रत्येक शनिवार को उसके माता-पिता एवं भाभी व्रत करते थे। प्रत्येक शनिवार को वे पूजा के विवाह हेतु माता से प्रार्थना करते एवं भक्तिभाव से उनका पूजन करते थे। माता के भजनों का गायन करते तथा माँ काली की चालीसा, स्तोत्र आदि का नियमित पाठ करते थे।

एक रात्रि में भगवती काली ने पूजा के पिता को स्वप्न में दर्शन देते हुये कहा – “हे पुत्र! तू कल लॉटरी का एक टिकट ले ले, तुझे प्रथम पुरस्कार प्राप्त होगा।” प्रातःकाल पूजा के पिता ने माता की आज्ञानुसार लॉटरी का एक टिकट ले लिया तथा उसे माता की मूर्ति के चरणों में रख दिया। माता के कथनानुसार कालीचरण को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ तथा एक माह से पूर्व ही उसे 10 लाख की धनराशि प्राप्त हुयी। दीपक को अपनी भविष्य निधि का धन भी प्राप्त हो गया था। अब तक पूजा का वेतन भी एकत्रित हो चुका था। अतः अत्यन्त धूमधाम एवं भव्यता पूर्वक पूजा का विवाह सम्पन्न हुआ।

माँ काली की कृपा से विवाह के पश्चात् भी अत्यधिक धन शेष रह गया था जिसकी सहायता से कालीचरण जी ने माँ भगवती के विशाल जागरण का आयोजन किया। उस जागरण में अधिकांश पड़ोसी, सम्बन्धी एवं प्रियजन प्रसन्नतापूर्वक सम्मिलित हुये। भगवती कालिका के साक्षात् चमत्कार से प्रभावित होकर उनमें से अधिकांश ने माँ काली की पूजा एवं 9 शनिवारों का व्रत आरम्भ कर दिया।

हे माँ काली! जिस प्रकार आपने पूजा एवं उसके परिवार के सङ्कटों को दूर कर उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान की एवं सभी कार्य सिद्ध किये, उसी प्रकार इस कथा का पाठ एवं श्रवण करने वाले तथा 9 शनिवार माँ काली का व्रत करने वाले सभी भक्तों के कष्टों का निवारण कर उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान करना। माँ काली की जय! भैरव बाबा की जय!

॥इति श्री काली शनिवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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