Shiva Monday Vrat Katha - शिव सोमवार व्रत कथा
व्रत कथा

Shiva Monday Vrat Katha – शिव सोमवार व्रत कथा

Shiva Monday Vrat Katha – शिव सोमवार व्रत कथा

शिव सोमवार व्रत कथा – पुत्रहीन धनिक को पुत्र प्राप्ति की कथा

एक समय की बात है, किसी नगर में एक अत्यन्त सम्पत्तिशाली सेठ अर्थात् धनिक निवास करता था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिव जी की कृपा से उस धनिक के घर में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं था। वह अत्यन्त धनवान एवं समृद्धिशाली था। किन्तु समस्त भौतिक सुख-साधनों से सम्पन्न होते हुये भी उस धनिक की एक समस्या थी जिसका निवारण नहीं हो रहा था। उस समस्या के कारण उसे वह समस्त सुख के साधन व्यर्थ प्रतीत होते थे। वह धनिक पुत्रहीन था, पुत्रहीन होने के कारण उसे अपने सम्पूर्ण वैभव में नीरसता का अनुभव होता था। वह नित्य यही विचार करता रहता था कि उसकी इस सम्पूर्ण सुख-सम्पत्ति का कोई उत्तराधिकारी ही नहीं है तो भला इसका क्या लाभ? पुत्र प्राप्ति की इच्छा से वह प्रति सोमवार पूर्ण विधि-विधान से व्रत का पालन करता था। वह प्रतिदिन नियमपूर्वक सायाह्नकाल के समय शिवालय में भगवान शिव के समक्ष दीप प्रज्वलित किया करता था। धनिक नित्य भगवान शिव से प्रार्थना करता था – “हे दीनों के नाथ, अनाथों के स्वामी! हे भगवान शिव! मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है कि मुझे पुत्र सुख की प्राप्ति नहीं हो रही है। हे प्रभो! मुझ पर कृपा करके मुझे एक पुत्र प्रदान करें।”

एक दिन माता पार्वती ने उस धनिक की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव से कहा – “स्वामी! यह साहूकार निर्मल मन से आपकी भक्ति में लीन रहता है, प्रत्येक सोमवार का व्रत करता है तथा पूर्ण भक्तिभाव से आपकी पूजा-अर्चना करता है। अतः महाराज! इसकी अभिलाषा पूर्ण होनी चाहिये।” माता पार्वती के वचनों को सुनकर भगवान शिव ने कहा – “हे देवि! यह मृत्युलोक कर्मभूमि है, यहाँ जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव को अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं। इस संसार में कोई भी कर्मफल से मुक्त नहीं है। कृषक जिस प्रकार का बीज रोपित करता है उसे उसी प्रकार के फल की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार इस कर्मक्षेत्र में कर्मानुसार ही प्रत्येक वस्तु प्राप्त होती है। इस धनिक के पूर्व सञ्चित कर्मों के कारण ही इसके भाग्य में पुत्रसुख नहीं है।”

अपने भक्त के प्रति ममता एवं दया के कारण माता पार्वती ने भगवान शिव से पुनः निवेदन किया – “हे स्वामी! यह धनिक आपका अनन्य भक्त है तथा श्रद्धापूर्वक आपकी आराधना करता है। आप सदैव ही अपने भक्तों पर दया करके उनके सभी मनोरथ सिद्ध करते हैं। आप देवों के भी देव हैं। यदि आपका कोई भक्त कष्ट में है तो आपको अवश्य ही उसका निवारण करना चाहिये। यदि आप ही अपने भक्तों का कष्ट नहीं हरेंगे तो भला मनुष्य क्यों ही आपका पूजन एवं व्रत करेंगे?” देवी पार्वती के वचनों को सुन महादेव ने कहा – “हे देवि! यह धनिक पुत्रहीन होने के कारण सदैव चिन्तित एवं व्यथित रहता है। इसके अतिरिक्त इसके जीवन में कोई अन्य कष्ट नहीं है। इसके भाग्य में पुत्रसुख न होते हुये भी मैं इसे एक पुत्र का वरदान देता हूँ, किन्तु वह पुत्र अल्पायु होगा। अतः उस पुत्र का जीवनकाल बारह वर्ष का ही होगा, तदुपरान्त उसकी मृत्यु हो जायेगी। भाग्य में न होते हुये भी मैं उसे इतने वर्षों के लिये पुत्र का सुख प्रदान करता हूँ।” मन्दिर में भगवान शिव एवं देवी पार्वती के मध्य इस वार्तालाप को वह धनिक सुन लेता है। इससे न ही वह प्रसन्न होता है और न ही दुखी होता है। वह पूर्व की भाँति नियमपूर्वक भगवान शिव का व्रत एवं पूजा करता रहता है।

कालान्तर में उस धनिक की पत्नी गर्भवती हो गयी। दसवें माह में उसके गर्भ से एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र रत्न का जन्म हुआ। इतने वर्षों उपरान्त पुत्र रत्न की प्राप्ति से धनिक के कुटुम्ब में हर्षोल्लास का वातावरण था, चारों ओर मङ्गल गायन हो रहा था। किन्तु वह धनिक मन ही मन पुत्र की मात्र बारह वर्ष की आयु के विषय में व्यथित हो रहा था। इसीलिये उसने अधिक प्रफुल्लता व्यक्त नहीं की तथा पुत्र के अल्पायु होने के भेद को गुप्त रखना ही उचित समझा।

धीरे-धीरे समय व्यतीत होता है और धनिक का पुत्र 11 वर्ष का हो जाता है। धनिक की पत्नी उससे पुत्र का विवाह करने का आग्रह करती है, किन्तु धनिक कहता है कि – “मैं अभी इसका विवाह नहीं करूँगा, पहले इसे कुछ ज्ञान अर्जित करने हेतु पवित्र काशी नगरी भेजूँगा।” ऐसा निश्चय कर धनिक ने अपने साले अर्थात् पुत्र के मामा को आमन्त्रित किया तथा उसे अत्यधिक धन आदि प्रदान कर उससे कहा – “तुम मेरे इस पुत्र को अध्ययन हेतु काशी जी लेकर जाओ तथा मार्ग में जहाँ भी पड़ाव डालो वहाँ यथाशक्ति यज्ञ तथा ब्राह्मण भोज अवश्य आयोजित करना।” धनिक की आज्ञा से दोनों मामा-भाँजे यज्ञ, ब्राह्मण-भोज आदि धार्मिक आयोजन कराते हुये मार्ग में जा रहे थे। मार्ग में एक नगर पड़ा तथा मामा-भाँजे ने उस नगर में विश्राम करने का निश्चय किया। उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था। सम्पूर्ण नगर में राजकुमारी के विवाह की रौनक थी। किन्तु जो अन्य राज्य का राजकुमार उस राजकुमारी से विवाह हेतु आया था, वह एक नेत्र से दृष्टिहीन था। किन्तु यह भेद राजकुमार के पिता ने राजकुमारी के परिवार को नहीं बताया था। उसके पिता को यह भय था कि राजकुमार को देखकर कहीं राजकुमारी के परिजन विवाह निरस्त न कर दें। तभी उस राजकुमार के पिता की दृष्टि धनिक के रूपवान पुत्र पर पड़ी तो उसके मन में विचार आया कि – “क्यों न इसी लड़के को द्वार-चार आदि की प्रथाओं के लिये राजकुमार बनाकर ले जाते हैं, इससे किसी को राजकुमार का भेद ज्ञात नहीं होगा।”

उस राजा ने धनिक पुत्र के मामा से इस विषय में चर्चा की और उसे सहमत कर लिया। तदुपरान्त राजकुमार के वस्त्राभूषण आदि द्वारा धनिक पुत्र को अलङ्कृत कर वर के रूप में सुसज्जित किया गया तथा घुड़चढ़ी की प्रथा हेतु उसे ले जाया गया। घुड़चढ़ी तथा द्वारचार आदि का कार्यक्रम सफल हो गया तथा सभी इतने रूपवान वर को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुये। इस पर राजकुमार के पिता ने विचार किया कि – “क्यों न विवाह भी इसी युवक से करा लिया जाये, अन्यथा यदि किसी को सत्य ज्ञात हो गया तो भेद खुल जायेगा।”

वह धनिक पुत्र एवं उसके मामा से बारम्बार अनुरोध करने लगा कि – “यदि आप कन्यादान एवं फेरों का कार्यक्रम भी हो जाने दें तो में आपका अत्यन्त आभारी रहूँगा, मैं आपको अत्यधिक धन-सम्पदा आदि प्रदान करूँगा, सदैव आपका ऋणी रहूँगा, मुझ पर कृपा करें।” उस पिता की विनती सुन मामा-भाँजे ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा विवाह का सम्पूर्ण कार्यक्रम भली-भाँति सम्पन्न हो गया। किन्तु धनिक पुत्र को आरम्भ से ही यह छल उचित नहीं लग रहा था, अतः उसने प्रस्थान करने से पूर्व राजकुमारी की चुनरी के पल्ले में यह लिख दिया कि – “तेरा विवाह तो मेरे संग हुआ है किन्तु जिस राजकुमार के साथ तेरी विदाई होगी वह एक नेत्र से दृष्टिहीन है। मैं पिता की आज्ञानुसार काशी अध्ययन हेतु जा रहा हूँ। मैं कोई राजकुमार नहीं अपितु एक धनिक पुत्र हूँ।” यह लिखकर वह युवक मामा सहित वहाँ से प्रस्थान कर गया। तदुपरान्त राजकुमारी ने जब चुनरी में लिखा सन्देश पढ़ा तो उसने यह कहते हुये राजकुमार के साथ प्रस्थान करने हेतु मना कर दिया कि – “मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है। अतः यह मेरा पति नहीं है, वह तो अध्ययन हेतु काशी नगरी गया है।” सत्य ज्ञात होने पर राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया तथा राजकुमार का पिता बारात वापस लेकर चला गया।

उधर धनिक का पुत्र अपने मामा सहित काशी की पावन धरा पर पहुँच चुका था। वहाँ धनिक पुत्र अध्ययन में लीन हो गया तथा उसके मामा यज्ञादि कर्म करने लगे। धनिक पुत्र की बारह वर्ष की आयु होने पर उसने एक यज्ञ आयोजित किया। तभी पुत्र बोला – “मामा आज मुझे मेरा स्वास्थ्य कुछ ठीक प्रतीत नहीं हो रहा है।” मामा ने उसे कक्ष में जाकर विश्राम करने को कहा। धनिक पुत्र कक्ष में जाकर शयन करने लगा तथा कुछ ही समय पश्चात् उसके प्राणों का अन्त हो गया। अधिक विलम्ब होने पर जब उसके मामा ने कक्ष में आकर देखा तो उसके भाँजे की मृत्यु हो चुकी थी। वह अत्यन्त व्याकुल हो उठा, अपने भाँजे को मृत देख उसे असीम पीड़ा हो रही थी किन्तु उसने विचार किया कि – “यदि मैं अभी विलाप करूँगा तो यज्ञ कार्य असम्पन्न रह जायेगा।” अतः उसने शीघ्रता से यज्ञ सम्पन्न कर ब्राह्मणों को आदरपूर्वक विदा किया तथा भाँजे के वियोग में विलाप करने लगा।

देवयोग से उसी समय माता पार्वती एवं भगवान शिव वहाँ से गमन कर रहे थे। उन्हें अत्यधिक तीव्र रुदन का स्वर सुनायी दिया, उस दारुण स्वर से द्रवित होकर माता पार्वती ने कहा – “महाराज! कोई दीन-हीन प्राणी कष्ट से विलाप कर रहा है। कृपया इसके कष्ट का निवारण कीजिये।” भगवान शिव देवी पार्वती सहित उस स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि वहाँ एक बालक मृत अवस्था में पड़ा हुआ है। उस बालक को पहचानकर माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा – “यह तो उसी धनिक का पुत्र है जो आपके वरदान स्वरूप उसे प्राप्त हुआ था। इसे क्या हो गया?” भगवान शिव ने कहा – “हे देवि! वरदान के अनुसार यह बालक अल्पायु था, इसकी आयु इतनी ही निश्चित थी, अतः इसका जीवन पूर्ण हो गया।” माता पार्वती ने शिव जी से निवेदन करते हुये कहा – “हे प्रभो! कृपा करके इस बालक को और आयु प्रदान करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। आपके लिये संसार मे कुछ भी असम्भव नहीं है भगवन्।” माता पार्वती के बारम्बार आग्रह पर भगवान शिव ने उस धनिक पुत्र को पुनः जीवनदान प्रदान कर दिया। भगवान शिव की कृपा से वह बालक पूर्ववत् स्वस्थ एवं सकुशल हो गया। तदुपरान्त श्री शिव-पार्वती कैलाश पर्वत की ओर चले गये।

तदनन्तर वे दोनों मामा-भाँजे यज्ञ-हवन आदि करते ब्राह्मणों को भोजन करवाते हुये अपने घर की ओर यात्रा कर रहे थे। मार्ग में वही नगर था जहाँ उस धनिक पुत्र का विवाह हुआ था। उस नगर में पड़ाव डालकर वे दोनों यज्ञ कर रहे थे, उसी समय नगर के राजा अर्थात् उस धनिक पुत्र के ससुर ने उसको पहचान लिया। राजा सम्मानपूर्वक अपने दामाद को राजमहल ले गया, वहाँ उसका अत्यन्त उत्साह से आथित्य-सत्कार किया गया। राजा ने अनेकों दास-दासियों एवं धन-सम्पदा सहित अपनी पुत्री को धनिक के पुत्र के साथ विदा कर दिया। जब वे अपने नगर के निकट पहुँचे तो मामा ने कहा कि – “मैं पहले जाकर, तुम्हारे आगमन की सूचना दे देता हूँ ताकि वधू के गृह प्रवेश का प्रबन्ध हो सके।”

मामा घर पहुँचकर देखता है कि धनिक अपनी पत्नी सहित भवन की छत पर बैठा हुआ है, उसने यह प्रण लिया था कि – “यदि हमारा पुत्र सकुशल लौटकर आया तो ही हम नीचे उतरेंगे अन्यथा यहीं से कूदकर अपने प्राण त्याग देंगे।” मामा ने तत्काल उन दोनों को पुत्र के आगमन का शुभ समाचार प्रदान किया। एक बार तो धनिक को विश्वास नहीं हुआ तो मामा ने शपथपूर्वक कहा – “भगवान शिव की कृपा से आपका प्रिय पुत्र एवं मेरा भाँजा आपके लिये राजकुल की पुत्रवधू तथा नाना प्रकार के धन-सम्पदा सहित सकुशल लौट आया है।”

धनिक एवं उसकी पत्नी ने उत्साह पूर्वक पुत्र का स्वागत किया तथा कुशलक्षेम ज्ञात की। तदुपरान्त धनिक कुटुम्ब सहित आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। इसी प्रकार जो भी भक्तिपूर्वक सोमवार का व्रत धारण करता है तथा इसकी कथा का पाठ एवं श्रवण करता है, उसके समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा भगवान शिव एवं माता पार्वती की असीम अनुकम्पा उसे प्राप्त होती है।

॥इति श्री शिव सोमवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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