Mahalakshmi Vrat Katha – महालक्ष्मी व्रत कथा
महालक्ष्मी व्रत कथा – मंगलार्ण नामक राजा एवं रानी पद्मावती की कथा
भगवान शिव के श्रीमुख से महालक्ष्मी व्रत का विधान श्रवण करने के उपरान्त, भगवान स्कन्द ने कहा – “हे प्रभो! इस व्रत का पालन सर्वप्रथम किसने किया था? किसने इस व्रत को संसार में प्रकाशित किया था? यदि आप मुझसे प्रेम करते हैं तो इस व्रत की कथा का यथार्थ वर्णन करने की कृपा करें।”
भगवान शिव ने कहा – “प्राचीनकाल में मंगलार्ण नाम का एक शूरवीर चक्रवर्ती सम्राट शासन करता था। कुण्डननगर नामक उसकी भव्य राजधानी थी। उसकी एक धर्मपत्नी थी जिसका नाम पद्मावती था। कालान्तर में एक ब्राह्मण उसके समक्ष सेवा कार्य करने हेतु आया। राजा ने उस ब्राह्मण का नाम अज्ञात रख दिया, किन्तु कालान्तर में वह धर्मपरायण ब्राह्मण तवल्लक के नाम से लोकप्रिय हुआ। एक दिन राजा आखेट करने हेतु वन में गया। वन में उसने अनेकों वन्य शूकरों तथा मृगों का आखेट किया। आखेट के उपरान्त जल तृष्णा से व्याकुल होकर वह एक वृक्ष के मूल में विश्राम करने लगा तथा अपने सेवकों को जल की खोज में सभी दिशाओं में भेज दिया। उसके सेवक खोजते-खोजते क्लान्त हो गये किन्तु उन्हें कहीं भी जल प्राप्त नहीं हुआ। तवल्लक भी तत्परता से वन में चहुँओर जल खोज रहा था।
जल की खोज में तवल्लक एक गह्वर के निकट पहुँचा, जहाँ एक अत्यन्त सुन्दर कमल पुष्पों से परिपूर्ण दिव्य सरोवर था। तवल्लक को सरोवर पर सुन्दर वस्त्राभूषणों से अलङ्कृत देव कन्याओं का दर्शन हुआ। वे देव कन्यायें व्रत के अङ्ग स्वरूप देवी महालक्ष्मी का पूजन कर रही थीं। उन सभी को इस प्रकार पूजन करते देख तवल्लक ने उनसे प्रश्न किया – ‘हे देवियों! यह आप क्या कर रही हैं? कृपया वर्णन करने की कृपा करें।’
उन स्त्रियों ने उत्तर दिया – ‘हम सभी श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक महालक्ष्मी व्रत कर रही हैं, यह व्रत सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला पुण्यशाली व्रत है।’ इस व्रत की महत्ता ज्ञात करने के उपरान्त तवल्लक ने भी महालक्ष्मी व्रत ग्रहण कर लिया। तदुपरान्त उन देव कन्याओं से आज्ञा लेकर राजा के लिये जल लेकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से प्रस्थान कर दिया। राजा को जल पिलाकर वह उसके सम्मुख ही बैठ गया।
जल ग्रहण करने के पश्चात् राजा ने तवल्लक के हाथ में सूत्र (डोरा) बँधा देखकर उससे पूछा – ‘हे द्विजवर! आपके हाथ में यह सूत्र कैसा है, क्या आपने किसी व्रत का पालन किया है?’ तवल्लक ने उस कुण्ड पर हुये सम्पूर्ण घटनाक्रम का वर्णन राजा के समक्ष कर दिया। उस व्रत का विधान सुनकर राजा ने भी व्रत ग्रहण कर लिया तथा तवल्लक सहित अपने नगर में आ गया।
महल में आकर वह राजा अपनी पत्नी पद्मावती के सङ्ग रमण करने लगा। उसकी पत्नी अत्यन्त क्रोधी स्वभाव की थी। रमण करते हुये उसकी दृष्टि राजा के हाथ में बँधें सूत्र पर गयी तो वह अत्यन्त कुपित होकर बोली – ‘किस स्त्री ने आपके हाथ में यह सूत्र बाँधा है? कौन है वो स्त्री, जिसने आपको ठग लिया है?’
रानी के क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर राजा ने कहा – ‘इससे अधिक और कुछ मत कहो यह तो दिव्य महालक्ष्मी के श्रेष्ठ व्रत का सूत्र है।’ राजा मंगलार्ण द्वारा समझाने पर भी रानी का क्रोध शान्त नहीं हुआ तथा उसने अपने हाथ से वह सूत्र तोड़कर भीषण अग्नि में डाल दिया। रानी की इस धृष्टता से राजा अत्यन्त क्रोधित व व्यथित हुआ तथा बोला – ‘हे रानी! तूने अपनी मूर्खता के वशीभूत होकर अत्यन्त घोर पाप किया है।’ इतना कहकर राजा ने क्रोधवश रानी को सघन वन में ले जाकर उसका त्याग कर दिया। अतः व्रत का अनादर करने से उस दुष्ट रानी की ही हानि हुयी, राजा का कुछ अहित नहीं हुआ।
महालक्ष्मी का अपमान करने के परिणामस्वरूप रानी राजमहल से निकलकर एक जल रहित वन में पहुँच गयी थी। वन में किसी आश्रयस्थल की खोज में वह इधर से उधर भटक रही थी। वन में विचरते हुये उसे एक आश्रम दृष्टिगोचर हुआ। वह आश्रम विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणियों एवं शान्त कृष्ण मृगों से घिरा हुआ था। वह आश्रम अत्यन्त सुन्दर एवं रमणीक प्रतीत हो रहा था। आश्रम के निकट ही उसे ऋषि वसिष्ठ का दर्शन हुआ।
वसिष्ठ जी का दर्शन करते ही रानी विलाप करती हुयी उनके चरणों में लेट गयी तथा रोदन करते हुये पीड़ा के कारण मूर्छित हो गयी। ऋषि वसिष्ठ जी ने अपने योगबल से ध्यानस्थ होकर उस रानी की समस्त व्यथा को ज्ञात कर लिया। ऋषिवर को ज्ञात हो गया कि देवी महालक्ष्मी का अनादर करने के कारण ही रानी की यह दुर्दशा हुयी है। अतः ऋषिवर ने रानी से वही महालक्ष्मी व्रत करवाया। व्रत के प्रभाव से रानी का चित्त निर्मल एवं शान्त हो गया।
उधर राजा मंगलार्ण पुनः आखेट करने हेतु उसी वन में आ गया, जहाँ रानी वनवास कर रही थी। राजा ने वन में एक मृग पर बाण चलाया जिससे वह आहत होकर भागने लगा तथा राजा भी उसका पीछा करते हुये वसिष्ठ जी के आश्रम के निकट पहुँच गया। वसिष्ठ जी ने राजा का आतिथ्य सत्कार किया। उसी समय राजा की दृष्टि वसिष्ठ जी के आश्रम के बाहर विचरती हुयी एक अत्यन्त सुन्दर, मृगनयनी स्त्री पर पड़ी। उस स्त्री की भाव-भंगिमा से राजा का मन-मयूर आकृष्ट हो रहा था।
राजा ने उस स्त्री को सम्बोधित करते हुये कहा – ‘हे सुन्दरी! हे मनोहारिणी! आप कौन हैं तथा सघन वन में क्यों विचर रही हैं? हे सुन्दर स्मित हास्य वाली, आप कोई किन्नरी हैं अथवा कोई यक्षिणी? मेरा मन आप पर मोहित हो गया है, मैं आपके प्रेमपाश का बन्दी हो गया हूँ, आप भी मुझसे प्रेम कर मेरे प्रणय निवेदन को स्वीकार करो प्रिय।’
राजा के मुख से इन प्रेमपूर्ण मधुर वचनों को श्रवण कर वह सुन्दरी बोली – ‘हे राजन्! मैं तुम्हारी अर्धाङ्गिनी ही हूँ! मुझे पहचानो, मैं तो मात्र आपसे ही प्रेम करती हूँ। मेरे द्वारा महालक्ष्मी व्रत का अनादर होने के कारण आपने मेरा परित्याग कर दिया था, जिसके कारण मैं इस अवस्था में यहाँ वनवास कर रही हूँ। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ जी ने मुझे इस सुन्दर वृक्षों एवं पुष्पों से सुशोभित आश्रम में शरण दी तथा मुझ अधम पर कृपा करके मेरे समस्त कष्टों के निवारण हेतु मुझसे पूर्ण विधि-विधान द्वारा महालक्ष्मी व्रत करवाया। उस व्रत के पुण्य प्रभाव से ही माता महालक्ष्मी ने मुझे यह रूप-सौन्दर्य एवं कान्ति प्रदान की है।’
उस स्त्री के मुख से इन वचनों को श्रवण कर राजा के नेत्र कमल की भाँति खिल उठे। तदुपरान्त उसने ऋषि वसिष्ठ से अपनी सहधर्मिणी को ले जाने की आज्ञा ग्रहण की तथा शीघ्र ही अपने सेवकों सहित ध्वजा-पताकाओं से सुसज्जित रथ में आरूढ़ होकर अपनी प्रिय अर्धाङ्गिनी पद्मावती सहित नगर में लौट आया। समस्त प्रजाजन अपने सम्राट का अभिनन्दन एवं जयघोष करते हुये राजा के सङ्ग चलने लगे। तदुपरान्त सम्पूर्ण प्रजा ने भी राजा के साथ महालक्ष्मी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन किया।
श्री महालक्ष्मी व्रत के प्रभाव से राजा ने भूलोक पर नाना प्रकार के सुखों को भोगा तथा उसे अनेकों पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति हुयी। तदनन्तर वह चक्रवर्ती सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित हुआ तथा तवल्लक ब्राह्मण उसका प्रधानमन्त्री बन गया। देवी महालक्ष्मी की कृपा से उसके भवन में समस्त प्रकार की सुख-समृद्धियाँ निवास करने लगीं। समस्त अभीष्टों को सिद्ध करने वाली देवी नारायणी लक्ष्मी का यही चमत्कार है। वह समस्त पापों को हरने एवं दुखों को नष्ट करने वाली हैं।”
भगवान शिव कहते हैं – “हे स्कन्द! इस श्रेष्ठ महालक्ष्मी व्रत को सोलह वर्षों तक करना चाहिये। जो इस व्रत का श्रद्धा, भक्ति एवं प्रेमपूर्वक पालन करेगा, समस्त सिद्धियाँ स्वयं उसकी आराधना करेंगी तथा लोकपाल भी प्रसन्न होकर स्वतः ही उसके मनोरथों को पूर्ण करेंगे। जो भी स्त्री या पुरुष सावधानीपूर्वक इस व्रत को करेगा उसकी कामनाओं की पूर्ति हेतु स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश भी सदैव तत्पर रहेंगे। समस्त मनुष्य उसके चरणों में अपना मस्तक झुकायेंगे। देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु सहित उसके कुटुम्ब में सदा निवास करेंगी। भक्त हो अथवा अभक्त जो भी इस उत्तम व्रत को करता है, अन्त समय में स्वयं भगवान विष्णु उस जीव को भवसागर से पार कर देते हैं। जो भी भक्त एकाग्रचित्त होकर इस व्रत कथा का पाठ एवं श्रवण करता है, देवी लक्ष्मी उसका त्याग कभी नहीं करतीं तथा अलक्ष्मी कभी उसके जीवन में प्रवेश नहीं करती। अन्त समय में वह प्राणी समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में वास करता है।” इस प्रकार स्कन्दपुराण में वर्णित श्री महालक्ष्मी व्रत कथा सम्पूर्ण होती है।
॥इति श्री महालक्ष्मी व्रत कथा सम्पूर्णः॥




