Sankarshan Chaturthi Vrat Katha – संकर्षण चतुर्थी व्रत कथा
संकर्षण चतुर्थी व्रत कथा – राजा ब्रह्मप्रिय की पाँच पत्नियों की मृत्यु की कथा
राजा दशरथ ने महर्षि वशिष्ठ से कहा – “हे मुनिश्रेष्ठ! अब आप वैशाख शुक्लपक्ष चतुर्थी के माहात्म्य का वर्णन करने की कृपा करें। चतुर्थी का व्रत पूर्णतः शुभ फल प्रदान करने वाला है। इसकी अमृतमयी कथा श्रवण कर मेरा मन तृप्त नहीं हो रहा है।”
वशिष्ठ मुनि ने कहा – “हे राजन्! गुजरात प्रदेश में सभी प्रकार की शोभाओं से सम्पन्न भद्रक नामक एक उत्तम नगर था। उस नगर में एक महान परोपकारी राजा शासन करता था, जिसका नाम ब्रह्मप्रिय था। वह राजा समस्त शास्त्रों के ज्ञान एवं शस्त्रास्त्र विद्या में पारङ्गत था तथा यज्ञ एवं दान करने में तत्पर रहता था। वह नित्य देवताओं, ब्राह्मणों एवं अतिथियों का पूजन-सत्कार करता था। सभी राजाओं को अधीन करके वह सम्पूर्ण भूमण्डल का राजा बन गया तथा अत्यन्त बलशाली होने के कारण वह सही राजाओं द्वारा मान्य हो गया एवं वन्दनीय हो गया।
एक समय उसकी धर्मपत्नी शीघ्र रजोदर्शन प्रारम्भ होते ही मृत्यु को प्राप्त हो गयी। उसकी मृत्यु के उपरान्त राजा ने दूसरा विवाह कर लिया। राज की दूसरी पत्नी भी राजा के ही समान ही शील स्वभाव वाली थी। किन्तु कुछ समय पश्चात् उसकी दूसरी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। हे राजन्! इसी प्रकार राजा ब्रह्मप्रिय की पाँच पत्नियों की मृत्यु हो गयी, जिसके कारण राजा अत्यन्त व्यथित हो गये। इस घटना से आहत होकर राजा ने अपने राज्य का कार्यभार अमात्यों एवं सचिवों को राज्य समर्पित करके वन में चले गये। वन में जाकर राजा ने अपने गुरु श्वेतकेतु को प्रणाम किया तथा करबद्ध होकर उनके समक्ष खड़े हो गये। ऋषि श्वेतकेतु ने अपने माननीय शिष्य को आसन प्रदान किया तथा कुशल-क्षेम पूछकर सम्मान दिया।
राजा के गुरु श्वेतकेतु ने राजा को भोजन आदि प्रदान कर पूछा – ‘हे राजसिंह! तुम्हारे इस प्रकार अकस्मात् मेरे आश्रम पर पधारने का क्या प्रयोजन है। अपने आगमन का मुख्य कारण मुझे बताइये। मैं प्रेमपूर्वक आपकी समस्या का समाधान करूँगा, क्योंकि तुम राज्य त्यागकर मेरे आश्रम में आये हो।’
राजर्षि श्वेतकेतु के इस प्रकार प्रश्न करने से राजा ब्रह्मप्रिय ने करबद्ध निवेदन करते हुये अपनी पत्नियों की मृत्यु से सम्बन्धित सम्पूर्ण व्यथा उनके समक्ष वर्णित कर दी। राजा की व्यथा सुनकर भगवान गणेश के परम भक्त महायोगी श्वेतकेतु ध्यानस्थ हुये एवं ध्यान में राजा की समस्या का कारण ज्ञात करके क्रोधपूर्वक राजा से बोले – ‘हे महापापी! हे अधम राजन्! तुम मेरे वचन ध्यानपूर्वक श्रवण करो, तुम्हारे राज्य में विशेष रूप से चतुर्थी व्रत का लोप हो गया है। चतुर्थी व्रत नहीं करने वाले मनुष्य के सभी शुभ कर्म फलहीन हो जाते हैं तथा अन्त समय में वह मनुष्य निःसन्देह नर्कगामी होता है। अतः हे राजन्! तुम्हारे राज्य में चतुर्थी व्रत न होने के कारण तुम धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष आदि चारों पुरुषार्थों से रहित हो गये हो, क्योंकि चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाली होने के कारण विद्वानों ने इसे चतुर्थी कहा है।’
अपने गुरु श्वेतकेतु के वचन सुनकर राजा ने खेदपूर्वक कहा – ‘हे मुनिवर! अज्ञानतावश मैंने सर्वस्व प्रदान करने वाली चतुर्थी व्रत का पालन नहीं किया, हे दयानिधे! इस अपराध के लिये मुझे क्षमा कीजिये। हे महात्मन्! मुझे बताने की कृपा करें कि यह सर्वस्व प्रदान करने वाला व्रत किस प्रकार किया जाता है तथा इसमें विधिपूर्वक किस देवता का पूजन किया जाता है।’ इस प्रकार राजा के प्रश्न करने पर श्वेतकेतु मुनि ने उस उत्तम व्रत का माहात्म्य वर्णित किया है।
उस व्रत के माहात्म्य का श्रवण करके राजा भी उनसे बोले कि – ‘यह गणाधीश कौन हैं? कैसे हैं? जिनका यह महान फलदायक व्रत है। हे महामुनि! कृपया आप उनके स्वरूप का वर्णन करें, मैं श्रद्धापूर्वक उनका ध्यान करूँगा।’
श्वेतकेतु बोले कि हे राजन्! मैं चतुर्थी व्रत का एक प्राचीन इतिहास वर्णित करता हूँ, जो मुझसे सम्बन्धित है। इसका श्रवण करके तुम ब्रह्म श्रीगणेश को भली-भाँति जान जाओगे। हे राजन्! मैं पूर्वकाल में अत्यन्त तपोनिष्ठ हो गया था। अपने पिता उद्दालक को प्रणाम करके मैं अपने पिता की साधना, सेवा एवं सुश्रूषा में लग गया। मुझे पूर्णतः तपस्या में लीन देखकर मेरे पिता शान्तिदाता महायशा उद्दालक ने मुझसे कहा – ‘हे पुत्र! महामते! तुम शान्ति प्राप्त करने हेतु तप को त्यागकर विशेष रूप से अहं ब्रह्मास्मि, अर्थात् “मैं ही ब्रह्म हूँ” यह मन में धारण करके परिश्रम करो। तुम कौन हो एवं कहाँ से आये हो बारम्बार योगाभ्यास करके इसे ज्ञात करो।’
पिता के वचन सुनकर मैंने कहा – ‘हे पिताश्री! अपने पुत्र को शान्ति प्रदान करने वाला श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान करें। यह भी बताने की कृपा करें कि चित्त कैसा है? क्या है? उसे महात्मा पुरुषों ने कैसे जाना है? उस चित्त में चिन्तामणि कौन है तथा महात्माओं ने चिन्तामणि को कैसे जाना है?'”
अब ऋषि वशिष्ठ ने राजा दशरथ से कहा – “हे राजन्! इस प्रकार जब श्वेतकेतु ने अपने पिता उद्दालक से पूछा तब गाणपत्य धर्म वाले महायोगी उद्दालक उनसे बोले – ‘हे पुत्र महाभाग! श्वेतकेतु तुम योगशान्ति प्रदान करने वाले व्रत का श्रवण करो। जिसके द्वारा सभी योगों के ज्ञाता होकर तुम ब्रह्मभूत अथवा ब्रह्मलीन हो जाओगे। हे पुत्र! चित्त को पाँच प्रकार का कहा गया है। क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र तथा निरोध, चित्त की यह पाँच भूमियाँ वर्णित की गयी हैं। चित्त की इन पाँच भूमियों को प्रकाशित करने वाले चिन्तामणि हृदय में स्थित हैं। योगी गण चित्त की पाँच भूमियों को नष्ट करके चिन्तामणि को प्राप्त करते हैं। ये बुद्धि स्वयं चित्तरूप है, अर्थात् चिन्तन बुद्धि में ही होता है। अतः बुद्धि एवं सिद्धि ये दो गणेश की माया हैं। गणेश को माया के साथ क्रीड़ा करने वाला कहा गया है। इसीलिये हे पुत्र! तुम गणेश के मन्त्र द्वारा उनकी साधना करो। उस योग द्वारा तुमने शान्ति प्राप्त होगी एवं शान्ति से तुम ब्रह्मभूतता को प्राप्त हो जाओगे।’ ऐसा कहकर महर्षि उद्दालक ने अपने पुत्र को ध्यान आदि से युक्त भगवान गणेश का एकाक्षर मन्त्र प्रदान किया।
उस मन्त्र के द्वारा मैं निरन्तर गणेश जी का ध्यान करता रहा तथा मुझे शान्ति प्राप्त हो गयी। तदुपरान्त में योगियों द्वारा भी वन्दनीय हो गया। अतः हे राजन्! तुम भी भगवान गणेश की आराधना करो, इसके द्वारा तुम परलोक में परम सुख की प्राप्ति करोगे। तदुपरान्त तुम ब्रह्म में लीन होकर निःसन्देह ब्रह्म ही हो जाओगे। ऐसा कहकर ऋषि श्वेतकेतु ने राजा ब्रह्मप्रिय को बत्तीस अक्षरों वाला मनु मन्त्र प्रदान कर दिया। मनु मन्त्र की दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात् राजा आनन्दपूर्वक ऋषिवर को प्रणाम करके अपने महल में आ गये।
तदुपरान्त वहाँ सर्वप्रथम वैशाख शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथि आयी। राजा ने श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक चतुर्थी का व्रत सम्पूर्ण प्रजा सहित किया। हे राजा दशरथ! राजा ब्रह्मप्रिय ने सम्पूर्ण राज्य में यह घोषणा कर दी कि शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी का व्रत सभी को करना है। अन्त में राजा भी सपत्नीक गणेश जी की भक्ति में लीन हो गये। राजा ने धर्मपूर्वक शासन किया तथा अन्त में अपने पुत्र को शासन सौंपकर सेवानिवृत्त हो गये।
भगवान गणेश की पूजा करते हुये राजा ने विघ्नेश्वर मन्त्र का जाप किया तथा निरन्तर चतुर्थी व्रत का पालन करते रहे। अन्त समय में व्रत के प्रभाव से वे ब्रह्म में लीन हो गये। उसी समय राजा ब्रह्मप्रिय नाम से विख्यात हो गये तथा अपने ब्रह्मप्रिय नाम को सार्थक कर दिया। उस राज्य में निवास करने वाले सभी मनुष्य समय आने पर स्वानन्दकपुर में ब्रह्मभूत हो गये। तदुपरान्त महर्षि उद्दालक एवं श्वेतकेतु दोनों अवधूत हो गये।”
वशिष्ठ मुनि ने कहा – “हे राजा दशरथ! अब तुम वैशाख शुक्ल चतुर्थी से सम्बन्धित एक अन्य माहात्म्य का श्रवण करो। महाराष्ट्र में एक स्त्री-लम्पट ब्राह्मण निवास करता था। वह मद्यपान, चोरी आदि दुर्गुणों से भी युक्त था। हत्या करके धन लूटकर, उस धन से वह परस्त्रीगमन करता था। एक समय कामातुर होकर वह एक शूद्र के घर चला गया है तथा धन देकर शूद्र की पत्नी के साथ रमण किया। वह बारम्बार उस शूद्र की स्त्री के साथ रमण करता रहा। एक समय वह ब्राह्मण उस शूद्र की पत्नी से रमण कर रहा था, उसी समय शूद्र घर लौट आया। अपनी पत्नी के साथ रमण करता देख शूद्र ने शस्त्र के आघात से उस पापी ब्राह्मण को धराशायी कर दिया, किन्तु उसकी मृत्यु नहीं हुयी थी। दैवयोग से उस दिन चतुर्थी तिथि थी तथा शस्त्र के आघात की पीड़ा के कारण उस दिन उस ब्राह्मण ने भोजन आदि नहीं किया तथा पूरे दिन निराहार रहा। अन्न एवं जल के अभाव एवं तथा शस्त्राघात के कारण पञ्चमी तिथि को उसका प्राणान्त हो गया। तदुपरान्त वह स्वानन्दलोक में प्रतिष्ठित होकर पूजित हुआ।
अतः अनभिज्ञता में वैशाख शुक्ल चतुर्थी के दिन भोजन प्राप्त न होने के कारण उसका व्रत सम्पन्न हो गया। चतुर्थी व्रत के पुण्यफल से वह महापापी ब्राह्मण भी ब्रह्मभूत हो गया, अर्थात् वह ब्रह्म में लीन हो गया। अतः अनभिज्ञ होते हुये भी व्रत के प्रभाव से वह दुष्टात्मा ब्रह्ममय हो गया, तो विधिवत् व्रत करने का तो फल वर्णित करना ही असम्भव है। अतः हे राजन्! अनेकों मनुष्य ज्ञात-अज्ञात रूप से चतुर्थी व्रत का पालन करके ब्रह्मलीन हो गये। जो मनुष्य वैशाख शुक्ल चतुर्थी के माहात्म्य का श्रवण अथवा पाठ करेगा, उसके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे।”
॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित वैशाख शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥




