Pradyumna Chaturthi Vrat Katha – प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत कथा
प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत कथा – राजा कर्दम के प्रमेह रोग की पीड़ा से मुक्त होने की कथा
राजा दशरथ ने ऋषि वशिष्ठ से कहा – “हे मुनिवर! आपके श्रीमुख से वैशाख शुक्ल चतुर्थी व्रत का माहात्म्य श्रवण कर मेरा हृदय आनन्दित हो रहा है। हे मुनिपुंगव! कृपया अब ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के व्रत का वर्णन करने की कृपा करें।”
वशिष्ठ मुनि बोले – “हे राजन्! आन्ध्र प्रदेश के शेषपुर नामक नगर में एक अत्यन्त गुणवान राजा हुये, जिनका नाम कर्दम था। वे राजा विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता तथा नीति एवं न्याय युक्त शासन करने वाले थे। समुद्र तक विस्तृत समस्त भूमण्डल पर राजा कर्दम का ही शासन था। अपने धर्माचरण के कारण राजा कर्दम भूलोक पर अतुलनीय हो गये थे।
कालान्तर में एक समय दैवयोग से राजा कर्दम को प्रमेह नामक दारुण रोग हो गया। प्रमेह को सुजाक भी कहा जाता है। इस रोग के कारण राजा की देह में अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र दाह होने लगा। प्रमेह रोग ने राजा की यह स्थिति कर दी कि राजा मूत्रत्याग करने में भी असमर्थ हो गये। उनकी सम्पूर्ण देह भयङ्कर रूप से दहक रही थी तथा राजा उस पीड़ा के कारण व्याकुल होकर विलाप कर रहे थे। विभिन्न कुशल वैद्यों द्वारा नाना प्रकार के उपचार करने पर भी राजा के रोग में कोई लाभ नहीं हुआ।
रोग की पीड़ा में वृद्धि होने पर राजा ने अपने राज्य का त्याग कर दिया तथा पत्नी सहित वन में चले गये। सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं से युक्त वन में विचरण करते हुये राजा यह विचार करने लगे कि इस पीड़ा से तो मृत्यु ही उचित है। राजा इस प्रकार मनन करते हुये वन में विचर ही रहे थे कि उसी समय ऋषियों में श्रेष्ठ ऋषि भारद्वाज वहाँ पधारे। भारद्वाज ऋषि का दर्शन पाकर राजा ने उन्हें सम्मानपूर्वक प्रणाम किया तथा उनके पूजन हेतु करबद्ध होकर खड़े हो गये। किन्तु उसी समय सहसा मूत्रनली में पीड़ा होने के कारण राजा भूमि पर गिर पड़े एवं विलाप करने लगे।
राजा की यह दुर्दशा देखकर ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाज जी ने अपने तपोबल से राजा के दुःख का कारण ज्ञात किया एवं कहा – ‘हे राजेन्द्र! कर्दम! तुम मेरे हितकारी वचनों को श्रवण करो। तुम्हारा राज्य चतुर्थी व्रत से हीन हो गया है, जिसके कारण तुम महापाप से युक्त हो गये हो। अतः तुम सम्पूर्ण प्रजा सहित चतुर्थी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करो। उस व्रत के पुण्यफल से तुम अवश्य ही दुःखहीन हो जाओगे।’
ऋषि के वचन सुनकर राजा ने नमन करते हुये उनसे पूछा – ‘हे ऋषिवर! इस व्रत का विधान क्या है? यह कैसे किया जाता है? कृपया चतुर्थी व्रत की विधि का वर्णन करें।’
भारद्वाज ऋषि बोले – ‘कृष्णपक्ष की चतुर्थी को संकष्ट कहा जाता है तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी को धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करने वाली माना जाता है। सभी व्रतों के आदि में यह व्रत करने से मनुष्य को चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होगी अन्यथा वह इनसे हीन होकर नरक भोगेगा।’ ऐसा कहकर ऋषिवर ने ज्येष्ठ चतुर्थी व्रत से उत्पन्न माहात्म्य का वर्णन किया जिसका श्रवण करके राजा प्रसन्न हो गये।
तदुपरान्त राजा ने ऋषिवर को प्रणाम करते हुये भगवान गणेश के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा प्रकट की। तब ऋषि भारद्वाज ने कहा – ‘हे राजन्! भगवान गणेश के स्वरूप का वर्णन करने में तो वेद आदि भी असमर्थ हैं, तथापि मैं सुख प्रदान करने वाला सार वर्णित करता हूँ। पूर्वकाल में मैंने ध्यान में लीन होकर कठिन तप किया जिससे सम्पूर्ण चराचर जगत् मेरे अधीन हो गया। तदनन्तर मुझे अन्तर्ज्ञान प्राप्त हो गया। तदुपरान्त मैं इन्द्रियों को शान्त एवं उनका दमन करके औघड़ मार्ग में स्थित हो गया। तत्पश्चात् मैंने स्वानन्दवासी होकर शान्ति प्राप्त कर ली। उस शान्ति से भेद उत्पन्न हो गये, जिससे मैं पुनः शान्तिहीन एवं दुखी हो गया।
उसी समय वहाँ महर्षि रैवत प्रकट हो गये। रैवत मुनि को प्रणाम एवं पूजन आदि करके मैंने उन्हें आसन प्रदान किया तथा निवेदन करते हुये कहा – ‘हे महामुने! आप योगीन्द्रों के भी गुरु हैं, आपके दर्शन से मेरा जीवन धन्य हो गया। हे भगवन्! मुझे योगशान्ति का ज्ञान प्रदान करें, जिसके द्वारा में शान्ति में स्थित हो जाऊँ।’
रैवत मुनि ने कहा – ‘गणेश शब्द में गकार वर्ण स्वसंवेद्य, अर्थात् स्वयं की आत्मा द्वारा ज्ञात करने योग्य है तथा णकार को आत्मा का योग कहा जाता है। इन दोनों के स्वामी भगवान गणेश हैं, जिन्हें ब्रह्म का पति कहा गया है। अतः हे मानद! तुम भगवान गणेश का ध्यान करो, तभी तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी अन्यथा तुम सौ वर्षों तक भ्रमित रहोगे। हे महात्मन्! पूर्वकाल में भगवान विष्णु के श्रीमुख से इस महाज्ञान का श्रवण करके मुझे शान्ति प्राप्त हुयी थी तथा अब मैं गाणपत्य धर्म का आचरण कर रहा हूँ।’
ऐसा कहकर रैवत ऋषि ने भगवान श्रीगणेश का सिद्धिदायक एकाक्षर मन्त्र मुझे प्रदान कर दिया तथा उसकी विधि एवं न्यास का वर्णन भी किया। मन्त्र ग्रहण करके मैंने उनका पूजन किया तथा पूजन स्वीकार कर वे अन्तर्धान हो गये। तदुपरान्त मैं अनन्य चित्त से भगवान गणेश की आराधना करने लगा। गणेश जी की कृपा से मुझे शान्ति प्राप्त हो गयी, तथापि मैं उनके ध्यान में लीन रहा। निरन्तर दश वर्षों तक अहर्निश भजन करने के उपरान्त विघ्नेश्वर भगवान गणेश मेरे सम्मुख साक्षात् प्रकट हो गये। गणेश जी का दर्शन कर मैंने उनकी पूजा-अर्चना की तथा सामवेद के आठ नामों वाले उनके स्तोत्र से उन्हें प्रणाम किया। तदुपरान्त मुझे गाणपत्य बनाकर वे स्वानन्दलोक में चले गये तथा मैं नित्य उनकी भक्ति में लीन रहने लगा।’
ऐसा कहकर भारद्वाज ऋषि ने राजा कर्दम को विधिपूर्वक अष्टाक्षर महामनु मन्त्र प्रदान किया एवं वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजा कर्दम ने अपने निवास जाकर प्रसन्नतापूर्वक भगवान गणेश का पूजन किया। सर्वप्रथम ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि आयी। चतुर्थी के दिन राजा ने नागरिकों सहित विधिवत् व्रत सम्पन्न किया।
हे राजन् दशरथ! राजा कर्दम ने यह घोषित कर दिया कि – ‘शुक्लपक्ष की चतुर्थी वर प्रदान करने वाली है तथा कृष्ण पक्ष की कष्ट हरने वाली, अतः जो भी मनुष्य इन तिथियों पर व्रत नहीं करेगा उसे राज्य से बहिष्कृत कर दिया जायेगा तथा वह दण्ड का भागी होगा।’ तत्पश्चात् समस्त भूमण्डल पर मनुष्य इस व्रत का पालन करने लगे।
स्वयं व्रत करने एवं प्रजा से कराने के कारण राजा का प्रमेह रोग शान्त हो गया तथा उनकी पीड़ा पूर्णतः समाप्त हो गयी। गणेश जी की महिमा से प्रभावित होकर राजा ने अपना राज्य पुत्र को सौंप दिया तथा स्वयं पत्नी सहित एक वाटिका में निवास कर भगवान गणेश की आराधना करने लगे। अन्त में गणेश का भजन करते हुये वे ब्रह्मलीन हो गये। तदुपरान्त राज्य के सभी मनुष्य अन्त समय आने पर ब्रह्म में लीन हो गये।”
ऋषि वशिष्ठ ने कहा – “हे राजेन्द्र दशरथ! अब इस व्रत से सम्बन्धित एक अन्य सिद्धिदायक कथा का श्रवण कीजिये। गौड देश में एक अत्यन्त पापी अन्त्यज निवास करता था। वह अन्त्यज धन का लोभी, स्त्रीलम्पट तथा दुराचारी था। वह वन में यात्रा कर रहे मनुष्यों की हत्या करके उनका धन आदि लूट लेता था। इतना ही नहीं वह वन में किसी भी वर्ण की स्त्री को अकेला देखकर बलपूर्वक उसके साथ दुष्कर्म करता था। वह नित्य नाना प्रकार के पाप कर्म करता था। एक समय किसी ब्राह्मण पर उस पापी ने आक्रमण कर दिया। भयभीत होकर ब्राह्मण सहायता के लिये तीव्र स्वर में लोगों को पुकारते हुये भागने लगा। उस ब्राह्मण की पुकार सुनकर पाँच पुरुष वहाँ आ गये। उन पाँचों ने शस्त्राघात करके उस पापी अन्त्यज को निःसहाय कर दिया।
उस दिन ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि थी। शस्त्राघात की पीड़ा के कारण वह चतुर्थी के दिन पूर्णतः निराहार रहा तथा अन्न-जल आदि ग्रहण नहीं कर सका। अतः अनभिज्ञता में ही उसके द्वारा चतुर्थी व्रत सम्पन्न हो गया। आघात की पीड़ा एवं निराहार रहने के कारण पञ्चमी तिथि को उस पापी की मृत्यु हो गयी। अनभिज्ञता में ही चतुर्थी व्रत करने के पुण्य से वह दुष्ट अधर्मी अन्त्यज भी ब्रह्मभूत हो गया।
हे राजन्! जब एक अधर्मी चाण्डाल अनभिज्ञ होते हुये व्रत करने के प्रभाव से ब्रह्मभूत हो सकता है, तो जो भी श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करेगा वह अवश्य ही ब्रह्म में लीन होकर स्वयं ब्रह्म हो जायेगा। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि कितने ही पापी मनुष्य इस व्रत के प्रभाव से लौकिक सुखों को भोगकर स्वानन्दवासी हो गये। उनका वर्णन करना भी असम्भव है। इस व्रत की महिमा अपार है, इसीलिये इसके माहात्म्य का वर्णन किया गया है। ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का पाठ एवं श्रवण करने वाला मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है।”
॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥




