Bhaum Mangalwar Vrat Katha – भौम मङ्गलवार व्रत कथा
भौम मङ्गलवार व्रत कथा – नन्दक ब्राह्मण एवं स्वर्ण उत्सर्जित करने वाली कन्या की कथा
भौम मङ्गल व्रत की कथा का वर्णन करते हुये सूतजी ऋषियों से बोले – “एक समय महर्षि गौतम ने समस्त लोकों में पूजनीय भगवान मङ्गल से प्रश्न किया कि, ‘हे लोहिताङ्ग! हे भगवन्! कृपा करके एक ऐसे गोपनीय एवं श्रेष्ठ व्रत का वर्णन कीजिये जिसको करने से समस्त पापों का शमन होता है। समस्त आयुधों से सुसज्जित, वाहन पर आरूढ़, स्वर्ण के समान कान्ति वाले भगवान मङ्गल के पूजन से नाना प्रकार के सुख-सम्पत्ति प्राप्त होते हैं। कृपया धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा समस्त प्रकार के सुख-सौभाग्य आदि प्रदान करने वाले भौमव्रत का वर्णन करें।’
महर्षि गौतम के वचन सुनकर मङ्गल देव ने कहा – ‘हे ऋषिश्रेष्ठ! तीनों लोकों में प्रचलित व्रत का में वर्णन करता हूँ, कृपया श्रद्धापूर्वक श्रवण करें –
प्राचीनकाल में एक अत्यन्त वेद पारायण एवं शास्त्रों का ज्ञाता ब्राह्मण था जिसका नाम नन्दक था। उसकी एक सुनन्दा नामक अत्यन्त सुलक्षणी धर्मपत्नी थी। वे दोनों वृद्ध हो चले थे परन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं थी। इस कारण से उस ब्राह्मण ने एक ब्राह्मण कन्या को गोद ले लिया तथा अपनी पुत्री की भाँति उसका लालन-पालन करने लगा।
उस कन्या ने पूर्वजन्म में मङ्गल देव की अनन्य भक्ति एवं आराधना की थी। उस कन्या के अङ्ग स्वर्ण के समान दैदीप्यमान थे। पूर्वजन्म के सत्कर्मों के कारण उस कन्या के अष्टाङ्ग से स्वर्ण उत्पन्न होता था। उस स्वर्ण के कारण नन्दक अत्यन्त धनवान एवं प्रभावशाली हो गया। कन्या की आयु 10 वर्ष की होने पर उसने अपनी कन्या का विवाह पूर्ण विधि-विधान से सोमेश्वर नामक ब्राह्मण से कर दिया। किन्तु अभी उसकी विदायी नहीं की गयी।
कालान्तर में वह कन्या युवावस्था को प्राप्त हुयी। उचित समय आने पर नन्दक ने अपनी कन्या एवं सोमेश्वर को नाना प्रकार के धन-उपहार आदि सहित विदा कर दिया। सम्पूर्ण दिवस एवं रात्रि यात्रा करते हुये वे दोनों एक अत्यन्त सघन वन में पहुँच गये। वन में लुटेरों के एक दल ने उन्हें घेर लिया तथा धन के लोभ में सोमेश्वर की हत्या कर दी। अपने पति की हत्या से आहत होकर उस कन्या ने भी प्राण त्यागने का निश्चय किया।
पति की चिता की प्रदक्षिणा करने के उपरान्त वह उस चिता में स्वयं को समाहित करने जा ही रही थी कि वहाँ भगवान मङ्गल प्रकट हो गये। मङ्गल देव ने उस ब्राह्मण कन्या से कहा कि – ‘हम पति के प्रति तुम्हारी निष्ठा एवं प्रेम से अत्यन्त प्रसन्न हैं, हम तुम्हारी समस्त मनोकामनायें पूर्ण करेंगे। वरदान माँगों।’ वह कन्या बोली – ‘यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो हे भगवान! कृपया मेरे पति को जीवनदान प्रदान करें।’ यह सुनकर मङ्गल देव ने कहा – ‘तथास्तु! तेरा पति देवताओं के समान अजर-अमर होगा। अन्य जो भी कामना है माँगों।’
यह सुनकर उस ब्राह्मणी ने कहा – ‘हे भूमिपुत्र! हे देवेश्वर! आप कृपा करके यह वरदान दें की जो भी लाल चन्दन से आपका पूजन एवं स्मरण करे तथा मङ्गलवार को प्रातः लाल पुष्प से आपकी पूजा-अर्चना करे, वह सदैव समस्त प्रकार की व्याधियों तथा रोगादि से सुरक्षित रहे। हे प्रभो! मङ्गलवार को आपका पूजन करने वाले की सर्प, अग्नि, शत्रु तथा वियोग आदि से रक्षा करें एवं सुख-सम्पत्ति प्रदान करें।’
ब्राह्मण कन्या के वचनों को सुन भगवान मङ्गल ने कहा – ‘जो भी भक्त परगृह के अन्न को त्यागकर काले अन्न का सेवन करते हुये 21 भौमव्रत करता है तथा मङ्गल देव के वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते हुये अर्घ्य आदि प्रदान कर सामग्री सहित युवा बैल का दान करता है और यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वर्ण दान करता है वह सदैव ग्रह पीड़ा से सुरक्षित रहते हुये उन्नति करता है। इस व्रत को करने वाले भक्त का भूत, वैताल, डाकिनी-शाकिनी आदि भी कुछ अहित नहीं कर सकते।’
मङ्गल देव ने कहा कि – ‘समस्त प्रकार के सुख प्रदान करने वाले इस व्रत का वर्णन हमने तुम्हारे समक्ष किया है। इस व्रत को करने वाला समस्त प्रकार की पीड़ाओं से मुक्त रहेगा। यह व्रत स्त्री, पुरुष आदि सभी के करने योग्य है। पुण्यदायक भौम व्रत के फलस्वरूप निश्चित् ही सभी को मुक्ति एवं स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।’ इस प्रकार व्रत के माहात्म्य का वर्णन करके भगवान मङ्गल अन्तर्धान हो गये।'”
॥इति श्री भौमवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥




