Kartik Mahatmya Ki Kathaayen - कार्तिक माहात्म्य की कथायें
व्रत कथा

Kartik Mahatmya Ki Kathaayen – कार्तिक माहात्म्य की कथायें

Kartik Mahatmya Ki Kathaayen – कार्तिक माहात्म्य की कथायें

कार्तिक माहात्म्य की कथायें, भगवान विष्णु की कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु की जाती है।


पहला अध्याय – कार्तिक मास की श्रेष्ठता तथा उसमें करने योग्य स्नान, दान, पूजन आदि धर्मों का महत्त्व

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव, ततो जयमुदीरयेत॥

भावार्थ – भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा देवी सरस्वती को नमस्कार करते हुये ही स्वरूप इतिहास-पुराण का पाठ करना चाहिये।

ऋषि बोले – “सूतजी! हम सभी आपके श्रीमुख से कार्तिक माह का माहात्म्य श्रवण करने के इच्छुक हैं।”

सूतजी ने कहा – “हे ऋषिगणों! जो जिज्ञासा आपने मेरे समक्ष प्रकट की है उसी को एक समय ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारद ने जगद्गुरु भगवान ब्रह्मा से इस प्रकार पूछा था – ‘हे पितामह! मासों में सर्वश्रेष्ठ मास, देवताओं में सर्वोत्तम देवता तथा तीर्थों में सर्वाधिक विशिष्ट तीर्थ कौन हैं, कृपया वर्णन करें।’

ब्रह्माजी बोले – ‘मासों में कार्तिक, देवताओं में भगवान विष्णु तथा तीर्थों में नारायण तीर्थ, अर्थात् बदरिकाश्रम श्रेष्ठ है। ये तीनों ही कलयुग में अत्यन्त दुर्लभ हैं।’

इतना कहकर ब्रह्माजी ने भगवान श्रीराधाकृष्ण का स्मरण किया एवं पुनः नारद जी से कहा – ‘हे पुत्र! तुमने समस्त लोकों के उद्धार की कामना से अति उत्तम प्रश्न किया है। मैं कार्तिक के माहात्म्य का वर्णन करता हूँ, तुम श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। कार्तिक मास भगवान विष्णु को सदा ही अत्यन्त प्रिय है। कार्तिक में भगवान विष्णु के निमित्त जो भी पुण्य किया जाता है, उसका क्षय नहीं होता है। हे नारद! मनुष्य योनि अत्यन्त दुर्लभ है। इसे प्राप्त कर मनुष्य को ऐसा आचरण करना चाहिये कि उसे पुनः निम्न योनियों में न गिरना पड़े। कार्तिक सभी मासों में उत्तम है। यह पुण्यमय वस्तुओं में सर्वाधिक पुण्यतम एवं पावन पदार्थों में सर्वाधिक पावन है। इस माह में तैंतीसों देवता मनुष्य के सम्मुख हो जाते हैं तथा उसके द्वारा किये हुये स्नान, व्रत एवं पूजन सहित भोजन, तिल, धेनु, सुवर्ण, रजत, भूमि आदि के दानों को विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं।

कार्तिक में जो कुछ भी दान एवं तप आदि किया जाता है, भगवान विष्णु ने स्वयं उसे अक्षय फल प्रदान करने वाला कहा है। भगवान विष्णु के निमित्त मनुष्य कार्तिक माह में जो कुछ भी दान करता है, उसे वह अक्षय रूप में प्राप्त करता है। कार्तिक में अन्नदान का अत्यधिक महत्त्व होता है। इस माह में अन्नदान करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है। जो व्यक्ति कार्तिक मास में पराये अन्न का सर्वथा त्याग करता है उसे अतिकृच्छ्र यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

कार्तिक मास के समान कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं, वेदों के समान को शास्त्र नहीं तथा गङ्गाजी के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं है। इसी प्रकार अन्नदान के सदृश कोई अन्य दान नहीं है। दान करने वाले पुरुषों के लिये न्यायोपार्जित द्रव्य के दान का सुअवसर दुर्लभ है, उसका भी तीर्थ में दान करना और अधिक दुर्लभ है। हे मुनिपुंगव! पाप से भयभीत होने वाले मनुष्य को कार्तिक मास में शालिग्राम शिला का पूजन एवं भगवान वासुदेव का स्मरण अवश्य करना चाहिये। यदि दान आदि करने में असमर्थ हो तो मनुष्य को प्रतिदिन हर्षपूर्वक भगवन्नामों का स्मरण करना चाहिये। कार्तिक में भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु विष्णु-मन्दिरों अथवा शिवालय में रात्रि जागरण करना चाहिये। भगवान शिव एवं भगवान विष्णु के मन्दिर न हों तो किसी भी देवस्थान में जागरण करे। यदि दुर्गम वन में हो अथवा किसी विपत्ति में पड़ा हो तो पीपल के वृक्ष की मूल में अथवा तुलसी के वनों में जागरण करे। भगवान विष्णु के समक्ष उनके नामों एवं लीलाओं का गायन करे। यदि मनुष्य आपत्ति से घिरा हो एवं उसे अधिक जल प्राप्त न हो अथवा किसी रोग से ग्रसित होने के कारण जल से स्नान करने में असमर्थ हो तो केवल भगवान के नाम से मार्जन मात्र कर ले।

गुरु के आदेश एवं वचनों का कभी उल्लङ्घन न करे। स्वयं पर दुःख आने पर गुरु की शरण में जाये। गुरु की प्रसन्नता से मनुष्य को सब कुछ प्राप्त हो जाता है। परम बुद्धिमान् कपिल मुनि एवं महातपस्वी सुमति ने भी अपने गुरु महर्षि गौतम की सेवा से अमरत्व प्राप्त किया था। अतः विष्णु भक्त पुरुष को कार्तिक में समस्त प्रकार से यत्नपूर्वक गुरु की सेवा करनी चाहिये। ऐसा करने से उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

समस्त दानों में उत्तम कन्यादान है, उससे अधिक विद्यादान है, विद्यादान से भी अधिक गोदान का महत्त्व है तथा गोदान से भी श्रेष्ठ अन्नदान है, क्योंकि यह समस्त संसार अन्न के आधार पर ही जीवित रहता है। इसीलिये कार्तिक में अन्नदान अवश्य ही करना चाहिये। कार्तिक मास में नियमों का पालन करने से निश्चित ही भगवान विष्णु का सारूप्य मोक्ष प्राप्त होता है। कार्तिक में ब्राह्मण दम्पति को भोजन कराना चाहिये, चन्दन से उनका पूजन करना चाहिये, अनेक प्रकार के वस्त्र, रत्न तथा कम्बल दान करने चाहिये। ओढ़ने सहित रूईदार बिछावन, जूता तथा छाता भी दान करना चाहिये। कार्तिक में भूमिशयन करने वाले मनुष्य के युग-युगान्तरों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो कार्तिक मास में भगवान विष्णु के समक्ष अरुणोदयकाल में जागरण करता है तथा नदी में स्नान, भगवान विष्णु की कथा का श्रवण, वैष्णवों का दर्शन तथा नित्यप्रति भगवान विष्णु का पूजन करता है, उसके पितरों का नरक से उद्धार हो जाता है। अहो! जिन मनुष्यों ने भक्तिपूर्वक भगवान विष्णु का पूजन नहीं किया, वे इस कलियुग की कन्दरा में पतित होकर नष्ट हो गये। जो मनुष्य कमल के एक पुष्प से देवताओं के स्वामी भगवान कमलापति का पूजन करता है, वह करोड़ों जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। हे मुनिश्रेष्ठ! जो कार्तिक में एक लाख तुलसी दल अर्पित कर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करता है, उसे एक-एक दल पर मुक्तादान करने का पुण्य प्राप्त होता है।

जो भगवान के श्रीअङ्गो से उतारी हुयी तुलसी को मुख में, मस्तक पर तथा देह में धारण करता है तथा भगवान के निर्माल्यों से अपने अङ्गो का मार्जन करता है, वह समस्त रोगों एवं पापों से मुक्त हो जाता है। भगवत्पूजन सम्बन्धी प्रसाद स्वरूप शङ्ख का जल, भगवान की भक्ति, निर्माल्य पुष्प आदि चरणोदक, चन्दन एवं धूप ब्रह्महत्या का भी नाश करने वाले हैं।

हे नारद! कार्तिक मास में प्रातःकाल स्नान करना चाहिये तथा प्रतिदिन अपनी सामर्थ्यानुसार ब्राह्मणों को अन्नदान करना चाहिये, क्योंकि समस्त दानों में अन्नदान ही सर्वोत्तम है। अन्न से ही मनुष्य जन्म लेता है तथा अन्न से ही उसकी वृद्धि होती है। अन्न को समस्त प्राणियों का प्राण माना गया है। अन्नदान करने वाला मनुष्य संसार में सब कुछ दान करने वाला तथा सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला है।

पूर्वकाल में सत्यकेतु नाम के ब्राह्मण ने अन्नदान से ही समस्त पुण्यों का फल प्राप्त कर अति दुर्लभ मोक्ष को भी प्राप्त कर लिया था। कार्तिक मास में नाना प्रकार के दान देकर भी यदि मनुष्य भगवान का चिन्तन नहीं करता तो वे दान उसे पवित्र नहीं करते। भगवन्नाम स्मरण की महिमा का वर्णन करने में तो मैं भी असमर्थ हूँ।

गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे, गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण।
गोविन्द गोविन्द रथांगपाणे, गोविन्द दामोदर माधवेति॥

इस प्रकार प्रतिदिन कीर्तन करना चाहिये। कार्तिक में नित्य प्रतिदिन भागवत के आधे श्लोक अथवा चौथाई श्लोक का ही श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक पाठ अवश्य करना चाहिये। जिन्होंने भागवतपुराण का श्रवण नहीं किया, पुराणपुरुष भगवान नारायण की आराधना नहीं की तथा ब्राह्मणों के मुखरूपी अग्नि में अन्न की आहुति नहीं दी, उन मनुष्यों का जन्म व्यर्थ ही हो गया। हे देवर्षे! जो मनुष्य कार्तिक मास में प्रतिदिन गीता का पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने की शक्ति मुझमें भी नहीं है। गीता के समान कोई शास्त्र न तो हुआ है और न ही होगा।

एकमात्र गीता ही सदा समस्त पापों को हरने वाली एवं मोक्ष प्रदान करने वाली है। गीता के एक अध्याय का पाठ करने से मनुष्य घोर नरक से मुक्त हो जाते हैं, जिस प्रकार जड़ ब्राह्मण मुक्त हो गया था। सात समुद्रों वाली पृथ्वी का दान करने से जो फल प्राप्त होता है, शालिग्राम शिला का दान करने से मनुष्य उसी फल को प्राप्त कर लेता है। अतः कार्तिक मास में स्नान तथा श्रद्धापूर्वक शालिग्राम शिला का दान अवश्य करना चाहिये।'”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


दूसरा अध्याय – विभिन्न देवताओं की सन्तुष्टि हेतु कार्तिक स्नान की विधि तथा स्नान के लिये श्रेष्ठ तीर्थों का वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘कार्तिक का व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी से आरम्भ करके कार्तिक शुक्ल दशमी को पूर्ण करें अथवा आश्विन पूर्णिमा से आरम्भ करके कार्तिक पूर्णिमा को सम्पन्न करें। भक्तों को आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी के अवसर पर भगवान विष्णु को नमन करके उनसे कार्तिक व्रत करने की आज्ञा प्राप्त करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक व्रत का पालन करना चाहिये। सभी मासों में मार्गशीर्ष मास अत्यन्त पुण्यप्रदायक है, उससे अधिक पुण्यदायक नर्मदा तट पर वैशाख मास बताया गया है। उससे लाख गुना अधिक प्रयाग में माघ मास का महत्त्व है। उससे भी महान फलप्रदायक कार्तिक मास है। इसका महत्त्व सर्वत्र जग में एक समान ही है। ब्रह्माजी ने तुला की एक ओर सभी दान, व्रत एवं नियम तथा दूसरी ओर कार्तिक का स्नान तौला तो कार्तिक का ही पलड़ा अधिक भारी सिद्ध हुआ।

कार्तिक मास में स्नान, दीपदान, तुलसी के पौधों को रोपना एवं सींचना, भूमि शयन, ब्रह्मचर्य का पालन, भगवान विष्णु के नामों का संकीर्तन तथा पुराणों का श्रवण आदि नियमों का जो भी निष्काम भाव से पालन करते हैं, वे ही जीवन्मुक्त हैं। यह व्रत भगवान श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है। भगवान सूर्य की आराधना करने वाले, भगवान गणेश के भक्तगण, शक्ति के उपासक, भगवान शिव का पूजन करने वाले तथा वैष्णवजन, इन सभी को समस्त पापों से मुक्ति हेतु कार्तिक स्नान अवश्य करना चाहिये। भगवान सूर्य की कृपा प्राप्ति हेतु जब तक सूर्य तुला राशि पर स्थित हों तब तक व्रत करना चाहिये। भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु आश्विन पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक स्नान करना चाहिये। देवी माँ दुर्गा को प्रसन्न करने हेतु आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से लेकर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महारात्रि आने तक स्नान करना चाहिये। भगवान गणेश का आशीर्वाद ग्रहण करने एवं प्रसन्नता हेतु आश्विन कृष्ण चतुर्थी से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक नियमपूर्वक स्नान करना चाहिये।

जो आश्विन शुक्ल पक्ष एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी तक कार्तिक व्रत का पालन करता है, उस पर भगवान जनार्दन प्रसन्न होकर विशेष कृपा करते हैं। जो दूसरों की संगतिवश या बलात् अथवा अज्ञानता वश ही कार्तिक मास में प्रातःस्नान का नियम पूर्ण कर लेता है वह भी यम-यातना से सुरक्षित हो जाता है। जो ब्राह्मण कार्तिक में प्रातःस्नान करते हैं, उन्हें ओढ़ने के लिये कम्बल एवं रजाई दान करने से भी स्नान जनित पुण्य फल प्राप्त होता है। कार्तिक मास में विशेषतः श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिये। जो कार्तिक में तुलसी वृक्ष के नीचे श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण की मूर्ति का पूजन करते हैं, उन्हें भी जीवन्मुक्त समझना चाहिये। सहस्रों पापों से युक्त मनुष्य भी कार्तिक स्नान से निश्चित ही निष्पाप हो जाता है। तुलसी के अभाव में आँवले के नीचे पूजन करना चाहिये। मुख्य पूजा की विधि सूर्यमण्डल में करनी चाहिये। अतः सूर्यमण्डल की ओर देखकर सूर्य रूपी भगवान नारायण के निमित्त पूजनोपचार समर्पित करना चाहिये। सभी देवता अप्रत्यक्ष हैं, किन्तु भगवान सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। अन्य सभी देवता काल के अधीन हैं, किन्तु भगवान सूर्य काल के भी काल हैं।

जो दरिद्र है वही दान का पात्र है तथा उसकी अपेक्षा भी विद्वान पुरुष दान का विशेष पात्र है। भगवान विष्णु की चल मूर्ति की तुलना में अचल मूर्ति श्रेष्ठ मानी गयी है। मूर्ति के अभाव में भगवान का रूप मानते हुये पीपल अथवा वटवृक्ष की पूजा करनी चाहिये। पीपल भगवान विष्णु का एवं वट वृक्ष भगवान शिव का स्वरूप है। शालग्राम शिला के चक्र में साक्षात् भगवान शिव का निवास है। इसीलिये यत्नपूर्वक शालग्राम की पूजा करनी चाहिये। पलाश की उत्पत्ति ब्रह्माजी के अंश से हुयी है। इसीलिये जो व्यक्ति कार्तिक मास में पलाश की पत्तल में भोजन करता है, वह भगवान विष्णु के लोक को प्राप्त करता है। पीपल के रूप में साक्षात् भगवान विष्णु विराजमान हैं, अतः कार्तिक में यथाशक्ति पीपल का पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य कार्तिक मास में स्नान, जागरण, दीपदान तथा तुलसीवन की रक्षा करते हैं, वे भगवान विष्णु के स्वरूप हैं। जो भगवान विष्णु के मन्दिर में झाड़ू लगाकर निष्काम भाव से स्वस्तिक आदि मङ्गलचिह्न की रचना एवं भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, वे जीवन्मुक्त हैं।

जब दो घड़ी रात्रि शेष रहे, उस समय तुलसी की मृत्तिका, वस्त्र एवं कलश लेकर जलाशय के समीप जायें। चरण प्रक्षालन कर गङ्गा आदि नदियों तथा विष्णु एवं शिव आदि देवताओं का स्मरण करें। तदुपरान्त नाभि तक जल में खड़े होकर निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करें –

कार्तिकेऽहं करिष्यामि प्रातःस्नानं जनार्दन।
प्रीत्यर्थं तव देवेश दामोदर मया सह॥

भावार्थ – ‘हे जनार्दन! हे देवेश्वर दामोदर! देवी लक्ष्मी सहित आपकी प्रसन्नता के लिये मैं कार्तिक मास में प्रातःस्नान करूँगा।’

तत्पश्चात्

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे।
नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने॥
नमस्तेऽस्तु ऋषीकेश गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते।

भावार्थ – ‘हे भगवन्! आप श्रीराधा के सहित मेरे दिये हुये इस अर्घ्य को स्वीकार करें। हरे! आप कमलनाभ को नमस्कार है। जल में शयन करने वाले आप नारायण को नमस्कार है। हे हृषिकेश! यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये, आपको बारम्बार नमस्कार है।’

मनुष्य किसी भी तीर्थ में स्नान करे, उसे गङ्गा का स्मरण अवश्य करना चाहिये। सर्वप्रथम मृत्तिका आदि से स्नान कर पावमानी ऋचाओं द्वारा अपने मस्तक पर अभिषेक करें। अघमर्षण एवं स्नानांग तर्पण करके पुरुष सूक्त से सर पर जल छिड़कें। तदुपरान्त बाहर आकर पुनः मस्तक पर तीर्थ का जल सिञ्चन करें। तत्पश्चात् हाथ में तुलसी लेकर तीन बार आचमन करके पानी से बहार धोती निचोड़ें। वस्त्र निचोड़ने के पश्चात् तिलक आदि धारण करें।

कार्तिक मास में जहाँ भी उपलब्ध हो वहाँ प्रत्येक जलाशय में स्नान करना चाहिये। ग्रीष्म जल की अपेक्षा शीतल जल में स्नान करने से दस गुणा पुण्य प्राप्त होता है। उससे सौ गुणा पुण्य बाहरी कूप में स्नान करने से प्राप्त होता है, उससे अधिक बावड़ी में तथा उससे भी अधिक पुण्य सरोवर में स्नान करने से प्राप्त होता है। सरोवर से दस गुणा झरनों में तथा उससे अधिक पुण्य कार्तिक में नदीस्नान करने से होता है। उससे भी दस गुणा फलदायी तीर्थस्नान होता है। तीर्थ से दस गुणा पुण्य वहाँ होता है, जहाँ दो नदियों का संगम हो तथा यदि कहीं तीन नदियों का संगम हो, तो असीमित पुण्य की प्राप्ति होती है।

सिन्धु, कृष्णा, वेणी, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, विपासा (व्यास), नर्मदा, तमसा, मही, कावेरी, सरयू, क्षिप्रा, चर्मण्वती (चम्बल), बितस्ता (झेलम), वेदिका, शोणभद्र, वेत्रवती (बेतवा), अपराजिता, गण्डकी, गोमती, पूर्णा, ब्रह्मपुत्रा, मानसरोवर, वाग्मती, शतद्रु (सतलज) – ये तीर्थ कार्तिक में अति दुर्लभ हैं। सभी स्थलों में अधिक आर्याव्रत (विन्धयाचल एवं हिमालय के भीतर का प्रदेश – उत्तर भारत), पुण्यदायक है, उससे भी कोल्हापुरी श्रेष्ठ है, कोल्हापुरी से श्रेष्ठ विष्णुकांची एवं शिवकांची हैं। उससे श्रेष्ठ अनन्तसेन का निवास स्थान वराहक्षेत्र है, वराहक्षेत्र से चक्रकक्षेत्र तथा चक्रकक्षेत्र से अधिक पुण्यमय मुक्तिकक्षेत्र है। उससे श्रेष्ठ अवन्तीपुरी तथा अवन्तीपुरी से श्रेष्ठ बदरिकाश्रम है। बदरिकाश्रम से अयोध्या, अयोध्या से गङ्गाद्वार, गङ्गाद्वार से कनखल तथा कनखल से भी श्रेष्ठ मथुरा है, क्योंकि कार्तिक में वहाँ स्वयं भगवान राधाकृष्ण स्नान करते हैं। मथुरा से भी श्रेष्ठ द्वारका है। जिन्होंने भगवान गोविन्द में अपने चित्त को लगा रखा है, उनके लिये द्वारका सूर्य के समान पुण्य प्रकाशित करने वाली है। द्वारका से भी श्रेष्ठ भागीरथी है। वह भी जहाँ विन्ध्यपर्वत से मिलती है, वहाँ अधिक श्रेष्ठ है। उससे दसगुना पुण्य तीर्थराज प्रयाग में होता है। उससे श्रेष्ठ काशी है, जिसके आश्रय से गङ्गाजी भी मनुष्यों के समस्त पापों का नाश करती हैं। काशी में पञ्चनद अर्थात् पञ्चगङ्गा तीर्थ है, जो तीनों लोकों में विख्यात है। कार्तिक मास आने पर रौरव नरक में पड़े हुये पितर भी उद्घोषणा करते हैं कि – “क्या हमारे वंश में कोई ऐसा भाग्यवान् जन्म लेगा, जो पञ्चगङ्गा में जाकर हमारे लिये नरक से उद्धार करने वाला तर्पण करेगा?” लाखों पाप करके भी मनुष्य यदि पञ्चगङ्गा में स्नान कर विन्दुमाधव जी का पूजन करे तो उसके समस्त पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।

कुछ रात्रि शेष रहे उस समय स्नान किया जाये, तो वह उत्तम एवं भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाला होता है। सूर्योदयकाल में किया हुआ स्नान मध्यम श्रेणी का है, जब तक कृत्तिका अस्त न हो, तभी तक स्नान का उत्तम समय है, अन्यथा अधिक विलम्ब करके किया हुआ स्नान कार्तिक स्नान की श्रेणी में नहीं आता। स्त्रियों को पति की आज्ञा लेकर कार्तिक स्नान करना चाहिये, क्योंकि पति से बिना आज्ञा लिये जो धर्मकार्य किया जाता है, वह पति की आयु को क्षीण कर देता है। स्त्रियों के लिये पति की सेवा के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म नहीं है। पति की आज्ञा का पालन करने वाली स्त्री ही इस संसार में धर्मवती है। केवल व्रत आदि करने वाली स्त्री धर्मवती नहीं है। पति यदि दरिद्र, पतित, मूर्ख अथवा दीन भी हो तो भी वह स्त्री का आश्रय है। उसके त्याग से स्त्री नरकगामी होती है।

जिसके दोनों हाथ, दोनों पैर, वाणी एवं मन नियन्त्रण में रहें तथा जिसमें विद्या, तप एवं कीर्ति हो, वही मनुष्य तीर्थ के फल का भागी होता है। जिसकी तीर्थों में श्रद्धा न हो, जो तीर्थ में भी पाप का ही स्मरण करता हो, नास्तिक हो, जिसका मन दुविधा में हो तथा जो कोरा तर्कवादी हो – ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थफल के भागी नहीं होते। जो ब्राह्मण प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर तीर्थ में स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होता है।

स्नान का तत्व जानने वाली मनीषी पुरुषों ने चार प्रकार के स्नान वर्णित किये हैं – वायव्य, वारुण, ब्राह्म एवं दिव्य। गोधूलि से किया हुआ स्नान वायव्य कहलाता है। समुद्र आदि के जल में जो स्नान किया जाता है, उसे वारुण कहते हैं। वेदमन्त्रों के उच्चारणपूर्वक जो स्नान होता है, वह ब्राह्म है तथा मेघों अथवा सूर्य की किरणों द्वारा जो जल देह पर गिरता है, उसे दिव्य स्नान कहा गया है। उपरोक्त सभी में वारुण स्नान सर्वोत्तम है। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य को मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करना चाहिये। स्त्री एवं शूद्र के लिये बिना मन्त्र के ही स्नान का विधान है। प्राचीन समय में श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर में जहाँ नन्दा-संगम है, वहीं नन्दा के कहने से राजा प्रभञ्जन ने कार्तिक मास में पुष्कर स्नान करके व्याघ्र योनि से मुक्ति प्राप्त की थी। नन्दा भी कार्तिक में पुष्कर का स्पर्श प्राप्त कर परम धाम को प्राप्त हुयी थी।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का द्वितीय अध्याय पूर्ण हुआ ॥


तीसरा अध्याय – कार्तिक व्रत करने वाले के लिये पालनीय नियम

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘व्रत करने वाले पुरुष को सदैव एक प्रहर रात्रि शेष रहते हुये निद्रा त्याग देनी चाहिये। तदुपरान्त नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति करके दिवस के कार्य का विचार करे। ग्राम से नैर्ऋत्य कोण में जाकर विधिपूर्वक मल-मूत्र का त्याग करे। यज्ञोपवीत को दायें कान पर चढ़ाकर उत्तराभिमुख होकर बैठे। पृथ्वी पर तिनका बिछा दे तथा अपने मस्तक को वस्त्र से भलीभाँति ढक ले, मुख पर भी वस्त्र लपेट ले, अकेला रहे तथा जल से पूर्ण पात्र समीप रखे। इस प्रकार दिन में मल-मूत्र का त्याग करे। यदि रात्रि में करना हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठे। मलत्याग के पश्चात् गुदा में पाँच या सात बार मिट्टी लगाकर धोवे, बायें हाथ में दस बार लगावे, तदुपरान्त दोनों हाथों में सात बार तथा दोनों पैरों में तीन बार मिट्टी लगानी चाहिये। यह गृहस्थ के लिये शौच का नियम वर्णित किया गया है। ब्रह्मचारी के लिये इससे दो गुणा, वानप्रस्थ के लिये तीन गुणा तथा सन्यासी के लिये चार गुणा शौच का निर्देश है। यह दिन में शौच का नियम है। रात्रि में इससे आधा तथा यात्रा में गये हुये मनुष्य के लिये उससे भी आधे शौच का विधान है तथा स्त्रियों एवं शूद्रों के लिये उससे भी आधे शौच का वर्णन किया गया है। शौचकर्म से हीन पुरुष की समस्त क्रियायें निष्फल होती हैं।

शौच आदि से निवृत्त होकर, अनन्तर दाँत एवं जिह्वा की शुद्धि के लिये वृक्ष के समीप जाकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करे –

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते॥

भावार्थ – ‘हे वनस्पते! आप मुझे आयु, बल, यश, तेज, सन्तति, पशु, धन, वैदिक ज्ञान, प्रज्ञा तथा धारणाशक्ति प्रदान करें।’

ऐसा कहकर वृक्ष से बारह अङ्गुल का दाँतन (दातून) ले, दुग्ध वाले वृक्षों से दाँतन नहीं लेनी चाहिये। इसी प्रकार कपास, काँटेदार वृक्ष तथा जले हुये वृक्ष से भी दाँतन लेना वर्जित है। जिसमें उत्तम गन्ध आती हो तथा जिसकी टहनी कोमल हो, ऐसे ही वृक्ष से दन्तधावन ग्रहण करना चाहिये। उपवास के दिन, नवमी एवं षष्ठी तिथि को, श्राद्ध के दिन, रविवार को, ग्रहण में, प्रतिपदा को तथा अमावस्या को भी काष्ठ से दाँतन नहीं करनी चाहिये। अतः जिस दिन दाँतन वर्जित है उस दिन बारह कुल्ले करने चाहिये। दाँतों को शुद्ध करके मुख को जल से धोये तथा दो घड़ी रात्रि शेष रहते हुये स्नान हेतु जलाशय पर जाये। कार्तिक व्रत का पालन करने वाला मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करे। तदुपरान्त धोती निचोड़कर अपनी रुचि अनुसार तिलक करे तत्पश्चात् अपनी शाखा के अनुरूप आह्निकसूत्र की वर्णित पद्धति से सन्ध्योपासना करे। सूर्योदय होने तक गायत्री मन्त्र का जप करता रहे। इस प्रकार रात्रि के अन्त का कृत्य वर्णित किया गया है।

अब दिवस का कृत्य वर्णित किया जाता है। सन्ध्योपासना के अन्त में विष्णुसहस्रनाम आदि का पाठ करे, तदुपरान्त देवालयों में आकर पूजन प्रारम्भ करे। भगवत्सम्बन्धी पदों का गायन, कीर्तन एवं नृत्य आदि कार्यों में दिन का प्रथम प्रहर व्यतीत करे। तदुपरान्त आधे प्रहर तक भलीभाँति पुराण-कथा का श्रवण करे। अनन्तर पुराणवाचक विद्वान् की एवं तुलसी की पूजा करके मध्याह्न का कर्म करने के पश्चात् दाल के सिवा शेष किसी अन्न का भोजन करे। बलिवैश्वदेव यज्ञ करके अतिथियों को भोजन कराकर जो मनुष्य स्वयं भोजन ग्रहण करता है, उसका भोजन अमृत है। मुखशुद्धि हेतु तीर्थ-जल अथवा भगवच्चरणामृत से तुलसी भक्षण करे। तदुपरान्त शेष दिवस सांसारिक व्यवहार में व्यतीत करे। सायंकाल में पुनः भगवान विष्णु के मन्दिर में सन्ध्या करके यथाशक्ति दीपदान करे। भगवान विष्णु को प्रणाम कर उनकी आरती करे तथा स्तोत्र पाठ आदि करते हुये प्रथम प्रहर में जागरण करे। प्रथम प्रहर व्यतीत होने पर शयन करे। ब्रह्मचर्य व्रत का सावधानीपूर्वक पालन करे। इस प्रकार एक माह तक प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधि का पालन करे। जो कार्तिक मास में उत्तम व्रत का पालन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा उसे भगवान विष्णु के सालोक्य मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कार्तिक मास आने पर निषिद्ध वस्तुओं का त्याग करना चाहिये। तेल लगाना, परान्न भोजन करना, तेल का सेवन, अनेक बीज वाले फलों का सेवन तथा चावल एवं दाल – ये सभी कार्तिक मास में त्याज्य हैं। लौकी, गाजर, बैगन, वनभंटा या ऊँटकटारा, भँसीड़ या कमल ककड़ी, मसूर, मदिरा, छत्राक, काँजी, दुर्गन्धित पदार्थ, बासी अन्न, दुबारा भोजन, पराया अन्न, काँसे के पात्र में भोजन, समुदाय अथवा संस्था आदि का अन्न, वेश्या का अन्न, ग्राम पुरोहित एवं शूद्र का अन्न तथा सूतक का अन्न, ये भी त्याज्य माने गये हैं। श्राद्ध का अन्न, रजस्वला द्वारा दिया हुआ अन्न, जनाना शौच का अन्न तथा लसोड़े का फल, इन्हें कार्तिक व्रत का पालन करने वाले पुरुष को अवश्य त्याग देना चाहिये। निषिद्ध पत्तलों में भोजन न करे। महुआ, केला, जामुन एवं पकड़ी के पत्तों में भोजन करना चाहिये। कमल के पत्ते पर कदापि भोजन ग्रहण करना चाहिये। कार्तिक मास में वनवासी मुनियों के अनुसार नियमित भोजन करने वाला चक्रपाणि भगवान विष्णु के परम धाम को गमन करता है। कार्तिक में प्रातःकाल स्नान एवं भगवान की आराधना करनी चाहिये। यह समय कथा श्रवण हेतु उत्तम माना गया है। कार्तिक में केला एवं आँवले के फल का दान करे एवं शीत से पीड़ित ब्राह्मण को वस्त्र दान करे। कार्तिक में भक्तिपूर्वक भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करने वाला संसार से मुक्त होकर विष्णु जी के परम पद को प्राप्त होता है।

भगवान श्रीहरि के परम प्रिय कार्तिक मास में जो नित्यप्रति गीता पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी करना असम्भव है। जो श्रीमद्भागवत का भी श्रवण करता है, उसके समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं तथा उसे परम शान्ति प्राप्त होती है। जो कार्तिक की एकादशी को निराहार रहकर व्रत करता है, वह निःसन्देह पूर्वजन्म के पापों से मुक्त हो जाता है। कार्तिक में भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु परान्न का त्याग करने वाला विष्णु जी के प्रेम को प्राप्त करता है। जो मार्ग में यात्रा कर क्लान्त हुये एवं भोजन के समय पर घर पर पधारे अतिथि का श्रद्धापूर्वक पूजन करता है। उसके सहस्रों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मूढ़ मनुष्य वैष्णव महात्माओं की निन्दा करते हैं, वे अपने पितरों के सहित महारौरव नरक में भीषण कष्ट भोगते हैं। जो भगवान की एवं भगवद्भक्तों की निन्दा श्रवण करते हुये उस स्थान से अन्यत्र नहीं जाता वह भगवान का प्रिय भक्त नहीं है। जो कार्तिक मास में भगवान विष्णु की परिक्रमा करता है उसे पग-पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। जो कार्तिक मास में परस्त्रीगमन करता है, उसके पाप के शमन का उपाय वर्णित करना असम्भव है। जिसके ललाट में तुलसी की मृत्तिका का तिलक सुशोभित रहता है, उसकी ओर भयङ्कर यमदूत तो क्या अपितु यमराज भी दृष्टिपात करने में असमर्थ हैं। कार्तिक मास में भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु धार्मिक अनुष्ठान करना चाहिये। मासव्रत का समापन होने पर व्रत की पूर्णता हेतु श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देना चाहिये। जो कार्तिक में भगवान विष्णु के देवालयों में चूना आदि का लेप कराता है अथवा चित्रों की रचना करता है, वह भगवान विष्णु के समीप आनन्द की अनुभूति करता है।

जो ब्राह्मण कार्तिक मास में गभस्तीश्वर महादेव के समीप शतरुद्री का जप करता है, उसके मन्त्र की सिद्धि होती है। जो तीन वर्षों तक काशी में निवास कर भक्तिपूर्वक साङ्गोपाङ्ग कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करता है, उसे सम्पत्ति, सन्तति, यश तथा धर्मबुद्धि की प्राप्ति के द्वारा इस लोक में ही उस व्रत का प्रत्यक्ष फल प्राप्त होता है। कार्तिक में प्याज, शृङ्ग, अर्थात् सिंघाड़ा, सेज, बेर, राई, मादक पदार्थ तथा चिउड़ा का प्रयोग नहीं करना चाहिये। कार्तिक व्रत करने वाले मनुष्य को देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरु, गौ, व्रती, स्त्री, राजा तथा महात्माओं की निन्दा नहीं करनी चाहिये। कार्तिक में केवल नरक चतुर्दशी अर्थात् दीवाली से एक दिन पूर्व ही देह में तेल मर्दन करना चाहिये। उसके अतिरिक्त व्रतधारी को अन्य किसी भी दिवस तेल मर्दन नहीं करना चाहिये। नलिका, मूली, कुम्हड़ा तथा कैथ का भी त्याग करना चाहिये। रजस्वला, चाण्डाल, म्लेच्छ, पतित, व्रतहीन, ब्राह्मणद्वेषी तथा वेद-बहिष्कृत लोगों से व्रती मनुष्य को वार्तालाप नहीं करना चाहिये।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का तृतीय अध्याय पूर्ण हुआ ॥


चौथा अध्याय – कार्तिक व्रत से एक पतित ब्राह्मणी का उद्धार तथा दीपदान एवं आकाशदीप की महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘स्त्री एवं पुरुषों ने जन्म पर्यन्त जो पाप किया है, वह कार्तिक में दीपदान करने से नष्ट हो जाता है। इस सन्दर्भ में मैं तुमसे एक प्राचीन इतिहास का वर्णन करता हूँ। पूर्वकाल में द्रविड़ देश में एक ब्राह्मण निवास करता था। उसका नाम बुद्ध था। उसकी पत्नी अत्यन्त दुष्टा एवं अधर्मी थी। उसके संसर्ग दोष से पति की आयु क्षीण हो गयी तथा वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। पति की मृत्योपरान्त वह विशेष रूप से व्यभिचार में रत हो गयी। उसे लोकनिन्दा से तनिक मात्र भी लज्जा नहीं आती थी। उसका न कोई पुत्र था एवं न ही कोई भ्राता था। वह सदैव भिक्षा में प्राप्त अन्न का भोजन करती थी। अपने हाथ से बनाये हुये शुद्ध एवं स्वल्प अन्न का सेवन न कर वह सदैव भिक्षाटन से प्राप्त एवं बासी अन्न का ही सेवन करती थी। इसके अतिरिक्त वह दूसरे के घर में रसोई बनाया करती थी तथा तीर्थयात्रा आदि के विचार से तो कोसों दूर रहती थी। उसने कभी कथा श्रवण भी नहीं की थी।

एक दिन तीर्थयात्रा करता हुआ एक विद्वान् ब्राह्मण उसके घर पर पधारा। उसका नाम कुत्स था। उस स्त्री को व्यभिचार में आसक्त पाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण कुत्स ने कहा – ‘ओ मूढ़ नारी! तू मेरे वचनों का ध्यानपूर्वक श्रवण कर। पृथ्वी आदि पञ्चभूतों से निर्मित तथा मज्जा एवं रक्त से भरी इस देह का पोषण तू क्यों करती है? यह देह मात्र दुःख का ही कारण है। अरि! यह देह जल के बुलबुले के समान है, एक दिन इसका नाश होना निश्चित है। इस अनित्य देह को यदि तू नित्य मान रही है तो अपने मन में व्याप्त इस मोह को तो विवेकपूर्वक त्याग दे। सर्वोत्तम देवता भगवान विष्णु का चिन्तन कर तथा उन्हीं की लीला-कथा का आदरपूर्वक श्रवण कर तथा जब कार्तिक मास आवे, तब भगवान दामोदर की प्रीति हेतु स्नान, दान आदि कर, दीपदान कर, भगवान विष्णु की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम कर। यह व्रत विधवा एवं सौभाग्यवती सभी स्त्रियों के करने योग्य है। यह समस्त पापों का शमन एवं समस्त उपद्रवों को नष्ट करने वाला है। कार्तिक मास में दीपदान करने से भगवान विष्णु की प्रसन्नता में निश्चित ही वृद्धि होती है।’

इतना कहकर कुत्स ब्राह्मण किसी अन्य के घर चला गया। वह ब्राह्मणी कुत्स के वचनों को सुनकर पश्चात्ताप करने लगी तथा उसने कार्तिक मास में व्रत करने का निश्चय किया। तदुपरान्त कार्तिक मास आने पर उसने माह पर्यन्त प्रातः सूर्योदयकाल में स्नान एवं दीपदान किया। तदनन्तर कुछ काल के उपरान्त आयु पूर्ण होने पर उसकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पश्चात् वह स्वर्गलोक को गयी तथा समयानुसार उसकी मुक्ति भी हो गयी। कार्तिक के व्रत में तत्परता से दीपदान आदि करने वाला जो मनुष्य इस दीपदान का इतिहास श्रवण करता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है।

हे नारद! अब आकाशदीप का माहात्म्य श्रवण करो। कार्तिक मास के आगमन पर जो प्रातःस्नान कर आकाशदीप का दान करता है, वह समस्त लोकों का स्वामी तथा समस्त प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न होकर इस लोक में सुख भोगता है तथा अन्ततः मोक्ष को प्राप्त होता है। इसीलिये कार्तिक में स्नान-दान आदि कर्म करते हुये भगवान विष्णु के मन्दिर के कँगूरे, अर्थात् शिखर पर एक मास तक अवश्य दीपदान करना चाहिये। महाराज सुनन्द ने चन्द्रशर्मा ब्राह्मण के निर्देशानुसार एक मास तक विधिपूर्वक व्रत किया। वे कार्तिक मास में प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके पवित्र होकर कोमल तुलसीदलों से भगवान विष्णु का पूजन करके रात्रि में उनके निमित्त आकाशदीप दान करते थे। दीपदान करते समय वे निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करते थे –

दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च।
नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम्॥

भावार्थ – ‘मैं सर्वस्वरूप एवं विश्वरूपधारी भगवान दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप प्रदान करता हूँ, जो भगवान को परम प्रिय है।’

‘हे देवेश्वर! इस व्रत से आप में मेरी भक्ति की वृद्धि हो’ इस भाव से प्रार्थना करते हुये राजा सुनन्द दीपदान करते थे। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर वे पुनः आकाशदीप का दान करते थे। उनका प्रातःकाल स्नान एवं भगवान विष्णु की पूजा का यह क्रम नियमपूर्वक चलता रहा। कार्तिक मास के समापन पर उन्होंने व्रत का उद्यापन कर आकाशदीप के नियम को भी सम्पन्न किया तथा ब्राह्मण भोज कराकर भगवान विष्णु के इस व्रत को पूर्ण किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा ने इस लोक में स्त्री, पुत्र, पौत्र तथा स्वजनों के साथ एक लक्ष्य वर्षों तक लौकिक भोगों का उपभोग किया तथा अन्त समय में स्त्रियों सहित सुन्दर विमान पर आरूढ़ होकर चार भुजाधारी, शङ्ख, चक्र, गदा आदि आयुधों से सुशोभित पीताम्बरधारी विष्णु जी के समान दिव्य देह प्राप्त कर मोक्ष का आश्रय लिया। वे विष्णुलोक में भगवान विष्णु के ही समान सुखपूर्वक निवास करने लगे। अतः दुर्लभ मनुष्य जन्म प्राप्त करने पर कार्तिक मास में भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय आकाशदीप का विधिपूर्वक दान करना चाहिये। जो संसार में भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु आकाशदीप का दान करते हैं, उन्हें क्रूर मुख वाले यमराज का दर्शन कभी नहीं होता।

एकादशी से या तुला राशि में सूर्यदेव के स्थित होने पर अथवा पूर्णिमा से देवी लक्ष्मी सहित भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु आकाशदीप का प्रारम्भ करना चाहिये।

नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे।
नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नमः॥

भावार्थ – ‘पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है, धर्मस्वरूप विष्णु को नमस्कार है, यमराज को नमस्कार है तथा दुर्गम पथ में रक्षा करने वाले भगवान रुद्र को नमस्कार है।’

इस मन्त्र से जो मनुष्य पितरों के लिये आकाश में दीपदान करते हैं, उनके नरकगामी पितर भी उत्तम गति को प्राप्त होते हैं। जो देवालय में, नदी के तट पर, मार्ग पर तथा शयन करने के स्थानों पर दीपदान करता है, उसे सर्वतोमुखी लक्ष्मी प्राप्त होती हैं।

जो ब्राह्मण अन्य जाति के मन्दिर में दीपक प्रज्वलित करता है, वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो कीट एवं काँटों से युक्त दुर्गम एवं ऊँची-नीची भूमि पर दीपदान करता है, वह नरक में नहीं पड़ता। पूर्वकाल में राजा धर्मनन्दन ने आकाशदीप दान के प्रभाव से श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक को प्रस्थान किया। जो कार्तिक मास में हरिबोधिनी एकादशी को भगवान विष्णु के समक्ष कपूर का दीपक प्रज्वलित करता है, उसके कुल में उत्पन्न सभी मनुष्य भगवान विष्णु के प्रिय भक्त होते हैं तथा अन्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं। पूर्वकाल में एक गोप था जो अमावस्या तिथि को भगवान विष्णु के मन्दिर में दीप प्रज्वलित कर तथा बारम्बार जय-जय का उच्चारण करके राजराजेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का चतुर्थ अध्याय पूर्ण हुआ ॥


पाँचवाँ अध्याय – कार्तिक में तुलसी वृक्ष के आरोपण एवं पूजन आदि की महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘कार्तिक मास में जो विष्णुभक्त पुरुष प्रातःकाल स्नान करके पवित्र होकर कोमल तुलसीदल से भगवान दामोदर का पूजन करता है, उसे निश्चित ही मोक्ष प्राप्त होता है। भक्ति से रहित मनुष्य यदि सुवर्ण आदि से भगवान की पूजा करे तो भी वे उसकी पूजा ग्रहण नहीं करते। सभी वर्णों के लिये भक्ति सर्वाधिक उत्कृष्ट मानी गयी है। भक्तिहीन कर्म भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला नहीं होता। यदि तुलसी के आधे दल से भी नित्य भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा की जाय तो भी वे साक्षात् दर्शन देते हैं।

पूर्वकाल में भक्त विष्णुदास भक्तिपूर्वक तुलसी-पूजन के द्वारा सहज ही विष्णुधाम को प्रस्थान कर गया तथा राजा चोल उसकी तुलना में गौण हो गये। हे नारद! अब तुम तुलसी का माहात्म्य श्रवण करो। तुलसी पापों का नाश एवं पुण्य की वृद्धि करने वाली है। मनुष्य के द्वारा लगायी हुयी तुलसी जितना ही अपने मूल का विस्तार करती है, उतने ही सहस्र युगों तक मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। यदि कोई तुलसी संयुक्त जल में स्नान करता है तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के लोक में निवास कर हर्षित होता है।

महामुने! जो लगाने के लिये तुलसी का संग्रह करता है तथा तुलसी का वन तैयार करता है, वह इतना करने मात्र से पापमुक्त हो ब्रह्मभाव में स्थित होता है। जिसके घर में तुलसी का उद्यान होता है, उसका घर तीर्थ के समान होता है तथा वहाँ यमदूतों का प्रवेश नहीं होता है। तुलसीवन समस्त पापों को नष्ट करने वाला, पुण्यमय तथा अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति करने वाला है। जो श्रेष्ठ मनुष्य तुलसी की वाटिका लगाते हैं, उन्हें यम दर्शन नहीं होता। जो मनुष्य तुलसीकाष्ठ से युक्त गन्ध धारण करता है, क्रियमाण पाप उसकी देह का स्पर्श नहीं करता। जहाँ तुलसीवन की छाया होती है, वहीं पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध करना चाहिये। जिसके मुख में, कान में तथा मस्तक पर तुलसीदल दृष्टिगोचर होता है, उसपर यमराज भी दृष्टिपात नहीं कर सकते तो यमदूतों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक तुलसी की महिमा श्रवण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्रस्थान करता है।

पूर्वकाल का वृत्तान्त है, कश्मीर देश में हरिमेधा एवं सुमेधा नामक दो ब्राह्मण निवास करते थे। वे सदैव भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। उनके हृदय में समस्त प्राणियों के लिये दया का भाव था। वे सभी तत्वों के यथार्थ मर्म को ज्ञात करने वाले थे। कालान्तर में किसी समय उन दोनों ब्राह्मणों ने तीर्थयात्रा हेतु प्रस्थान किया। यात्रा करते-करते किसी दुर्गम वन में वे परिश्रम से व्याकुल हो गये। वहाँ उन्हें एक स्थान पर तुलसी का वन दृष्टिगोचर हुआ। उनमें से सुमेधा ने उस तुलसी के महान् वन का दर्शन कर उसकी प्रदक्षिणा की तथा श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। सुमेधा को ऐसा करते देख हरिमेधा ने तुलसी का माहात्म्य एवं फल ज्ञात करने हेतु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक बारम्बार निवेदन किया – ‘ब्रह्मन्! अन्य देवताओं, तीर्थों, व्रतों एवं मुख्य-मुख्य ब्राह्मणों के होते हुये तुमने तुलसीवन को क्यों प्रणाम किया है?’

सुमेधा ने कहा – ‘हे महाभाग! सुनो! यहाँ धूप से कष्ट हो रहा है, अतः हम उस वटवृक्ष के समीप चलते हैं, उसकी छाया में बैठकर मैं यथार्थ रूप से विस्तृत वर्णन करूँगा।’

वहाँ विश्राम करके सुमेधा ने हरिमेधा से कहा – ‘विप्रवर! पूर्वकाल में जिस समय ऋषि दुर्वासा के श्राप से इन्द्र का ऐश्वर्य छिन गया था, उस समय ब्रह्मा आदि देवताओं एवं असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मन्थन किया था। उस समुद्रमन्थन से ऐरावत गज, कल्पवृक्ष, चन्द्रदेव, देवी लक्ष्मी, उच्चैःश्रवा अश्व, कौस्तुभ मणि तथा धन्वन्तरि स्वरूप में भगवान विष्णु एवं दिव्य औषधियों का प्राकट्य हुआ। तदुपरान्त अजरता एवं अमरता प्रदान करने वाले अमृत कलश को दोनों हाथों में लिये हुये श्रीविष्णु अत्यन्त हर्षित हुये। उनके नेत्रों से आनन्दाश्रु की कुछ बूँदें उस अमृत कलश के ऊपर टपकीं, उनसे तत्काल ही मण्डलाकार तुलसी उत्पन्न हुयीं। इस प्रकार समुद्रमन्थन से प्रकट हुयीं देवी लक्ष्मी एवं तुलसी को ब्रह्मा आदि देवगणों ने श्रीहरि की सेवा में समर्पित किया तथा भगवान ने उन्हें स्वीकार कर लिया। उसी समय से तुलसी जी भगवान श्रीविष्णु की अत्यन्त प्रिय हो गयीं। समस्त देवतागण भगवत्प्रिया तुलसी की भगवान श्रीविष्णु के समान ही पूजा करते हैं। भगवान नारायण संसार के रक्षक हैं तथा तुलसी उनकी प्रियतमा है, एतावता मैंने उन्हें प्रणाम किया है।’

सुमेधा इस प्रकार वर्णन कर ही रहे थे कि सूर्यदेव के समान अत्यन्त तेजस्वी एक विशाल विमान उन्हें दृष्टिगोचर हुआ। उन दोनों के सम्मुख ही वह वटवृक्ष गिर पड़ा तथा उससे दो दिव्य पुरुष प्रकट हुये जो सूर्य की भाँति सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। उन दोनों दिव्य पुरुषों ने हरिमेधा एवं सुमेधा को प्रणाम किया। उनका दर्शन कर वे दोनों ब्राह्मण भयभीत हो गये तथा आश्चर्यचकित होकर बोले – ‘आप दोनों कौन हैं? देवताओं के समान आपका सर्वमङ्गलमय स्वरूप है। आप नूतन मन्दार की माला धारण किये कोई देवता प्रतीत हो रहे हैं।’ उन दोनों ब्राह्मणों के इस प्रकार प्रश्न करने पर वृक्ष से निकले पुरुष बोले – ‘विप्रवरों! आप दोनों ही हमारे माता-पिता, गुरु एवं बन्धु आदि हैं।’

इतना कहकर उन पुरुषों में जो ज्येष्ठ था, वह बोला – ‘मेरा नाम आस्तीक है, मैं देवलोक का निवासी हूँ। एक दिन मैं नन्दनवन में किसी पर्वत पर क्रीड़ा करने हेतु गया। वहाँ देवांगनाओं ने मेरे सङ्ग इच्छानुसार विहार किया। उस समय युवतियों के मोती एवं बेला के हार तपस्या करते हुये लोमश मुनि के ऊपर गिर गये। इससे मुनि अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने विचार किया कि – ‘स्त्रियाँ तो परतन्त्र होती हैं, अतः यह उनका अपराध नहीं है। यह दुराचारी आस्तीक ही श्राप के योग्य है।’ ऐसा निश्चय कर उन्होंने मुझे श्राप देते हुये कहा – ‘अरे दुष्ट! मैं तुझे श्राप देता हूँ कि तू ब्रह्मराक्षस होकर वटवृक्ष पर निवास करेगा।’ तदुपरान्त मैंने विनयपूर्वक उन्हें प्रसन्न किया तब उन्होंने इस श्राप से मुक्त होने की अवधि भी निश्चित कर दी एवं कहा – ‘जब तू किसी ब्राह्मण के मुख से भगवान विष्णु का नाम एवं तुलसीदल की महिमा का श्रवण करेगा तब तत्काल तुझे उत्तम मोक्ष प्राप्त होगा।’ इस प्रकार मुनि का श्राप प्राप्त कर मैं चिरकाल से अत्यन्त दुःखी हो इस वटवृक्ष पर निवास कर रहा था। आज दैववश आप दोनों के दर्शन से मुझे निश्चित ही श्राप से मुक्ति प्राप्त हुयी है।

अब आप मेरे अन्य साथी की कथा श्रवण करें – ये पूर्वकाल में एक श्रेष्ठ मुनि थे तथा सदैव गुरु सेवा में लीन रहते थे। एक समय गुरुदेव की अवज्ञा करने के कारण ब्रह्मराक्षस भाव को प्राप्त हो गये, किन्तु आपके प्रसाद से इस समय उनकी भी ब्राह्मण के श्राप से मुक्ति हो गयी। आप दोनों ने तीर्थयात्रा का फल तो यहीं अर्जित कर लिया है।’

ऐसा कहकर वे दोनों पुरुष उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बारम्बार प्रणाम करते हुये उनकी आज्ञा ग्रहण कर आनन्दपूर्वक दिव्य धाम को प्रस्थान कर गये। तदुपरान्त वे दोनों श्रेष्ठ मुनि परस्पर पुण्यमयी तुलसी की प्रशंसा करते हुये तीर्थयात्रा हेतु चल दिये। इसीलिये भगवान विष्णु को आनन्दित करने वाले इस कार्तिक मास में तुलसी की पूजा अवश्य करनी चाहिये।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का पञ्चम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


छठा अध्याय – त्रयोदशी से दीपावली तक के उत्सव कृत्य का वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रातःकाल दन्तधावन कर स्नान करना चाहिये तथा त्रिरात्रि व्रत का नियम लेकर भगवान गोविन्द के भजन में तत्पर रहना चाहिये। इस व्रत के अन्त में गोवर्धनोत्सव मनाना चाहिये। त्रयोदशी यदि तीन मुहूर्त से अधिक हो तो वह इस व्रत में ग्राह्य है। परतिथि से वेध होना दोषपूर्ण नहीं है। कार्तिक के कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी के प्रदोषकाल में यमराज के निमित्त दीप एवं नैवेद्य समर्पित करे तो अपमृत्यु अर्थात् अकालमृत्यु एवं दुर्मरण से मनुष्य सुरक्षित रहता है।

एक दिन यमदूतों ने यमराज से कहा – ‘हे प्रभो! ऐसे महोत्सव के अवसर पर जिस प्रकार जीव अपने जीवन से वियुक्त न हो, उस उपाय का हमारे समक्ष वर्णन करने की कृपा करें।’

यमराज ने कहा – ‘कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रदोषकाल में जो अपने भवन के द्वार पर निम्नोक्त मन्त्र से उत्तम दीपदान करता है, वह अपमृत्यु को प्राप्त होने पर भी यहाँ यमलोक में आने योग्य नहीं है। वह मन्त्र इस प्रकार है –

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति॥

भावार्थ – ‘त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल तथा लक्ष्मी सहित सूर्यनन्दन यम प्रसन्न हों।’

उक्त मन्त्र से जो अपने द्वार पर दीपदान करता है, वह अपमृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। दीपावली से पूर्व की चतुर्दशी को तेल में देवी लक्ष्मी एवं जल में देवी गङ्गा निवास करती हैं। जो चतुर्दशी को प्रातःस्नान करता है उसे यमलोक की यातनायें नहीं भोगनी पड़तीं। नर्कभय को नष्ट करने हेतु स्नान करते समय अपामार्ग, अर्थात् चिच्चिड़ा को मस्तक पर घुमायें। तीन बार निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करके तीन बार ही लकड़ी घुमानी चाहिये –

सीतालोष्ठसमायुक्त सकण्टकदलान्वित।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः॥

भावार्थ – ‘जोते हुये खेत के ढेले से युक्त तथा कण्टक विशिष्ट पत्तों से सुशोभित हे अपामार्ग! तुम बारम्बार घुमाये पर मेरे पापों को हर लो।’

ऐसा कहकर अपने सिर पर अपामार्ग घुमायें। यह प्रार्थना कर भीगे वस्त्रों में ही दो श्वानों को दीपदान दें, इन श्वानों को मृत्यु का पुत्र माना जाता है। श्वानों को दीपदान देते समय निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये –

शुनकौ श्यामशबलौ भ्रातरौ यमसेवकौ।
तुष्टौ स्यातां चतुर्दश्यां दीपदानेन मृत्युजौ॥

मन्त्रार्थ – ‘काले एवं चितकबरे रङ्ग के दो श्वान जो मृत्यु के पुत्र, यमराज के सेवक तथा परस्पर भ्राता हैं, चतुर्दशी को दीपदान करने से मुझ पर प्रसन्न हों।’

तदुपरान्त स्नानाङ्गतर्पण करने के पश्चात् चौदह यमों का तर्पण करें, जिनके नाम निम्नोक्त हैं –

यमाय धर्मराजाय मृत्युवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।
वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय ते नमः॥

यह चौदह नाम मन्त्र हैं। इनमें से प्रत्येक के अन्त में नमः पद जोड़कर उच्चारण करें तथा एक-एक मन्त्र का तीन-तीन बार उच्चारण करते हुये तिल मिश्रित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ अर्पण करें। यमराज तर्पण यज्ञोपवीती होकर, अर्थात् यज्ञोपवीत को बायें कन्धे पर रखकर अथवा प्राचीनावीती होकर, जनेऊ को दायें कन्धे पर करके भी किया जा सकता है, क्योंकि यमराज देवता एवं पितर दोनों ही पदों पर प्रतिष्ठित हैं। अतः उनमें उभयरूपता है। जिसके पिता जीवित हों वह भी यम एवं भीष्म के निमित्त तर्पण कर सकता है।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को यदि अमावस्या भी हो तथा उसमें स्वाती नक्षत्र का योग हो तो उसी दिन दीपावली होती है। उस दिन से आरम्भ करके तीन दिनों तक दीपोत्सव मनाना चाहिये। क्योंकि पूर्वकाल में राजा बलि ने भगवान से यह वर माँगा था कि – ‘मैंने छद्मपूर्वक वामन रूप धारण करने वाले आपको भूमिदान की है तथा आपने उसे तीन दिनों में तीन पगों द्वारा नाप लिया है, अतः आज से लेकर तीन दिनों तक प्रतिवर्ष पृथ्वी पर मेरा शासन रहे। उस समय जो मनुष्य पृथ्वी पर दीपदान करे, उसके घर में आपकी अर्धाङ्गिनी देवी लक्ष्मी स्थिर भाव से निवास करें।’

दैत्यराज बलि को भगवान विष्णु ने चतुर्दशी से लेकर तीन दिवस तक का राज्य प्रदान किया है। इसीलिये इन तीन दिवस में यहाँ सर्वथा महोत्सव करना चाहिये। चतुर्दशी की रात्रि में देवी महारात्रि का प्रादुर्भाव हुआ है। अतः शक्ति पूजा परायण पुरुषों को चतुर्दशी का उत्सव अवश्य करना चाहिये। भगवान सूर्य के तुला राशि में स्थित होने पर चतुर्दशी एवं अमावस्या की सन्ध्या के समय मनुष्य हाथ में उल्का, अर्थात् मशाल लेकर पितरों को मार्ग-प्रदर्शन करावें। कार्तिक मास में चतुर्दशी आदि तीन तिथियाँ दीपदान आदि हेतु ग्रहण करने योग्य हैं। यदि यह तीन तिथियाँ संगवकाल, अर्थात् पूर्वाह्नकाल से पूर्व ही समाप्त हो जाती हैं तो दीपदान आदि कार्यों में इन्हें पूर्वातिथि से युक्त ही ग्रहण करना चाहिये।

तदनन्तर अमावस्या को प्रातःकाल स्नान करके भक्तिपूर्वक देवताओं एवं पितरों की पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रणाम करें। तदुपरान्त दही, दुग्ध तथा घी आदि से पार्वण श्राद्ध करें। इस दिन बालकों एवं रोगियों के अतिरिक्त अन्य किसी को दिन में भोजन नहीं करना चाहिये। प्रदोष के समय कल्याणमयी देवी लक्ष्मी का पूजन करें। उस दिन लक्ष्मीजी को सुख प्रदान करने हेतु जो उनके लिये कमल के पुष्पों की शय्या बनाता है, उसके घर को त्यागकर भगवती लक्ष्मी कहीं नहीं जातीं। जावित्री, लवङ्ग, इलायची तथा कपूर सहित गोदुग्ध को भलीभाँति पकाकर उसमें आवश्यकता अनुसार शक्कर मिश्रित कर लड्डू बना लें तथा उन्हें महालक्ष्मीजी को अर्पण करें।

पूजनोपरान्त इस प्रकार लक्ष्मीजी की स्तुति करनी चाहिये – ‘दीपक की ज्योति में विराजमान महालक्ष्मी! आप ज्योतिर्मयी हो। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, सुवर्ण तथा तारा आदि सभी ज्योतियों की ज्योति हो, आपको कोटि-कोटि नमस्कार है। कार्तिक की दीपावली के पवित्र दिवस को इस भूतल पर एवं गौओं के गोष्ठ में जो लक्ष्मी शोभायमान होती हैं, वे सदा-सर्वदा मेरे लिये वरदायिनी हों।’

इस प्रकार स्तुति करने के पश्चात्‌ प्रदोषकाल में दीपदान करें। अपनी शक्ति के अनुसार देवालयों आदि में दीपकों का वृक्ष बनावें। चौराहे पर, श्मशान-भूमि में, नदी के तट पर, पर्वत पर, घरों में, वृक्षों की जड़ों में गोशालाओं में, चबूतरों पर तथा प्रत्येक भवन में दीपक प्रज्वलित करने चाहिये। सर्वप्रथम ब्राह्मणों एवं भूखे मनुष्यों को भोजन कराकर तदुपरान्त स्वयं नूतन वस्त्राभूषणों से अलङ्कृत होकर भोजन करना चाहिये। जीवहिंसा, मदिरापान, अगम्यागमन, चोरी तथा विश्वासघात, ये पाँच नर्क के द्वार कहे गये हैं। इनका सदैव त्याग करना चाहिये। तदनन्तर मध्यरात्रि के समय नगर की शोभा का अवलोकन करने हेतु शनैः शनैः पद-भ्रमण करना चाहिये तथा उस समय के आनन्दोत्सव का दर्शन कर अपने घर लौट आना चाहिये।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद में कार्तिक मास माहात्म्य में षष्ठम् अध्याय पूर्ण हुआ ॥


सातवाँ अध्याय – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा एवं यम द्वितीया के कृत्य तथा बहिन के घर में भोजन का महत्त्व

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘तदुपरान्त प्रतिपदा को आरती करके स्वयं विभिन्न वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर कथा, गायन, कीर्तन एवं दान आदि के द्वारा दिवस व्यतीत करें। इस दिन स्त्री एवं पुरुष सभी को तिल का तेल लगाकर स्नान करना चाहिये। इस प्रतिपदा को जो मनुष्य तैल, स्नान आदि पूर्वक पूजन करेंगे, उनका वह सब कुछ अक्षय होगा। संसार में प्रतिपदा तिथि प्रसिद्ध है, उसे पूर्वविद्धा होने पर ग्रहण नहीं करना चाहिये। अमावस्याविद्ध प्रतिपदा में तैलाभ्यंग नहीं करना चाहिये, अन्यथा मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है।

यदि दूसरे दिन एक घड़ी भी अविद्धा, अर्थात् अमावस्या के वेध से रहित प्रतिपदा हो तो उत्सव आदि कार्यों में मनीषी पुरुषों को उसे ही ग्रहण करना चाहिये। दूसरे दिन यदि थोड़ी भी प्रतिपदा न हो तो पूर्वविद्धा तिथि ही ग्रहण करनी चाहिये, उस दशा में वह दोषकारक नहीं होती है। जो मनुष्य उस तिथि में या उस शुभ दिवस में जिस रूप से स्थित होता है उसी स्थिति में वह एक वर्ष तक रहता है। इसीलिये यदि सुन्दर, दिव्य एवं उत्तम भोगों को भोगने की इच्छा हो तो उस दिन मङ्गलमय उत्सव अवश्य करें। प्रातःकाल गोवर्द्धन की पूजा करें। उस समय गौओं को विभूषित करना चाहिये तथा उनसे बोझ ढोने या दुहने का कार्य नहीं करना चाहिये। गोवर्द्धन पूजन के समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये –

गोवर्द्धनधराधार गोकुलत्राणकारक।
विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥
या लक्ष्मीर्लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु॥
अग्रतः सन्तु मे गावो गावो मे सन्तु पृष्ठतः।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥

मन्त्रार्थ – ‘पृथ्वी को धारण करने वाले गोवर्द्धन! आप गोकुल की रक्षा करने वाले हैं। भगवान विष्णु ने अपनी भुजाओं से आपको ऊँचा उठाया था। आप मुझे कोटि गोदान प्रदान करने वाले हों। लोकपालों की जो देवी लक्ष्मी यहाँ धेनुरूप से विराज रहीं है तथा यज्ञ के लिये घृत का भार वहन करती हैं, वे मेरे पापों को दूर करें। मेरे आगे गायें हों, मेरे पीछे गायें हों, गायें मेरे हृदय में हों तथा मैं सदा गायों के मध्य में निवास करूँ।’

इस प्रकार गोवर्द्धन पूजा करके उत्तम भाव से देवताओं, सत्पुरुषों तथा साधारण मनुष्यों को सन्तुष्ट करें। अन्य लोगों को अन्न-जल प्रदान कर तथा विद्वानों को सङ्कल्पपूर्वक वस्त्र, ताम्बूल आदि के द्वारा प्रसन्न करें। कार्तिक शुक्ल पक्ष की यह प्रतिपदा तिथि वैष्णवी कही गयी है। जो लोग सब प्रकार से सभी मनुष्यों को आनन्द प्रदान करने वाले दीपोत्सव तथा शुभ के हेतुभूत बलिराज का पूजन करते हैं, वे दान, उपभोग, सुख एवं बुद्धि से सम्पन्न कुलों का आनन्द प्राप्त करते हैं तथा उनका सम्पूर्ण वर्ष आनन्दपूर्वक व्यतीत होता है। प्रतिपदा एवं अमावस्या के योग में गौओं की क्रीड़ा उत्तम मानी गयी है। उस दिन गौओं का भोजन आदि से भलीभाँति पूजन करके अलङ्कारों से विभूषित करें तथा गायन-वादन आदि सहित सभी को नगर से बाहर ले जाकर उनकी आरती करें। ऐसा करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

अब तुम मृत्युनाशक यम द्वितीया का वर्णन श्रवण करो। द्वितीया तिथि को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अन्तर्मन में अपने हित की बातों का चिन्तन करें। तदनन्तर शौच आदि से निवृत्त होकर दन्तधावन एवं प्रातःकाल स्नान करें। तदुपरान्त श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्पों की माला एवं श्वेत चन्दन धारण करें। नित्यकर्म पूर्ण करके प्रसन्नतापूर्वक औदुम्बर, अर्थात् गूलर के वृक्ष के नीचे जायें। वहाँ उत्तम मण्डल निर्मित कर उसमें अष्टदल कमल की रचना करें। अनन्तर उस औदुम्बर-मण्डल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा वीणा-पुस्तक धारिणी वरदायिनी देवी सरस्वती का स्वस्थ चित्त से आवाहन एवं पूजन करें।

चन्दन, अगरु, कस्तूरी, कुंकुम, पुष्प, धूप, नैवेद्य एवं नारियल आदि के द्वारा पूजन करके अपमृत्यु निवारण के लिये वेदवेत्ता ब्राह्मण को अलङ्कार सहित दूध देने वाली सवत्सा गौ, अर्थात् बछड़े वाली गाय दान करें। उस समय ब्राह्मण से इस प्रकार कहें – ‘हे विप्र! मैं अपमृत्यु का निवारण करने हेतु संसार-सागर से तारने वाली यह सीधी-सरल गो आपको दान कर रहा हूँ।’

गाय के अभाव में ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक एक जोड़ा उपानह, अर्थात् जूते अथवा चरण पादुका दान करें। तदनन्तर पूजा का समापन करके भगवान विष्णु के प्रति भक्तिभाव रखते हुये अपने कुटुम्ब के श्रेष्ठ वयोवृद्ध पुरुषों को श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक प्रणाम करें। तदुपरान्त अनेक प्रकार के सुन्दर फलों द्वारा अपने स्वजनों को तृप्त करें। तत्पश्चात् अपनी सहोदरी ज्येष्ठ भगिनी के घर जायें तथा उसे भी भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुये कहें – ‘हे सौभाग्यवती बहन! तुम कल्याणमयी हो। मैं अपने कल्याण हेतु तुम्हारे चरणारविन्दों में प्रणाम करने के उद्देश्य से तुम्हारे घर आया हूँ।’ ऐसा कहकर बहन को भगवद्बुद्धि से प्रणाम करें। तदुपरान्त बहन अपने भ्राता से यह उत्तम वचन कहे – ‘भैया ! आज मैं तुम्हें पाकर धन्य हो गयी। वास्तविकता में आज मैं मङ्गलमयी हो गयी हूँ। हे कुलदीपक! आज अपनी आयुवृद्धि हेतु तुम्हें मेरे घर में भोजन करना चाहिये। मेरे सहोदर भ्राता! पूर्वकाल में इसी कार्तिक शुक्ल द्वितीया को देवी यमुना ने अपने भ्राता यमराज को अपने ही घर पर भोजन कराया तथा उनका सत्कार किया था। उस दिन कर्मपाश में बँधे हुये नारकीय पापियों को भी यमराज मुक्त कर देते हैं, जिसके कारण वे अपनी इच्छानुसार भ्रमण करते हैं। इस तिथि में विद्वान् पुरुष भी प्रायः अपने घर भोजन नहीं करते।’

बहन के ऐसा कहने पर व्रतवान् पुरुष वस्त्र एवं आभूषणों से हर्षपूर्वक उसका पूजन करें। बड़ी बहन को प्रणाम करके उसका आशीर्वाद ग्रहण करें। तदुपरान्त सभी बहनों को वस्त्राभूषण प्रदान कर सन्तुष्ट करें। अपनी सगी बहन न होने पर चाचा की पुत्री अथवा पिता की बहन के घर जाकर आदरपूर्वक भोजन करें। वह भी न हो तो मौसी अथवा मामा की पुत्री को बहन मानें अथवा गोत्र या कुटुम्ब के सम्बन्ध से किसी के साथ बहन का सम्बन्ध जोड़ लें। इन सबके अभाव में किसी भी समान वर्ण की स्त्री को बहन मान लें तथा उसी का आदर-सम्मान करें। वह भी सम्भव न हो तो किसी गाय या नदी आदि को ही बहन बना लें। उसके भी अभाव में किसी वन या झाड़ी को ही बहन मानकर वहाँ भोजन करें। यमद्वितीया को कभी भी अपने घर भोजन न करें। भाई के भोजन में वही द्वितीया ग्राह्य है, जो मध्याह्न के पश्चात् तक विद्यमान रहे।

हे देवर्षि नारद! जो इस प्रकार यमद्वितीया का व्रत करता है, वह अपमृत्यु से मुक्त हो पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न होता है तथा अन्त समय में मोक्ष प्राप्त करता है। ये सभी व्रत एवं नाना प्रकार के दान गृहस्थ के लिये ही योग्य हैं। व्रत का पालन करने वाला जो पुरुष यमद्वितीया की इस कथा का श्रवण करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, ऐसा माधव का कथन है।

कार्तिक शुक्ल की द्वितीया को यमुनाजी में स्नान करने वाला पुरुष यमलोक का दर्शन नहीं करता। जिन्होंने यमद्वितीया के दिन अपनी सौभाग्यवती बहनों को वस्त्रदान आदि से सन्तुष्ट किया है, उन्हें एक वर्ष तक कलह अथवा शत्रुभय का सामना नहीं करना पड़ता। इस तिथि को यमुनाजी ने स्नेहपूर्वक यमदेव को भोजन कराया था। इसीलिये उस दिन जो बहन के हाथ से भोजन करता है, उसे धन एवं उत्तम सम्पदा प्राप्त होती है। राजाओं ने जिन बन्दियों को कारागृह में डाल दिया हो, उन्हें यमद्वितीया के दिन बहन के घर भोजन करने के लिये अवश्य भेजना चाहिये।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का सप्तम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


आठवाँ अध्याय – आँवले के वृक्ष की उत्पत्ति एवं उसका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं – “कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को आँवले का पूजन करना चाहिये। आँवले का महान वृक्ष समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। उक्त चतुर्दशी को वैकुण्ठ चतुर्दशी कहा जाता है। वैकुण्ठ चतुर्दशी के अवसर पर मनुष्य को आँवले की छाया में देवी राधा सहित देवेश्वर श्रीहरि का पूजन करना चाहिये। तदुपरान्त आँवले की एक सौ आठ प्रदक्षिणा करनी चाहिये। अनन्तर साष्टाङ्ग प्रणाम करके परमेश्वर श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण से प्रार्थना करनी चाहिये। आँवले के वृक्ष की छाया में बैठकर इस कथा का श्रवण करने के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन करायें तथा यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करें। ब्राह्मणों के सन्तुष्ट होने पर मोक्षदायक श्रीहरि भी प्रसन्न होते हैं।

पूर्वकाल में जिस समय समस्त संसार एकार्णव, अर्थात् जल प्रलय में निमग्न हो गया था एवं समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो गये थे, उस समय देवाधिदेव सनातन परमात्मा ब्रह्माजी, अविनाशी परब्रह्म का जप करने लगे। परब्रह्म का जप करते-करते उनका श्वास निकला। श्वास के साथ ही भगवद्दर्शन के अनुरागवश उनके नेत्रों से जल निकल आया। प्रेम के अश्रुओं से परिपूर्ण वह जल की बूँदें पृथ्वी पर आ टपकीं, जिनसे आँवले के महान वृक्ष की उत्पत्ति हुयी। तदुपरान्त उस दिव्य वृक्ष में अनेक शाखायें एवं उपशाखायें प्रकट हुयीं। वह वृक्ष फलों के भार से लदा हुआ था। समस्त वृक्षों में सर्वप्रथम आँवला ही प्रकट हुआ, एतावता उसे आदिरोह कहा गया है। ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम आँवले को उत्पन्न किया। तदुपरान्त समस्त प्रजा की सृष्टि की। जब देवता आदि की भी सृष्टि हो गयी तब वे उस स्थान पर आये जहाँ भगवान विष्णु का अत्यन्त प्रिय आँवले का वृक्ष था। उस वृक्ष का दर्शन कर देवताओं को घोर आश्चर्य हुआ।

उसी समय आकाशवाणी हुयी – ‘यह आँवले का वृक्ष समस्त वृक्षों से श्रेष्ठ है, क्योंकि यह भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय है। इसके स्मरणमात्र से मनुष्य को गोदान का फल प्राप्त हो जाता है। इसके दर्शन से दो गुणा तथा फल का सेवन करने से तीन गुणा पुण्य होता है। इसीलिये सर्वथा प्रयत्न करके आँवले के वृक्ष की सेवा करनी चाहिये। आँवले का वृक्ष भगवान विष्णु को परम प्रिय एवं समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। अतः समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु आँवले के वृक्ष का पूजन करना सर्वोत्तम है।’

जो मनुष्य कार्तिक में आँवले के वन में भगवान श्रीहरि का पूजन तथा आँवले की छाया में भोजन करता है, उसके पापों का नाश हो जाता है। आँवले की छाया में वह जो भी पुण्य करता है, वह कोटि गुना हो जाता है। प्राचीन काल का वृत्तान्त है, कावेरी के उत्तर तट पर एक विख्यात एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करते थे, जिनका नाम देवशर्मा था। वे वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत विद्वान् थे। कालान्तर में उनके यहाँ एक पुत्र ने जन्म लिया जो अत्यन्त दुराचारी निकला। पिता ने उसके हित की कामना से उससे कहा – ‘हे पुत्र! इस समय कार्तिक का पवित्र माह है जो भगवान विष्णु को अत्यन्त ही प्रिय है। तुम इस माह में स्नान, दान, व्रत एवं नियमों का पालन करो। तुलसी के पुष्प सहित भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करो। भगवान के निमित्त दीपदान, नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करो।’

पिता के मुख से यह वचन सुनकर वह दुष्टात्मा पुत्र क्रोध से दग्ध हो उठा, उसके ओष्ठ फड़कने लगे तथा उसने पिता की निन्दा करते हुये कहा – ‘तात! मैं कार्तिक में पुण्य-संग्रह नहीं करूँगा। मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं।’ पुत्र का यह उद्दण्डतापूर्ण वचन सुनकर देवशर्मा ने क्रोधपूर्वक कहा – ‘ओ दुर्बुद्धि! मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू मूषक बनकर वृक्ष के खोखले में निवास कर।’

इस श्राप से भयभीत होकर पुत्र ने पिता को नमस्कार करके पूछा – ‘पूज्यवर! उस घृणित योनि से मेरी मुक्ति कैसे होगी, कृपया यह बताइये।’ इस प्रकार पुत्र के अनुनय-विनय से प्रसन्न होकर ब्राह्मण ने शाप निवृत्ति का कारण वर्णित करते हुये कहा – ‘जब तुम भगवान्‌ को प्रिय लगने वाले कार्तिक व्रत का पवित्र माहात्म्य श्रवण करोगे, उस समय कथा के श्रवण मात्र से तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।’

पिता के ऐसा कहने पर वह तत्क्षण मूषक में परिवर्तित हो गया तथा अनेक वर्षों तक सघन वन में निवास करता रहा। एक दिन कार्तिक मास में ऋषि विश्वामित्र अपने शिष्यों के सहित वहाँ पधारे तथा नदी में स्नान करके भगवान की पूजा करने के पश्चात् आँवले की छाया में विराजमान हो गये। वहाँ बैठकर वे अपने शिष्यों को कार्तिक मास का माहात्म्य सुनाने लगे। उसी समय कोई दुराचारी व्याध आखेट करता हुआ वहाँ आया। वह प्राणियों की हत्या करने वाला तो था ही, इसीलिये ऋषियों का दर्शन कर उनकी भी हत्या करने की कामना करने लगा। परन्तु उन महात्माओं के दर्शन से उसके भीतर सुबुद्धि प्रकाशित हुयी। उसने ब्राह्मणों को नमस्कार करके पूछा – ‘आप लोग यहाँ क्या कर रहे हैं?’

उसके प्रश्न करने पर विश्वामित्र जी बोले – ‘कार्तिक मास सभी मासों में श्रेष्ठ बताया जाता है। उसमें जो कर्म किया जाता है वह वटवृक्ष के बीज की भाँति वृद्धि करता है। जो कार्तिक मास में स्नान, दान एवं पूजन करके ब्राह्मण भोज कराता है, उसका वह पुण्य अक्षय फल प्रदान करने वाला होता है।’

व्याध की प्रेरणा से ऋषि विश्वामित्र के श्रीमुख से कहे हुये इस धर्म माहात्म्य का श्रवण उस मूषक रूपी शापभ्रष्ट ब्राह्मण कुमार ने कर लिया। माहात्म्य श्रवण के फलस्वरूप वह मूषक की देह त्यागकर तत्काल दिव्य देह से युक्त हो गया तथा ऋषि विश्वामित्र को प्रणाम करके अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त वर्णित किया। तदुपरान्त वह ब्राह्मण पुत्र ऋषिवर की आज्ञा से विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गया।

इस घटनाक्रम से ऋषि विश्वामित्र एवं व्याध दोनों को अत्यन्त विस्मय हुआ। व्याध भी कार्तिक-व्रत का पालन करके भगवान विष्णु के धाम में प्रतिष्ठित हुआ। एतावता कार्तिक में सभी प्रकार से प्रयत्न करके आँवले की छाया में बैठकर भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख कथा श्रवण करनी चाहिये। जो ब्राह्मण कार्तिक मास में आँवले एवं तुलसी की माला धारण करता है, उसे अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य आँवले की छाया में बैठकर दीपमाला समर्पित करता है, उसको अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। विशेषतः तुलसी के नीचे श्रीराधा एवं श्यामसुन्दर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिये।

तुलसी के अभाव में यह शुभ पूजा आँवले के नीचे करनी चाहिये। जो आँवले की छाया के नीचे कार्तिक में ब्राह्मण दम्पति को एक बार भी भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करता है, वह अन्न-दोष से मुक्त हो जाता है। लक्ष्मी प्राप्ति की कामना करने वाले मनुष्य को सदा आँवलों से स्नान करना चाहिये। विशेषतः एकादशी तिथि को आँवले से स्नान करने पर भगवान विष्णु सन्तुष्ट होते हैं। नवमी, अमावस्या, सप्तमी, संक्रान्ति-दिवस, रविवार, चन्द्र ग्रहण तथा सूर्य ग्रहण के दिन आँवले से स्नान नहीं करना चाहिये।

जो मनुष्य आँवले की छाया में बैठकर पिण्डदान करता है, उसके पितर भगवान विष्णु के प्रसाद से मोक्ष को प्राप्त होते हैं। तीर्थ या घर में जहाँ-जहाँ मनुष्य आँवले से स्नान करता है, वहाँ-वहाँ भगवान विष्णु स्थित होते हैं। जिसकी देह की अस्थियों को आँवले से स्नान कराया जाता है, वह पुनः गर्भ में वास नहीं करता। जिनके सिर के केश आँवला मिश्रित जल से रँगे जाते हैं, वे मनुष्य कलियुग के दोषों का नाश करके भगवान विष्णु को प्राप्त होते हैं। जिस घर में सदा आँवला रहता है, वहाँ भूत, प्रेत, कूष्माण्ड, अर्थात् दैत्यों की एक विशेष प्रजाति एवं राक्षस प्रवेश नहीं करते। जो कार्तिक में आँवले की छाया में बैठकर भोजन करता है, उसके एक वर्ष तक अन्न-संसर्ग से उत्पन्न हुये पाप का नाश हो जाता है।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का अष्टम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


नौवाँ अध्याय – गुणवती का कार्तिक व्रत के पुण्य से सत्यभामा के रूप में अवतार तथा भगवान के द्वारा शङ्खासुर का वध एवं वेदों का उद्धार

सूतजी कहते हैं – “एक समय प्रसन्न मुख वाली देवी सत्यभामा ने हर्षित होते हुये भगवान श्रीकृष्ण से कहा – ‘हे भगवन्! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ तथा मेरा जीवन सफल है। प्रभो! मैंने पूर्वजन्म में कौन-सा दान, व्रत अथवा तप किया है, जिससे मर्त्यलोक में जन्म लेकर भी मैं आपकी अर्द्धांगिनी हुयी हूँ? जन्मान्तर में मेरा कैसा स्वभाव था, मैं कौन थी तथा किसकी पुत्री थी जो इस जन्म में आपकी प्रियतमा पत्नी हुयी? कृपया मेरे समक्ष इसका वर्णन करें।’

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – ‘प्रिये! सत्ययुग के अन्त में हरद्वार में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करते थे, जिनका नाम देवशर्मा था। वे अत्रिकुल में उत्पन्न हुये थे तथा वेद-वेदाङ्गों में पारङ्गत विद्वान् थे। उनकी आयु बहुत अधिक हो गयी थी, किन्तु उनका कोई पुत्र नहीं था। उनकी केवल एक कन्या थी, जिसका नाम गुणवती था। देवशर्मा ने चन्द्र नामक अपने एक शिष्य के सङ्ग अपनी पुत्री का विवाह कर दिया तथा चन्द्र को ही पुत्र के समान मानने लगे। चन्द्र अत्यन्त जितेन्द्रिय एवं आज्ञाकारी था। वह देवशर्मा को पिता तुल्य मानकर ही उनकी सेवा करता था। एक दिन वे दोनों कुश लाने के लिये वन में गये, वहाँ यमराज के समान आकार वाले किसी विकराल राक्षस ने उन दोनों की हत्या कर दी। वे दोनों अपने-अपने पुण्य के प्रभाव से भगवान विष्णु के लोक में गये। अपने पिता एवं पति की मृत्यु का समाचार सुनकर गुणवती उनके वियोग में दुःख से पीड़ित होकर करुण स्वर में विलाप करने लगी। उसने घर की समस्त वस्तुयें विक्रय कर अपनी सामर्थ्यानुसार उन दोनों का पारलौकिक कर्म सम्पन्न किया। तदुपरान्त वह उसी नगर में निवास करने लगी। जीवित रहने पर भी गुणवती संसार के लिये मृत थी। उसने बाल्यकाल में ही विवेक जागृत होने के उपरान्त से मृत्यु पर्यन्त दो व्रतों का विधिपूर्वक पालन किया था। एक तो एकादशी का उपवास तथा दूसरा कार्तिक मास का भलीभाँति सेवन एवं व्रत पालन।

इस प्रकार गुणवती प्रतिवर्ष कार्तिक का व्रत करती थी। एक समय, जबकि वह रुग्णा थी, उसके सभी अङ्ग दुर्बल हो गये थे तथा वह ज्वर से अत्यन्त पीड़ित थी, किसी प्रकार शनैः शनैः गङ्गाजी में स्नान करने हेतु गयी। जल में प्रवेश करते ही गुणवती शीत से व्याकुल होकर काँपती हुयी गिर पड़ी। उस व्याकुलता की दशा में ही उसने देखा, आकाश से विमान उतर रहा है। मृत्यु के पश्चात् वह दिव्य रूप धारण कर उस विमान पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठलोक को प्रस्थान कर गयी। कार्तिक व्रत के पुण्य से वह मेरे समीप निवास करने लगी। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं की प्रार्थना से जब मैं इस पृथ्वी पर आया, तब मेरे साथ मेरे समस्त पार्षद भी यहाँ आये। हे भामिनि! ये सभी यदुवंशी मेरे पार्षदगण ही हैं। पूर्वजन्म के देवशर्मा ही तुम्हारे पिता सत्राजित् के रूप में प्रकट हुये तथा वे चन्द्र नामक ब्राह्मण ही इस समय अक्रूर के रूप में अवतरित हुये हैं तथा तुम वही कल्याणमयी गुणवती हो। कार्तिक व्रत के पुण्य से तुम मेरे लिये अधिक प्रसन्नता प्रदान करने वाली बन गयी हो। पूर्वजन्म में तुमने जो मेरे मन्दिर के द्वार पर तुलसी की वाटिका लगा रखी थी, उसी का फल है कि इस समय तुम्हारे आँगन में यह कल्पवृक्ष शोभायमान हो रहा है। तुमने जो मृत्यु पर्यन्त कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उसके प्रभाव से तुम्हारा मुझसे कभी भी वियोग नहीं होगा।

प्रिये! पूर्वकाल में राजा पृथु एवं महर्षि नारद का इस विषय में जो सम्वाद हुआ है, उसका श्रवण करो। पृथु के प्रश्न करने पर नारदजी ने इस प्रकार वर्णन करना आरम्भ किया – ‘प्राचीनकाल में शङ्ख नामक एक असुर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। उसने इन्द्र आदि समस्त लोकपालों के अधिकार छीन लिये। देवता मेरुगिरि की दुर्गम कन्दराओं में छुपकर निवास करने लगे। उस समय दैत्य ने विचार किया – ‘यद्यपि मैंने देवताओं को जीत लिया है तथापि वे बलवान प्रतीत होते हैं। अब इस विषय में मुझे क्या करना चाहिये? यह बात तो मुझे भलीभाँति ज्ञात है कि देवता वेदमन्त्रों के बल से ही प्रबल प्रतीत होते हैं। अतः मैं वेदों का ही अपहरण करूँगा। इसके फलस्वरूप देवता निर्बल हो जायेंगे।’ ऐसा निश्चय कर वह दैत्य ब्रह्माजी के सत्यलोक से शीघ्र ही वेदों को हर लाया। जिस समय शङ्खासुर वेदों का हरण कर उन्हें ले जा रहा था, उसी समय भयभीत होकर वेद उसके बन्धन से मुक्त होकर निकल भागे तथा यज्ञ, मन्त्र एवं बीजों सहित जल में समाहित हो गये। शङ्खासुर उन्हें खोजता हुआ समुद्र के भीतर यत्र-तत्र भ्रमण करने लगा, किन्तु उसे किसी एक स्थान पर भी वेदमन्त्रों का दर्शन नहीं हुआ।

इधर देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित हो उनकी स्तुति की। तब भगवान जागे एवं देवताओं से बोले – ‘हे देवगणों! मैं तुम्हारे गायन, वादन आदि मङ्गल साधनों से प्रसन्न होकर तुम्हें वर देने के लिये उद्यत हूँ। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुमने मुझे जगाया है, एतावता यह तिथि मेरे लिये अत्यन्त प्रीतिदायिनी एवं माननीय है। शङ्खासुर के द्वारा हरे गये सम्पूर्ण वेद जल में स्थित हैं। मैं सागर पुत्र शङ्ख का वध करके उन वेदों को अभी लेकर आता हूँ। इस कार्तिक मास में जो श्रेष्ठ मनुष्य प्रातःकाल स्नान करते हैं, वे सभी यज्ञ के अवभृथ स्नान, अर्थात् यज्ञ के अन्त में किये जाने वाले स्नान का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। आज से मैं भी कार्तिक में जल के भीतर निवास करूँगा। तुम सभी देवता भी मुनीश्वरों सहित मेरे साथ जल में आओ।’

ऐसा कहकर मत्स्यावतार अर्थात् मछली के समान रूप धारण कर भगवान विष्णु आकाश से जल में समाहित हो गये। तदुपरान्त, शङ्खासुर का वध करके भगवान् विष्णु बदरीवन में आ गये तथा वहाँ उन्होंने समस्त ऋषियों को आमन्त्रित कर आदेश देते हुये कहा – ‘हे मुनीश्वरों! तुम जल के भीतर बिखरे हुये वेदमन्त्रों की खोज करो तथा यथाशीघ्र उन्हें सागर के जल से बाहर निकाल लाओ। तब तक मैं देवताओं सहित प्रयाग में ठहरता हूँ।’

तब भगवान की आज्ञा से उन तपोबल सम्पन्न महर्षियों ने यज्ञ एवं बीजों सहित सम्पूर्ण वेदमन्त्रों का उद्धार किया। उनमें से जितने मन्त्र जिस ऋषि ने उपलब्ध किये, वही उन मन्त्रों का उस दिन से ऋषि माना जाने लगा। तदुपरान्त सभी ऋषि एकत्र होकर प्रयाग में गये। वहाँ उन्होंने समुद्र से प्राप्त हुये सभी वेदमन्त्र ब्रह्माजी सहित भगवान् विष्णु को समर्पित कर दिये। सभी वेदों को पुनः प्राप्त कर ब्रह्माजी अति प्रसन्न हुये। उन्होंने देवताओं एवं ऋषियों सहित प्रयाग में अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ समाप्त होने पर सभी देवताओं ने भगवान से निवेदन किया।

देवता बोले – ‘हे देवाधिदेव जगन्नाथ! इस स्थान पर ब्रह्माजी ने लुप्त हुये वेदों को पुनः प्राप्त किया है तथा हमने भी यहाँ आपकी कृपा से यज्ञभाग प्राप्त किये हैं। अतः यह स्थान पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ, पुण्य की वृद्धि करने वाला तथा भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाला हो। इसके अतिरिक्त यह समय भी महापुण्यमय एवं ब्रह्मघाती आदि महापापियों की भी शुद्धि करने वाला हो तथा यह स्थान यहाँ दिये हुये दान को अक्षय बना देने वाला भी हो, कृपया यह वर दीजिये।’

भगवान विष्णु ने कहा – ‘हे देवगणों! तुमने जो कुछ कहा है, वह मुझे भी स्वीकार है, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। आज से यह स्थान ब्रह्मक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। सूर्यवंश में उत्पन्न राजा भगीरथ यहाँ गङ्गा को लेकर आयेंगे तथा गङ्गा जी यहाँ सूर्यपुत्री यमुना से भेंट करेंगी। ब्रह्माजी एवं तुम सभी देवता मेरे सानिध्य में यहाँ निवास करो। आज से यह तीर्थ तीर्थराज के नाम से विख्यात होगा। तीर्थराज के दर्शन से तत्काल सभी पाप नष्ट हो जायेंगे। सूर्यदेव जब मकर राशि में स्थित होंगे, उस समय यहाँ स्नान करने वाले मनुष्यों के सभी पापों को यह तीर्थ नष्ट करेगा। यह काल भी मनुष्यों के लिये सदा महान् पुण्यफल देने वाला होगा। माघ में सूर्यदेव के मकर राशि में स्थित होने पर यहाँ स्नान करने से सालोक्य आदि फल प्राप्त होंगे।’

देवाधिदेव भगवान विष्णु देवताओं से ऐसा कहकर ब्रह्माजी के साथ वहीं अन्तर्धान हो गये। तदुपरान्त इन्द्रादि देवता भी अपने अंश से प्रयाग में निवास करते हुये वहाँ से अन्तर्धान हो गये। जो मनुष्य कार्तिक में तुलसी जी की जड़ के समीप श्रीहरि का पूजन करता है, वह इस लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्ततः वैकुण्ठधाम को प्राप्त होता है।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का नवम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


दसवाँ अध्याय – कार्तिक व्रत के पुण्यदान से एक राक्षसी का उद्धार

नारदजी कहते हैं – “कार्तिक के उद्यापन में तुलसी के मूल प्रदेश में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है, क्योंकि तुलसी विष्णु जी को अत्यन्त प्रीतिप्रदायक मानी गयी है। हे राजन्! जिसके घर में तुलसी की वाटिका है, वह घर तीर्थ स्वरूप है एवं वहाँ यमराज के दूत प्रवेश नहीं करते। तुलसी का वन सदैव समस्त पापों का नाश करने वाला तथा अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति करने वाला है। जो श्रेष्ठ मनुष्य तुलसी की वाटिका लगाते हैं, उन्हें यमराज का दर्शन नहीं होता। नर्मदा का दर्शन, गङ्गा का स्नान तथा तुलसीवन का संसर्ग, ये तीनों एक समान कहे गये हैं। जो तुलसी की मञ्जरी से संयुक्त होकर प्राणों का त्याग करता है, वह सैकड़ों पापों से युक्त हो तो भी यमराज उसकी ओर दृष्टि नहीं कर सकते। जो मनुष्य आँवले के फलों एवं तुलसी के दलों से मिश्रित जल के द्वारा स्नान करता है, उसे गङ्गा स्नान करने का फल प्राप्त होता है।

पूर्वकाल का दृष्टान्त है, सह्यपर्वत पर करवीरपुर में धर्मदत्त नामक एक विख्यात एवं धर्मज्ञ ब्राह्मण निवास करते थे। एक दिन कार्तिक मास में भगवान विष्णु के समीप जागरण करने हेतु उन्होंने भगवान के मन्दिर की ओर प्रस्थान किया। उस समय एक प्रहर रात्रि शेष थी। वे भगवान के पूजन की सामग्री लेकर जा रहे थे। उसी समय ब्राह्मण ने मार्ग में एक भयङ्कर राक्षसी को आते हुये देखा। उसे देखते ही वे भयकम्पित हो उठे। उनके सम्पूर्ण शरीर में कम्पन होने लगा। उन्होंने साहस करके पूजन सामग्री तथा जल से ही उस राक्षसी के ऊपर प्रहार किया। धर्मदत्त ने हरि नाम का स्मरण करके तुलसीदल मिश्रित जल उस पर छिड़का था, इसीलिये उस राक्षसी का सम्पूर्ण पातक नष्ट हो गया। तदुपरान्त उसे अपने पूर्वजन्म के कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त हुयी दुर्दशा का स्मरण हो गया। उसने ब्राह्मण को दण्डवत् प्रणाम किया तथा बोली – ‘हे ब्रह्मन्! मेरे पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप मेरी यह दुर्दशा हुयी है। अब कैसे मुझे उत्तम गति की प्राप्ति होगी?’

धर्मदत्त ने प्रश्न किया – ‘किस कर्म के फलस्वरूप तुम्हारी यह दशा हुयी है? तुम कहाँ की निवासी हो? तुम्हारा नाम क्या है तथा आचार व्यवहार कैसा है? इन सब तथ्यों से मुझे अवगत कराओ।’

राक्षसी बोली – ‘हे ब्रह्मन्! मेरे पूर्वजन्म का वृत्तान्त है, सौराष्ट्र नगर में भिक्षु नाम के एक ब्राह्मण निवास करते थे। मैं उन्हीं की धर्मपत्नी थी। मेरा नाम कलहा था तथा मैं अत्यन्त क्रूर स्वभाव की स्त्री थी। मैंने वचन से भी कभी अपने पति का भला नहीं किया, उन्हें कभी मिष्टान्न या मीठा भोजन नहीं परोसा। सदा अपने स्वामी से विश्वासघात करती रही। मुझे कलह विशेष प्रिय था, जिसके कारण मेरे पति का मन मुझसे सदैव उद्विग्न रहा करता था। अन्ततोगत्वा उन्होंने अन्य स्त्री से विवाह करने का निश्चय कर लिया। तदा मैंने विष का सेवन कर अपने प्राण त्याग दिये। तदुपरान्त यमदूत आये तथा मुझे बन्धक बनाकर ताड़ना देते हुये यमलोक में ले गये। वहाँ यमराज ने मुझे देखकर चित्रगुप्त से पूछा – ‘चित्रगुप्त! देखो तो सही इसने कैसा कर्म किया है? जैसा इसका कर्म हो, उसके अनुसार यह शुभ या अशुभ फल प्राप्त करे।’

चित्रगुप्त ने कहा – ‘हे प्रभो! इसके द्वारा कोई भी शुभ कर्म नहीं किया गया है। यह स्वयं मिष्टान्न ग्रहण करती थी तथा अपने स्वामी को उसमें से कुछ भी नहीं देती थी। इसने सदा अपने स्वामी से द्वेष किया है, एतावता यह चमगादुरी की योनि में रहे। इसकी प्रवृत्ति सदा कलह में ही रही है, इसीलिये यह विष्ठाभोजी सूकरी की योनि में रहे। जिस पात्र में भोजन बनाया जाता है, उसी में यह सदैव अकेली भोजन करती थी। अतः उसके दोष से यह अपनी ही सन्तान का भक्षण करने वाली बिल्ली की योनि में जाये। इसने अपने पति को निमित्त बनाकर आत्मघात किया है, अतः यह अत्यन्त निन्दनीय स्त्री प्रेत के शरीर में भी कुछ काल तक अकेली ही रहनी चाहिये। इसे यमदूतों के द्वारा निर्जल प्रदेश में भेज देना चाहिये, वहाँ दीर्घकाल तक यह प्रेत के शरीर में निवास करे। तदुपरान्त यह पापिनी शेष तीन योनियों का भी उपभोग करेगी।’

कलहा कहती है – ‘हे विप्रवर! मैं वही पापिनी कलहा हूँ। इस प्रेत शरीर में मुझे पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। मैं सदैव क्षुधा एवं तृष्णा से पीड़ित रहती हूँ। एक वैश्य, अर्थात् बनिये की देह में प्रवेश करके मैं इस दक्षिण देश में कृष्णा एवं वेणी के संगम तक आयी हूँ। ज्यों ही संगम-तट पर पहुँची, त्यों ही भगवान शिव एवं भगवान विष्णु के पार्षदों ने मुझे बलपूर्वक उस वैश्य की देह से दूर भगा दिया। उसी समय से मैं क्षुधा का कष्ट सहन करती हुयी इधर-उधर भ्रमण कर रही हूँ। इतने में ही आपके ऊपर मेरी दृष्टि पड़ी। आपके हाथ से तुलसी मिश्रित जल का संसर्ग पाकर मेरे समस्त पाप नष्ट हो गये। हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप ही कोई समाधान कीजिये। कृपापूर्वक यह बताइये कि मुझे इस प्रेत शरीर से एवं भविष्य में होने वाली भयङ्कर तीन योनियों से किस प्रकार मुक्ति प्राप्त होगी?’

कलहा की व्यथा सुनकर द्विजश्रेष्ठ धर्मदत्त ने बहुत समय तक विचार मन्थन करने के पश्चात् कहा – ‘तीर्थ में दान एवं व्रत आदि सत्कर्म करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं, परन्तु तू तो प्रेत की देह में है; इसीलिये उन कर्मों को करने की अधिकारिणी नहीं है। अतः मैंने जन्म से लेकर अब तक जो कार्तिक का व्रत किया है, उसके पुण्य का अर्ध भाग मैं तुझे समर्पित करता हूँ। तू उसी से सद्गति को प्राप्त हो जायेगी।’ ऐसा कहकर धर्मदत्त ने द्वादशाक्षर मन्त्र का श्रवण कराते हुये तुलसी मिश्रित जल से ज्यों ही उसका अभिषेक किया, त्यों ही वह प्रेतयोनि से मुक्त होकर प्रज्वलित अग्निशिखा के समान तेजस्विनी एवं दिव्यरूपधारिणी देवी में परिवर्तित हो गयी। वह सौन्दर्य में देवी लक्ष्मी के समान प्रतीत होने लगी।

तदुपरान्त उसने भूमि पर दण्डवत् होकर ब्राह्मण देवता को प्रणाम किया तथा हर्षपूर्वक गद्गद वाणी में कहा – ‘हे द्विजश्रेष्ठ! आपकी कृपा से आज मुझे इस नर्क से मुक्ति प्राप्त हुयी है। मैं पाप के समुद्र में डूब रही थी, आप मेरे लिये नौका के समान हो गये।’ वह इस प्रकार ब्राह्मण से कह ही रही थी कि आकाश से एक दिव्य विमान आता हुआ दृष्टिगोचर हुआ। वह अत्यन्त प्रकाशमान था तथा उसपर विष्णुरूपधारी पार्षद विराजमान थे। विमान के द्वार पर खड़े हुये पुण्यशील एवं सुशील ने उस देवी को उठाकर श्रेष्ठ विमान पर चढ़ा लिया। तब धर्मदत्त ने अत्यन्त विस्मयपूर्वक विमान को देखा तथा विष्णुरूपधारी पार्षदों को देखकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया।

पुण्यशील एवं सुशील ने प्रणाम करने वाले ब्राह्मण को उठाया एवं उसकी सराहना करते हुये कहा – ‘हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें साधुवाद है; क्योंकि तुम सदा भगवान विष्णु के भजन में लीन रहते हो, दीनों पर दया करते हो, सर्वज्ञ हो तथा भगवान विष्णु के व्रत का पालन करते हो। तुमने बाल्यकाल से लेकर अब तक जो कार्तिक व्रत का अनुष्ठान किया है, उसके अर्ध भाग का दान करने से तुम्हें दो गुणा पुण्य प्राप्त हुआ है तथा इसके सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो गये हैं। अब यह वैकुण्ठ धाम में ले जायी जा रही है। तुम भी इस जन्म के अन्त में अपनी दोनों पत्नियों सहित भगवान विष्णु के वैकुण्ठधाम में प्रतिष्ठित हो जाओगे। हे धर्मदत्त! जिन्होंने तुम्हारे समान भक्तिपूर्वक भगवान विष्णु की आराधना की है, वे धन्य एवं कृतकृत्य हैं। इस संसार में उन्हीं का जन्म सफल है। भलीभाँति आराधना करने पर भगवान विष्णु देहधारी प्राणियों को क्या कुछ नहीं प्रदान करते हैं? उन्होंने ही उत्तानपाद के पुत्र को पूर्वकाल में ध्रुव पद पर स्थापित किया। उनके नामों का स्मरण करने मात्र से समस्त जीव सद्गति को प्राप्त होते हैं। पूर्वकाल में ग्राहग्रस्त गजराज उन्हीं के नामों का स्मरण करने से मुक्त हुआ था। तुमने जन्म से ही लेकर जो भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाले व्रत का अनुष्ठान किया है, उससे श्रेष्ठ न यज्ञ है, न दान है तथा न ही तीर्थ हैं। विप्रवर! तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने जगद्गुरु भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला ऐसा व्रत किया है कि जिसके अर्ध भाग के फल को प्राप्त कर यह स्त्री हमारे साथ भगवान के लोक में प्रतिष्ठित होने जा रही है।'”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का दशम अध्याय पूर्ण हुआ ॥


ग्यारहवाँ अध्याय – भक्ति के प्रभाव से विष्णुदास एवं राजा चोल का भगवान के पार्षद होना

नारदजी कहते हैं – “इस प्रकार भगवान विष्णु के पार्षदों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा – ‘प्रायः सभी मनुष्य भक्तों का कष्ट दूर करने वाले श्रीविष्णु की यज्ञ, दान, व्रत, तीर्थ सेवन तथा तपस्याओं के द्वारा विधिपूर्वक आराधना करते हैं। उन समस्त साधनों में कौन-सा ऐसा साधन है, जो भगवान विष्णु की प्रसन्नता में वृद्धि करने वाला तथा उनका सामीप्य प्रदान करने वाला है।’

दोनों पार्षद अपने पूर्वजन्म की कथा का वर्णन करते हुये बोले – ‘हे ब्रह्मन्! पूर्वकाल में कांचीपुरी में चोल नामक एक चक्रवर्ती राजा हुये थे। उन्हीं के नाम पर उनके अधीन रहने वाले सभी देश चोल नाम से विख्यात हुये। राजा चोल जिस समय इस भूमण्डल पर शासन करते थे, उस समय उनके राज्य में कोई भी मनुष्य दरिद्र, दुःखी, पापी अथवा रोगी नहीं था। एक समय का वृत्तान्त है, राजा चोल अनन्तशयन नामक तीर्थ में गये, जहाँ जगदीश्वर भगवान विष्णु ने योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन किया था। वहाँ राजा ने भगवान विष्णु के दिव्य विग्रह की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की। दिव्य मणि, मुक्ताफल तथा सुवर्ण से निर्मित सुन्दर पुष्पों द्वारा पूजन करके राजा ने साष्टाङ्ग प्रणाम किया।

प्रणाम करके वे ज्यों ही बैठे, उसी समय उनकी दृष्टि भगवान के समीप आते हुये एक ब्राह्मण पर पड़ी, जो उन्हीं की कांचीनगरी के निवासी थे। उनका नाम विष्णुदास था। उन्होंने भगवान की पूजा हेतु अपने हाथ में तुलसीदल एवं जल ले रखा था। निकट आने पर उन ब्रह्मर्षि ने विष्णु सूक्त का पाठ करते हुये देवाधिदेव भगवान को स्नान कराया तथा तुलसी की मञ्जरी एवं पत्तों से उनकी विधिवत् पूजा की। राजा चोल ने जो पहले रत्नों से भगवान की पूजा की थी, वह सब तुलसी पूजा से ढक गयी। यह देख राजा कुपित होकर बोले – ‘विष्णुदास! मैंने मणियों तथा सुवर्ण से भगवान की जो पूजा की थी, वह कितनी शोभायमान हो रही थी; तुमने तुलसीदल चढ़ाकर उसे ढक दिया। बताओ, ऐसा क्यों किया? मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम दरिद्र एवं असभ्य हो! भगवान विष्णु की भक्ति के विषय में तुम्हें किञ्चित मात्र ज्ञान नहीं है!’

राजा के वचनों को सुनकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास ने कहा – ‘हे राजन्! आपको भक्ति का कुछ भी ज्ञान नहीं है, केवल राजलक्ष्मी के कारण आप मिथ्या अहङ्कार कर रहे हैं। बतलाइये तो, आज से पूर्व आपने कितने वैष्णव व्रतों का पालन किया है?’

तब नृपश्रेष्ठ चोल ने हँसकर कहा – ‘तुम तो दरिद्र एवं निर्धन हो, तुम्हारी भगवान विष्णु में भक्ति ही कितनी है? तुमने भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाला कोई भी यज्ञ एवं दान आदि नहीं किया तथा न पूर्व में कभी किसी देव मन्दिर का निर्माण कराया है। इतने पर भी तुम्हें अपनी भक्ति का इतना अभिमान है! अच्छा, तो ये सभी ब्राह्मण मेरे वचन ध्यानपूर्वक श्रवण करें एवं देखें कि भगवान विष्णु के दर्शन पहले मुझे होते हैं अथवा इस ब्राह्मण को। तदुपरान्त हम दोनों में से किसकी भक्ति कैसी है, यह सभी को स्वतः ही ज्ञात हो जायेगा।’

ऐसा कहकर राजा अपने राजभवन को प्रस्थान कर गये। वहाँ उन्होंने महर्षि मुद्गल को आचार्य बनाकर वैष्णव यज्ञ प्रारम्भ किया। उधर सदैव भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले शास्त्रोक्त नियमों में तत्पर विष्णुदास भी व्रत का पालन करते हुये, वहीं भगवान विष्णु के मन्दिर में विराजमान हो गये। उन्होंने माघ एवं कार्तिक के उत्तम व्रत का अनुष्ठान, तुलसीवन की रक्षा, एकादशी को द्वादशाक्षर मन्त्र, अर्थात् ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। का जप तथा नृत्य, गीत आदि मङ्गलमय कर्म किये। इन सभी सत्कर्मों सहित विष्णुदास ने प्रतिदिन नियमपूर्वक षोडशोपचार विधि से भगवान विष्णु का पूजन एवं अन्य सम्बन्धित अनुष्ठान सम्पन्न किये। वे प्रतिदिन चलते-फिरते एवं शयन आदि प्रत्येक कार्य करते हुये प्रतिक्षण भगवान विष्णु का स्मरण करते रहते थे। उनकी दृष्टि सर्वत्र सम हो गयी थी। वे सभी प्राणियों के भीतर स्थित एकमात्र भगवान विष्णु का ही दर्शन करते थे। इस प्रकार राजा चोल एवं विष्णुदास दोनों ही भगवान लक्ष्मीपति की आराधना में संलग्न थे, दोनों ही अपने-अपने व्रत में स्थित रहते थे तथा दोनों की ही सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा समस्त कर्म भगवान विष्णु को समर्पित हो चुके थे। इस अवस्था में उन दोनों ने दीर्घकाल व्यतीत किया।

एक दिन की बात है, विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के पश्चात् भोजन तैयार किया, किन्तु कोई अज्ञात प्राणी उसको चुरा ले गया। विष्णुदास ने देखा भोजन नहीं है, परन्तु उन्होंने पुनः भोजन नहीं बनाया, क्योंकि ऐसा करने पर सायंकाल की पूजा हेतु उन्हें अवकाश नहीं मिलता। अतः प्रतिदिन का नियम भङ्ग हो जाने का भय था। दूसरे दिन पुनः उसी समय पर भोजन बनाकर वे ज्यों ही भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने हेतु गये, त्यों ही किसी ने आकर पुनः समस्त भोजन चुरा लिया। इस प्रकार निरन्तर सात दिवस तक कोई आकर उनके भोजन की चोरी करता रहा। इससे विष्णुदास को अत्यन्त विस्मय हुआ। वे मन ही मन इस प्रकार विचार करने लगे – ‘अहो! कौन प्रतिदिन आकर मेरी रसोई चुरा ले जाता है। यदि पुनः रसोई बनाकर भोजन करता हूँ तो सायंकाल की पूजा छूट जाती है। रसोई बनाकर तुरन्त ही भोजन कर लेना उचित हो तो भी मुझसे यह न होगा, क्योंकि भगवान विष्णु को अर्पण किये बिना कोई भी वैष्णव भोजन नहीं करता। आज उपवास करते मुझे सात दिवस हो गये। इस प्रकार मैं व्रत में कब तक स्थिर रह सकता हूँ। अच्छा आज मैं रसोई की भलीभाँति रक्षा करूँगा।’

ऐसा निश्चय करके भोजन बनाने के पश्चात् विष्णुदास वहीं कहीं छुपकर खड़े हो गये। इतने में ही उन्हें एक चाण्डाल दृष्टिगोचर हुआ जो रसोई का अन्न हरकर जाने के लिये तत्पर खड़ा था। क्षुधा के कारण उसका सम्पूर्ण शरीर दुर्बल हो गया था, मुख पर दीनता छा रही थी, शरीर में अस्थि एवं चर्म के अतिरिक्त अन्य कुछ शेष नहीं बचा था। उसे देखकर श्रेष्ठ ब्राह्मण विष्णुदास का हृदय करुणा से द्रवित हो गया। उन्होंने भोजन चुराने वाले चाण्डाल की ओर देखकर कहा – ‘भैया! जरा ठहरो! क्यों रूखा-सूखा खाते हो? यह घी तो ले लो।’ ऐसा कहते हुये विप्रवर विष्णुदास को आते देख वह चाण्डाल भयभीत होकर अत्यन्त तीव्र वेग से भागा तथा कुछ ही अन्तराल पर मूर्च्छित होकर धराशायी हो गया। चाण्डाल को भयभीत एवं मूर्च्छित देखकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास तीव्र वेग से उसके समीप आये तथा दयावश अपने वस्त्र के छोर से उसको हवा करने लगे।

तदुपरान्त जब वह उठकर खड़ा हुआ, तब विष्णुदास ने देखा, वहाँ चाण्डाल नहीं है, अपितु साक्षात् भगवान नारायण ही शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये सामने उपस्थित हैं। अपने प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन कर विष्णुदास सात्त्विक भावनाओं के वशीभूत होकर भावविह्वल हो गये। उनमें प्रभु की स्तुति एवं नमस्कार करने का भी सामर्थ्य नहीं रहा। तदा भगवान विष्णु ने सात्त्विक व्रत का पालन करने वाले अपने भक्त विष्णुदास को हृदय से लगा लिया एवं उन्हें अपने ही जैसा रूप प्रदान कर वे वैकुण्ठ धाम को प्रस्थान करने लगे।

उस समय यज्ञ में दीक्षित हुये राजा चोल ने देखा विष्णुदास एक श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर भगवान विष्णु के समीप जा रहे हैं। विष्णुदास को वैकुण्ठ धाम में जाते देख राजा ने शीघ्रता से अपने गुरु महर्षि मुद्गल को बुलाया तथा कहने लगे – ‘जिसके सङ्ग स्पर्धा करके मैंने इस यज्ञ, दान आदि कर्म का अनुष्ठान किया है, वह ब्राह्मण आज भगवान विष्णु का रूप धारण करके मुझसे पूर्व ही वैकुण्ठ धाम को जा रहा है। मैंने इस वैष्णवयाग में भलीभाँति दीक्षित होकर अग्नि में हवन किया तथा दान आदि के द्वारा ब्राह्मणों का मनोरथ पूर्ण किया। तथापि अभी तक भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न नहीं हुये तथा इस विष्णुदास को केवल भक्ति के ही कारण श्रीहरि ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अतः प्रतीत होता है कि भगवान विष्णु केवल दान एवं यज्ञों से प्रसन्न नहीं होते। उन प्रभु का दर्शन कराने में भक्ति ही प्रधान कारण है।’

दोनों पार्षद कहते हैं – ‘इतना कहकर राजा ने अपने भानजे को राजसिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया। वे बाल्यकाल से ही यज्ञ की दीक्षा लेकर उसी में संलग्न रहते थे, इसीलिये उनका कोई पुत्र नहीं हुआ था। यही कारण है कि उस देश में अब तक भानजे ही राज्य के उत्तराधिकारी होते हैं। भानजे को राज्य प्रदान कर राजा यज्ञशाला में गये तथा यज्ञ कुण्ड के सम्मुख खड़े होकर भगवान विष्णु को सम्बोधित करते हुये तीन बार उच्च स्वर में उद्घोष किया कि – ‘हे भगवान् विष्णु! आप मुझे मन, वाणी, शरीर एवं क्रिया द्वारा होने वाली अविचल भक्ति प्रदान कीजिये।’ इतना कहकर राजा उन सभी की उपस्थिति में उस अग्निकुण्ड में कूद गये। ऐसा करते ही तत्क्षण भक्तवत्सल भगवान विष्णु अग्निकुण्ड में प्रकट हो गये। उन्होंने राजा को हृदय से लगाकर एक श्रेष्ठ विमान पर विराजमान किया तथा उन्हें सङ्ग लेकर वैकुण्ठ धाम को प्रस्थान कर गये।’

नारदजी कहते हैं – ‘हे राजन्! जो विष्णुदास थे, वे तो भगवान के पुण्यशील नामक प्रसिद्ध पार्षद हुये तथा जो राजा चोल थे, वे सुशील नाम से विख्यात हुये। इन दोनों को अपने ही समान रूप प्रदान कर भगवान लक्ष्मीपति ने अपना द्वारपाल बना लिया।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का एकादश अध्याय पूर्ण हुआ ॥


बारहवाँ अध्याय – जय-विजय का चरित्र

धर्मदत्त ने पूछा – ‘मैंने सुना है कि जय एवं विजय भी भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं। उन्होंने पूर्वजन्म में कौन-सा पुण्य किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान के समान रूप एवं वैकुण्ठ धाम के द्वारपाल का परम् पवित्र पद प्राप्त हुआ?’

दोनों पार्षदों ने कहा – ‘हे ब्रह्मन्! पूर्वकाल में तृणविन्दु की कन्या देवहूति के गर्भ से महर्षि कर्दम की दृष्टि मात्र से दो पुत्र उत्पन्न हुये। उनमें से ज्येष्ठ पुत्र का नाम जय था तथा अनुज पुत्र का नाम विजय था। तदनन्तर उसी देवहूति के गर्भ से योग धर्म के ज्ञाता भगवान कपिल का जन्म हुआ। जय एवं विजय सदैव भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते थे। वे नित्य नियमपूर्वक अष्टाक्षर मन्त्र, ॐ नमो नारायणाय। का जप एवं वैष्णव व्रतों का पालन करते थे। एक समय राजा मरुत्त ने उन दोनों को अपने यज्ञ में आमन्त्रित किया। वहाँ जय को ब्रह्मा एवं विजय को आचार्य बनाया गया। उन्होंने यज्ञ की सम्पूर्ण विधि पूर्ण की। यज्ञान्त में अवभृथ स्नान के पश्चात् राजा मरुत्त ने उन दोनों को अत्यधिक धन प्रदान किया। धन लेकर दोनों भ्राता अपने आश्रम पर गये। वहाँ उस धन का विभाग करते समय दोनों में परस्पर विवाद होने लगा। जय ने कहा – ‘इस धन को समान मात्रा में बाँट लेते हैं।’ किन्तु विजय का कहना था – ‘नहीं! जिसको जो मिला है, वह उसी के समीप रहे।’ तदा जय ने क्रोधवश लोभी विजय को शाप देते हुये कहा – ‘तुम ग्रहण करके देते नहीं हो, इसीलिये ग्राह हो जाओ।’ जय के इस शाप को सुनकर विजय ने भी शाप दिया – ‘तुमने मद से भ्रान्त होकर शाप दिया है, इसीलिये मातङ्ग, अर्थात् गज की योनि में जाओ।’ तदुपरान्त वे दोनों भगवान से शाप निवृत्ति हेतु प्रार्थना करने लगे।

उन दोनों की करूण पुकार सुनकर श्री भगवान ने कहा – ‘तुम मेरे भक्त हो, तुम्हारा वचन कभी असत्य नहीं होगा। तुम दोनों अपने ही दिये हुये इन शापों को भोगकर अनन्तर मेरे धाम को प्राप्त होओगे।’ ऐसा कहकर भगवान विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर जय-विजय दोनों गण्डकी नदी के तट पर ग्राह एवं गज के रूप में निवास करने लगे। उस योनि में भी उन्हें पूर्वजन्म का स्मरण बना रहा तथा वे भगवान विष्णु के व्रत में तत्पर रहे। किसी समय वह गजराज कार्तिक मास में स्नान हेतु गण्डकी नदी में गया। उस समय ग्राह ने शाप का स्मरण करते हुये उस गज को पकड़ लिया। ग्राह से पकड़े जाने पर गजराज ने भगवान रमानाथ का स्मरण किया। तब भगवान विष्णु शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने सुदर्शन चक्र द्वारा ग्राह एवं गजराज दोनों का उद्धार किया तथा उन्हें अपने ही समान रूप प्रदान कर वे वैकुण्ठ धाम को ले गये। तब से वह स्थान हरिक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है। वे ही दोनों विश्वविख्यात जय एवं विजय हैं, जो भगवान विष्णु के द्वारपाल हुये हैं।

हे धर्मदत्त! तुम भी मात्सर्य एवं दम्भ का त्याग करके सदा भगवान विष्णु के व्रत में स्थिर रहो, समदर्शी बनो, तुला (कार्तिक), मकर (माघ) तथा मेष (वैशाख), इन मासों में सदैव प्रातःकाल स्नान करो। एकादशी व्रत के पालन में स्थिर रहो। तुलसी के उद्यान की रक्षा करते रहो। ऐसा करने से तुम्हें भी शरीर का अन्त होने पर भगवान विष्णु का परम पद प्राप्त होगा। भगवान विष्णु को सन्तुष्ट करने वाले तुम्हारे इस व्रत से श्रेष्ठ न यज्ञ हैं, न दान हैं तथा न तीर्थ ही हैं। विप्रवर! तुम धन्य हो, जिसके व्रत के अर्धभाग का फल प्राप्त कर यह स्त्री हमारे द्वारा वैकुण्ठ धाम में ले जायी जा रही है।’

नारदजी कहते हैं – “राजन्! धर्मदत्त को इस प्रकार उपदेश करके वे दोनों विमानचारी पार्षद उस कलहा के साथ वैकुण्ठ धाम को चले गये। धर्मदत्त जीवन पर्यन्त भगवान के व्रत में स्थिर रहे तथा देहावसान के उपरान्त उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों के सहित वैकुण्ठ धाम प्राप्त कर लिया। इस प्राचीन इतिहास का जो श्रवण एवं वाचन करता है, वह जगद्गुरु भगवान की कृपा से उनका सान्निध्य प्राप्त कराने वाली उत्तम गति प्राप्त करता है।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का द्वादश अध्याय पूर्ण हुआ ॥


तेरहवाँ अध्याय – सांसर्गिक पुण्य से धनेश्वर का उद्धार, दूसरों के पुण्य एवं पाप की आंशिक प्राप्ति के कारण तथा मासोपवास व्रत की सङ्क्षिप्त विधि

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – “प्रिये! नारदजी के मुख से यह कथा श्रवण कर राजा पृथु के मन में घोर आश्चर्य हुआ। उन्होंने नारदजी का भलीभाँति पूजन करने के पश्चात् उन्हें विदा किया। पूर्वकाल में अवन्तिपुरी में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। वह क्रय-विक्रय के कार्य से भ्रमण करता हुआ किसी समय माहिष्मतीपुरी में जा पहुँचा, जहाँ पापनाशिनी नर्मदा सदैव शोभायमान होती है। वहाँ कार्तिक का व्रत करने वाले अनेक मनुष्य विभिन्न ग्रामों से स्नान करने हेतु पधारे थे। धनेश्वर ने उन सभी का दर्शन किया एवं अपना सामान विक्रय करते हुये एक मास तक वहीं वास किया। वह प्रतिदिन नर्मदा के तट पर भ्रमण करते हुये स्नान, जप एवं देवार्चन में लीन ब्राह्मणों का दर्शन करता तथा वैष्णवों के मुख से भगवान विष्णु के नामों का कीर्तन श्रवण करता था। इस प्रकार उसको नर्मदा-तट पर वास करते हुये जब एक मास व्यतीत हो गया, तब एक दिन अकस्मात् उसे किसी काले सर्प ने डँस लिया। इससे विह्वल होकर वह धराशायी हो गया। यमदूत उसे बाँधकर ले गये तथा कुम्भीपाक में डाल दिया। वहाँ उसके गिरते ही समस्त कुण्ड शीतल हो गया। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार पूर्वकाल में प्रह्लादजी को डालने से दैत्यों द्वारा जलायी हुयी अग्नि शीतल हो गयी थी। तदुपरान्त यमराज इस विषय में पूछताछ करने लगे।

इतने में ही वहाँ नारदजी पधारे एवं बोले – ‘हे सूर्यनन्दन! यह नरकों का उपभोग करने योग्य नहीं है। जो मनुष्य पुण्यकर्म करने वाले लोगों का दर्शन, स्पर्श एवं उनसे वार्तालाप करता है, वह उनके पुण्य का छठा अंश प्राप्त कर लेता है। यह धनेश्वर तो एक मास तक श्रीहरि के कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करने वाले असङ्ख्य मनुष्यों के सम्पर्क में रहा है, अतः यह उन सभी के पुण्यांश का भागी हुआ है। इसको अनिच्छा से पुण्य प्राप्त हुआ है, एतावता यह यक्ष की योनि में रहे एवं पाप भोग के रूप में सभी नरकों का दर्शन मात्र करके ही यमयातना से मुक्त हो जाये।’

प्रिये! इतना कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये। तब प्रेतराज ने धनेश्वर को नरकों के समीप ले जाकर उन सभी का दर्शन कराते हुये कहा – ‘धनेश्वर! महान् भय देने वाले इन घोर नरकों की ओर दृष्टि डालो। इनमें पापी पुरुष सदा दूतों द्वारा पकाये जाते हैं। इन नरकों के पृथक्-पृथक् चौरासी भेद हैं। तुम्हें कार्तिक व्रत करने वाले पुरुषों का संसर्ग प्राप्त हुआ था, उससे पुण्य की वृद्धि होने के कारण ये सभी नरक तुम्हारे लिये निश्चय ही नष्ट हो गये हैं।’ इस प्रकार धनेश्वर को नरकों का दर्शन कराकर प्रेतराज उसे यक्षलोक में ले गये। वहाँ जाकर वह यक्ष हुआ। वही कुबेर के अनुचर धनयक्ष के नाम से विख्यात हुआ।’

सूतजी कहते हैं – “इस प्रकार अपनी अत्यन्त प्रिय सत्यभामा को यह कथा सुनाकर भगवान श्रीकृष्ण सन्ध्योपासना करने हेतु माता के घर में गये।”

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘हे नारद! यदि कार्तिक व्रत करने हेतु स्वयं सामर्थ्य न हो तो अन्य उपाय से भी इसका फल प्राप्त हो सकता है। ब्राह्मण को धन प्रदान कर कार्तिक व्रत के उत्तम फल को ग्रहण करें। शिष्य से, भृत्यवर्ग (सेवक) से, स्त्रियों से अथवा अपने किसी विश्वास पात्र मनुष्य से भी व्रत का पालन करावें। ऐसा करने से भी मनुष्य फल का भागी होता है।’

नारदजी ने पूछा – ‘पितामह! यह कार्तिक व्रत अल्प परिश्रम द्वारा साध्य होने वाला तथा महान फल प्रदान करने वाला है, तो भी मनुष्य इसे क्यों नहीं करते हैं?’

ब्रह्माजी ने कहा – ‘काम, क्रोध एवं लोभ के वशीभूत होने वाले मनुष्य व्रत आदि धर्मकृत्य नहीं कर पाते। जो इनसे मुक्त हैं, वे ही धर्मकार्य करते हैं। इस पृथ्वी पर श्रद्धा एवं मेधा, ये दो वस्तुएँ ऐसी हैं, जो काम, क्रोध आदि का विनाश करने वाली हैं। इनसे व्याप्त मनुष्य भगवान विष्णु का श्रवण, कीर्तन आदि करता है। परन्तु जिसकी बुद्धि खोटी है, वह यह सब नहीं करता। इसी कारण से वह अन्धकारपूर्ण नरक में गिरता है। पढ़ाने से, यज्ञ कराने से तथा एक पङ्क्ति में बैठकर भोजन करने से मनुष्य दूसरों के किये हुये पुण्य एवं पाप का चौथाई भाग प्राप्त कर लेता है। एक आसन पर बैठने, एक सवारी पर यात्रा करने तथा श्वास से शरीर का स्पर्श होने से मनुष्य निश्चय ही पुण्य एवं पाप के छठे अंश के फल का भागी होता है। अन्य के स्पर्श से, भाषण से तथा उसकी प्रशंसा करने से भी मानव सदा उसके पुण्य एवं पाप के दसवें अंश को प्राप्त करता है। दर्शन एवं श्रवण से अथवा मन के द्वारा उसका चिन्तन करने से, वह दूसरे के पुण्य एवं पाप का शतांश प्राप्त करता है। जो दूसरे की निन्दा एवं चुगली करता है तथा उसे धिक्कार देता है, वह उसके किये हुये पातक को स्वयं लेकर उसके प्रतिफल में उसे अपना पुण्य देता है।

जो मनुष्य किसी पुण्यकर्म करने वाले पुरुष की सेवा करता है, वह यदि उसकी पत्नी, भृत्य एवं शिष्यों से भिन्न है तथा उसे उसकी सेवा के अनुरूप कुछ धन नहीं दिया जा रहा है तो वह भी सेवा के अनुसार उस पुण्यात्मा के पुण्यफल का भागी होता है। जो एक पङ्क्ति में बैठे हुये पुरुष को रसोई परोसते समय छोड़कर आगे बढ़ जाता है, उसके पुण्य का छठा अंश वह छूटा हुआ व्यक्ति पा लेता है। स्नान एवं सन्ध्या आदि करते समय जो दूसरे का स्पर्श अथवा दूसरे से भाषण करता है, वह अपने कर्मजनित पुण्य का छठा अंश उसे निश्चय ही प्रदान करता है। जो धर्म के उद्देश्य से दूसरों के समीप जाकर धन की याचना करता है, उसके उस पुण्यकर्म जनित फल का भागी वह धन देने वाला भी होता है। जो दूसरों का धन चुराकर उसके द्वारा पुण्यकर्म करता है, वहाँ कर्म करने वाला तो पापी होता है तथा जिसका धन चुराकर उस कर्म में लगाया गया है, वही उसके पुण्यफल को प्राप्त करता है।

जो दूसरों का ऋण चुकाये बिना मृत्यु को प्राप्त होता है, उसके पुण्य में से वह धनी अपने धन के अनुरूप भाग प्राप्त कर लेता है। जो बुद्धि (सलाह) देने वाला, अनुमोदन करने वाला, साधन सामग्री देने वाला तथा बल लगाने वाला है, वह भी पुण्य-पाप में से छठे अंश को ग्रहण करता है। प्रजा के पुण्य एवं पाप में से छठा अंश राजा ग्रहण करता है। इसी प्रकार शिष्य से गुरु, स्त्री से उसका पति एवं पुत्र से उसका पिता पुण्य-पाप का छठा अंश ग्रहण करता है। स्त्री भी यदि अपने पति के मनोनुकूल आचरण करने वाली एवं सदा उसे सन्तुष्ट रखने वाली हो तो वह उसके पुण्य का आधा भाग प्राप्त कर लेती है।

जो दूसरे के हाथ से दान आदि पुण्य कर्म करता है, उसके पुण्य का छठा अंश वह कर्ता ही ले लेता है; परन्तु यदि वह पुत्र अथवा भृत्य हो तो षष्ठांश का भागी नहीं होता है। वृत्ति देने वाला पुरुष वृत्ति भोगने वाले के पुण्य का छठा अंश ले लेता है। किन्तु ऐसा तभी होता है जब वह वृत्ति देने वाला पुरुष वृत्ति भोगने वाले से स्वयं की अथवा किसी अन्य की सेवा न कराता हो। इस प्रकार दूसरों के द्वारा सञ्चित किये हुये पुण्य-पाप बिना दिये हुये भी आ जाते हैं। पूर्वकाल में एक दम्भी तपस्वी पतिव्रता स्त्री के शुद्ध प्रभाव से, पिता-माता के पूजन का दर्शन करने से, कार्तिक व्रत का सेवन करके उत्तम लोक को प्राप्त हो गया था।’

नारदजी ने कहा – ‘भगवन्! मैं मासोपवास की विधि एवं उसके फल का यथोचित वर्णन श्रवण करने का इच्छुक हूँ।’

ब्रह्माजी ने कहा – ‘हे नारद! जैसे देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में यह मासोपवास व्रत श्रेष्ठ है। अपने शरीर के बलाबल के अनुसार मासोपवास व्रत करना चाहिये। आश्विन के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उपवास करके तीस दिवस के लिये इस व्रत को ग्रहण करना चाहिये तथा उतने दिवस तक भगवान के मन्दिर में जाकर तीनों समय भक्तिपूर्वक नैवेद्य, धूप, दीप तथा नाना प्रकार के पुष्पों से मन, वाणी एवं क्रिया द्वारा भगवान गरुडध्वज की पूजा करनी चाहिये। स्वधर्मपरायण मनुष्य एवं अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाली सौभाग्यवती अथवा विधवा स्त्री भगवान वासुदेव की पूजा करे। दूसरे का अन्न ग्रहण न करे, परन्तु स्वयं दूसरों को अन्नदान करे।

व्रतस्थ पुरुष को शरीर में उबटन लगाना, मस्तक में तेल मलना, पान का सेवन तथा चन्दन आदि का लेप करना त्याग देना चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य निषिद्ध वस्तुओं का भी त्याग करे। व्रत का पालन करने वाला मनुष्य विपरीत कर्म में लगे रहने वाले किसी मनुष्य का न तो स्पर्श करे तथा न उससे वार्तालाप ही करे। गृहस्थ भी देवालय में निवास कर व्रत का आचरण करे। यथोक्त विधि से मासोपवास व्रत पूर्ण करके द्वादशी में परम पवित्र भगवान विष्णु का पूजन करे एवं दक्षिणा प्रदान करे। मासोपवास के अन्त में तेरह ब्राह्मणों का वरण करके वैष्णव यज्ञ करावे। तदुपरान्त ब्राह्मणों को भोजन करावे एवं उन्हें ताम्बूल सहित दो-दो वस्त्र प्रदान कर पूजनपूर्वक विदा करे। इस प्रकार मासोपवास की विधि वर्णित की गयी है।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का त्रयोदश अध्याय पूर्ण हुआ ॥


चौदहवाँ अध्याय – तुलसी विवाह तथा भीष्मपञ्चक व्रत की विधि एवं महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘कार्तिक शुक्ल नवमी को द्वापरयुग का प्रारम्भ हुआ है। अतः वह तिथि दान एवं उपवास में क्रमशः पूर्वाह्णव्यापिनी तथा पराव्यापिनी हो तो ग्राह्य है। इसी तिथि को (नवमी से एकादशी तक) मनुष्य शास्त्रोक्त विधि से तुलसी के विवाह का उत्सव करे तो उसे कन्यादान का फल प्राप्त होता है। पूर्वकाल में कनक की पुत्री किशोरी ने एकादशी तिथि में सन्ध्या के समय तुलसी की वैवाहिक विधि सम्पन्न की थी। इससे वह किशोरी वैधव्य दोष से मुक्त हो गयी थी। अब मैं उसकी विधि वर्णित करता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो। एक तोला सुवर्ण से भगवान विष्णु की सुन्दर प्रतिमा का निर्माण करावें अथवा अपनी सामर्थ्यानुसार आधे या चौथाई तोले की ही प्रतिमा निर्मित करा लें। तदुपरान्त तुलसी एवं भगवान विष्णु की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके स्तुति आदि के द्वारा भगवान को उठावें। पुनः पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा षोडशोपचार पूजन करें। सर्वप्रथम देश-काल का स्मरण करके भगवान गणेश का पूजन करें, अनन्तर पुण्याहवाचन कराकर नान्दी श्राद्ध करें। तदनन्तर वेदमन्त्रों के उच्चारण एवं वाद्य यन्त्र आदि की ध्वनि सहित भगवान विष्णु की प्रतिमा को तुलसीजी के निकट लाकर विराजमान करें। प्रतिमा को वस्त्रों से आच्छादित किये रहें। उस समय भगवान का इस प्रकार आवाहन करें –

आगच्छ भगवन् देव अर्चयिष्यामि केशव।
तुभ्यं दास्यामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव॥

भावार्थ – ‘हे भगवान् केशव! पधारिये, देव! मैं आपका पूजन करूँगा। आपकी सेवा में तुलसी को समर्पित करूँगा। आप मेरे समस्त मनोरथों को पूर्ण करें।’

इस प्रकार आवाहन के पश्चात् तीन-तीन बार अर्घ्य, पाद्य एवं विष्टर, अर्थात् कुशा का आसन का उच्चारण करके इन्हें क्रमशः भगवान को समर्पित करें। अनन्तर आचमनीय पद का तीन बार उच्चारण करके भगवान को आचमन करावें। तदुपरान्त कांस्य के पात्र में दही, घी एवं मधु रखकर उसे कांस्य के पात्र से ही ढक दें तथा भगवान को अर्पण करते हुये कहें – ‘हे वासुदेव! आपको नमस्कार है, यह मधुपर्क ग्रहण कीजिये।’ तदनन्तर हरिद्रालेपन एवं अभ्यङ्ग कार्य सम्पन्न करके गोधूलि बेला में तुलसी एवं श्रीविष्णु का पूजन पृथक्-पृथक् करना चाहिये। दोनों को एक-दूसरे के सम्मुख रखकर मङ्गल पाठ करें। जब भगवान सूर्य कुछ-कुछ दिखायी देते हों, तब कन्यादान का सङ्कल्प करें। अपने गोत्र एवं प्रवर का उच्चारण करके आदि की तीन पीढ़ियों का भी आवर्तन करें। तत्पश्चात् भगवान से इस प्रकार कहे –

अनादिमध्यनिधन त्रैलोक्यप्रतिपालक।
इमां गृहाण तुलसीं विवाहविधिनेश्वर॥
पार्वतीबीजसम्भूतां वृन्दाभस्मनि संस्थिताम्।
अनादिमध्यनिधनां वल्लभां ते ददाम्यहम्॥
पयोघटैश्च सेवाभिः कन्यावद्वर्द्धिता मया।
त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं ददामि त्वं गृहाण भोः॥

भावार्थ – ‘आदि, मध्य एवं अन्त से रहित त्रिभुवन प्रतिपालक परमेश्वर! इस तुलसी को आप विवाह की विधि से ग्रहण करें। यह देवी पार्वती के बीज से प्रकट हुयी है, वृन्दा की भस्म में स्थित रही है तथा आदि, मध्य एवं अन्त से शून्य है। आपको तुलसी अत्यन्त ही प्रिय है, अतः इसे मैं आपकी सेवा में अर्पित करता हूँ। मैंने जल के घड़ों से सींचकर एवं अन्य प्रकार की सेवायें करके अपनी पुत्री की भाँति इसका पालन-पोषण किया एवं बढ़ाया है, आपकी प्रिया तुलसी मैं आपको ही प्रदान कर रहा हूँ। हे प्रभो! आप इसे ग्रहण करें।’

इस प्रकार तुलसी का दान करके पुनः भगवान विष्णु एवं तुलसी का पूजन करें। विवाह का उत्सव मनायें। प्रातःकाल होने पर पुनः तुलसी एवं विष्णु का पूजन करें। अग्नि की स्थापना करके उसमें द्वादशाक्षर मन्त्र से खीर, घी, मधु एवं तिल मिश्रित हवनीय द्रव्य की एक सौ आठ आहुति प्रदान करें। तदुपरान्त स्विष्टकृत् होम करके पूर्णाहुति दें। आचार्य की पूजा करके होम की शेष विधि पूर्ण करें। तदुपरान्त भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करें – ‘हे देव! हे प्रभो! आपकी प्रसन्नता हेतु मैंने यह व्रत किया है। हे जनार्दन! इसमें जो न्यूनता हो, वह आपकी कृपा प्रसाद से पूर्णता को प्राप्त हो जाये।’

यदि द्वादशी में रेवती का चौथा चरण व्यतीत हो रहा हो तो उस समय पारण न करें। उस समय पारण करने वाले का व्रत निष्फल हो जाता है। भोजन के पश्चात् तुलसी के स्वतः गलकर गिरे हुये पत्तों का सेवन कर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। भोजन के अन्त में ऊख, आँवला एवं बेर का फल ग्रहण करने से उच्छिष्ट-दोष मिट जाता है।

तदनन्तर भगवान का विसर्जन करते हुये कहें – ‘हे भगवन्! आप तुलसी सहित वैकुण्ठ धाम में पधारें। हे प्रभो! मेरे द्वारा की हुयी पूजा ग्रहण करके आप सदैव सन्तुष्ट रहें।’ इस प्रकार देवेश्वर भगवान विष्णु का विसर्जन करके मूर्ति आदि सभी सामग्री आचार्य को अर्पण करें। इससे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है।

कार्तिक शुक्ल पक्ष में एकादशी को प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान करके पाँच दिवसीय व्रत ग्रहण करें। बाणशय्या पर शयन करते हुये महात्मा भीष्म ने राजधर्म, मोक्षधर्म तथा दानधर्म का वर्णन किया था, जिसका श्रवण पाण्डवों सहित भगवान श्रीकृष्ण ने भी किया। उससे प्रसन्न होकर भगवान वासुदेव ने कहा – ‘हे भीष्म! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुमने धर्मों का स्वरूप भलीभाँति वर्णित किया है। कार्तिक की एकादशी को तुमने जल के लिये याचना की तथा अर्जुन ने बाण के वेग से गङ्गाजल प्रकट किया, जिससे तुम्हारे तन, मन एवं प्राण सन्तुष्ट हुये। इसीलिये आज से लेकर पूर्णिमा तक तुम्हें सभी लोग अर्घ्यदान से तृप्त करें तथा मुझको सन्तुष्ट करने वाले इस भीष्मपञ्चक नामक व्रत का पालन प्रतिवर्ष करते रहें।’

निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करके सव्यभाव से महात्मा भीष्म के निमित्त तर्पण करना चाहिये। यह भीष्म तर्पण सभी वर्णों के लोगों का कर्तव्य है।

सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने।
भीष्मायैतद् ददाम्यर्घ्यमाजन्मब्रह्मचारिणे॥

भावार्थ – ‘आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले परम पवित्र सत्यव्रतपरायण गङ्गानन्दन महात्मा भीष्म को मैं यह अर्घ्य प्रदान करता हूँ।’

जो मनुष्य पुत्र की कामना से स्त्री सहित भीष्मपञ्चक व्रत का पालन करता है, उसे एक वर्ष के भीतर ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। जो भीष्मपञ्चक व्रत का पालन करता है, उसके द्वारा सभी प्रकार के शुभ कृत्यों का पालन स्वतः ही हो जाता है। यह महापुण्यमय व्रत महापातकों को नष्ट करने वाला है। अतः मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक इसका अनुष्ठान करना चाहिये। इसमें भीष्मजी के लिये जलदान एवं अर्घ्यदान विशेष यत्न से करना चाहिये। जो निम्नोक्त मन्त्र से भीष्मजी के निमित्त अर्घ्यदान करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। अर्घ्य-मन्त्र इस प्रकार है –

वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतप्रवराय च।
अपुत्राय ददाम्येतदुदकं भीष्मवर्मणे॥
वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च।
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे॥

भावार्थ – ‘जिनका व्याघ्रपद गोत्र एवं सांकृत प्रवर है, उन पुत्ररहित भीष्मवर्मा को मैं यह जल प्रदान करता हूँ। वसुओं के अवतार, शन्तनु के पुत्र, आजन्म ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य प्रदान करता हूँ।’

पञ्चगव्य, सुगन्धित चन्दन के जल, चन्दन, उत्तम गन्ध तथा कुंकुम के द्वारा भक्तिपूर्वक सर्वपापहारी श्रीहरि का पूजन करें। कर्पूर एवं खस मिश्रित कुंकुम से भगवान गरुडध्वज के अङ्गों में लेप करें। सुन्दर पुष्प एवं गन्ध, धूप आदि के द्वारा भगवान की अर्चना करें। पाँच दिवस तक भगवान के समीप दिन-रात दीप प्रज्वलित करते रहें। देवाधिदेव भगवान के लिये उत्तमोत्तम नैवेद्य निवेदन करें। इस प्रकार भगवान की पूजा-अर्चना, ध्यान एवं नमस्कार के पश्चात् “ॐ नमो वासुदेवाय।” मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करें। तदुपरान्त घी मिश्रित तिल, चावल एवं जौ आदि के द्वारा स्वाहा विशिष्ट षडक्षर “ॐ रामाय नमः।” मन्त्र से आहुति प्रदान करें।

तदनन्तर सायाह्न सन्ध्या करके भगवान विष्णु को प्रणाम करें तथा पूर्ववत् मन्त्र जपकर भूमि पर ही शयन करें। भक्तिपूर्वक भगवान में ही मन को लगावें। व्रत के समय बुद्धिमान पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते हुये पापपूर्ण विचार तथा पाप के कारणभूत मैथुन का परित्याग करें। शाकाहार तथा मुनियों के अन्न से निर्वाह करते हुये सदैव भगवान विष्णु के पूजन में तत्पर रहें। रात्रि में पञ्चगव्य लेकर भोजन करें। इस प्रकार भलीभाँति व्रत का समापन करें। ऐसा करने से मनुष्य को शास्त्रोक्त फल प्राप्त होता है। स्त्रियों को अपने पति की आज्ञा लेकर पुण्य की वृद्धि करनी चाहिये। विधवाओं को भी मोक्ष सुख की वृद्धि के लिये व्रत का अनुष्ठान करना चाहिये।

पूर्वकाल में अयोध्यापुरी में एक अतिथि नाम के राजा थे। उन्होंने ऋषि वसिष्ठ जी के वचन से इस परम दुर्लभ व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप इस लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्त में वे भगवान विष्णु के परम धाम में प्रतिष्ठित हुये। इस प्रकार नियम, उपवास एवं पञ्चगव्य से तथा दुग्ध, फल, मूल एवं हविष्य के आहार से निर्वाह करते हुये भीष्मपञ्चक व्रत का पालन करें। पौर्णमासी आने पर पहले की भाँति पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन करावें तथा सवत्सा अर्थात् बछड़े सहित गौ का दान करें। एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक पञ्च दिवसीय भीष्मपञ्चक व्रत समस्त भूमण्डल में विख्यात है। अन्न भोजन करने वाले पुरुष के लिये यह व्रत नहीं कहा गया है, क्योंकि इस व्रत में अन्न का निषेध है। इस व्रत का पालन करने पर भगवान विष्णु शुभ फल प्रदान करते हैं।’

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का चतुर्दश अध्याय पूर्ण हुआ ॥


पन्द्रहवाँ अध्याय – एकादशी पर भगवान को जगाने की विधि, कार्तिक व्रत का उद्यापन तथा अन्तिम तीन तिथियों की महिमा सहित ग्रन्थ का उपसंहार

ब्रह्माजी कहते हैं – ‘जो पुरुष कार्तिक मास में प्रतिदिन पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा अथवा पाञ्चरात्र आगम में वर्णित विधि के अनुसार भगवान विष्णु का पूजन करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। जो कार्तिक में “ॐ नमो नारायणाय।” मन्त्र से भगवान श्रीहरि की आराधना करता है, वह नरक के दुःखों से मुक्त हो, रोग-शोक से रहित वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है। कार्तिक मास में जो मनुष्य विष्णुसहस्रनाम तथा गजेन्द्रमोक्ष का पाठ करता है, उसका पुनः संसार में जन्म नहीं होता। सुव्रते! जो कार्तिक मास में रात्रि के पिछले पहर में भगवान की स्तुति का गान करता है, वह पितरों सहित श्वेतद्वीप में निवास करता है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शङ्खासुर दैत्य का संहार किया गया है। अतः उसी दिन से आरम्भ करके भगवान चार मास तक क्षीरसागर में शयन करते हैं तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इस कारण वैष्णवों को एकादशी में निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करके भगवान को जगाना चाहिये –

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमङ्गलं कुरु॥

भावार्थ – ‘हे गोविन्द! उठिये, उठिये, हे गरुड़ध्वज! उठिये, हे कमलाकान्त! निद्रा का त्याग कर तीनों लोकों का मङ्गल कीजिये।’

इस प्रकार प्रभु से प्रार्थना करके प्रातःकाल शङ्ख एवं नगाड़े आदि का वादन करें। वीणा, वेणु एवं मृदङ्ग आदि की मधुर ध्वनि सहित नृत्य-गायन एवं कीर्तन आदि करें। देवेश्वर श्रीविष्णु को उठाकर उनका पूजन करें तथा सायंकाल में तुलसी की वैवाहिक विधि को सम्पन्न करें। एकादशी सदा ही परम पवित्र है, विशेषतः कार्तिक की एकादशी परम पुण्यमयी मानी गयी है। उत्तम बुद्धि वाला मनुष्य वृद्ध माता-पिता का विधिपूर्वक पूजन करके अपनी पत्नी के साथ भगवान विष्णु के प्रसाद को ग्रहण करें। जो इस प्रकार विधि से द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करता है, वह मनुष्य उत्तम सुखों का उपभोग करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है। हे मुनिश्रेष्ठ! जो मनुष्य द्वादशी तिथि के इस परम उत्तम पुण्यमय माहात्म्य का पाठ अथवा श्रवण करता है, वह उत्तम गति को प्राप्त होता है।

अब मैं कार्तिक व्रत के उद्यापन का वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। व्रत का पालन करने वाले मनुष्य कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को व्रत की पूर्ति एवं भगवान विष्णु की प्रीति हेतु उद्यापन करें। तुलसी के ऊपर एक सुन्दर मण्डप बनवायें। उसे केले के खम्भों से संयुक्त करके नाना प्रकार की धातुओं से शोभायमान करें। मण्डप के चारों ओर सुन्दर रूप से दीपकों की श्रेणी से सुसज्जित करें। उस मण्डप में सुन्दर बन्दनवारों से सुशोभित चार द्वार बनावें तथा उन्हें पुष्पों एवं चँवर से सुसज्जित करें। द्वारों पर पृथक्-पृथक् मिट्टी के द्वारपाल निर्मित कर उनकी पूजा-अर्चना करें। उन द्वारपालों के नाम इस प्रकार हैं – जय, विजय, चण्ड, प्रचण्ड, नन्द, सुनन्द, कुमुद एवं कुमुदाक्ष। उन्हें चारों द्वारों पर दो-दो के क्रम से स्थापित कर भक्तिपूर्वक पूजन करें। तुलसी की जड़ के समीप चार रंगों से सुशोभित सर्वतोभद्रमण्डल की रचना करें तथा उसके ऊपर पूर्णपात्र, अर्थात् चावल से भरे एक कलश तथा पञ्चरत्न से संयुक्त कलश की स्थापना करें। कलश के ऊपरशङ्ख, चक्र एवं गदाधारी भगवान विष्णु को विराजमान कर उनका पूजन करें। भक्तिपूर्वक उस तिथि में उपवास करें तथा रात्रि में गायन, वादन, कीर्तन आदि मङ्गलमय आयोजनों सहित जागरण करें। जो भगवान विष्णु के लिये जागरण करते समय भक्तिपूर्वक भगवत्सम्बन्धी पदों का गान करते हैं, वे सैकड़ों जन्मों की पापराशि से मुक्त हो जाते हैं।

तदुपरान्त पूर्णमासी में एक सपत्नीक ब्राह्मण को निमन्त्रित करें। प्रातःकाल स्नान एवं देवपूजन करके वेदी पर अग्नि की स्थापना करें तथा “अतो देव…” इत्यादि मन्त्रों के द्वारा देवाधिदेव भगवान की प्रीति हेतु तिल एवं खीर की आहुति दें। होम की शेष विधि पूर्ण करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों का पूजन करें तथा उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें। भगवान द्वादशी तिथि को शयन से उठे, त्रयोदशी को देवताओं से मिले तथा चतुर्दशी को सभी ने उनका दर्शन एवं पूजन किया, इसीलिये उस तिथि में भगवान की पूजा करनी चाहिये। गुरु की आज्ञा से भगवान विष्णु की सुवर्णमयी प्रतिमा का पूजन करें। इस पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर तीर्थ की यात्रा श्रेष्ठ मानी गयी है। हे नारद! कार्तिक मास में इस विधि का पालन करना चाहिये। जो इस प्रकार कार्तिक के व्रत का पालन करते हैं, उन्हें उत्तम फल की प्राप्ति होती है तथा वे धन्य एवं पूजनीय हैं। जो भगवान विष्णु की भक्ति में तत्पर होकर कार्तिक में व्रत का पालन करते हैं, उनके शरीर में स्थित सभी पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो श्रद्धापूर्वक कार्तिक के उद्यापन का माहात्म्य श्रवण करता एवं अन्यों को कराता है, उसे भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त होता है।

भगवान विष्णु की पूजा में रात्रिकालव्यापिनी चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिये तथा अरुणोदय के समय भगवान शिव की पूजा करनी चाहिये। सायंकाल काशी के पञ्चगङ्गा तीर्थ में स्नान करके भगवान बिन्दुमाधव की पूजा करें। सर्वप्रथम विष्णुकांची में स्नान करके भगवान अनन्तसेन की पूजा करें। तदुपरान्त रुद्रकांची में स्नान करके एवं ओंकारेश्वर के अग्नि तीर्थ में स्नान कर भगवान नारायण की, रेतोदक में स्नान करके केदारेश्वर की, प्रयाग की यमुना में स्नान कर भगवान वेणीमाधव की तथा तदनन्तर गङ्गा में स्नान करके संगमेश्वर की पूजा करें। जो इस प्रकार पूजन करता है, समस्त प्रकार की सम्पत्तियाँ उसके अधीन हो जाती हैं।

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में जो अन्तिम तीन पुण्यमयी तिथियाँ हैं, वे त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा कल्याण करने वाली मानी गयी हैं। उनकी अति पुष्करिणी संज्ञा है। वे समस्त पापों का नाश करने वाली हैं। जो पूरे कार्तिकमास में स्नान करता है, वह इन्हीं तीन तिथियों में स्नान करके पूर्ण फल का भागी होता है। त्रयोदशी में समस्त वेद जाकर प्राणियों को पवित्र करते हैं, चतुर्दशी में यज्ञ एवं देवता समस्त जीवों को पावन करते हैं तथा पूर्णिमा में भगवान विष्णु से अधिष्ठित सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थ ब्रह्मघाती एवं मद्यप, अर्थात् शराबी आदि सभी पापी प्राणियों को शुद्ध करते हैं। जो गृहस्थ उक्त तीन तिथियों में ब्राह्मण कुटुम्ब को भोजन कराता है, वह अपने समस्त पितरों का उद्धार करके परम पद को प्राप्त होता है। जो कार्तिक के अन्तिम तीन दिनों में गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। जो उक्त तीनों दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, वह जल से कमल के पत्तों की भाँति पापों से कभी लिप्त नहीं होता। ऐसा करने वाले कुछ मनुष्य देवता तथा कुछ सिद्ध हो जाते हैं।

कार्तिक मास की अन्तिम तीन तिथियों में समस्त पुण्यों का उदय होता है। उनमें भी पूर्णिमा का महत्त्व विशेष है। पूर्णिमा को प्रातःकाल उठकर शौच स्नानादि से निवृत्त हो समस्त नित्यकर्मों की समाप्ति करके भगवान विष्णु का पूजन करें। वाटिका में अथवा घर पर भगवद्भक्त पुरुष कार्तिक पूर्णिमा के दिन मण्डप का निर्माण करें। उसे केले के खम्भों से सुशोभित करें। उसमें आम के पल्लवों की बन्दनवार लगायें तथा ऊख के दण्ड खड़े करके उस मण्डप को सुसज्जित करें। तदुपरान्त विचित्र वस्त्रों से मण्डप को अलङ्कृत करके उसमें भगवान विष्णु की पूजा करें। पवित्र, चतुर, शान्त, ईर्ष्यारहित, साधु, दयालु, उत्तम वक्ता तथा श्रेष्ठ बुद्धिवाला पुराणज्ञ विद्वान वहाँ बैठकर पवित्र कथा का वाचन करें। पौराणिक विद्वान जब व्यासासन पर विराजमान हो जाये, तब से लेकर उस प्रसङ्ग की समाप्ति होने तक किसी को नमस्कार न करें। जहाँ दुष्ट मनुष्य भरे हुये हों, जो शूद्र एवं हिंसक प्राणियों से घिरा हुआ हो अथवा जहाँ जुये का अड्डा हो ऐसे स्थान में बुद्धिमान पुरुष पुण्यकथा का वाचन न करे। जो शुद्ध एवं भक्ति से संयुक्त, अन्य कार्यों की अभिलाषा न रखने वाले, मौन, पवित्र तथा चतुर हों, वे ही श्रोता पुण्य के भागी होते हैं। जो मनुष्य बिना भक्ति के तथा अधम भाव लेकर पवित्र कथा श्रवण करते हैं, उनको पुण्यफल प्राप्त नहीं होता।

मास के अन्त में गन्धमाल्य, वस्त्राभूषण तथा धन के द्वारा भक्तिपूर्वक पौराणिक विद्वान‌ का पूजन करें। जो मनुष्य कल्याणमयी पुराण कथा को सुनाते हैं, वे सौ कोटि कल्पों से अधिक काल तक ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। जो पौराणिक विद्वान को बैठने हेतु कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, चौकी अथवा पलंग दान करते हैं तथा जो पहनने के लिये वस्त्र दान करते हैं, वे ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। यह कार्तिक माहात्म्य समस्त रोगों एवं सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य इस माहात्म्य का भक्तिपूर्वक पाठ करता है तथा जो सुनकर धारण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है। जिसकी बुद्धि खोटी हो तथा जो श्रद्धाहीन हो, ऐसे किसी भी मनुष्य को यह माहात्म्य नहीं सुनाना चाहिये।’

सूतजी कहते हैं – “ब्रह्माजी के मुख से इस प्रकार कार्तिक माहात्म्य की कथा सुनकर नारदजी प्रेम में मग्न हो गये। उन्होंने ब्रह्माजी को बारम्बार प्रणाम किया तथा स्वेच्छानुसार वहाँ से प्रस्थान कर गये।”

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित सूतजी एवं ऋषिगणों के सम्वाद के अन्तर्गत कार्तिक मास माहात्म्य का पञ्चदश अध्याय पूर्ण हुआ ॥

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