Ravi Pradosh Vrat Katha - रवि प्रदोष व्रत कथा
व्रत कथा

Ravi Pradosh Vrat Katha – रवि प्रदोष व्रत कथा

Ravi Pradosh Vrat Katha – रवि प्रदोष व्रत कथा

रवि प्रदोष व्रत कथा – निर्धन ब्राह्मण के धनवान होने की कथा

प्राचीन काल में एक समय ऋषियों ने भागीरथी के पवित्र तट पर एक विशाल गोष्ठी का आयोजन किया। यह गोष्ठी सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणियों के कल्याण के उद्देश से आयोजित की गयी थी। उन ऋषियों की विशाल सभा में श्री व्यासजी के प्रतिष्ठित शिष्य श्री सूतजी भगवन्नाम का गायन करते हुये उपस्थित हुये। सूतजी के दर्शन होते ही शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनियों ने उन्हें साष्टङ्ग प्रणाम किया। सूतजी से आशीर्वाद प्राप्त कर सभी शिष्यों ने आसन ग्रहण किया।

वहाँ उपस्थित ऋषिगणों ने सूतजी से जिज्ञासा प्रकट करते हुये प्रश्न किया – “हे परम ज्ञानी सूतजी महाराज! कलियुग में समस्त प्राणी धर्म-कर्म, वेद-शास्त्र आदि से रहित होकर अधर्म एवं पापाचरण करेंगे। जिसके कारण उनके पुण्य क्षीण हो जायेंगे और वे कष्ट भोगेंगे। अतः ऐसी दुर्गम स्थिति में भगवान शिव की भक्ति किस उपासना के माध्यम से सुलभ होगी? ऐसा कौन सा श्रेष्ठ व्रत है जिससे धर्मावम्बलम्बियों के समस्त मनोरथ सिद्ध होंगे, कृपया वर्णन करें।”

ऋषिगणों का लोकहितकारी प्रश्न सुनकर सूतजी बोले – “हे शौनक आदि मुनिश्रेष्ठों आप सभी धन्य हैं, आपने अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं जनहितकारी प्रश्न किया है। आपने समस्त प्राणियों के कल्याणार्थ यह प्रश्न किया है, अतः हे मुनिगणों! मैं आपके समक्ष एक अत्यन्त उत्तम व्रत का विधान वर्णित करता हूँ। इस व्रत को करने से सभी प्रकार के पापों का शमन होता है। यह व्रत समस्त दुखों का निवारण करके सुख, शान्ति, समृद्धि तथा सन्तान आदि प्रदान करने वाला है। इस व्रत का उपदेश भगवान शिव ने देवी सती को किया था। तदुपरान्त उनसे इस व्रत का उपदेश मेरे पूज्य गुरुदेव को तथा गुरुदेव से मुझे प्राप्त हुआ है।”

व्रत का विधान वर्णित करते हुये सूतजी कहते हैं कि – “प्रातःकाल स्नानादि दैनिक कर्मों से निवृत होकर भगवान शिव का ध्यान करें। निराहार रहते हुये किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव का पूजन करें। पूजनोपरान्त अर्द्ध पुण्ड त्रिपुण्ड तिलक धारण करें। शिव जी को बेलपत्र, धूप, दीप, अक्षत तथा ऋतुफल आदि अर्पित कर पूजन करें। रुद्राक्ष की माला द्वारा ‘ॐ नमः शिवाय’ मन्त्र का जाप करें। तदुपरान्त ब्राह्मण भोज कराकर सामर्थ्यानुसार दक्षिणा प्रदान करें। तत्पश्चात् मौन व्रत का पालन करें। मिथ्याभाषण न करें, भूमिशयन करें तथा एक समय ही भोजन ग्रहण करें। ‘ॐ ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा’ मन्त्र से आहुति प्रदान कर हवन करें। इस प्रकार व्रत करने से समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं। श्रावण माह में यह व्रत उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। हे मुनिगणों! इस प्रदोष व्रत का वर्णन भगवान शिव ने सती जी के समक्ष तथा श्री वेदव्यास ऋषि ने मेरे समक्ष किया था।”

शौनकादि ऋषि बोले – “हे मुनिश्रेष्ठ! आपने इस परम मङ्गलकारी, दुःखनाशक तथा गोपनीय व्रत का वर्णन किया है। कृपापूर्वक यह बतायें कि यह व्रत किसने किया तथा उसे क्या फल प्राप्त हुआ?” श्री सूतजी ने कहा – “हे विद्वान मुनिजनों! आप भगवान शिव के अनन्य भक्त हैं, आपके इस भक्तिपूर्वक आग्रह पर मैं इस व्रत को करने वाले भक्तों की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करें –

एक ग्राम में एक अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी पत्नी अति धर्मात्मा थी तथा श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत का पालन करती थी। उसका एक पुत्र था। एक समय उसका पुत्र गङ्गा स्नान करने हेतु जा रहा था। संयोगवश मार्ग में उसे डाकुओं ने घेर लिया तथा उससे कहने लगे – ‘तू हमें अपने पिता के गुप्त धन के विषय में बता दे अन्यथा हम तेरी हत्या कर देंगे।’ वह बालक भयभीत हो बोला – ‘हे बन्धुओं! हम अति दीन-हीन, निर्धन तथा दुखी हैं। भला हमारे समीप धन-सम्पत्ति कैसे हो सकती है?’

उनमें से एक डाकू ने पूछा – ‘तेरी इस पोटली में क्या है?’ वह बालक निष्कपट होकर बोला कि – ‘मेरी माँ ने मेरे लिये रोटी बाँध कर दी है।’ उसी समय एक अन्य डाकू ने कहा – ‘यह बालक तो अत्यन्त दीन-हीन है, इसे मुक्त कर देना चाहिये।’ अन्ततः सर्वसम्मति से वे वहाँ से चले गये।

डाकुओं से मुक्त होकर वह बालक एक नगर के समीप पहुँच गया। वहाँ एक बरगद का वृक्ष था, वह बालक थककर उस वृक्ष की छाया में शयन करने लगा। उस नगर के सैनिक डाकुओं की खोज करते-करते उस बालक के समक्ष पहुँचे। अज्ञात होने के कारण सैनिकों ने उस बालक को चोर समझ लिया तथा उसे बन्दी बनाकर राजा के दरबार में उपस्थित किया। राजा ने उसे कारावास का दण्ड दे दिया।

उधर बालक की माँ भगवान शिव के प्रदोष व्रत का पालन कर रही थी। माँ मन ही मन शिव जी से यह प्रार्थना कर रही थी कि उसका पुत्र गङ्गा स्नान करके सकुशल लौट आये। माँ द्वारा भक्तिपूर्वक किये गये उस व्रत के फलस्वरूप उसी रात्रि में राजा को एक स्वप्न दिखायी दिया कि वह बालक निर्दोष है तथा यदि प्रातःकाल ही उसे मुक्त नहीं किया गया तो राजा का सम्पूर्ण राज्य-वैभव शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

प्रातःकाल होते ही राजा ने सर्वप्रथम उस बालक से जाकर सम्पूर्ण वृतान्त वर्णित करने का आग्रह किया। बालक ने राजा को मार्ग में डाकुओं से भेंट एवं अपनी निर्धनता का सम्पूर्ण वृतान्त राजा के समक्ष वर्णित कर दिया। राजा ने सैनिकों को भेजकर उस बालक के माता-पिता को अपने समक्ष बुलवाया। उस बालक का पिता वह निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी सहित भयभीत होते हुये दरबार में उपस्थित हुआ। राजा ने ब्राह्मण से कहा – ‘आप निश्चिन्त रहें, आपका पुत्र निरपराध है। हम आपकी यह दीन-हीन स्थिति देखकर आपको जीवन-यापन हेतु पाँच ग्राम दान करते हैं।’ भगवान शिव की अनुकम्पा से वह ब्राह्मण अपने कुटुम्ब सहित आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।

इसी प्रकार जो भी इस व्रत को भक्ति-भाव एवं श्रद्धापूर्वक करता है उसे सदैव आनन्द की प्राप्ति होती है।”

॥इति श्री रवि प्रदोष व्रत कथा सम्पूर्णः॥

Leave a Reply