Varda Chaturthi Vrat Katha - वरदा चतुर्थी व्रत कथा
व्रत कथा

Varda Chaturthi Vrat Katha – वरदा चतुर्थी व्रत कथा

Varda Chaturthi Vrat Katha – वरदा चतुर्थी व्रत कथा

वरदा चतुर्थी व्रत कथा – राजा सुषेण के राज्य में सर्पों के आक्रमण एवं उससे मुक्ति की कथा

राजा दशरथ ने मुनि वशिष्ठ से कहा कि – “हे गुरुवर! मलमास में जो वरदायक चतुर्थी आती है, उसके सिद्धिदायक माहात्म्य का वर्णन करने की कृपा करें।”

वशिष्ठ मुनि ने कहा – “हे राजन्! आपकी तृप्ति हेतु मैं चतुर्थी तिथि से सम्बन्धित पुरातन कथानक का वर्णन करता हूँ। यह माहात्म्य अत्यन्त महिमाशाली एवं सभी मनोरथों की सिद्धि करने वाला है। हे राजन्! तुम ध्यानपूर्वक श्रवण करो –

हे राजन्! पूर्वकाल में आन्ध्र प्रदेश में राजा सुषेण धर्मपूर्वक शासन करते थे। वे राजा चम्पक नगर में निवास करते थे। राजा सुषेण विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में पारङ्गत थे। वे नीतिपूर्वक एवं धर्मपूर्वक शासन करते थे, जिसके कारण उनका यश संसार में प्रकाशित हो गया। राजा ने अपनी दानशीलता से ख्याति अर्जित कर ली थी तथा वे विभिन्न प्रकार व्रत आदि का पालन करते थे। उन्होंने अपने पराक्रम से सम्पूर्ण भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर ली, इसीलिये समस्त राजा उनकी सेवा करते थे।

कालान्तर में एक समय राजा सुषेण के राज्य में विषधर सर्पों ने आक्रमण कर दिया। अत्यन्त भयङ्कर विषैले सर्प राज्य में प्रत्येक स्थान पर विचरण करते हुये मनुष्यों को डस लेते थे। अनेक मनुष्य सर्पदंश के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गये। वे मनुष्य अपना राज्य त्याग नहीं सकते थे, अतः विवश होकर उनमें से कुछ वनों में तथा कुछ अपने घरों में ही निवास कर रहे थे।

अपनी प्रजा की इस स्थिति से राजा सुषेण भी अत्यन्त व्याकुल एवं भयभीत हो गये। नागों की शान्ति हेतु सभी मनुष्यों ने नाग पञ्चमी व्रत की साधना की तथा श्रद्धापूर्वक व्रत एवं अनुष्ठान किया। किन्तु नाग पञ्चमी व्रत का अनुष्ठान करने पर भी परम दारुण सर्पों का प्रकोप शान्त नहीं हुआ। नाना प्रकार के पुण्य तीर्थों आदि में स्नान एवं पूजन करने पर वे सर्प शान्त नहीं हुये। उन सर्पों को शान्त करने हेतु जितने अधिक उपाय किये जाते, वे क्रूर नाग उतना अधिक भीषण प्रकोप उस राज्य में कर रहे थे। उन सर्पों की सङ्ख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही थी तथा वे सम्पूर्ण राज्य में यहाँ-वहाँ रेंग रहे थे।

तदुपरान्त इस घोर सङ्कट के निवारण हेतु राजा अपने गुरु ऋषि जैमिनि के समीप गये। ऋषि जैमिनि ने आसनादि प्रदान कर उनका सम्मान किया। उनके गुरु जैमिनि ने विनयपूर्वक राजा से पूछा कि – ‘हे राजन्! तुम्हारे यहाँ आगमन का क्या कारण है?’

राजा सुषेण ने कहा – ‘हे स्वामिन्! मेरे राज्य में अपार सर्प उत्पन्न हो गये हैं, जिनके कारण अनेकों मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। अतः हे महामुने! उन भयङ्कर विषधर सर्पों के प्रकोप से मेरी प्रजा राज्य से विस्थापन हेतु विवश हो गयी है। हमने नाना प्रकार के उपाय किये, नाग पञ्चमी व्रत का अनुष्ठान भी किया, किन्तु वे भीषण सर्प शान्त नहीं हुये। अतः हे महाभाग! हम इस घोर सङ्कट के निवारण हेतु आपकी शरण में आये हैं। हे प्रभो! हम इन विषधर सर्पों की शान्ति हेतु हम क्या करें? हे विप्र! यदि आप हमें इस समस्या का समाधान नहीं प्रदान करेंगे तो आपके चरणों में ही अपनी देह त्याग दूँगा।’

जैमिनि मुनि ने राजा सुषेण से कहा – ‘हे पापी! तुम्हारे राज्य में चतुर्थी का व्रत समाप्त हो गया है, जिसके कारण तुम्हारे राज्य पर यह आपदा आयी है। चतुर्थी व्रत के लोप के कारण तुम सभी अन्त समय में नरक के काष्ठ भोगोगे। यह शुक्लपक्ष की चतुर्थी धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाली है, इसीलिये यह चतुर्थी वरदा कही गयी है। कृष्णपक्ष की चतुर्थी को सङ्कट नाश करने वाली होने के कारण संकष्टी कही जाती है। यदि सभी कार्यों के आरम्भ में यह व्रत नहीं किया तो सभी कर्म निरर्थक हो जायेंगे तथा मनुष्य चारों पुरुषार्थों से रहित हो जायेगा। अतः चतुर्थी व्रत का पालन अवश्य करना चाहिये।’ ऐसा कहकर मुनिवर ने चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया।

माहात्म्य श्रवण करके राजा सुषेण ने जैमिनि मुनि से कहा – ‘हे गुरुवर! यह भगवान गणेश का उत्तम व्रत कैसा है? अतः कृपया आप उनके स्वरूप का वर्णन करें, मैं निरन्तर उन महाप्रभु गणेश की आराधना करूँगा।’

जैमिनि मुनि ने कहा कि – ‘हे राजन्! भगवान गणेश के स्वरूप का वर्णन करना तो असम्भव है। वे ढुण्ढि तो प्रथम पूज्य की उपाधि से युक्त हैं। अब मैं तत्वरूप से वर्णन करता हूँ, तुम श्रवण करो। प्राचीनकाल में योगशान्ति प्राप्त करने हेतु में महर्षि वेदव्यास जी की शरण में गया। मेरी जिज्ञासा शान्त करने हेतु साक्षात् भगवान नारायण के स्वरूप वेदव्यास जी ने मुझसे जो कहा, उसी का वर्णन में अब तुम्हारे समक्ष कर रहा हूँ।

देह एवं आत्मा से युक्त यह समस्त संसार गकार अक्षर वाचक है, अर्थात् ‘ग’ का अर्थ हैं, देह एवं आत्मा से युक्त सभी प्राणी तथा णकार वाचक वह ब्रह्म है जो संयोग एवं अयोग रूप वाला है, अर्थात् निराकार ब्रह्म है। अतः ‘ग’ का अर्थ है सकार जगत् तथा ‘ण’ का अर्थ है निराकार ब्रह्म, अर्थात् आत्मा एवं परमात्मा। उन दोनों के स्वामी गणेश हैं तथा चित्त में निवास करने के कारण उनको चिन्तामणि कहा जाता है।’ ऐसा कहकर जैमिनि मुनि ने राजा सुषेण को विधिवत् रूप से गणेश जी का षडक्षर मन्त्र प्रदान किया है।

तदुपरान्त उन मुनि जैमिनि की आज्ञा लेकर राजा अपने राज्य को चले गये। सर्वप्रथम वहाँ मलमास का माह आता है, जिसे अधिक मास भी कहते हैं। मलमास में भगवान गणेश की वरदा नामक शुक्लपक्ष की चतुर्थी आ गयी तथा राजा ने श्रद्धापूर्वक शुक्ल चतुर्थी का व्रत किया। तदनन्तर राज्य के सभी मनुष्यों ने पूर्ण विधि-विधान से चतुर्थी व्रत का पालन किया। राजा ने यत्नपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डल पर इस महिमाशाली व्रत को प्रसिद्ध कर दिया तथा सभी मनुष्य उस व्रत को निष्ठापूर्वक करने लगे।”

वशिष्ठ जी कहते हैं – “हे राजा दशरथ! उस व्रत के पुण्य प्रभाव से राज्य से सभी सर्प चले गये। सभी मनुष्य सुख-सौभाग्य, सन्तति तथा आरोग्य से युक्त हो गये। गणेश जी के चमत्कार से प्रभावित होकर राजा सुषेण अहर्निश भाव से भगवान गणेश की आराधना करने लगे। वे गणेश जी के षडक्षर मन्त्र से विधिवत् उनकी साधना में लीन हो गये। तदनन्तर राजा सुषेण ने अपना सिंहासन अपने पुत्र को प्रदान कर दिया तथा स्वयं पत्नी सहित वन में जाकर गणेश का ध्यान करने एवं जप करने लगे। अन्त समय में राजा सहित सभी व्रतधारी व्रत के पुण्यफल से स्वानन्दवासी होकर ब्रह्मलीन हो गये। इस व्रत के प्रभाव से कुछ भी कठिन नहीं है।

हे नृपश्रेष्ठ! इस व्रत से सम्बन्धित एक अन्य पुण्य माहात्म्य का वर्णन श्रवण करो। यह माहात्म्य अत्यन्त चतुर्थी व्रत का यह माहात्म्य सर्वस्व प्रदान करने वाला है। हे राजन! हस्तिनापुर में एक अत्यन्त क्रूर एवं स्त्रीलम्पट क्षत्रिय निवास करता था। वह बाल्यकाल से ही अधर्माचरण में प्रवृत्त रहता था।

धन के लोभ में उसने अपने पिता की हत्या कर दी तथा पूर्णतः चौरकर्म करने लगा। वह अधर्मी नित्य इस प्रकार के पापकर्म करता था। धन के अधिकाधिक लोभ एवं वैश्यागमन आदि के कारण उसने वन में अनेकों मनुष्यों की हत्या कर दी। परन्तु एक समय उस दुष्ट को वन में एक विषैले सर्प ने डस लिया। सर्पदंश की पीड़ा के कारण व्याकुल होकर वह घर चला गया। सर्प का विष उसके पूर्ण शरीर में फैल गया एवं वह धराशायी हो गया। सर्पदंश से मूर्च्छित हो जाने के कारण उस दिन वह निराहार रहा एवं अन्न-जल ग्रहण करने से वञ्चित रहा। दैवयोग से उस दिन मलमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि थी। अज्ञानता में उसने चतुर्थी व्रत का पालन कर लिया। तदनन्तर पञ्चमी तिथि को उस सघन वन में वह पापी मृत्यु को प्राप्त हो गया। अज्ञानता में किये हुये व्रत के प्रभाव से वह दुष्ट स्वानन्दकपुर में गया तथा वहाँ भगवान गणेश का दर्शन प्राप्त करके ब्रह्मलीन हो गया।

इस प्रकार अनेकों मनुष्य इस व्रत के पुण्यफल से समस्त सांसारिक सुखों को भोगकर ब्रह्म स्वरूप हो गये। जो मनुष्य चतुर्थी व्रत के इस माहात्म्य का मलमास के शुक्लपक्ष में पाठ अथवा श्रवण करता है, उसे सहज में ही समस्त पुण्यफल प्राप्त हो जाता है।”

॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित मलमास शुक्लपक्ष चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥

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