Rishi Panchami Vrat Katha – ऋषि पञ्चमी व्रत कथा
ऋषि पञ्चमी व्रत कथा – उत्तंग नामक ब्राह्मण एवं उनकी पुत्री की कथा
राजा सीताश्व ने भगवान ब्रह्मा से अनुरोध किया – “हे देवदेवेश! मैंने आपके श्रीमुख से अनेक व्रतों का श्रवण किया है। कृपया जनकल्याण हेतु किसी पाप विनाशक व्रत का वर्णन करें जिसको करने से विभिन्न पापों का शमन हो।”
भगवान ब्रह्मा बोले – “हे राजन्! एक ऐसा व्रत है जो समस्त पापों का सर्वथा नाश करता है तथा अत्यन्त ही पुण्यदायक है। इस व्रत को ऋषि पञ्चमी के नाम से वर्णित किया गया है। हे पुत्र! इस व्रत का विधिवत् पालन करने वाले मनुष्य को नर्क की यातना से मुक्ति तो मिलती ही है अपितु उसे नर्क का दर्शन तक नहीं होता। इस व्रत के सन्दर्भ में ऋषियों ने एक कथा का वर्णन किया है, जिसका श्रवण तुम ध्यानपूर्वक करो –
विदर्भ देश की राजधानी में उत्तंग नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करता था। उसकी एक अर्धाङ्गिनी थी जिसका नाम सुशीला था। सुशीला अत्यन्त पतिव्रता एवं सुलक्षणा नारी थी। कालान्तर में सुशीला ने एक पुत्र एवं एक पुत्री को जन्म दिया। उसका पुत्र अत्यन्त ही सद्गुणी, धर्म परायण एवं विवेकी था। उस पुत्र ने अङ्ग, पद एवं क्रम सहित सभी वेदों का अध्ययन किया था।
उत्तंग ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह कुल परम्परा के अनुसार एक श्रेष्ठ कुटुम्ब में कर दिया किन्तु हे राजन्! विधि का विधान कुछ ऐसा था कि उसकी पुत्री विधवा हो गयी। वैधव्य का दुःख प्राप्त होने पर वह पतिव्रत धर्म का पालन करते हुये अपने पिता के घर में ही जीवन-यापन करने लगी। उस ब्राह्मण उत्तंग का हृदय भी इस पीड़ा से अत्यन्त व्यथित था जिसके कारण वह अपने पुत्र को भवन आदि सौंप कर स्वयं पत्नी एवं पुत्री सहित गङ्गा के पावन तट पर निवास करते हुये वहीं अपने शिष्यों को वेदाध्ययन कराने लगा। वह विधवा पुत्री भी अपने पिता की शुश्रुषा अर्थात् सेवा आदि करने लगी। एक समय ऐसा आया कि उस पुत्री का साहस एवं धैर्य टूट गया। अर्धरात्रि का समय था, वह एक शिला पर शयन कर रही थी। शयन करते ही उसकी सम्पूर्ण देह कृमिमय (कीड़ों से युक्त) हो गयी। यहाँ तक कि उसके वस्त्र भी कृमिरूप में परिवर्तित हो गये।
उत्तंग के शिष्यों ने जब अपनी गुरुपुत्री को इस दुर्दशा में देखा तो वह भयभीत होकर तुरन्त ही गुरुमाता सुशीला के समीप उपस्थित हुये तथा दुखी होकर बोले – ‘हे माता! आपकी पुत्री एक शिला पर शयन कर रही है एवं उसकी सम्पूर्ण देह कृमिमय हो गयी है। उसकी देह तो तनिक मात्र भी दृष्टिगोचर नहीं होती मात्र कृमियाँ ही दिखायी दे रही हैं। हे माँ! हमें तो यह ज्ञात ही नहीं कि आपकी उस पतिव्रता एवं चरित्रवान पुत्री की यह दशा क्यों हो गयी?’
यह सुनते ही माँ के हृदय को गहरा आघात पहुँचा एवं वह तत्काल ही उस स्थान पर पहुँची जहाँ उसकी पुत्री शयन कर रही थी। वहाँ उसने शिष्यों द्वारा वर्णित दृश्य को सत्य पाया। अपनी पुत्री की यह दुर्दशा देखकर माता व्याकुल होकर विलाप करने लगी। विलाप करते हुये वह मूर्छित हो गयी। जब उसकी मूर्छा भङ्ग हुयी तो उसने अपनी पुत्री को उठाया एवं अपने आँचल से स्वच्छ कर उसे पिता के समीप ले गयी।
उस दुर्दशा में पुत्री को पिता के समीप लाकर सुशीला बोली – ‘हे स्वामी! हमारी इस सच्चरित्र पुत्री जिसने सदैव पतिव्रत धर्म का पालन किया है, उसकी यह दशा क्यों हुयी? यह अर्धरात्रि में शयन कर रही थी कि इसके सम्पूर्ण देह में कीड़े पड़ गये। इससे ऐसा कौन सा अपराध हुआ है जिसका दण्ड इस रूप में प्राप्त हो रहा है, हे प्राणनाथ! कृपा करके इस समस्या का समाधान करें।’
अपनी पुत्री की वेदना सुनकर ब्राह्मण भगवान नारायण का ध्यान करते हुये समाधिस्थ हुये एवं पुत्री के पूर्वजन्मों के पापों को देखकर बोले – ‘हे शुभे! इस जन्म से पूर्व सातवें जन्म में भी यह एक ब्राह्मणी थी। उस जन्म में इसने रजस्वला होते हुये कभी शौचाचार एवं स्पर्शास्पर्श का विचार नहीं किया। रजस्वला स्थिति में सभी भोजनादि के पात्रों को स्पर्श किया। इसी पाप के फलस्वरूप इसकी देह कृमिमय हो गयी है।
हे अनघे! रजस्वला काल में स्त्री पापग्रस्त होती है, प्रथम दिवस चाण्डाली, द्वितीय दिवस ब्रह्मघातिनी तथा तृतीय दिवस रजकी, अर्थात् धोबिन होती है। अनन्तर चतुर्थ दिवस वह शुद्ध होती है। उसी जन्म में इसने अपनी सखियों के कुसङ्ग के कारण ऋषि पञ्चमी व्रत का दर्शन करते हुये भी उसका अनादर किया था। इसने उस व्रत के उत्सव का दर्शन किया था जिसके शुभ फलस्वरूप इसका पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ है। क्योंकि इसने उस व्रत की अवज्ञा एवं अपमान किया था, अतः इसकी देह कृमिमय हो गयी है। यही इसके पाप एवं दण्ड का मूल कारण है।’
पुत्री के पूर्वजन्म का वृत्तान्त ज्ञात कर सुशीला बोली – ‘हे नाथ! जिस ऋषि पञ्चमी व्रत के उत्सव का दर्शन करने मात्र से आपके समान ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण के पावन कुल में इसका जन्म हुआ तथा जिस व्रत का अनादर करने से अर्धरात्रि में इसकी देह कृमियों से आच्छादित हो गयी, कृपया इस अद्भुत विलक्षण व्रत का वर्णन करने की अनुकम्पा करें।’
ऋषि बोले – ‘हे सुशीले! मैं इस सर्वोत्तम व्रत का वर्णन करता हूँ, जिसका पालन करने से इस प्रकार के समस्त पापों का शमन हो जाता है। तुम सावधानीपूर्वक श्रवण करो। इस व्रत का पालन करने से आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक तीनों प्रकार के दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। यह व्रत स्त्रियों को सुख एवं सौभाग्य प्रदान करने वाला है। इस व्रत को जो भी स्त्री निष्ठापूर्वक करती है उसे समस्त प्रकार के आनन्द एवं सुख-सम्पत्तियों की प्राप्ति होती है तथा विपत्तियों से रक्षा होती है। भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी तिथि को किसी नदी, सरोवर आदि जलाशय में स्नान करके व्रत ग्रहण करना चाहिये।
तदुपरान्त सन्ध्योपासना आदि नित्यकर्तव्य पूर्ण करके द्वारवती, अर्थात् मण्डप में सप्तऋषियों की स्थापना करनी चाहिये। प्रतिदिन हवन करने एवं पूजन हेतु सुसज्जित मण्डप को द्वारवती कहा गया है। तत्पश्चात् सप्त ऋषियों को पूर्ण विधि-विधान द्वारा पवित्र दुग्ध आदि पञ्चामृत पदार्थों से स्नान कराना चाहिये। स्नानोपरान्त ऋषियों को सुगन्धित चन्दन, अगर एवं कपूर अर्पित करें। नाना प्रकार के पुष्पों से उनका शृङ्गार करें एवं धूप, दीप आदि से उनका पूजन करें। विधिपूर्वक ऋषियों को उपवीत एवं अहतवस्त्र (बिना सिला हुआ अखण्ड वस्त्र) एवं उपवस्त्र धारण कराना चाहिये।
तदुपरान्त विविध प्रकार के फलों एवं नैवेद्य सहित अर्घ्यदान करना चाहिये। अर्घ्यदान करते समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये – ‘कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि एवं वशिष्ठ ये सभी मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्यजल को स्वीकार करें तथा इससे प्रसन्न हों।’
इस कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिये। इस व्रत में शाग का ही भोजन करना चाहिये। व्रत में सप्त ऋषियों का स्मरण करते हुये पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। उक्त विधि से इस व्रत को भली प्रकार करना चाहिये। अन्यान्य तीर्थों में स्नान एवं दानादि करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है, वह फल मात्र इस एक व्रत को नियमपूर्वक करने से प्राप्त होता है। इस व्रत को करने वाली स्त्री सदैव सुखी, रूप-सौन्दर्य से युक्त पूर्ण देह वाली एवं पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न होती है। जो स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रतानुष्ठान को सम्पन्न करती है वह इस लोक में सभी प्रकार के सुख भोगती है तथा परलोक में अक्षय पद प्राप्त करती है। उस स्त्री को उसके पूर्व जन्म के चरित्रों का स्मरण हो जाता है।’ इस प्रकार हेमाद्रि में वर्णित ब्रह्माण्डपुराण से उद्धृत ऋषि पञ्चमी व्रत की कथा सम्पूर्ण होती है।”
॥इति श्री ऋषि पञ्चमी व्रत कथा सम्पूर्णः॥




