Akshaya Navami Vrat Katha - अक्षय नवमी व्रत कथा
व्रत कथा

Akshaya Navami Vrat Katha – अक्षय नवमी व्रत कथा

Akshaya Navami Vrat Katha – अक्षय नवमी व्रत कथा

अक्षय नवमी व्रत कथा – किशोरी नामक क्षत्रिय कन्या के वैधव्य योग से मुक्ति की कथा

विष्णुकांची में एक कनक नाम का क्षत्रिय निवास करता था। कनक अत्यन्त धनवान था तथा वह व्यापार आदि कार्य करता था। बहुत आयु तक निःसन्तान रहने के उपरान्त नाना प्रकार के व्रतों आदि के प्रभाव से उसकी धर्मपत्नी ने एक कन्या को जन्म दिया। कनक ने अपनी कन्या का नाम किशोरी रखा। किसी दिन एक जन्मपत्री का विश्लेषण करने वाला ज्योतिष वहाँ आया। कनक ने अपनी पुत्री किशोरी की जन्मपत्री उसे दिखाते हुये उसके विषय में पूछा कि – “इस कन्या का भविष्य कैसा होगा? यह भविष्य में कैसी होगी?”

कुछ समय तक उस जन्मपत्री का अन्वेषण करने के पश्चात् वह ज्योतिष बोला – “हे कनक, ध्यानपूर्वक मेरे वचन श्रवण करो। यदि में सत्य बोलता हूँ तो तुझे दुःख होगा एवं यदि झूठ बोलता हूँ तो मैं मिथ्याभाषी कहलाऊँगा। अतः में सत्य कहता हूँ, जिस भी युवक के साथ इस कन्या का विवाह होगा, वज्रपात अर्थात् बिजली गिरने से उसकी मृत्यु हो जायेगी।” उस ज्योतिष विद्वान के वचन सुनकर पिता कनक को अत्यन्त दुख हुआ तथा उसने अपनी कन्या किशोरी के निवास करने हेतु एक अन्य भवन भेंट कर दिया ताकि अपनी सुलक्षणी कन्या को नित्य अविवाहित देखकर कनक के हृदय को पीड़ा न हो।

किशोरी अपने भवन में रहकर ब्राह्मणों एवं सन्तों की सेवा व आथित्य सत्कार करती थी। एक दिन संयोगवश किशोरी के द्वार पर एक उत्तम ब्राह्मण पधारा। उस ब्राह्मण का नाम शङ्कर था एवं वह वैशाख माह में विष्णुकांची में आया था। शङ्कर ने बहुत सुना था कि कनक के यहाँ ब्राह्मणों का सत्कार होता है अतः वह किशोरी के द्वार पर आया था। शङ्कर कनक के आँगन में आकर बैठ गया। तभी किशोरी ने आकर शङ्कर का आतिथ्य सत्कार किया। शङ्कर किशोरी को देखकर उसकी सखी से बोला – “हे चन्दने! ऐसा क्या कारण है जो इस सुन्दरी एवं रूपवती कन्या ने अभी तक विवाह नहीं किया?” उसके ऐसा पूछने पर चन्दना ने सम्पूर्ण वृत्तान्त शङ्कर के समक्ष वर्णित कर दिया।

शङ्कर ने कनक से कहा – “मैं आपकी कन्या को भगवान विष्णु का द्वादश अक्षर का एक मन्त्र बताता हूँ, यह किशोरी उस मन्त्र का तीन वर्ष तक जाप करे, प्रातःकाल स्नानादि करके तुलसी की वाटिका में जल सिंचन करे तथा कार्तिक शुक्ल नवमी को भगवान विष्णु के स्वर्ण निर्मित विग्रह के साथ देवी तुलसी का विवाह कराये। इस प्रकार पूजन सम्पन्न करने से आपकी कन्या विधवा नहीं होगी।”

पिता ने शङ्कर की बात स्वीकार करते हुये किशोरी से प्रायश्चित आदि कराकर व्रत का सम्पूर्ण वैष्णव नियम-धर्म उसके समक्ष वर्णित किया। किशोरी ने ब्राह्मण के निर्देशानुसार शास्त्रोक्त विधि से तीन वर्ष तक व्रत का पालन किया। चतुर्थ कार्तिक के समय किशोरी स्नान करने हेतु जा रही थी तभी मार्ग में एक क्षत्रिय उसके रूप-सौन्दर्य पर मोहित हो गया तथा चुपचाप उसका अनुसरण करने लगा। उसके रूप-सौन्दर्य की तुलना भी असम्भव प्रतीत हो रही थी। कोई उसे देवकन्या तो कोई नागकन्या बता रहा था। किन्तु वह कन्या न ही लोक-व्यवहार के विषय में कुछ चिन्तन करती एवं न ही मार्ग को अथवा सखियों को देखती थी। वो तो बस अपने हृदय में देवरूपिणी तुलसी एवं भगवान विष्णु का ध्यान करती थी।

धनवान एवं बली विलेपी ने उस कन्या पर अधिकार के अनेक प्रयास किये किन्तु सफल नहीं हुआ। वह मालिनी के घर गया तथा उसे धन देकर कहा कि वह किसी भी प्रकार से किशोरी से उसका संगम करवा दे तो वह इससे चौगुना धन देगा। किन्तु कोई भी उपाय सफल नहीं हुआ। तब मालिनी ने विलेपी से कहा – “मुझे तो अब कोई मार्ग नहीं दिखायी देता, अब धन लेने हेतु जो आप कहें वैसा ही मैं करूँगी।” विलेपी ने कहा – “मैं तेरी कन्या बनूँगा एवं प्रतिदिन पुष्प लेकर आया करूँगा। इसके लिये मैं प्रतिदिन सौ स्वर्ण-मुद्रायें प्रदान करूँगा।” मालिनी ने स्वीकार कर लिया। उस दिन सप्तमी तिथि थी। अष्टमी के दिन मालिनी किशोरी के घर पहुँची। उसे देखकर किशोरी बोली – “हे मालिन! कल नवमी है, तुलसी देवी का विवाह है, इसीलिये पुष्पों का मुकुट बनाकर लाना।” मालिन बोली – “मेरी लड़की ससुराल से आ गयी है, वह एक श्रेष्ठ कलाकार है, तुम उससे जो भी कहोगी वह शीघ्र ही ले आयेगी।” किशोरी ने अपनी स्वीकृति दे दी, जिसके विषय में मालिन ने विलेपी को सूचित कर दिया। विलेपी इस प्रकार प्रसन्न होने लगा जैसे उसे इन्द्रासन प्राप्त हो गया हो। मालिन ने रात्रिकाल में ही अनेक प्रकार के मुकुट निर्मित कर दिये।

उस समय विष्णुकांची में जयसेन नामक राजा था। जयसेन का पुत्र मुकुन्द था जो भगवान सूर्य का अनन्य भक्त था। किशोरी के रूप-सौन्दर्य के विषय में सुनकर मुकुन्द ने भी भगवान सूर्य के समक्ष यह प्रण लिया कि – “जब तक किशोरी से विवाह नहीं कर लूँगा तब तक भोजन ग्रहण नहीं करूँगा, विवाह करूँगा तो किशोरी से अन्यथा निराहार रहकर प्राण त्याग दूँगा।” सात दिन तक मुकुन्द के निराहार रहने पर सूर्यदेव उसके स्वप्न में प्रकट हुये तथा उससे कहा – “हे पुत्र! किशोरी की कुण्डली में वैधव्य योग है, किस प्रकार तेरा विवाह उससे करूँ?, मैं किसी अन्य सुन्दरी से तेरा विवाह कर देता हूँ।”

सूर्यदेव के श्रीमुख से इन वचनों को सुनकर मुकुन्द बोला – “हे भगवन! आप सम्पूर्ण जगत की रचना करते हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो उसके बाल वैधव्य योग को सरलतापूर्वक नष्ट कर सकते हैं।” भगवान सूर्य ने नाना प्रकार से मुकुन्द को समझाया किन्तु वह अपने हठ पर अडिग रहा तो सूर्यदेव “अच्छा! ऐसा ही हो।” कहकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।

उसी रात्रि में किशोरी को स्वप्न दिखा कि – “तुलसी व्रत के माहात्म्य से तेरा वैधव्य योग नष्ट हो जायेगा।” कोई कन्या स्वप्न में प्रसन्नतापूर्वक अपने पति से कह रही है कि मेरी किशोरी का विवाह नहीं हो रहा है। उसका पति भी बोला – “ठीक है! मैं उत्तम बली दूँगा तदुपरान्त इसका विवाह होगा।” स्वप्न में बलि के विषय में विचार कर किशोरी चिन्तित हुयी तथा चन्दना को बुलाकर उसे स्वप्न के विषय में बताकर स्वप्न का अर्थ एवं फल पूछा। चन्दना बोली – “हे देवि! इस स्वप्न का फल अत्यन्त शुभ है। इसका अर्थ है कि आपके अनिष्टों का निवारण शीघ्र ही होगा। तुलसी व्रत के प्रभाव से शीघ्र ही आपका विवाह हो जायेगा। इस प्रकार स्वप्न का फल श्रवण कर किशोरी स्नानादि कर्म करने चली गयी। किशोरी दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर आयी ही थी कि उधर विलेपी मालिन की कन्या के रूप में वहाँ आ गया। उसने इस प्रकार कन्या का वेष धरा था कि कोई भी स्त्री-पुरुष का भेद नहीं कर पा रहा था।

विलेपी स्त्रियों को पुष्प एवं आभूषण आदि दिखा रहा था जिसमें तीन दिवस व्यतीत हो गये। तीसरे दिन कनक अत्यन्त चिन्तित था कि – “अब मैं क्या करूँ? राजपुत्र इससे विवाह करेगा।” उसके इस प्रकार चिन्तन में दो प्रातःकाल व्यतीत हो गये तथा राजसेवक वस्त्र एवं वाहन आदि लेकर वहाँ उपस्थित हुये। तदुपरान्त मन्त्री ने आकर कनक से कहा – “आपके यहाँ एक कन्या है, उसे मुकुन्द के लिये दे दीजिये। आप कोई विचार न करते हुये राजा की आज्ञा का पालन करें।”

कनक ने कहा – “मेरा सौभाग्य है कि मेरी पुत्री राजकुमार की वधू होगी।” मन्त्री बोला – “द्वादशी का श्रेष्ठ लग्न है तथा विवाह का समय समीप ही है।” द्वादशी के दिन सैनिकों सहित राजपुत्र विवाह हेतु आया। तेकी नामक राजपुरोहित ने कनक से कहा – “राजा की आज्ञा से किशोरी का विवाह कर दीजिये। यह महारानी बनेगी, कोई इसकी ओर दृष्टि भी नहीं उठा सकेगा।” पुरोहित के इन वचनों को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी पुरुष पीछे हट गये किन्तु मालिनी की कन्या के वेष में विलेपी अपने स्थान पर ही खड़ा रहा।

तदुपरान्त मध्यरात्रि के समय मुकुन्द भीतर चला गया किन्तु किशोरी बाहर तुलसी के समक्ष बैठकर भगवान विष्णु का स्मरण कर रही थी। उसी समय भीषण मेघ ध्वनि होने लगी, घनघोर आँधी चलने लगी, समस्त दीपक बुझ गये, विकराल बिजली चमकने लगी। किसी को वहाँ कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। मुकुन्द मन ही मन विचार कर रहा था कि – “भगवान सूर्य का वचन मिथ्या नहीं हो सकता।” इस प्रकार भयभीत होकर मुकुन्द सूर्यदेव का ध्यान करता है।

इसी बीच विलेपी आकर मुकुन्द का हाथ पकड़ लेता है। उसके हाथ से स्पर्श करते ही स्वर्ग से सीधा वज्रपात हुआ जिसमें विलेपी तत्काल मारा गया किन्तु लोगों को लगा की मुकुन्द की मृत्यु हुयी है। कुछ समयोपरान्त यह ज्ञात हुआ कि माली की छोरी मारी गयी। तदुपरान्त दोनों का विवाह निश्चित हुआ। किशोरी राजरानी बन गयी। तुलसी व्रत के प्रभाव से उसके अनेक भ्राता उत्पन्न हुये। सर्वप्रथम शास्त्र सत्य हुआ एवं तदुपरान्त सूर्यदेव सत्य हुये। तुलसी व्रत के माहात्म्य से भला मनोरथ क्यों सिद्ध न हों। सौभाग्य, अर्थ, धन, विद्या, रोग मुक्ति तथा सन्तान आदि की प्राप्ति हेतु तुलसी विवाह करना चाहिये।” इस प्रकार श्री सनत्कुमार संहिता में वर्णित कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन तुलसी के विवाह का व्रत सम्पूर्ण होता है।

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