Anant Chaturdashi Vrat Katha – अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा
अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा – कौण्डिल्य ऋषि एवं उनकी पत्नी सुशीला की कथा
प्राचीनकाल में एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में दुर्योधन आदि अन्य कौरव भी आमन्त्रित थे। युधिष्ठिर जी के महल का निर्माण अत्यन्त विलक्षण रूप से किया गया था। उस महल में थल के स्थान पर जल एवं जल के स्थान पर थल की अनुभूति होती थी। दुर्योधन भी उनके महल की सुन्दरता एवं भव्यता को निहार रहा था। उसी समय थल का भ्रम होने पर दुर्योधन ने ज्यों ही अपना पग आगे उठाया, वह जल के कुण्ड में जा गिरा।
द्रौपदी ने अपने कक्ष से दुर्योधन को जल में गिरता देख लिया तथा उपहास करते हुये बोलीं – “अन्धे की सन्तान भी अन्धी।” द्रौपदी के मुख से निकले यह शब्दबाण दुर्योधन के हृदय को भेद गये।
दुर्योधन ने इस विषय में मामा शकुनि से चर्चा की। शकुनि के सुझाव पर दुर्योधन ने कुछ दिवस उपरान्त पाण्डवों को द्यूत क्रीड़ा का आमन्त्रण दिया। शकुनि द्यूत क्रीड़ा में पारङ्गत था। उसके पासे उसकी आज्ञा के अनुरूप ही अङ्क लाते थे। शकुनि एवं दुर्योधन ने छलपूर्वक पाण्डवों को द्यूत क्रीड़ा में परास्त कर दिया। उस क्रीड़ा में पाण्डवों ने अपना सर्वस्व लुटा दिया। यहाँ तक कि उन्हें द्रौपदी को भी दाँव पर लगाना पड़ा। अन्ततः उन्हें पराजय के दण्ड स्वरूप बारह वर्ष का वनवास भी दे दिया गया।
एक दिन वनवास भोग रहे पाण्डवों से भेंट करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण वन में पधारे। महाराज युधिष्ठिर ने अपनी सम्पूर्ण व्यथा सुनाते हुये श्रीकृष्ण से इस सङ्कट के निवारण का मार्ग बताने का निवेदन किया। भगवान कृष्ण ने उन्हें अनन्त व्रत करने का सुझाव दिया एवं कहा – “इस व्रत को करने से निश्चित ही तुम्हें तुम्हारा राज्य पुनः प्राप्त होगा।” व्रत का विधान वर्णित करने के उपरान्त श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा – “अब मैं तुम्हें इस व्रत से सम्बन्धित एक कथा सुनाता हूँ, कृपया श्रद्धा एवं ध्यानपूर्वक श्रवण करो –
प्राचीनकाल में एक अत्यन्त ही धर्मनिष्ठ एवं पुण्यात्मा ब्राह्मण था। उसका नाम सुमन्त था। सुमन्त की सुशीला नाम की एक कन्या थी। उचित आयु होने पर सुमन्त ने अपनी पुत्री का विवाह कौण्डिल्य नामक ऋषि से करवा दिया। कौण्डिल्य ऋषि सुशीला को विदा कराकर अपने आश्रम की ओर यात्रा कर रहे थे। मार्ग में ही सायाह्नकाल का समय हो गया जिसके कारण ऋषिवर एक नदी के तट पर सन्ध्या आदि करने हेतु रुक गये। इधर ऋषि अपने सन्ध्या वन्दन में लीन थे उधर उनकी सहधर्मिणी सुशीला ने अनेक स्त्रियों को किसी देवता का पूजन करते हुये देखा।
सुशीला ने जिज्ञासा प्रकट करते हुये उनसे पूछा – ‘आप सभी यह कौन सा पूजन कर रही हैं तथा यह किस देवता को समर्पित है?’ सुशीला के प्रश्न करने पर उन सभी ने अनन्त व्रत का विस्तृत वर्णन करते हुये कहा कि – ‘यह भगवान अनन्त को समर्पित अत्यन्त प्रिय व्रत है। इसको करने से समस्त मनोरथों की सिद्धि सहज ही हो जाती है।’ उन सभी के मुख से अनन्त व्रत की विधि एवं माहात्म्य ज्ञात करके सुशीला ने भी उस व्रत को ग्रहण कर लिया तथा चौदह गाँठो वाला सूत्र (धागा) अपने हाथ में बाँध लिया। इस धागे को अनन्त सूत्र कहा जाता है। पूजनोपरान्त वह अपने पति के समीप आ गयी।
कौण्डिल्य ऋषि की दृष्टि जब सुशीला के हाथ में बँधे उस अनन्त सूत्र पर पड़ी तो उन्होंने पूछा – ‘हे सुभगे! यह आपके हाथ में किस प्रकार का सूत्र बँधा है?’ सुशीला ने अपने पति के समक्ष उन स्त्रियों द्वारा किये जाने वाले अनन्त व्रत के विषय में सम्पूर्ण वृत्तान्त वर्णित कर दिया। सुशीला के वचनों से ऋषिवर क्रोधित हो गये तथा उन्होंने उसके हाथ में बँधे उस सूत्र को तोड़कर अग्नि में भस्म कर दिया। उनके इस कृत्य से अनन्त भगवान का अनादर हो गया।
भगवान की अवज्ञा के परिणामस्वरूप कौण्डिल्य ऋषि की समस्त सुख-सम्पदा का नाश हो गया। बहुत विचार करने पर जब उन्हें इसका कारण ज्ञात नहीं हुआ तो सुशीला ने उनसे विनयपूर्वक कहा – ‘हे स्वामी! आपके द्वारा किये गये अनन्त सूत्र के अनादर के कारण ही समस्त सुख-सम्पत्ति नष्ट हुयी है।’ यह सुनकर अपने पाप का पश्चात्ताप करने हेतु ऋषिवर अनन्त भगवान को खोजते हुये वन में चले गये। वन में भगवान को खोजते हुये वे इधर से उधर भटक रहे थे। बहुत समय व्यतीत होने पर भी जब उन्हें प्रभु के दर्शन नहीं हुये तो ऋषिवर व्याकुल होकर मूर्छित हो गये।
वन में उन्हें एक स्थान पर आम्र, गौ, वृष, खर, पुष्करिणी एवं एक वृद्ध ब्राह्मण मिले। ब्राह्मण के रूप में वे स्वयं भगवान अनन्त ही थे। वह ऋषि कौण्डिल्य को एक गुहा में ले गये। वहाँ वे ऋषि से बोले – ‘वह आम्र पूर्वजन्म में वेदपाठी ब्राह्मण था जिसने विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान नहीं की इसीलिये आम हो गया। गौ रूप में पृथ्वी थी जो बिजापहरण के कारण गौ हो गयी, वृष धर्म का रूप है एवं खर क्रोध का तथा दो बहनें थीं जो एक दूसरे को ही दान आदि करने के कारण पुष्करिणी हो गयीं तथा वृद्ध ब्राह्मण के रूप में, मैं स्वयं अनन्त हूँ। हे ऋषिवर! मेरे अपमान के कारण ही आपको यह दुःख एवं कष्ट भोगने पड़े हैं। आपके निर्मल हृदय से पश्चात्ताप करने के कारण में आपसे प्रसन्न हूँ। आप अपने आश्रम में पुनः लौट जायें तथा चौदह वर्षों तक अथवा यथाशक्ति विधिवत् अनन्त व्रत का पालन करें। इससे आपके समस्त कष्टों का निवारण हो जायेगा। निर्धारित सँख्या पूर्ण होने पर भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को व्रत का विधिपूर्वक उद्यापन करें।
उद्यापन हेतु सर्वतोभद्रमण्डल पर कलश स्थापित कर कुश निर्मित अथवा सुवर्णमय अनन्त की मूर्ति विराजमान करें। मूर्ति के सम्मुख ही यथासामर्थ्य स्वर्ण, रजत, ताम्र, रेशम सूत्र द्वारा निर्मित चौदह ग्रन्थियों से युक्त अनन्त सूत्र (अनन्त दोरक) स्थापित करें। तदुपरान्त उनका वेद मन्त्रों से पूजन करें तथा तिल, घी, खाँड, मेवा एवं खीर आदि से हवन करें। अनन्तर सामर्थ्यानुसार गोदान, शय्यादान अथवा अन्नदान करें। चौदह घट, चौदह सौभाग्य द्रव्य तथा चौदह अनन्त सूत्र दान करें। चौदह ब्राह्मण दम्पतियों को भोजन करायें तथा उन्हें दक्षिणा आदि सहित विदा कर स्वयं भी भोजन ग्रहण करके व्रत का समापन करें।’
इस प्रकार व्रत का विधान वर्णित कर भगवान अनन्त वन से अन्तर्धान हो गये। भगवान की आज्ञा पाकर कौण्डिल्य ऋषि ने उनके निर्देशानुसार व्रत का पालन किया। उस व्रत के पुण्यफल से ऋषि के समस्त कष्ट एवं सङ्कटों का अन्त हो गया।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – “हे धर्मराज! यह मैंने तुम्हें सर्वश्रेष्ठ व्रत सुना दिया है। इस व्रत को करने वाला प्राणी निःसन्देह निष्पाप हो जाता है। जो भी अनन्त चतुर्दशी व्रत की इस पावन कथा का पाठ एवं श्रवण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान के श्रीचरणों में परम पद प्राप्त करता है। जो शुद्धचित्त वाले मनुष्य इस संसार रूपी गुहा में सुखपूर्वक विचरण करने की कामना करते हैं, उन्हें तीनों प्रकार के शोकों के अधिपति भगवान अनन्तदेव का पूजन कर दायें हाथ में अनन्त सूत्र बाँधना चाहिये। इस प्रकार श्री अनन्त भगवान के पवित्र व्रत की कथा सम्पूर्ण होती है। आप भी श्रद्धापूर्वक इस श्रेष्ठ अनन्त व्रत का पालन करें। इस व्रत को करने से निश्चित ही आपके मनोरथ सिद्ध होंगे।”
श्रीकृष्ण जी के निर्देशानुसार युधिष्ठिर जी ने भी भगवान अनन्त का व्रत नियमपूर्वक किया जिसके फलस्वरूप महाभारत के युद्ध में पाण्डव विजयी हुये तथा उन्हें उनका साम्राज्य पुनः प्राप्त हो गया।
॥इति श्री अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा सम्पूर्णः॥




