गणपति गिरजा पुत्र को,सुमिरूँ बारम्बार। हाथ जोड़ बिनती करूँ,शारद नाम आधार॥
बंदौं वीणा पाणि को,देहु आय मोहिं ज्ञान। पाय बुद्धि रविदास को,करौं चरित्र बखान॥
पहले साई के चरणों में,अपना शीश नमाऊं मैं। कैसे शिरडी साई आए,सारा हाल सुनाऊं मैं॥
बन्दउ माँ शाकम्भरी,चरणगुरु का धरकर ध्यान। शाकम्भरी माँ चालीसा का,करे प्रख्यान॥
मूर्ति स्वयंभू शारदा,मैहर आन विराज। माला, पुस्तक, धारिणी,वीणा कर में साज॥
देवि पूजिता नर्मदा,महिमा बड़ी अपार। चालीसा वर्णन करत,कवि अरु भक्त उदार॥
विश्वेश्वर-पदपदम की,रज-निज शीश-लगाय। अन्नपूर्णे! तव सुयश,बरनौं कवि-मतिलाय॥
सिर नवाइ बगलामुखी,लिखूँ चालीसा आज। कृपा करहु मोपर सदा,पूरन हो मम काज॥
जय गिरी तनये दक्षजे,शम्भु प्रिये गुणखानि। गणपति जननी पार्वती,अम्बे! शक्ति! भवानि॥
श्री गणपति पद नाय सिर,धरि हिय शारदा ध्यान। सन्तोषी मां की करुँ,कीरति सकल बखान॥


