Labh Chaturthi Vrat Katha – लाभ चतुर्थी व्रत कथा
लाभ चतुर्थी व्रत कथा – राजा सुधन्वा के कुष्ठ-रोग से पीड़ित होने एवं उससे मुक्ति की कथा
वशिष्ठ मुनि ने राजा दशरथ से कहा – “हे राजन्! कार्तिक शुक्ल चतुर्थी सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली है। हे महाभाग! आप ध्यानपूर्वक इस व्रत से सम्बन्धित इतिहास एवं माहात्म्य का श्रवण करें।
प्राचीनकाल में सुधन्वा नामक एक अत्यन्त पराक्रमी राजा थे। वे अत्यन्त नीतिवान, धर्मशील तथा शस्त्र विद्या में निपुण राजा थे। राजा सुधन्वा सदैव सत्य बोलते थे, ब्राह्मणों एवं अतिथियों का सत्कार करते थे तथा सज्जनों द्वारा माननीय थे। राजा सुधन्वा की एक धर्मपत्नी थी जिसका नाम कलावती था। कलावती भी अत्यन्त पतिव्रता थी तथा सदैव धर्माचरण का पालन करती थी। वे परम पराक्रमी राजा सुधन्वा समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन कर रहे थे।
राजा सुधन्वा का वैभव स्वयं भगवान कुबेर के समान था। सभी मन्त्री आदि सदैव उनके अधीन रहते थे। किन्तु दैवयोग से आधी आयु व्यतीत होने पर ही राजा कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गये। जिस प्रकार शूल से प्रहार करने पर पीड़ा होती है, वैसी पीड़ा राजा को होने लगी। राजा ने नाना प्रकार की औषधियों का सेवन किया, किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। तदुपरान्त अनेकों प्रकार के तन्त्र-मन्त्र तथा टोटके आदि का प्रयोग किया, तब भी कोई लाभ नहीं हुआ। तत्पश्चात् ब्राह्मणों से वेदमन्त्रों द्वारा विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान करवाये, परन्तु राजा के रोग में किञ्चित मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा।
राजा सुधन्वा ने विभिन्न तीर्थों में स्नान, दान एवं तर्पण आदि कर्म किये, किन्तु उनके रोग में और अधिक वृद्धि होती गयी। इतना पीड़ित होने पर राजा को जीवन के प्रति अनासक्ति हो गयी तथा उसने अपने राज्य का भार सचिवों को सौंपते हुये कहा – ‘मेरे पुनः लौटकर आने तक मेरे राज्य का पालन एवं सुरक्षा करना।’ तदुपरान्त अपनी प्रजा को सान्त्वना प्रदान कर अपनी धर्मपत्नी सहित राजा वन की ओर प्रस्थान कर गये। भगवान गणेश का स्मरण करते हुये राजा वन मैं चहुँओर भ्रमण करने लगे। तभी सौभाग्यवश अकस्मात् ही राजा को वन में ऋषि पुलस्त्य का दर्शन हुआ। पुलस्त्य मुनि भगवान ब्रह्मा के पुत्र हैं जिन्हें प्रजापति के रूप में वर्णित किया गया है। राजा ने सपत्नीक श्रद्धापूर्वक मुनिवर को प्रणाम किया।
प्रणाम करते हुये राजा सुधन्वा ने मुनि पुलस्त्य से कहा कि – ‘हे मुनिश्रेष्ठ! न जाने मेरे पूर्वजन्मों के किन पुण्य कर्मों का उदय हुआ है जो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। आपके दर्शन प्राप्त कर मेरा जन्म, मेरे माता-पिता तथा कुल आदि सभी धन्य हो गये हैं।’
राजा के वचन सुनकर पुलस्त्य मुनि ने पूछा – ‘हे राजन्! तुम तो राजनीति के परम ज्ञाता हो। अतः तुम इस वन में किस प्रयोजन से आये हो?’ इस प्रकार प्रश्न करते हुये मुनिवर ने राजा को एक वृक्ष की छाया में आसन प्रदान किया तथा स्वयं भी विराजमान हो गये।
राजा सुधन्वा ने मुनिवर को प्रणाम करते हुये कहा कि – ‘हे महायोगी! आप तो सर्वज्ञ एवं सर्वज्ञाता हैं, कृपया मुझे ये बतायें कि, मैं निरन्तर धर्मपूर्वक शासन कर रहा था। मुझे ज्ञात नहीं कि मेरे पूर्वजन्म के किस पाप के फलस्वरूप मुझे यह कुष्ठ रोग भोगना पड़ रहा है।'”
वशिष्ठ जी ने राजा दशरथ से कहा कि – “सुधन्वा के करुण वचन सुनकर एवं उसे घोर पीड़ा में देखकर महामुनि पुलस्त्य बोले – ‘हे अधम मनुष्य! तुम इस जन्म में किये हुये पाप से अनभिज्ञ होने के कारण कुष्ठ रोग से ग्रसित हुये हो। हे राजन्! आपके राज्य में महान एवं श्रेष्ठ गणेश्वर व्रत नष्ट हो गया है। यह चतुर्थी नामक व्रत विभिन्न प्रकार की श्रेष्ठ सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। चतुर्थी व्रत धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्राप्त करने का सर्वमान्य साधन है। इसी कारण से यह चतुर्थी वरदा एवं संकटा मानी गयी है। सभी प्रकार के व्रत करने से पूर्व यदि आदि में इस व्रत का पालन नहीं किया तो अन्य सभी शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं।’
मुनि पुलस्त्य बोले – ‘हे राजा सुधन्वा! राज्य में सभी वर्णों की प्रजा द्वारा किये गये शुभ एवं अशुभ कर्मों का फल राजा को प्राप्त होता है, इसीलिये तुम्हें यह कुष्ठ रोग प्राप्त हुआ है। तुम्हारी मृत्यु के उपरान्त भी तुम्हें नर्क की प्राप्ति होगी तथा तुम निःसन्देह चारों पुरुषार्थों से विमुख हो जाओगे।’
मुनिवर के वचन सुन व्याकुल मन से करबद्ध निवेदन करते हुये मुनिवर से राजा ने कहा – ‘हे प्रभो! आप समस्त तत्वों के ज्ञाता हैं। आपके वचन निश्चय ही सत्यरूप हैं। किन्तु मुझे इस व्रत का विधि-विधान ज्ञात नहीं है। अतः हे मुनिवर! कृपा करके बतायें कि यह व्रत कैसा है? किस समय किया जाता है तथा इस व्रत में किसका पूजन करना चाहिये? हे प्रभो! मेरे कुष्ठरोग के नाश का उपाय बताने की कृपा करो। मेरे राज्य में जिस चतुर्थी व्रत का लोप हो गया है, मैं स्वयं उसका प्रायश्चित्त करूँगा।’
राजा के इस प्रकार विनयपूर्वक निवेदन करने से पुलस्त्य मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुये तथा राजा सुधन्वा से बोले – ‘तुम “गणेशाय नमः।” मन्त्र का जाप करो। अज्ञानता में किये हुये पाप को प्रायश्चित्त द्वारा नष्ट किया जा सकता है। अतः तुम सभी मनुष्यों सहित इस व्रत का पालन करो। हे राजन्! इस प्रायश्चित्त से अवश्य ही तुम्हारे पाप का शमन हो जायेगा तथा तुम अत्यन्त ही रूपवान हो जाओगे।’ ऐसा कहकर पुलस्त्य मुनि ने राजा के समक्ष व्रत से सम्बन्धित विभिन्न कथाओं का वर्णन किया, जिनका श्रवण कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुये। तदुपरान्त राजा ने बारम्बार प्रणाम करते हुये ऋषिवर का धन्यवाद किया तथा बोला – ‘हे महामते! मेरा जीवन धन्य है जो मुझे इस व्रत के माहात्म्य के श्रवण का अवसर प्राप्त हुआ। हे मुनिश्रेष्ठ! अब श्री गणेश जी के स्वरूप का वर्णन कीजिये। उनके स्वरूप को ज्ञात कर मैं भक्तिपूर्वक उनका ध्यान एवं आराधना करूँगा।’
यह सुनकर भगवान गणेश के शिष्य ऋषि पुलस्त्य ने कहा – ‘हे सुधन्वा! पूर्वकाल में मैंने योगशान्ति की कामना से विभिन्न प्रकार के योग करते हुये शम एवं दम से मन पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया, किन्तु मुझे शान्ति प्राप्त नहीं हुयी। तदुपरान्त मैं भगवान शिव की शरण में गया। भगवान शिव को नमन करते हुये मैंने उनसे श्रेष्ठ योग साधन पूछा।
भगवान शिव ने कहा – ‘हे मुनिवर! आप गणेश को योगशान्ति मय मानो। वे मन एवं वाणी से विहीन भी हैं तथा मन एवं वाणी से युक्त भी हैं। तुम उन्हीं की साधना करो। गणेश जी का मन एवं वाणीमय स्वरूप संप्रज्ञात समाधि वाला है। अतः उसे गकार अक्षर वाला मानो एवं वेद में अवलोकन करो। गणेश जी का जो मन एवं वाणी से विहीन स्वरूप है, उसे असम्प्रज्ञात समाधि वाला एवं णकार अक्षर वाला मानो। इन दोनों शब्दों के योग से गण शब्द बनता है, जिसके स्वामी श्री गणेश जी हैं तथा जिन्हें योगशान्ति से प्राप्त किया जा सकता है। अतः तुम चित्त को नियन्त्रित करके भगवान गणेश की साधना करो।’ ऐसा कहकर भगवान शिव मौन हो गये तथा मैं उन्हें प्रणाम करके साधना हेतु वन में चला गया। मैंने भगवान गणेश के अष्टाक्षर मन्त्र से उनका ध्यान करते हुये चित्त की समस्त वृत्तियों का निग्रह कर भगवान गणेश को प्रसन्न किया। तदनन्तर अल्पकाल में ही मुझे आत्मशान्ति प्राप्त हो गयी। किन्तु मैं उस मन्त्रराज का निरन्तर जाप करता रहा।
इक्कीस वर्ष व्यतीत होने के उपरान्त भक्तवत्सल भगवान गणेश मेरे समक्ष प्रकट हो गये। उनका पुण्यशाली दर्शन प्राप्त कर मैंने उन्हें प्रणाम करते हुये विधिवत् पूजा-अर्चना की तथा आठ अक्षरों वाले दिव्य मन्त्र से उनकी स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर गणपति ने मुझे अपना भक्त बना लिया तथा स्वानन्दपुर को चले गये। तभी से मैं निरन्तर उन गणपति की आराधना कर रहा हूँ।'”
मुनि वशिष्ठ कहते हैं – “हे राजन् दशरथ! इस प्रकार कहकर कृपामूर्ति पुलस्त्य मुनि ने राजा सुधन्वा को अष्टाक्षर गणेश मन्त्र प्रदान कर दिया तथा मन्त्र प्रदान करके मुनिवर वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तदुपरान्त राजा सुधन्वा ने प्रजा सहित इस उत्तम व्रत का पालन किया। कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी को गणेश जी का ध्यान करते हुये व्रत सम्पन्न किया तथा पञ्चमी तिथि को विधिवत् व्रत का पारण किया। राजा ने ब्राह्मणों को दान देकर प्रसन्न किया तथा सभी को अन्न प्रदान किया। उस व्रत के पुण्यफल से राजा कुष्ठरोग से मुक्त हो गये तथा उनका रूप-सौन्दर्य कामदेव के समान हो गया। उनकी प्रजा में जितने भी निःसन्तान, रोगी एवं निर्धन मनुष्य थे, उन सभी के कष्टों का निवारण हो गया तथा सभी सुखी हो गये।
तदुपरान्त राजा ने सम्पूर्ण भूमण्डल पर निष्ठापूर्वक इस व्रत का प्रचार-प्रसार किया, जिसके प्रभाव से सभी मनुष्यों ने शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि पर व्रत करना आरम्भ कर दिया। इस पुण्यदायक व्रत के फलस्वरूप सभी लोग अनेक प्रकार के सुखों से युक्त हो गये तथा आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
कालान्तर में राजा सुधन्वा ने अपने पुत्र को राजसिंहासन सौंप दिया तथा स्वयं एकाग्रचित्त होकर भगवान गणेश की साधना में लीन हो गये। अन्त में राजा स्वानन्दस्थ में स्थित होकर ब्रह्मभूत हो गये, अर्थात् ब्रह्मलीन हो गये। उनके राज्य में सभी मनुष्य भी स्वानन्दवासी हो गये।
हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार समस्त सिद्धियाँ एवं सफलता प्रदान करने वाले इस व्रत का वर्णन मैंने तुम्हारे समक्ष किया है। अब इस व्रत से सम्बन्धित एक अन्य माहात्म्य का श्रवण करो। हे राजन्! माहिष्मती नगरी में एक पापी चाण्डाल निवास करता था। कार्तिक मास की चतुर्थी तिथि के दिन वह चाण्डाल वन में गया। वन में एक सिंह उसके पीछे पड़ गया। सिंह से अपने प्राणों की रक्षा करने हेतु वह पापी चाण्डाल एक वृक्ष पर चढ़ गया। वह सिंह भी उसके उतरने की प्रतीक्षा में वृक्ष के नीचे ही खड़ा हो गया जिसके कारण वह चाण्डाल सम्पूर्ण रात्रि जागरण करता रहा। हे राजन्! उसी समय वन में एक सर्प आकर उस वृक्ष पर चढ़ गया। उस सर्प को देखकर चाण्डाल भयभीत होकर वृक्ष से नीचे गिर गया। नीचे खड़े सिंह ने पञ्चमी के दिन उसका भक्षण कर लिया। मृत्यु के उपरान्त वह महापापी चाण्डाल विमान पर आरूढ़ होकर भगवान गणेश के स्वानन्दपुर को चला गया।
अज्ञानता में ही उस चाण्डाल ने कार्तिक शुक्ल चतुर्थी का व्रत कर लिया था, क्योंकि उसे विवशता में निराहार रहना पड़ा था। किन्तु उसी से उसका व्रत सफल हो गया। अतः उस व्रत के पुण्य से उसे गणेश जी की प्राप्ति हुयी तथा वह ब्रह्मभूत हो गया। हे राजन्! इसी प्रकार अनेकों मनुष्य उस दिन व्रत का पालन कर ब्रह्म में लीन हो गये।”
महामुनि वशिष्ठ जी ने राजा दशरथ से कहा – “कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी की महिमा का वर्णन मैंने तुम्हारे समक्ष किया है। अतः है नृपश्रेष्ठ! जो इस महिमा का पाठ अथवा श्रवण करेगा, उसे समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होगी तथा वह पुत्र-पौत्रादि का सुख प्राप्त कर भगवान गणेश का प्रिय हो जायेगा।”
॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित कार्तिक शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥




