मास वैशाख कृतिका युत,हरण मही को भार। शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन,लियो नरसिंह अवतार॥
जैसे अटल हिमालय,और जैसे अडिग सुमेर। ऐसे ही स्वर्ग द्वार पै,अविचल खड़े कुबेर॥
श्री गुरु पद नमन करि,गिरा गनेश मनाय। कथूं रामदेव विमल यश,सुने पाप विनशाय॥
बन्दहुँ वीणा वादिनी,धरि गणपति को ध्यान। महाशक्ति राधा सहित,कृष्ण करौ कल्याण॥
श्री गुरु चरण चितलाय,के धरें ध्यान हनुमान। बालाजी चालीसा लिखे,दास स्नेही कल्याण॥
श्री गुरु चरण सरोज छवि,निज मन मन्दिर धारि। सुमरि गजानन शारदा,गहि आशिष त्रिपुरारि॥
विनय करौं कर जोड़कर,मन वचन कर्म संभारि। मोर मनोरथ पूर्ण कर,विश्वकर्मा दुष्टारि॥
श्री गणपति गुरुपद कमल,प्रेम सहित सिरनाय। नवग्रह चालीसा कहत,शारद होत सहाय॥
श्री भैरव सङ्कट हरन,मंगल करन कृपालु। करहु दया जि दास पे,निशिदिन दीनदयालु॥
विश्वनाथ को सुमिर मन,धर गणेश का ध्यान। भैरव चालीसा रचूं,कृपा करहु भगवान॥


