Ganadheep Sankashti Vrat Katha – गणाधिप संकष्टी व्रत कथा
माता पार्वती जी ने भगवान गणेश से पूछा कि – “मार्गशीर्ष माह की कृष्ण चतुर्थी (अमान्त कार्तिक माह) संकटा कहलाती है, उस दिन किस गणेश की पूजा करनी चाहिये तथा उसका विधान क्या है?”
गणेश जी ने उत्तर दिया – “हे माता! मार्गशीर्ष में गणाधिप नामक गणेश की पूजा करनी चाहिये। पूजनोपरान्त अर्घ्य अर्पित करना चाहिये। पूर्ण दिवस उपवास का पालन करते हुये ब्राह्मण भोज करवाकर जौ, तिल, चावल, चीनी तथा घृत के मिश्रण द्वारा हवन करने से शत्रुओं को अधीन किया जा सकता है। मैं आपको इस व्रत से सम्बन्धित एक प्रसङ्ग सुनाता हूँ।
प्राचीन काल का प्रकरण है, त्रेतायुग में एक परम प्रतापी राजा थे जिनका नाम दशरथ था। राजा दशरथ को आखेट अत्यन्त प्रिय था। एक समय श्रवण कुमार नामक एक नवयुवक अपने दृष्टिहीन माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर तीर्थों की यात्रा करवा रहा था। एक स्थान पर उसके माता-पिता को प्यास लगती है जिसके कारण श्रवण कुमार समीप की ही नदी से जल लेने के लिये जाता है। संयोगवश उसी समय वहाँ राजा दशरथ आखेट करते हुये आ पहुँचते हैं। श्रवण कुमार जब जल भरने लगता है तो उसके घट से ध्वनि उत्पन्न होती है। दशरथ जी को लगता है कि कोई वन्य पशु नदी के तट पर जल पी रहा है। अतः वे अपने शब्दभेदी बाण को ध्वनि की दिशा में छोड़ देते हैं जो सीधा जाकर श्रवण कुमार को लगता है और उसका प्राणान्त हो जाता है।
श्रवण कुमार के दृष्टिहीन माता पिता को जब अपने पुत्र की मृत्यु के विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने महराज दशरथ को श्राप देते हुये कहा कि – ‘जिस प्रकार हम लोग पुत्र वियोग में प्राण त्याग रहे हैं उसी प्रकार तुम भी पुत्र वियोग में प्राण त्यागोगे।’ इतना कहते हुये श्रवण कुमार के माता-पिता ने भी अपने प्राण त्याग दिये।
इस घटना से राजा दशरथ अत्यन्त व्यथित एवं चिन्तित हुये तथा उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन करवाया। यज्ञ के फलस्वरूप भगवान विष्णु उनके पुत्र श्रीराम के रूप मे अवतरित हुये। देवी लक्ष्मी भी श्री राम जी की सहधर्मिणी का कर्तव्य पालन करने हेतु देवी सीता के रूप में अवतरित हुयीं।
लीलानुसार भगवान राम को वनवास के लिये अयोध्या से जाना पड़ा। वन में भगवान राम अपनी अर्धांगिनी देवी सीता एवं भ्राता लक्ष्मण सहित पञ्चवटी में निवास करने लगे जहाँ लङ्का नरेश रावण ने छलपूर्वक भगवान राम की अर्धांगिनी देवी सीता जी का हरण कर लिया। सीता जी के वियोग में भगवान राम उनकी खोज करते हुये ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे जहाँ उनकी भेंट सुग्रीव जी से हुयी। तदुपरान्त श्रीराम जी की सुग्रीव जी से मित्रता हुयी एवं हनुमान जी सहित विभिन्न वानर आदि गण देवी सीता की खोज करने लगे। वे सभी देवी सीता की खोज करते हुये जटायु जी के भ्राता सम्पाती के समक्ष पहुँचे। सम्पाती ने उन वानरों को देखकर पूछा – ‘आप लोग कौन हैं? इस वन में आपके आने का क्या प्रयोजन है? आपको किसने भेजा है? तथा आप यहाँ किस प्रकार पहुँचे?’ सम्पाती के प्रश्नों को सुनकर वानरों ने उत्तर दिया कि – ‘भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम जी की अर्धांगिनी माता जानकी का हरण असुरराज रावण ने कर लिया है। हम सभी माता की खोज करते हुये यहाँ तक पहुँचे हैं।’
यह सुनकर सम्पाती ने कहा – ‘मेरा भ्राता जटायु माता सीता के लिये अपने प्राणों का बलिदान दे चुका है। आप सभी मेरे प्रभु दशरथनन्दन श्रीराम के सेवक हैं अतः मेरे भी मित्र हुये। मैं आपकी सहायता अवश्य करूँगा। यहाँ से कुछ ही दूरी पर विशाल समुद्र है जिसके उस पार राक्षसों की एक विशाल नगरी है। वहाँ वृक्ष के नीचे देवी सीता विराजमान हैं। मैं रावण द्वारा अपहृत देवी सीता जी को स्पष्ट देख सकता हूँ। आप सभी में हनुमान जी अति बलशाली एवं पराक्रमी हैं। इसीलिये उन्हें उस राक्षस की नगरी में जाना चाहिये। मात्र हनुमान जी ही अपने आत्मबल से उस विशाल समुद्र को लाँघ सकते हैं। उनके अतिरिक्त कोई अन्य इस दुर्गम कार्य में समर्थ नहीं है।’ सम्पाती जी के वचन सुनकर हनुमान जी ने पूछा – ‘हे सम्पाती! मैं इस विशाल समुद्र को भला किस प्रकार लाँघ सकता हूँ।’
सम्पाती ने उत्तर दिया कि – ‘हे मित्र! आप संकटनाशन गणेश चतुर्थी का व्रत कीजिये। उस व्रत के प्रभाव से आप समुद्र को क्षणमात्र में पार कर लेंगे।’
सम्पाती के निर्देशानुसार हनुमान जी ने संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को किया। हे देवी! इस व्रत के प्रभाव से तत्क्षण हनुमान जी उस दुस्तर समुद्र को लाँघ गये। समस्त संसार में इस व्रत के समान सुखदायक कोई अन्य व्रत नहीं है।”
॥इति श्री गणाधिप संकष्टी चतुर्थी कथा सम्पूर्णः॥
माहात्म्य
भगवान श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि – “महाराज युधिष्ठिर! आप भी इस व्रत को अवश्य करें। इस व्रत के प्रभाव से आप क्षणभर में शत्रुओं को परास्त करके अपने राज्य को पुनः प्राप्त करेंगे।” भगवान कृष्ण के वचनों का पालन करके युधिष्ठिर ने गणेश चतुर्थी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उन्होंने अपने शत्रुओं को पराजित किया तथा उन्हें उनका राज्य पुनः प्राप्त हुआ।




