Krichra Chaturthi Vrat Katha – कृच्छ्र चतुर्थी व्रत कथा
कृच्छ्र चतुर्थी व्रत कथा – राजा अजात्शत्रु को योगशान्ति की प्राप्ति की कथा
राजा दशरथ ने ऋषि वशिष्ठ से कहा – “हे मुनिवर! भगवान गणेश की कथा श्रवण करके मेरा मन आनन्दित हो रहा है। अतः है महामुने! मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष चतुर्थी के विषय में वर्णन करने की कृपा करें।”
वशिष्ठ मुनि बोले – “हे राजन्! अब मैं मार्गशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि से सम्बन्धित पुरातन इतिहास का वर्णन करता हूँ। पूर्वकाल में पुण्यकीर्ति काशी नगरी के एक राजा हुये थे। उनका नाम अजात्शत्रु था तथा वे सभी शास्त्रों में निपुण थे। राजा अजात्शत्रु देवताओं एवं ब्राह्मणों के पूजक तथा धर्माचरण करने वाले थे। वे सभी का मान-सम्मान करते थे तथा शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार प्रजा का पालन करते थे।
एक समय अकस्मात् ही देवर्षि नारद राजा अजात्शत्रु से भेंट करने हेतु पधारे। राजा ने देवर्षि को प्रणाम कर उनका आदर-सत्कार किया तथा श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा-अर्चना की। राजा स्वयं ही नारद जी के चरणों की सेवा करने लगे तथा प्रसन्नतापूर्वक नारद जी से बोले – ‘हे मुनिवर! आपके पावन चरण-कमलों का दर्शन प्राप्त कर मेरा जीवन एवं मेरे माता-पिता धन्य-धन्य हो गये हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! कृपया आप मुझे आप योगशान्ति प्रदान करने वाला वह दिव्य ज्ञान प्रदान कीजिये, जिससे मनुष्य तत्क्षण लौकिक दुखों से मुक्त हो जाता है।’
राजा के वचन सुनकर गणपति भक्तों में अग्रणी देवर्षि नारद ने प्रसन्नतापूर्वक राजा अजात्शत्रु से कहा – ‘हे राजन्! तुमने उचित प्रश्न किया है। तुम्हारा प्रश्न जन-कल्याणी एवं प्राणियों को ब्रह्मज्ञान प्रदान करने वाला है। अतः तुम श्रवण करो, मैं तुम्हें परम शान्तिदायक योग का ज्ञान प्रदान करता हूँ। हे नृप! मैं जिसका वर्णन करने जा रहा हूँ, वह वही ब्रह्मभूतत्व है, जिसके द्वारा मनुष्य ब्रह्म हो जाता है।’
नारद मुनि ने कहा – ‘हे राजन्! तुम ब्रह्मणस्पति नामक गणेश का भावपूर्वक ध्यान एवं पूजन करो। तदुपरान्त तुम चित्तवृत्ति के निरोध से चिन्तामणि हो जाओगे। “मैं गणेश हूँ! इसमें कोई सन्देह नहीं है। मेरा अस्तित्व क्यों तथा कैसे है?” इन सब का कुछ भान नहीं रहेगा। अर्थात् चित्तवृत्ति के निरोध के समय “मैं गणेश ही हूँ तथा मेरा स्वयं का कुछ अस्तित्व नहीं।” जब ऐसी स्थिति हो जायेगी, उस समय कभी संयोग एवं कभी वियोग की स्थिति होगी। अतः संयोग एवं वियोग दोनों स्थितियों में तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी। हे महाभाग! उन गजानन श्रीगणेश का चतुर्थी नामक व्रत अत्यन्त महान है। तुम्हारे राज्य में यह व्रत नष्ट होने एवं इसका लोप होने के कारण तुम नर्कगामी हो जाओगे। हे राजन्! यह व्रत धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाला तथा वरप्रदायक है। मनुष्य अपने मनोरथों की सफलता हेतु नाना प्रकार के कर्म करता है। परन्तु चतुर्थी व्रत से हीन होकर यदि वह अन्य कोई भी व्रत करता है तो वह सभी निष्फल हो जाते हैं।’
हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर देवर्षि नारद ने चतुर्थी तिथि से सम्बन्धित माहात्म्य का वर्णन किया। तदुपरान्त राजा अजात्शत्रु ने नारद मुनि को भावपूर्वक प्रणाम करके गणेश उपासना एवं व्रत का पुनः वर्णन करने का निवेदन किया। राजा अजात्शत्रु ने कहा – ‘हे देवर्षि! मैंने ब्रह्म के पति ब्रह्मेश श्रीगणेश के माहात्म्य का श्रवण किया। अतः हे सर्वज्ञ! कृपा करके अब आप उनकी उपासना की विधि का वर्णन कीजिये।’
देवर्षि नारद ने कहा – ‘हे राजन्! तुम एकाक्षर विधान से ढुण्ढिराज अर्थात् भगवान गजानन का ध्यान एवं भजन करो। उस भजन के फलस्वरूप तुम्हें भगवान गणेश का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त होगा।’ तदुपरान्त नारद जी ने उपासना विधि सहित राजा को गणेश जी का एकाक्षर मन्त्र, “गं” प्रदान कर दिया तथा वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सर्वप्रथम मार्गशीर्ष (अगहन) के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि आने पर राजा ने विधिपूर्वक उपवास, पूजन तथा ध्यान आदि सहित चतुर्थी व्रत सम्पन्न किया।”
वशिष्ठ मुनि ने कहा – “हे राजन् दशरथ! राजा अजात्शत्रु ने ही नहीं अपितु सभी मनुष्यों ने सर्वफलदायक चतुर्थी व्रत का पालन किया। उसी समय से चतुर्थी व्रत संसार में प्रसिद्ध एवं मान्य हो गया। अतः शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी का व्रत जो अधम नर-नारी नहीं करते हैं, वे ताड़नीय एवं महापापी होते हैं। राजा अजात्शत्रु ने ढुण्ढिराज गणेश का नियमपूर्वक नित्य पूजन सहित श्रद्धापूर्वक भजन किया, जिसके प्रभाव से वे राजा योगियों के स्वामी एवं योगी-सम्मत हो गये।
बहुत समय व्यतीत होने के उपरान्त कालान्तर में भगवान गणेश राजा अजात्शत्रु के सम्मुख साक्षात् प्रकट हुये तथा वरदान माँगने को कहा। राजा ने भक्तिपूर्वक भगवान गजानन की स्तुति एवं पूजा-अर्चना की, जिससे प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन्हें गाणपत्य, अर्थात् अपना अनुयायी एवं भक्त बना लिया। तदुपरान्त राजा को मनोवाञ्छित वर प्रदान कर ढुण्ढिराज गणेश अन्तर्धान हो गये। राजा पुनः अहर्निश भाव से गणेश जी का भजन करने लगे। अन्त में अपनी सम्पूर्ण प्रजा सहित राजा भगवान गणपति को प्राप्त हो गये तथा योगियों के मध्य सम्मानित होकर ब्रह्म में लीन हो गये।”
वशिष्ठ मुनि आगे राजा दशरथ से कहते हैं – “इस प्रकार मार्गशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी का महान् व्रत सम्पन्न हुआ। मैंने मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी व्रत के माहात्म्य का सङ्क्षिप्त वर्णन किया है। हे राजन्! इस कथा के अन्तर्गत सभी को भयमुक्त करने वाली एक अन्य कथा का श्रवण कीजिये जो व्रत के फलस्वरूप एक वेश्या के ब्रह्मभूत होने की कथा है।
एक समय का प्रकरण है, मिथिला में कहीं से सभी मनुष्यों के मन को आकर्षित करने वाली एक वेश्या आ गयी थी। उस वेश्या के रूप-लावण्य का दर्शन कर सभी मनुष्य मोहित हो जाते थे। राजा ने उस वेश्या का अत्यन्त सम्मान किया तथा वेश्या को भी वह राज्य अत्यन्त प्रिय लगा, इसीलिये वह वहीं निवास करने लगी। एक बार तीर्थ गमन करते समय किसी राक्षस की दृष्टि उस वेश्या पर पड़ गयी तथा वह राक्षस वेश्या का अपहरण करके प्रसन्नतापूर्वक अपने निवास स्थान पर ले गया। वेश्या भयभीत होकर तीव्र स्वर में विलाप करने लगी। राक्षस ने अनेक प्रकार से वेश्या को मनाया एवं शान्त करने का प्रयास किया, किन्तु वेश्या निरन्तर शोकाकुल होकर विलाप करती रही। उसी समय शुक्लपक्ष की चतुर्थी आ गयी।
हे राजन! वह वेश्या अत्यन्त दुखी थी, इसीलिये उसने दुख के कारण अन्न तो त्याग ही दिया अपितु जल का सेवन भी नहीं किया। भय, शोक एवं पीड़ा के कारण पञ्चमी तिथि को उस वेश्या की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के उपरान्त भगवान गणेश के दूत उस वेश्या को स्वानन्दकपुर ले गये तथा वह व्रत के पुण्य प्रभाव से ब्रह्मभूत हो गयी।
वेश्या ने अज्ञानता में इस वरदायक व्रत का पालन किया था, जिसके परिणाम स्वरूप वह ब्रह्म में लीन हो गयी। अतः जब अज्ञानतावश व्रत का पालन करने से वह वेश्या ब्रह्मलीन हो गयी, तो जो श्रद्धा, भक्ति एवं ज्ञानपूर्वक इस व्रत का पालन करेगा उसे कितना महान् पुण्य प्राप्त होगा। अतः मार्गशीर्ष मास की शुक्ल चतुर्थी को जो मनुष्य व्रत का पालन करेगा, उसे प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त होगी। इस कथा का श्रवण एवं पाठ करने वाले मनुष्य के भी सभी मनोरथ सिद्ध होंगे।”
॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥




